**”दीदी!! ये घर हम दोनों बहुओं का है, तो इस घर की जिम्मेदारी भी हम दोनों की ही होनी चाहिए।** सिर्फ़ सुख में हिस्सा बंटाना ही बहू का धर्म नहीं होता, दुख में कंधा देना भी उसी का धर्म है। आप जेठानी हैं तो क्या हुआ? क्या मैं इस घर की बेटी नहीं?”
बनारस के पुराने मोहल्ले में स्थित ‘रघुनाथ सदन’ अपनी मजबूती और संस्कारों के लिए जाना जाता था। घर के मुखिया, दीनानाथ जी, और उनकी धर्मपत्नी, सुशीला देवी, ने अपने दोनों बेटों—आलोक और सुमित—को बड़े नाज़ों से पाला था। आलोक बड़ा था और स्वभाव से बेहद गंभीर। उसकी पत्नी, वंदना, पिछले सात सालों से इस घर की बड़ी बहू (जेठानी) बनकर हर ज़िम्मेदारी को बखूबी निभा रही थी। सुमित छोटा था, चंचल और अभी-अभी अपनी पढ़ाई पूरी करके नौकरी में लगा था।
दो महीने पहले ही सुमित की शादी ‘रिया’ से हुई थी। रिया शहर की पढ़ी-लिखी, एमबीए पास मॉडर्न लड़की थी। जब रिया इस घर में आई, तो मोहल्ले की औरतों ने सुशीला देवी के कान भरने शुरू कर दिए थे।
“अरे सुशीला, देख लेना, ये आज-कल की लड़कियां घर नहीं जोड़ पातीं। वंदना तो सीधी-सादी है, पर ये रिया तो नौकरी-पेशे वाली है, इसे घर के काम-काज से क्या मतलब? देखना, आते ही बंटवारा करवाएगी।”
लेकिन सुशीला देवी को अपने संस्कारों पर भरोसा था, और उससे भी ज्यादा भरोसा उन्हें अपनी बड़ी बहू वंदना पर था, जिसने रिया का स्वागत देवरानी की तरह नहीं, बल्कि अपनी छोटी बहन की तरह किया था।
वंदना सुबह पांच बजे उठ जाती। घर की सफाई, नाश्ता, दीनानाथ जी की दवाइयाँ, और फिर बच्चों को स्कूल भेजना—वह मशीन की तरह काम करती। रिया अक्सर देर से उठती, क्योंकि उसका ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) चलता था और वह रात-रात भर लैपटॉप पर खटपट करती रहती थी।
वंदना ने कभी रिया को जल्दी उठने के लिए नहीं कहा। उसे लगता था कि रिया अभी नई है, धीरे-धीरे ढल जाएगी। लेकिन वंदना के चेहरे पर एक थकान और चिंता की लकीरें अब गहरी होती जा रही थीं, जिसे घर के पुरुष तो नहीं देख पा रहे थे, पर रिया की तेज़ नज़रें उसे भांप रही थीं।
एक रात, करीब 12 बजे रिया पानी पीने के लिए रसोई में आई। उसने देखा कि वंदना डाइनिंग टेबल पर बैठी है। सामने घर के खर्च की डायरी खुली पड़ी है और वह सिर पकड़े बैठी है। वंदना की आँखों में आंसू थे।
रिया ठिठक गई। उसने देखा कि वंदना ने अपनी कलाई से सोने के कंगन उतारे और उन्हें एक मखमली डिब्बे में रख दिया। फिर उसने अपने गले की चेन भी उतार दी। वह उन गहनों को ऐसे देख रही थी जैसे अपने जिगर के टुकड़े को विदा कर रही हो।
रिया को समझते देर नहीं लगी कि मामला गंभीर है। उसने पिछले कुछ दिनों से महसूस किया था कि घर में राशन कम आ रहा है, आलोक भैया अक्सर तनाव में रहते हैं, और ससुर जी की दवाइयां भी अब सरकारी डिस्पेंसरी से आ रही हैं, न कि प्राइवेट केमिस्ट से।
रिया दबे पाँव वापस अपने कमरे में आ गई। उसने सुमित को जगाया।
“सुमित, घर में क्या चल रहा है? दीदी इतनी परेशान क्यों हैं? मैंने उन्हें अभी अपने गहने पैक करते हुए देखा।”
सुमित ने नींद भरी आँखों में हड़बड़ाते हुए कहा, “रिया, तुम इन सब में मत पड़ो। भैया का बिज़नेस पिछले छह महीनों से बहुत घाटे में चल रहा है। ऊपर से पापा की हार्ट सर्जरी के लिए डॉक्टर ने 5 लाख का खर्चा बताया है। भैया नहीं चाहते कि पापा को पता चले कि घर गिरवी रखने की नौबत आ गई है। इसलिए शायद भाभी…” सुमित की आवाज़ भर्रा गई। “मैं अभी नया हूँ नौकरी में, मेरी सेविंग्स इतनी नहीं हैं। भैया ने मना किया है तुम्हें बताने से, उन्हें लगता है तुम नई हो, घबरा जाओगी।”
रिया पूरी रात सो नहीं पाई। उसे गुस्सा भी आ रहा था और दुख भी। गुस्सा इसलिए कि उसे ‘परिवार’ का हिस्सा मानकर भी उससे सच छिपाया गया, और दुख इस बात का कि वंदना अकेले इस तूफान से लड़ रही थी।
अगली सुबह, घर में अजीब सी खामोशी थी। वंदना तैयार होकर, हाथ में वही मखमली डिब्बा लिए, आलोक के साथ सुनार के यहाँ जाने के लिए निकल रही थी। उसने झूठ बोला था कि वह मायके से मिले गहनों को पॉलिश करवाने जा रही है। सुशीला देवी खुश थीं कि बहू गहनों का ख्याल रख रही है।
जैसे ही वंदना दहलीज पार करने वाली थी, पीछे से एक आवाज़ आई।
“रुकिए दीदी!”
वंदना और आलोक पलट गए। रिया खड़ी थी। उसके हाथ में एक बड़ा सा लिफाफा और एक छोटा बॉक्स था।
रिया तेज़ कदमों से उनके पास आई। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी—विद्रोह की नहीं, अधिकार की।
“आप कहाँ जा रही हैं दीदी?” रिया ने सीधा सवाल किया।
वंदना हड़बड़ा गई। “वो… रिया, सुनार के पास। थोड़ी पॉलिश करवानी थी।”
“पॉलिश करवाने या गिरवी रखने?” रिया की आवाज़ ने सन्नाटा चीर दिया।
आलोक और वंदना के चेहरे का रंग उड़ गया। सुशीला देवी और दीनानाथ जी भी अपने कमरे से बाहर आ गए। “क्या हुआ? गिरवी? क्या कह रही है रिया?” सुशीला देवी ने घबराकर पूछा।
वंदना ने रिया को चुप रहने का इशारा किया, “रिया, प्लीज। अभी तुम बच्चे हो, तुम्हें नहीं पता। अंदर जाओ।”
रिया ने वंदना का हाथ पकड़ लिया। “नहीं दीदी, अब मैं अंदर नहीं जाऊंगी। आप मुझे ‘बच्चा’ और ‘नई बहू’ कहकर कब तक पराया रखेंगी?”
वंदना की आँखों से आंसू छलक पड़े। “रिया, आलोक का काम ठप पड़ गया है। बाबूजी का ऑपरेशन ज़रूरी है। मेरे पास और कोई रास्ता नहीं है। ये कंगन मेरी माँ की निशानी हैं, पर बाबूजी की जान से बढ़कर नहीं। तुम समझो, मैं बड़ी हूँ, यह मेरा फर्ज़ है।”
तभी रिया ने वह बात कही, जिसने उस घर की दीवारों को हिलाकर रख दिया।
उसने वंदना के हाथ से वह गहनों का डिब्बा छीन लिया और अपना लिफाफा वंदना के हाथ में थमा दिया।
**”दीदी!! ये घर हम दोनों बहुओं का है, तो इस घर की जिम्मेदारी भी हम दोनों की ही होनी चाहिए।** सिर्फ़ सुख में हिस्सा बंटाना ही बहू का धर्म नहीं होता, दुख में कंधा देना भी उसी का धर्म है। आप जेठानी हैं तो क्या हुआ? क्या मैं इस घर की बेटी नहीं?”
वंदना अवाक रह गई। उसने कांपते हाथों से लिफाफा खोला। उसमें रिया की एफ.डी. (Fixed Deposit) के कागज़ात और उसके खुद के कुछ गहने थे।
“ये क्या है रिया?” आलोक ने आश्चर्य से पूछा।
“भैया,” रिया ने आलोक की ओर मुड़कर कहा, “ये मेरे 3 लाख की एफ.डी. है जो मैंने शादी से पहले अपनी नौकरी से जोड़ी थी। और ये मेरे कंगन हैं। पापा के ऑपरेशन के लिए 5 लाख चाहिए ना? दीदी के गहने बेचने की ज़रूरत नहीं है। मेरी एफ.डी. तुड़वा लीजिए और बाकी के लिए हम बैंक से पर्सनल लोन ले लेंगे, जिसकी ईएमआई (EMI) मैं अपनी सैलरी से भरूंगी।”
“नहीं रिया!” वंदना तड़प उठी। “यह तेरा स्त्रीधन है। तू अभी नई है, तेरी पूरी ज़िंदगी पड़ी है। हम तेरा पैसा नहीं ले सकते।”
रिया ने वंदना के दोनों कंधे पकड़े और उसकी आँखों में झांका।
“दीदी, जब मैं विदा होकर आई थी, तो मुझे सबसे ज्यादा डर सास का नहीं, जेठानी का था। सुना था जेठानियां हुक्म चलाती हैं। पर आपने? आपने मुझे सुबह देर तक सोने दिया, मेरा काम किया, मुझे अपनी बहन माना। जब आपने मुझे प्यार देने में ‘बड़ा-छोटा’ नहीं देखा, तो आज मुसीबत में मुझे ‘छोटा’ बताकर अलग क्यों कर रही हैं? अगर यह घर डूबता, तो क्या मैं बच जाती? हम एक नाव में हैं दीदी।”
सुशीला देवी, जो यह सब सुन रही थीं, दौड़कर आईं और दोनों बहुओं को गले लगा लिया। वह फूट-फूट कर रोने लगीं।
“हे भगवान! लोग कहते थे कलयुग आ गया है, बहुएं घर तोड़ती हैं। पर मेरे घर में तो तूने दो देवियां भेज दीं। एक ने मर्यादा रखी और दूसरी ने मान।”
दीनानाथ जी की आँखों में भी नमी थी। उन्हें अपनी बीमारी का डर खत्म हो गया था क्योंकि उन्हें दिख गया था कि उनके घर की नींव अब पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत है।
उस दिन गहने नहीं बिके। रिया की एफ.डी. और आलोक की थोड़ी सी व्यवस्था से ऑपरेशन हो गया। लेकिन उस घटना ने घर का माहौल हमेशा के लिए बदल दिया।
अब वंदना अकेली नहीं थी।
सुबह का नज़ारा बदल चुका था। अब वंदना रसोई में अकेली नहीं खटती थी। रिया सुबह जल्दी उठती, वंदना के साथ नाश्ता बनवाती और फिर अपने ऑफिस के काम पर लगती। वंदना ने भी रिया से बहुत कुछ सीखा। रिया ने वंदना को समझाया कि सिर्फ़ बचत करना काफी नहीं है, आमदनी बढ़ाना भी ज़रूरी है।
रिया ने देखा कि वंदना के हाथ का बना अचार और पापड़ बहुत स्वादिष्ट होता है।
“दीदी, आप इतना अच्छा अचार बनाती हैं, हम इसे ऑनलाइन क्यों नहीं बेचते?” रिया ने एक दिन सुझाव दिया।
वंदना झिझकी, “अरे नहीं रिया, लोग क्या कहेंगे? रघुनंदन सदन की बड़ी बहू अचार बेचेगी?”
“लोग तो तब भी कहेंगे जब हम दाने-दाने को मोहताज होंगे,” रिया ने उसे हौसला दिया। “हुनर की कद्र करना सीखिए दीदी। मैं मार्केटिंग संभालूंगी, आप प्रोडक्शन संभालिए।”
और फिर, उन दोनों ने मिलकर ‘वंदना’स किचन’ नाम से एक छोटा सा स्टार्टअप शुरू किया। शुरुआत मोहल्ले से हुई, फिर शहर में, और देखते ही देखते उनके अचार और मसालों की मांग बढ़ने लगी। जो वंदना कल तक घर खर्च के लिए पति के आगे हाथ फैलाने पर मजबूर थी, आज वह खुद आलोक के बिज़नेस में मदद करने लायक हो गई थी।
एक शाम, जब पूरा परिवार आंगन में बैठा चाय पी रहा था, आलोक ने रिया और वंदना की तरफ देखा।
“जानती हो सुमित,” आलोक ने कहा, “मुझे हमेशा लगता था कि मैं इस घर की छत हूँ। पर आज समझ आया कि छत दीवारों पर टिकती है, और ये दोनों (वंदना और रिया) इस घर की वो दीवारें हैं जिन्होंने हर तूफ़ान को बाहर ही रोक दिया।”
रिया मुस्कुराई और वंदना के कंधे पर सिर रख दिया।
“दीदी, याद है आपने कहा था कि जेठानी माँ समान होती है?”
वंदना ने हंसते हुए कहा, “हाँ, पर तूने साबित कर दिया कि देवरानी, दोस्त और ढाल दोनों हो सकती है।”
उस दिन रघुनाथ सदन में सिर्फ़ दीये की रोशनी नहीं थी, बल्कि रिश्तों की एक ऐसी चमक थी जो कभी फीकी पड़ने वाली नहीं थी। मोहल्ले वाले जो कल तक रिया की आलोचना करते थे, अब अपनी बहुओं को रिया और वंदना की मिसाल देते थे।
वे समझ गए थे कि घर ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि **”तेरा” और “मेरा” छोड़कर “हमारा” कहने से बनता है।**
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**कहानी का सार:**
अक्सर परिवारों में जेठानी और देवरानी के बीच तुलना और प्रतिस्पर्धा की दीवार खड़ी कर दी जाती है। “बड़ी है तो ज़िम्मेदारी उठाएगी” और “छोटी है तो मज़े करेगी”—ये सोच रिश्तों में दीमक लगा देती है। लेकिन जब रिया ने आगे बढ़कर ज़िम्मेदारी बांटी, तो उसने न केवल घर बचाया, बल्कि अपनी जेठानी को एक घुटन भरी ज़िंदगी से भी आज़ाद किया।
अगर रिया चुप रहती, तो वंदना अपने गहने बेच देती और शायद ताउम्र अपने मन में एक कड़वाहट पाल लेती कि “मैंने इस घर के लिए सब कुछ खो दिया और किसी ने कद्र नहीं की।” रिया के उस एक कदम ने वंदना को ‘त्याग की मूर्ति’ बनने से बचा लिया और उसे ‘सशक्त साथी’ बना दिया।
**लेखक का संदेश:**
यह कहानी उन सभी घरों के लिए है जहाँ बहुओं को अलग-अलग पलड़ों में तोला जाता है। याद रखिये, एक हाथ से ताली नहीं बजती और एक पहिये से गाड़ी नहीं चलती। जब घर की स्त्रियां एक-दूसरे का हाथ थाम लेती हैं, तो बड़े से बड़ा संकट भी घुटने टेक देता है।
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**क्या इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया?**
क्या आपके घर में भी कोई ऐसी वंदना है जो चुपचाप सब सहती है, या कोई ऐसी रिया है जिसने अपनी समझदारी से घर जोड़ा है? अपनी राय और अनुभव कमेंट में जरूर लिखें। हम हर कमेंट पढ़ते हैं।
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मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश