“एक बेटे को लगता था कि पिता के सामने झुकने से उसका ‘रुतबा’ कम हो जाएगा, लेकिन उसे क्या पता था कि जिस ऊंचाई पर वह आज खड़ा है, उसकी नींव में उसके पिता की झुकी हुई कमर का ही सहारा है। पढ़िए एक ऐसी कहानी जो आपकी रूह को झकझोर देगी।”
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“पापा, अब और नहीं! मैंने तय कर लिया है। मैं और नमिता इस घर में अब एक पल भी नहीं रहेंगे। रोज़-रोज़ की किचकिच, आपके पुराने नियम-कायदे और यह उम्मीद करना कि मैं हर बात में ‘जी बाबूजी’ कहूँ… अब मुझसे नहीं होगा। मेरा भी अपना कोई वजूद है, कोई सेल्फ-रिस्पेक्ट (आत्म-सम्मान) है।”
आलोक की आवाज़ ड्राइंग रूम में गूंज रही थी। सामने सोफे पर बैठे उसके पिता, मास्टर दीनानाथ जी, चुपचाप अपनी छड़ी को मुट्ठी में भींचे हुए थे। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरा, अतल सन्नाटा था। माँ, सुमित्रा देवी, दरवाजे की चौखट पर खड़ीं आंसुओं से अपना पल्लू भिगो रही थीं।
“बेटा,” दीनानाथ जी ने बहुत धीमे स्वर में कहा, “मैंने सिर्फ़ इतना कहा था कि बड़ों के सामने जुबान लड़ाना शोभा नहीं देता। कल ताऊजी आए थे, तूने उनके पैर तक नहीं छुए। वो क्या सोचकर गए होंगे?”
“यही! यही तो दिक्कत है आपकी!” आलोक झल्लाया। “पैर छूना, झुकना… यह सब गुलामी की निशानी है पापा। मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी का वीपी (Vice President) हूँ। पचास लोग मुझे ‘सर-सर’ कहते हैं। और आप चाहते हैं कि मैं घर आते ही हर ऐरे-गैरे रिश्तेदार के पैरों में गिर जाऊं? झुकने से इज़्ज़त कम होती है, यह आप नहीं समझेंगे।”
नमिता, आलोक की पत्नी, भी सामान पैक करते हुए बाहर आई। “आलोक ठीक कह रहे हैं बाबूजी। झुकना और सम्मान देना दो अलग बातें हैं। हम मॉडर्न लोग हैं। हम दिल से इज़्ज़त करते हैं, दिखावे के लिए कमर झुकाना हमें नहीं आता।”
दीनानाथ जी ने एक गहरी सांस ली। “ठीक है बेटा। अगर तुम्हें लगता है कि झुकने से तुम छोटे हो जाओगे, तो तुम अपना रास्ता चुनने के लिए आज़ाद हो। बस याद रखना, आकाश में उड़ने वाली पतंग भी डोर से जुड़ी होती है, जिस दिन डोर कटी, वो ज़मीन पर ही गिरती है।”
आलोक ने व्यंग्य से हंसा। “आप चिंता मत कीजिये। मेरी डोर मेरे टैलेंट और मेरे पैसे के हाथ में है। हम जा रहे हैं।”
आलोक, नमिता और उनका पांच साल का बेटा, अंश, अपनी लग्ज़री गाड़ी में बैठकर चले गए। दीनानाथ जी और सुमित्रा देवी उस बड़े से पुश्तैनी घर में अकेले रह गए।
शहर के सबसे पॉश इलाके में आलोक ने एक आलीशान पेंटहाउस किराए पर लिया। ज़िंदगी बहुत मज़े में कटने लगी। न कोई रोकने वाला, न कोई टोकने वाला। आलोक को लगा कि उसने ज़िंदगी की सबसे बड़ी जंग जीत ली है। उसने अपने अहंकार को अपने स्वाभिमान का नाम दे दिया था।
छह महीने बीत गए। दीनानाथ जी ने कई बार बेटे को फोन किया, लेकिन आलोक ने या तो उठाया नहीं या “बिज़ी हूँ” कहकर काट दिया।
एक दिन ऑफिस में आलोक के बॉस ने उसे बुलाया।
“आलोक, हमें एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मिला है—’ग्रीन वैली टाउनशिप’ का। लेकिन इसमें एक पेंच है। जिस ज़मीन पर यह प्रोजेक्ट बनना है, वह एक पुराने ट्रस्ट की ज़मीन है। उसके ट्रस्टी बहुत उसूलों वाले आदमी हैं। अगर वो मान गए, तो कंपनी को करोड़ों का मुनाफा होगा और तुम्हारा प्रमोशन पक्का। तुम्हें उनसे मिलना है।”
आलोक का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। “डोंट वरी सर। मैं किसी को भी मना सकता हूँ। मेरा रिकॉर्ड है।”
आलोक फाइल लेकर उस ट्रस्टी के पास पहुंचा। ट्रस्टी का नाम था—सेठ रामगोपाल।
आलोक उनके केबिन में गया। रामगोपाल जी एक साधारण धोती-कुर्ते में बैठे थे। आलोक ने हाथ मिलाया और बड़े ही एटीट्यूड के साथ अपनी प्रेजेंटेशन देनी शुरू की।
“देखिये सर, हम आपको मार्केट रेट से डबल पैसा देंगे। आपकी ज़मीन वैसे भी खाली पड़ी है। हम वहां मॉल और फ्लैट्स बनाएंगे…” आलोक बोलता गया।
रामगोपाल जी ने शांति से उसे सुना और फिर फाइल बंद कर दी।
“माफ़ कीजियेगा मिस्टर आलोक। हम यह ज़मीन आपको नहीं दे सकते।”
“क्यों?” आलोक हैरान रह गया। “पैसे कम लग रहे हैं क्या?”
“नहीं,” रामगोपाल जी ने कहा। “बात पैसों की नहीं, संस्कारों की है। आपकी कंपनी का पिछला रिकॉर्ड अच्छा है, लेकिन जिस आदमी को भेजा गया है (यानी आप), उसकी बातों में अहंकार की बू आती है। जो इंसान बात करते वक्त मेरी आँखों में आँखें डालकर ‘सौदा’ कर रहा है, लेकिन एक बार भी उसने अपनी कुर्सी से उठकर एक बुजुर्ग (मुझे) को नमस्ते तक नहीं किया, वो मेरे अनाथालय की ज़मीन का क्या आदर करेगा? मुझे ऐसे लोगों के साथ काम नहीं करना जो सिर्फ़ पैसा जानते हैं, विनम्रता नहीं।”
आलोक को जैसे सांप सूंघ गया। वह अपमानित होकर वहां से निकला। उसने बहुत कोशिश की, बॉस से सिफारिश करवाई, लेकिन रामगोपाल जी टस से मस नहीं हुए।
आखिरकार, बॉस ने अल्टीमेटम दे दिया। “आलोक, अगर यह डील हाथ से गई, तो तुम्हारी नौकरी खतरे में है। मुझे नहीं पता तुम क्या करोगे, लेकिन मुझे वो ज़मीन चाहिए।”
आलोक डिप्रेशन में आ गया। उसकी रातों की नींद उड़ गई। घर की ईएमआई, गाड़ी का लोन, नमिता की शॉपिंग—सब कुछ उसकी नौकरी पर टिका था। और अब वह नौकरी जाने वाली थी।
एक शाम वह पार्क में बेंच पर बैठा था, सिर झुकाए। उसका बेटा अंश वहां खेल रहा था। खेलते-खेलते अंश का एक सिक्का नाली के पास गिर गया।
अंश दौड़ा और झुककर नाली के कीचड़ के पास से वह सिक्का उठाने लगा।
“छोड़ उसे अंश! गंदा है!” आलोक चिल्लाया। “मैं तुझे नया दे दूंगा। झुक मत वहां।”
अंश ने सिक्का उठाया, अपनी टी-शर्ट से पोंछा और माथे से लगा लिया।
“पापा,” अंश ने मासूमियत से कहा, “दादू कहते थे कि इसमें लक्ष्मी होती है। और कीमती चीज़ अगर कीचड़ में भी गिर जाए, तो उसे झुककर उठा लेना चाहिए। झुकने से हम गंदे नहीं होते, बल्कि हम उस चीज़ को खोने से बचा लेते हैं।”
आलोक सन्न रह गया। ‘कीमती चीज़ को उठाने के लिए झुकना पड़ता है’। उसके दिमाग में एक बिजली सी कौंधी।
उसने घर आकर नमिता को सारी बात बताई। नमिता भी चुप हो गई।
“आलोक,” नमिता ने धीरे से कहा, “शायद दादू सही थे। और शायद… रामगोपाल जी भी सही थे। हमारा अहंकार हमें ले डूबा। लेकिन अब क्या होगा?”
आलोक के पास कोई जवाब नहीं था। उसे लगा सब ख़त्म हो गया।
अगले दिन सुबह, आलोक के बॉस का फोन आया।
“आलोक, तुम कहाँ हो? जल्दी ऑफिस आओ। सेठ रामगोपाल जी ने डील साइन कर दी है।”
“क्या?” आलोक को यकीन नहीं हुआ। “लेकिन सर, उन्होंने तो मुझे धक्के मारकर निकाल दिया था। फिर अचानक कैसे?”
“मुझे नहीं पता। उन्होंने कहा कि वो सिर्फ़ एक शर्त पर साइन करेंगे कि इस प्रोजेक्ट का हेड आलोक ही रहेगा। जाओ, उनसे मिलो और थैंक यू बोलो।”
आलोक पागलों की तरह रामगोपाल जी के दफ्तर पहुंचा। वहां पहुंचकर उसने देखा कि रामगोपाल जी के केबिन में कोई और भी बैठा है।
वह शख़्स धोती-कुर्ते में था, हाथ में छड़ी थी।
आलोक के कदम ठिठक गए। वह उसके पिता, दीनानाथ जी थे।
दीनानाथ जी कुर्सी पर नहीं, बल्कि रामगोपाल जी के सामने खड़े थे, हाथ जोड़े हुए।
“सेठ जी,” दीनानाथ जी कह रहे थे, “मेरा बेटा नादान है। उसे अभी दुनियादारी की समझ नहीं है। उसे लगता है कि अकड़ कर चलने में शान है। लेकिन वह दिल का बुरा नहीं है। उसकी नौकरी मत छिनिये। मैं उसका पिता हूँ, मैं उसकी तरफ से आपके सामने हाथ जोड़ता हूँ, अपना सिर झुकाता हूँ। उसे माफ़ कर दीजिये।”
और आलोक ने देखा कि उसके पिता, जो घुटनों के दर्द से कराहते थे, झुककर सेठ रामगोपाल जी के पैर छूने जा रहे थे।
सेठ रामगोपाल जी ने तुरंत दीनानाथ जी को थाम लिया और गले लगा लिया। “अरे मास्टर जी! आप यह क्या कर रहे हैं? आप तो मेरे गुरु रहे हैं। बचपन में आपने ही मुझे ककहरा सिखाया था। आप मेरे सामने झुकेंगे? यह पाप मत चढ़ाइये मुझे।”
रामगोपाल जी ने आगे कहा, “मैंने तो डील इसलिए कैंसिल की थी क्योंकि उस लड़के में मुझे आपका अक्स नहीं दिखा। लेकिन जब कल आप मेरे घर आए और आपने अपनी पगड़ी मेरे पैरों में रख दी… तो मैं हार गया। जिस पिता के पास इतना बड़ा ‘झुकने वाला दिल’ हो, उसका बेटा कभी न कभी तो सुधरेगा ही। मैंने डील आपके बेटे के लिए नहीं, आपके उस झुके हुए सिर के मान के लिए साइन की है।”
दरवाज़े पर खड़ा आलोक यह सब सुन रहा था। उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। वह जिस पिता को ‘पुराने ख्यालात’ और ‘कमज़ोर’ समझता था, आज उसी पिता ने झुककर उसका करियर, उसकी इज़्ज़त और उसका भविष्य बचा लिया था।
आलोक को अंश की बात याद आई—*हर कीमती वस्तु को उठाने के लिए झुकना ही पड़ता है।* आज उसके पिता ने झुककर अपने बेटे की ज़िंदगी उठा ली थी।
आलोक अंदर दौड़ा। उसने न बॉस की परवाह की, न सेठ जी की। वह सीधा अपने पिता के पैरों में गिर पड़ा। उसने अपने दोनों हाथों से पिता के चरण पकड़ लिए और अपना माथा उन पर रख दिया।
“पापा… पापा मुझे माफ़ कर दीजिये!” आलोक फूट-फूट कर रो रहा था। “मैं हार गया पापा। मेरा अहंकार हार गया। आप जीत गए। आपने सही कहा था, झुकने से इंसान छोटा नहीं होता। आज आप मेरे लिए झुके, इसलिए मैं खड़ा हो पाया।”
दीनानाथ जी की आँखों में भी पानी आ गया। उन्होंने झुककर बेटे को उठाया। “उठ जा पगले। बाप कभी अपने बच्चों से नहीं जीतना चाहता। बाप तो बस यह चाहता है कि उसका बेटा कभी दुनिया से न हारे।”
आलोक ने सेठ रामगोपाल जी के भी पैर छुए। “सर, आपने मुझे बहुत बड़ा सबक दिया है। अब यह प्रोजेक्ट सिर्फ़ प्रॉफिट के लिए नहीं, बल्कि सेवा भाव से बनेगा।”
उस शाम, आलोक और नमिता वापस अपने पुराने घर, ‘शांति-कुंज’ लौटे।
गाड़ी से उतरते ही आलोक ने देखा कि घर का वही पुराना गेट है, वही तुलसी का चौरा है। माँ आरती की थाली लिए खड़ी थीं।
आलोक ने घर की देहरी पर सिर झुकाकर प्रणाम किया। नमिता ने भी पल्लू सिर पर रख लिया।
अंश दौड़कर दादाजी की गोद में चढ़ गया। “दादू! देखो मेरे पास सिक्का है।”
दीनानाथ जी हंसे। “अरे वाह! कहाँ से मिला?”
“मैंने झुककर उठाया दादू,” अंश ने गर्व से कहा।
आलोक ने पिता की तरफ देखा और नम आँखों से मुस्कुराया। “हाँ पापा, आज मैंने भी अपनी ज़िंदगी का सबसे कीमती सिक्का—’आपका आशीर्वाद’—झुककर उठा लिया है।”
रात के खाने पर आज डाइनिंग टेबल पर सन्नाटा नहीं था, बल्कि हंसी-ठिठोली थी। आलोक ने महसूस किया कि जो सुकून पिता के सामने सिर झुकाकर आशीर्वाद लेने में है, वह दुनिया की किसी भी ऊँची कुर्सी पर बैठकर नहीं मिलता।
उसने सीखा कि वृक्ष जितना फलों से लदा होता है, उतना ही झुका होता है। और जो ठूंठ अकड़ा रहता है, आंधी उसे सबसे पहले उखाड़ फेंकती है।
उस रात आलोक ने अपनी डायरी में लिखा:
*”मैंने सोचा था कि झुकने से मुकुट गिर जाता है, लेकिन आज समझ आया कि बड़ों के चरणों में झुकने से ही सिर पर इज़्ज़त का ताज सजता है। पिता का झुकना मजबूरी नहीं, उनकी ताकत थी। और मेरा झुकना हार नहीं, मेरी नई शुरुआत है।”*
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**क्या इस कहानी ने आपके दिल को छुआ?**
अक्सर हम आधुनिकता की दौड़ में यह भूल जाते हैं कि **विनम्रता हमारा आभूषण है, कमजोरी नहीं।** जो इंसान अपने माता-पिता और ईश्वर के सामने झुकना जानता है, दुनिया की कोई ताकत उसे गिरा नहीं सकती। याद रखिये, **अकड़ तो मुर्दे की पहचान होती है, झुकना तो ज़िंदा इंसान का स्वभाव है।**
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मूल लेखिका : कमलेश राणा