वो कंगन का सच: एक खामोश कुर्बानी – विभा गुप्ता

“बात क्या है, मैं सब समझती हूँ!” कमला देवी ने बीच में ही बात काट दी। “जब से इस घर की चाबियाँ तेरे हाथ में दी हैं, तुझे लगने लगा है कि तू ही मालकिन है। अरे, वो कंगन मैंने तुझे अपनी पुश्तैनी कमाई से बनवाकर दिए थे। आज मेरी ही बेटी को पहनने के लिए तू नखरे दिखा रही है? इतना मोह किस काम का सुलोचना? साथ में ऊपर लेकर जाएगी क्या सोना?”

अक्टूबर का महीना था और हल्की-हल्की ठंड शुरू हो चुकी थी। लखनऊ के गोमती नगर में स्थित ‘शर्मा निवास’ में चहल-पहल कुछ ज्यादा ही थी। घर की लाडली बेटी, यानी वंदना की सहेली की शादी थी और वंदना के लिए यह शादी किसी त्यौहार से कम नहीं थी। वंदना, जो अभी कॉलेज के आखिरी साल में थी, अपनी भाभी सुलोचना के कमरे में पिछले एक घंटे से अलग-अलग साड़ियाँ बदलकर देख रही थी।

सुलोचना, घर की बड़ी बहू, स्वभाव से बेहद शांत और मृदुभाषी थी। शादी को पाँच साल हो चुके थे। उसका पति, रघुनंदन, एक प्राइवेट फर्म में मैनेजर था। घर में सास-ससुर (कमला देवी और दीनानाथ जी) और ननद वंदना थे। सुलोचना ने इस घर को बड़ी कुशलता से संभाल रखा था।

“भाभी, यह नीली वाली साड़ी कैसी लग रही है?” वंदना ने आईने के सामने इठलाते हुए पूछा।

“बहुत सुंदर लग रही है वंदना, तुम पर नीला रंग बहुत जंचता है,” सुलोचना ने कपड़े तह करते हुए मुस्कुरा कर कहा।

वंदना अचानक सुलोचना के पास आकर बैठ गई और उसका हाथ पकड़कर लाड़ से बोली, “भाभी, एक चीज़ मांगू? मना तो नहीं करोगी?”

सुलोचना ने वंदना के सिर पर हाथ फेरा, “पगली, तूने आज तक कुछ माँगा और मैंने मना किया है? बोल क्या चाहिए?”

वंदना की आँखों में चमक आ गई। “भाभी, वो जो आपकी शादी वाले मोटे सोने के कंगन हैं न, जिस पर मोर की नक्काशी बनी है… वो मुझे कल शादी में पहनने के लिए दे दो ना? मेरी इस नीली साड़ी पर वो कंगन बहुत अच्छे लगेंगे। बस एक शाम की तो बात है।”

सुलोचना का हाथ, जो कपड़े तह कर रहा था, अचानक रुक गया। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। एक अजीब सी घबराहट उसकी आँखों में तैर गई। उसने नज़रें चुराते हुए कहा, “वंदना… वो कंगन… वो तो लॉकर में नहीं हैं। वो तो…”

“अरे, लॉकर में नहीं हैं तो क्या हुआ? अलमारी में होंगे। भाभी, प्लीज़ दे दो ना। मेरी सारी सहेलियाँ भारी ज्वेलरी पहनकर आ रही हैं, मेरी कलाई सूनी अच्छी नहीं लगेगी,” वंदना ने ज़िद करते हुए कहा।

सुलोचना ने एक गहरी सांस ली और खुद को संयत करते हुए बोली, “वंदना, तुम मेरा वो डायमंड वाला ब्रेसलेट पहन लो, वो भी तो बहुत सुंदर है। वो कंगन… वो मैं नहीं दे सकती।”

वंदना का चेहरा उतर गया। “क्यों नहीं दे सकतीं? क्या आपको डर है कि मैं उन्हें खो दूंगी? या आपको लगता है कि आपकी ननद आपकी चीज़ पर कब्ज़ा कर लेगी?”

“नहीं वंदना, ऐसी बात नहीं है। बस समझो मेरी मजबूरी… मैं वो कंगन नहीं निकाल सकती,” सुलोचना ने बेबसी से कहा।

वंदना गुस्से में पैर पटकती हुई कमरे से बाहर निकल गई। सुलोचना वहीं पलंग पर बैठ गई, उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसे पता था कि यह बात यहीं ख़त्म नहीं होगी।

और हुआ भी वही। थोड़ी देर में ही नीचे हॉल से कमला देवी (सास) की ऊँची आवाज़ आने लगी।

“अरे, कैसी बहू ले आए हम? घर की बेटी एक चीज़ मांग ले तो इनका कलेजा मुंह को आ जाता है।”

सुलोचना डरते-डरते नीचे गई। हॉल में वंदना मुंह फुलाकर बैठी थी और कमला देवी गुस्से में लाल हो रही थीं। दीनानाथ जी अखबार पढ़ रहे थे, लेकिन माहौल की गर्मी उन्हें भी महसूस हो रही थी।

“मम्मी जी, बात वो नहीं है…” सुलोचना ने सफाई देने की कोशिश की।

“बात क्या है, मैं सब समझती हूँ!” कमला देवी ने बीच में ही बात काट दी। “जब से इस घर की चाबियाँ तेरे हाथ में दी हैं, तुझे लगने लगा है कि तू ही मालकिन है। अरे, वो कंगन मैंने तुझे अपनी पुश्तैनी कमाई से बनवाकर दिए थे। आज मेरी ही बेटी को पहनने के लिए तू नखरे दिखा रही है? इतना मोह किस काम का सुलोचना? साथ में ऊपर लेकर जाएगी क्या सोना?”

सुलोचना की आँखों में आंसू आ गए। “मम्मी जी, आप मुझे गलत समझ रही हैं। मैं लालची नहीं हूँ। वंदना मेरी छोटी बहन जैसी है। अगर मेरे बस में होता तो मैं अपनी जान निकालकर दे देती, कंगन क्या चीज़ हैं।”

“तो दे दे ना!” वंदना चिल्लाई। “भाभी, आप इतनी ‘पजेसिव’ कब से हो गईं? मुझे लगा था हमारा रिश्ता सहेलियों जैसा है। पर आज आपने साबित कर दिया कि भाभी आखिर पराई ही होती है।”

यह शब्द सुलोचना के दिल में तीर की तरह चुभा। ‘पराई’। जिस घर को उसने पाँच साल खून-पसीने से सींचा, आज एक कंगन के पीछे उसे पराया कर दिया गया।

सुलोचना ने होंठ भींच लिए। वह सच नहीं बता सकती थी। उसने रघुनंदन की तरफ देखा, जो अभी-अभी ऑफिस से आया था और दरवाजे पर खड़ा सब सुन रहा था। रघुनंदन की नज़रें झुकी हुई थीं। वह चुपचाप अपने कमरे में चला गया। पति की यह चुप्पी सुलोचना को और तोड़े जा रही थी।

“ठीक है,” कमला देवी ने फैसला सुनाया। “अगर बहू को अपने कंगन इतने प्यारे हैं, तो रखे रहे अपनी तिजोरी में। वंदना, तू मेरे कंगन पहन ले। लेकिन याद रखना सुलोचना, आज तूने अपनी ननद का दिल दुखाया है। रिश्तों में जो खटास तूने आज घोली है, वो सोने की चमक से कभी नहीं भरेगी।”

वंदना शादी में चली गई, लेकिन घर का माहौल मातम जैसा हो गया। सुलोचना ने रात का खाना बनाया, लेकिन किसी ने ठीक से नहीं खाया। सास ने उससे बात करना बंद कर दिया। वंदना जब भी सामने आती, मुंह फेर लेती। रघुनंदन भी नज़रे नहीं मिला पा रहा था।

सुलोचना ‘कंजूस’ और ‘घमंडी’ घोषित कर दी गई थी।

दो दिन बीते।

घर में एक और मुसीबत आ खड़ी हुई। दीनानाथ जी को अचानक सीने में तेज़ दर्द उठा। अफरा-तफरी मच गई। उन्हें तुरंत शहर के बड़े हार्ट हॉस्पिटल ले जाया गया। डॉक्टरों ने बताया कि उनकी धमनियों में ब्लॉकेज है और तुरंत एंजियोप्लास्टी करनी पड़ेगी। खर्चा लगभग तीन लाख रुपये बताया गया।

कमला देवी के हाथ-पाँव फूल गए। रघुनंदन अस्पताल के कॉरिडोर में सिर पकड़े बैठा था। वंदना रो रही थी।

“बेटा रघु, तू चिंता मत कर। घर में जो कैश पड़ा है वो निकाल ले, और अगर कम पड़े तो सुलोचना के वो कंगन बेच दे। अब तो इंसान की जान से बढ़कर सोना नहीं है ना?” कमला देवी ने रोते हुए कहा।

रघुनंदन ने एक बार सुलोचना की तरफ देखा। सुलोचना शांत खड़ी थी, लेकिन उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था।

“मम्मी, वो कंगन…” रघुनंदन कुछ बोलने को हुआ।

“अरे अब क्या बहू से पूछना पड़ेगा? मैं कह रही हूँ न! सुलोचना, घर जा और लॉकर से वो कंगन और बाकी जेवर लेकर आ। तेरे ससुर की जान का सवाल है,” कमला देवी ने आदेश दिया।

सुलोचना वहां से हिली नहीं।

“तू सुन नहीं रही?” कमला देवी का गुस्सा फिर भड़कने लगा। “या अब तुझे अपने ससुर की जान से ज़्यादा अपना सोना प्यारा है?”

“मम्मी जी, कंगन नहीं हैं,” सुलोचना ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।

“क्या मतलब नहीं हैं? चोरी हो गए? या तूने अपने मायके भेज दिए?” कमला देवी चिल्लाईं। अस्पताल के लोग उनकी तरफ देखने लगे।

“वो बिक चुके हैं, मम्मी जी,” सुलोचना की आवाज़ कांप रही थी।

सन्नाटा। एक गहरा, भारी सन्नाटा।

वंदना ने अपनी गीली आँखों से भाभी को देखा। “बिक गए? आपने बेच दिए? बिना किसी को बताए? भाभी, आपको पैसों की क्या ज़रूरत पड़ गई थी? रघुनंदन भैया तो अच्छी खासी सैलरी लाते हैं।”

कमला देवी को जैसे लकवा मार गया हो। “तूने मेरे खानदानी कंगन बेच दिए? किसलिए? अपनी ऐश के लिए? या अपने भाई-भाभी को देने के लिए? बोल! मुझे आज हिसाब चाहिए।”

रघुनंदन अब और चुप नहीं रह सका। वह अपनी माँ और पत्नी के बीच में आकर खड़ा हो गया। उसकी आँखों में आंसू थे।

“माँ! बस करो। सुलोचना को मत डांटो। वो कंगन उसने अपनी ऐश के लिए नहीं बेचे।”

“तो फिर कहाँ गए कंगन?” कमला देवी ने बेटे को झकझोरा।

रघुनंदन घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया और फूट-फूट कर रोने लगा।

“माँ, आपको याद है पिछले साल वंदना की एमबीए की फीस भरनी थी? आठ लाख रुपये? मैंने कहा था कि मुझे ऑफिस से लोन मिला है?”

कमला देवी ने सिर हिलाया।

“मुझे कोई लोन नहीं मिला था माँ। मेरी नौकरी तो छह महीने पहले ही छूट गई थी मंदी के कारण। मैं पिछले छह महीने से रोज़ सुबह टाई लगाकर निकलता था, ताकि आपको और पापा को दिल का दौरा न पड़ जाए। मैं दिन भर नौकरी ढूंढता था और शाम को घर आता था।”

वंदना और कमला देवी पत्थर की मूर्ति बन गई थीं।

रघुनंदन ने सिसकते हुए आगे कहा, “वंदना की फीस, घर का खर्च, पापा की दवाइयाँ… यह सब कैसे चल रहा था, आपको पता है? सुलोचना ने चलाया। उसने एक-एक करके अपने सारे जेवर बेच दिए। वो कंगन, जो आप उस दिन मांग रही थीं… वो तो छह महीने पहले ही बिक चुके थे वंदना की सेमेस्टर फीस के लिए। लॉकर खाली है माँ। उसमें सिर्फ सुलोचना की कुछ आर्टिफिशियल ज्वेलरी पड़ी है, ताकि आपको शक न हो।”

सुलोचना दीवार से टिककर चुपचाप आंसू बहा रही थी।

“उस दिन जब वंदना ने कंगन मांगे, तो सुलोचना के पास देने के लिए कंगन थे ही नहीं। वो नकली कंगन वंदना को कैसे देती? अगर वंदना वो पहनकर शादी में जाती और कोई जौहरी या परखने वाला कह देता कि ये नकली हैं, तो हमारी कितनी बदनामी होती? वंदना को कितना बुरा लगता? इसलिए सुलोचना ने सारी कड़वाहट पी ली। उसने ‘लालची’ और ‘कंजूस’ कहलाना मंज़ूर किया, लेकिन मेरा और इस घर का ‘सच’ बाहर नहीं आने दिया। उसने मेरी बेरोज़गारी का राज़ अपने सीने में दफ़न रखा।”

रघुनंदन की बात ख़त्म हुई तो वहां सिर्फ़ मशीनों की बीप-बीप और वंदना की सिसकियों की आवाज़ थी।

कमला देवी कांपते कदमों से सुलोचना के पास गईं। जिस बहू को वो कल तक कोस रही थीं, आज उसका चेहरा उन्हें देवी जैसा लग रहा था। उन्होंने सुलोचना के हाथ अपने हाथों में ले लिए।

“सुलोचना… मेरी बच्ची… तूने इतना बड़ा बोझ अकेले उठाया? तूने एक बार भी नहीं कहा कि ‘मम्मी जी, आपका बेटा बेरोजगार है’? तूने मेरी गालियाँ सुनी, मेरे ताने सहे, वंदना की नफरत सही… सिर्फ इसलिए ताकि हम चैन से सो सकें?”

सुलोचना ने सास के आंसू पोंछे। “मम्मी जी, घर तो एक-दूसरे का पर्दा रखने से ही चलता है न? अगर मैं बता देती तो पापा जी को शायद तभी अटैक आ जाता। मुझे कंगन जाने का दुःख नहीं है, मुझे दुःख इस बात का था कि वंदना मुझसे नाराज़ हो गई।”

वंदना दौड़कर आई और सुलोचना के गले लगकर रोने लगी। “भाभी, मुझे माफ़ कर दो। मैं कितनी स्वार्थी हो गई थी। मैंने एक कंगन के लिए आपको पराया कह दिया, जबकि आपने तो मेरे भविष्य के लिए अपना स्त्री-धन भी नहीं छोड़ा। आप भाभी नहीं, आप तो मेरी ढाल हैं।”

उस दिन अस्पताल के कॉरिडोर में एक अजीब सा दृश्य था। एक परिवार रो रहा था, लेकिन वो आंसू दुःख के नहीं, बल्कि मेल-मिलाप और पश्चाताप के थे।

दीनानाथ जी का ऑपरेशन हुआ। रघुनंदन को कुछ दोस्तों की मदद और सुलोचना की बची-खुची छोटी-मोटी बचत से काम चल गया। कुछ महीनों बाद रघुनंदन को एक अच्छी नौकरी भी मिल गई।

पहली तनख्वाह आने पर रघुनंदन और कमला देवी सुलोचना को लेकर सुनार की दुकान पर गए।

“भैया, बिल्कुल वैसे ही मोर की नक्काशी वाले कंगन दिखाइये,” कमला देवी ने कहा।

सुलोचना ने रोका, “मम्मी जी, इसकी क्या ज़रूरत है? घर में अभी पैसे…”

कमला देवी ने उसके मुंह पर उंगली रख दी। “चुप कर। ये कंगन सोने के नहीं हैं बहू, ये तेरे ‘सम्मान’ के हैं। उस दिन मैंने कहा था न कि तू सोना ऊपर लेकर जाएगी क्या? मैं गलत थी। तूने साबित कर दिया कि असली सोना तू खुद है। और सोने को जेवर की ज़रूरत नहीं होती, पर इस घर की शोभा तेरे हाथों में कंगन खनकने से ही है।”

सुलोचना की आँखों में आज एक अलग चमक थी—आत्मसम्मान और प्रेम की चमक, जो किसी भी हीरे-जवाहरात से कहीं ज़्यादा कीमती थी। उसने सीख लिया था कि कभी-कभी ‘ना’ कहना ‘हाँ’ कहने से ज़्यादा बड़ा बलिदान होता है।

**कहानी का सार:**

हम अक्सर अपनों को परखने में जल्दबाजी कर देते हैं। जो दिखता है, वो हमेशा सच नहीं होता। सुलोचना ने जेवर खोए, पर परिवार को टूटने से बचा लिया। उसने सिखाया कि रिश्तों की नींव “विश्वास” और “त्याग” पर टिकी होती है, सोने के टुकड़ों पर नहीं।

**क्या आपको भी लगता है कि सुलोचना ने जो किया वो सही था? क्या आज के जमाने में ऐसी बहुएं या ऐसे परिवार होते हैं? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।**

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मूल लेखिका : विभा गुप्ता

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