पुरानी जड़ों की नई कोंपलें – आरती झा

“नहीं बहू, आज बात बढ़नी चाहिए,” सुमित्रा जी खड़ी हो गईं। उनका स्वर आज याचना का नहीं, अधिकार का था।

“मैं जानती हूँ तुम पढ़ी-लिखी हो, इंटरनेट से बच्चे पालना सीखती हो। पर मैंने भी एक बच्चे को पाला है—तुम्हारे पति को।

शहर के पॉश अपार्टमेंट ‘ग्रीन वुड्स’ की सातवीं मंजिल पर बने फ्लैट नंबर 702 में सुबह का सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे बीच-बीच में मिक्सर ग्राइंडर की आवाज़ या कुकर की सीटी चीर देती थी। सुमित्रा जी अपनी बालकनी में बैठीं तुलसी के पौधे को पानी दे रही थीं। उनकी नज़र बार-बार दीवार घड़ी पर जा रही थी। साढ़े सात बज चुके थे। यह समय उनके छह साल के पोते, कबीर के स्कूल जाने का था।

सुमित्रा जी के हाथ में एक छोटी सी डिब्बी थी, जिसमें उन्होंने कबीर के लिए मिश्री और बादाम पीसकर रखे थे। यह उनका बरसों पुराना नुस्खा था—”दिमाग तेज़ होता है इससे,” वह अक्सर कहती थीं। लेकिन पिछले छह महीनों से यह डिब्बी उनकी साड़ी के पल्लू में ही छिपी रह जाती थी।

अंदर डाइनिंग टेबल पर जंग छिड़ी हुई थी।

“कबीर! फिनिश योर मिल्क राइट नाउ! (अभी दूध ख़त्म करो)” कबीर की माँ, और सुमित्रा जी की बहू, आकांक्षा की आवाज़ में हड़बड़ाहट और सख्ती दोनों थी। आकांक्षा एक कॉर्पोरेट कंपनी में एच.आर. हेड थी। उसके लिए हर चीज़ ‘परफेक्ट’ और ‘टाइम पर’ होनी चाहिए थी।

कबीर मुंह बनाए बैठा था। “मम्मा, इसमें बॉर्नविटा कम है, मुझे अच्छा नहीं लग रहा।”

“चुपचाप पियो। शुगर इज़ नॉट गुड फॉर हेल्थ। और सुनो, आज लंच में ब्रोकोली पास्ता है, पूरा ख़त्म करके आना,” आकांक्षा ने टिफिन बैग में डालते हुए कहा।

सुमित्रा जी धीरे-धीरे अंदर आईं। उन्होंने देखा कि कबीर का चेहरा लटका हुआ है। उनकी ममता उमड़ आई।

“बहू,” सुमित्रा जी ने संकोच करते हुए कहा, “बच्चा है, अगर एक चम्मच चीनी डाल दोगी तो क्या हो जाएगा? फीका दूध तो गले से नीचे नहीं उतरता।”

आकांक्षा ने अपनी कलाई घड़ी देखी और झुंझलाते हुए बोली, “मम्मी जी, प्लीज। सुबह-सुबह आप शुरू मत हो जाइए। डॉक्टर ने कहा है कि बचपन से ही हेल्दी ईटिंग हैबिट्स डालनी चाहिए। आपका वो घी-चीनी वाला ज़माना गया। अब कम्पटीशन का ज़माना है, बच्चे ओबेस (मोटे) हो रहे हैं।”

सुमित्रा जी चुप हो गईं। कबीर ने दादी को देखा, उसकी आँखों में उम्मीद थी कि शायद दादी उसे बचा लेंगी। सुमित्रा जी ने दबे हाथों से वो मिश्री वाली डिब्बी निकाली।

“अच्छा, ये थोड़ी सी मिश्री तो खिला दूँ? शगुन होता है,” सुमित्रा जी ने कहा।

आकांक्षा ने लगभग कबीर के मुंह के पास से सुमित्रा जी का हाथ रोक दिया।

“नो मम्मी जी! अभी ब्रश किया है उसने। दांत खराब हो जाएंगे। और प्लीज, उसे यह सब मीठा खिलाकर उसकी आदत मत बिगाड़िए। आप उसे बिगाड़ रही हैं।”

सुमित्रा जी का हाथ हवा में ही थम गया। वो हाथ कांप रहा था। आकांक्षा ने जल्दी से कबीर को बैग पहनाया, उसे ‘गुडबाय’ किस किया और स्कूल बस के लिए दौड़ा दिया। जाते-जाते कबीर ने पीछे मुड़कर दादी को बाय भी नहीं किया क्योंकि मम्मा उसे खींचते हुए ले जा रही थीं।

सुमित्रा जी वहीं डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर धम्म से बैठ गईं। यह रोज़ की कहानी थी। जब से बेटा राजीव और बहू आकांक्षा इस नए शहर में शिफ्ट हुए थे और सुमित्रा जी उनके साथ रहने आई थीं, उन्हें लगने लगा था कि वे इस घर में ‘माँ’ नहीं, बल्कि एक ‘अनचाही मेहमान’ हैं।

राजीव अपनी नौकरी में इतना व्यस्त रहता था कि उसे घर की इन बारीक दरारों का अंदाज़ा ही नहीं था। आकांक्षा बुरी नहीं थी, लेकिन वह ‘पेरेंटिंग’ को लेकर इतनी जुनूनी (obsessed) थी कि उसे लगता था कि दादी का लाड़-प्यार कबीर के अनुशासन को खराब कर देगा। सुमित्रा जी कबीर को कहानियां सुनाना चाहती थीं, पर आकांक्षा कहती, “स्क्रीन टाइम है, उसे एजुकेशनल वीडियो देखने दीजिए।” सुमित्रा जी उसे पार्क ले जाना चाहती थीं, तो आकांक्षा कहती, “धूल-मिट्टी है, इन्फेक्शन हो जाएगा।”

धीरे-धीरे सुमित्रा जी ने खुद को अपने कमरे तक समेट लिया। लेकिन आज जो हुआ, उसने उनके सब्र का बांध हिला दिया था।

शाम को कबीर स्कूल से आया। वह थोड़ा सुस्त लग रहा था। आकांक्षा अभी ऑफिस से नहीं लौटी थी। घर पर सिर्फ़ सुमित्रा जी और मेड थीं।

“दादी, सिर दुख रहा है,” कबीर ने बैग पटकते हुए कहा और सोफे पर लेट गया।

सुमित्रा जी ने उसका माथा छूकर देखा। बदन तप रहा था। उसे तेज़ बुखार था। सुमित्रा जी घबरा गईं। उन्होंने तुरंत उसे गोद में उठाया, उसके कपड़े ढीले किए और सर पर गीली पट्टी रखने लगीं। कबीर रो रहा था, “मम्मा चाहिए…”

सुमित्रा जी ने उसे सीने से लगाया और लोरी सुनाने लगीं। उन्होंने रसोई से अदरक और तुलसी का काढ़ा बनाया और उसे पिलाने की कोशिश की।

“पिट्टू बेटा, इसे पी लो, गला ठीक हो जाएगा,” वे उसे पुचकार रही थीं।

तभी दरवाज़ा खुला। आकांक्षा ऑफिस से लौटी थी। उसने कबीर को सुमित्रा जी की गोद में लेटे और सुमित्रा जी को चम्मच से कुछ पिलाते हुए देखा।

“क्या हुआ कबीर को?” आकांक्षा ने बैग फेंकते हुए पूछा और दौड़कर पास आई।

“बुखार है बहू, बहुत तेज़। मैंने काढ़ा बनाया है…”

“काढ़ा?” आकांक्षा ने लगभग चीखते हुए कहा। “मम्मी जी, उसे वायरल फीवर हो सकता है, डॉक्टर को दिखाना है, और आप उसे यह जड़ी-बूटियाँ पिला रही हैं? अगर रिएक्शन हो गया तो? आप उसे मेरी गोद में दीजिये।”

आकांक्षा ने लगभग झपटते हुए कबीर को सुमित्रा जी की गोद से छीन लिया। कबीर, जो दादी की गर्माहट में शांत हो रहा था, अचानक झटके से डर गया और ज़ोर से रोने लगा।

“मैं अभी डॉक्टर बत्रा को फ़ोन करती हूँ। आप प्लीज यहाँ से हटिये, उसे सांस लेने दीजिये,” आकांक्षा ने कबीर को सोफे पर लिटाते हुए कहा। वह फ़ोन पर डॉक्टर से बात करने लगी, थर्मामीटर ढूंढने लगी, और पैनिक में घर में इधर-उधर भागने लगी।

सुमित्रा जी दीवार से सटकर खड़ी थीं। उनकी गोद, जो अभी भरी हुई थी, अचानक खाली हो गई थी। उन्हें महसूस हुआ जैसे किसी ने उनके अस्तित्व को नकार दिया हो।

जब डॉक्टर की दवाई देने के बाद कबीर सो गया, तो आकांक्षा राहत की सांस लेते हुए रसोई में पानी पीने आई। सुमित्रा जी वहीं डाइनिंग टेबल पर बैठी थीं।

“बहू,” सुमित्रा जी की आवाज़ बहुत धीमी लेकिन भारी थी।

आकांक्षा ने पानी का गिलास मेज पर रखा। “हाँ मम्मी जी, बोलिये। अब कबीर ठीक है, आप चिंता मत कीजिये।”

“चिंता तो मैं नहीं कर रही बहू,” सुमित्रा जी ने अपनी नम आँखें ऊपर उठाईं। “चिंता तो तुम कर रही हो। इतनी कि तुम्हें डर लगने लगा है कि कहीं मेरी परछाई भी कबीर पर पड़ गई तो वो बीमार हो जाएगा।”

“मम्मी जी, आप बात को बढ़ा रही हैं,” आकांक्षा ने सफाई देनी चाही।

“नहीं बहू, आज बात बढ़नी चाहिए,” सुमित्रा जी खड़ी हो गईं। उनका स्वर आज याचना का नहीं, अधिकार का था।

“मैं जानती हूँ तुम पढ़ी-लिखी हो, इंटरनेट से बच्चे पालना सीखती हो। पर मैंने भी एक बच्चे को पाला है—तुम्हारे पति को। बिना गूगल के, बिना डॉक्टर के, इन्हीं काढ़ों और कहानियों से। वो तो डॉक्टर नहीं बना, न ही बीमार पड़ा।”

आकांक्षा कुछ कहने ही वाली थी कि सुमित्रा जी ने हाथ उठाकर रोक दिया।

“आज जब तुमने कबीर को मेरी गोद से छीना, तो मुझे लगा जैसे तुमने मुझे कूड़ेदान में फेंक दिया हो। **बहू, तुम्हारा बेटा क्या मेरा कुछ भी नहीं लगता?** क्या उस पर मेरा रत्ती भर भी अधिकार नहीं है? क्या दादी सिर्फ़ वसीयत में जायदाद देने के लिए होती है, संस्कार और प्यार देने के लिए नहीं?”

सुमित्रा जी का गला भर आया। “मैं उसे बिगाड़ना नहीं चाहती। मैं बस उसे वो जड़ें देना चाहती हूँ जो तुम उसे नहीं दे पा रही। तुम उसे उड़ाना चाहती हो, अच्छी बात है। पर बिना जड़ों के पेड़ पहली आंधी में गिर जाते हैं आकांक्षा। आज उसे बुखार था, उसे दवाई की ज़रूरत थी, मैं मानती हूँ। पर उसे ‘सुकून’ की भी ज़रूरत थी, जो डॉक्टर की कड़वी दवाई में नहीं, दादी की गोद में होता है। और तुमने उसे उस सुकून से वंचित कर दिया।”

आकांक्षा स्तब्ध खड़ी थी। उसने सुमित्रा जी को कभी ऐसे बोलते नहीं सुना था।

“कल मैं हरिद्वार जा रही हूँ,” सुमित्रा जी ने फैसला सुनाया। “मेरे भाई का आश्रम है वहां। यहाँ इस घर में फर्नीचर बनकर रहने से अच्छा है कि मैं वहां जाकर भजन करूँ। कम से कम वहां कोई मुझे यह तो महसूस नहीं कराएगा कि मैं ‘अनवांटेड’ (अवांछित) हूँ।”

सुमित्रा जी अपने कमरे में चली गईं। आकांक्षा वहीं खड़ी रही, सुन्न। उसे अपने कानों में सुमित्रा जी का वो सवाल गूंजता सुनाई दे रहा था—*”तुम्हारा बेटा क्या मेरा कुछ भी नहीं लगता?”*

रात भर आकांक्षा को नींद नहीं आई। राजीव भी टूर पर था, वह अकेली थी। कबीर को रात में फिर बुखार चढ़ा। वह बड़बड़ा रहा था, “दादी… कहानी… दादी…”

आकांक्षा ने उसे दवाई दी, पट्टी रखी, पर कबीर शांत नहीं हो रहा था। वह हाथ-पैर पटक रहा था। आकांक्षा ने लोरी गाने की कोशिश की, पर कबीर रोता रहा। “दादी पास जाना है…”

आकांक्षा हार गई। उसका ‘परफेक्ट मदर’ का अहंकार उस नन्हे बच्चे की ज़िद के आगे टूट गया। उसे समझ आ गया कि बच्चा सिर्फ़ माँ से नहीं पलता, उसे एक पूरे परिवार की ऊर्जा चाहिए होती है। उसे याद आया कि कैसे शाम को कबीर दादी की गोद में दुबका हुआ था और शांत था।

सुबह के चार बजे थे। सुमित्रा जी अपना सूटकेस पैक कर रही थीं। उन्होंने निश्चय कर लिया था। तभी उनके कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला।

आकांक्षा खड़ी थी। उसकी आँखें सूजी हुई थीं और बालों में उलझन थी।

“मम्मी जी…”

सुमित्रा जी ने बिना मुड़े कपड़े तह करना जारी रखा। “जाग गई? कबीर ठीक है?”

आकांक्षा धीरे-धीरे अंदर आई और सुमित्रा जी के हाथों से वो साड़ी ले ली जिसे वे पैक कर रही थीं।

“कबीर ठीक नहीं है मम्मी जी,” आकांक्षा ने रुंधे गले से कहा।

सुमित्रा जी घबराकर पलटीं। “क्या हुआ? बुखार तेज़ है? चलो मैं देखती हूँ…” वे दरवाज़े की तरफ लपकीं।

“शारीरिक बुखार उतर गया है,” आकांक्षा ने उनका हाथ पकड़ लिया। “पर उसे ‘दादी’ वाला बुखार चढ़ा है। वो रात भर आपको पुकारता रहा।”

सुमित्रा जी रुक गईं।

आकांक्षा घुटनों के बल बैठ गई और सुमित्रा जी के पैरों पर सिर रख दिया। वह फूट-फूट कर रोने लगी।

“मम्मी जी, मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं एक अच्छी माँ बनने की होड़ में इतनी अंधी हो गई थी कि मैंने यह नहीं देखा कि मैं अपने बेटे से उसका सबसे प्यारा रिश्ता छीन रही हूँ। मुझे लगता था कि मैं सब कुछ संभाल सकती हूँ, पर कल रात मुझे समझ आ गया कि माँ सिर्फ़ जन्म देती है, पर पालती तो ‘दादी’ ही है। मेरी डिग्री, मेरा ज्ञान, मेरी डॉक्टर की दवाइयाँ—सब फेल हो गईं, जहाँ आपकी एक लोरी काम कर गई थी।”

सुमित्रा जी ने झुककर आकांक्षा को उठाया। उनकी आँखों में भी आंसू थे।

“मैं उसे बिगाड़ना नहीं चाहती थी मम्मी जी, बस डरती थी,” आकांक्षा सिसक रही थी। “पर अब समझ गई हूँ कि अनुशासन की दीवारें इतनी ऊँची नहीं होनी चाहिए कि हवा और धूप (बुज़ुर्गों का प्यार) अंदर ही न आ सके। प्लीज, आप मत जाइये। अगर आप चली गईं, तो कबीर तो ठीक हो जाएगा, पर यह घर हमेशा के लिए बीमार पड़ जाएगा।”

सुमित्रा जी ने आकांक्षा को गले लगा लिया। दोनों सास-बहू के बीच जो बर्फ की दीवार थी, वो आंसुओं की गर्मी से पिघल गई थी।

“पगली, मैं कहीं नहीं जा रही। मैं तो बस तुझे डरा रही थी,” सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए उसके आंसू पोंछे। “भला अपनी जड़ों को छोड़कर पेड़ कभी कहीं जा सकता है?”

सुबह के सात बज रहे थे।

डाइनिंग टेबल पर आज का नज़ारा बदला हुआ था। कबीर आज स्कूल नहीं जा रहा था, लेकिन वह सोफे पर बैठा था। सुमित्रा जी उसे अपने हाथों से दलिया खिला रही थीं।

आकांक्षा पास खड़ी थी।

“मम्मी जी,” आकांक्षा ने कहा। “दलिया में चीनी डाली है ना? फीका दलिया कोई खाता है क्या?”

सुमित्रा जी और कबीर ने चौंककर आकांक्षा को देखा।

आकांक्षा मुस्कुराई, “क्या देख रहे हैं? अब बच्चा है, थोड़ा मीठा तो खायेगा ही।”

कबीर खुशी से चिल्लाया, “येयय! मम्मा इज़ द बेस्ट! दादी इज़ द बेस्ट!”

सुमित्रा जी ने अपनी साड़ी के पल्लू से वो मिश्री और बादाम वाली डिब्बी निकाली।

“बहू, यह दूं?” उन्होंने पूछा, पर इस बार डरते हुए नहीं, हक़ से।

आकांक्षा ने खुद वह डिब्बी ली, एक टुकड़ा कबीर के मुंह में डाला और एक टुकड़ा खुद खाया।

“शगुन है मम्मी जी, इसके बिना दिन कैसे शुरू होगा?”

उस दिन ग्रीन वुड्स के फ्लैट नंबर 702 में मिक्सर की आवाज़ के साथ-साथ ठहाकों की आवाज़ भी गूंज रही थी। सुमित्रा जी को अपना खोया हुआ घर और कबीर को उसकी दोहरी छाँव—माँ का अनुशासन और दादी का लाड़—वापस मिल चुका था। उन्हें समझ आ गया था कि बच्चे को बड़ा करने के लिए सिर्फ़ ‘तरीकों’ की नहीं, ‘तजुर्बे’ की भी ज़रूरत होती है।

**कहानी का सार:**

पीढ़ियों का अंतर (Generation Gap) कभी-कभी हमारे देखने के नज़रिए में होता है, प्यार में नहीं। एक दादी या नानी का प्यार बच्चे के लिए कोई बाधा नहीं, बल्कि वो सुरक्षा कवच है जो उसे भावनात्मक रूप से मज़बूत बनाता है। एक माँ को यह समझना होगा कि दादी ‘माँ’ की जगह नहीं लेना चाहती, वो तो बस ‘दादी’ बनकर रहना चाहती है—एक ऐसा रिश्ता जिसमें शर्तें नहीं, सिर्फ़ सुकून होता है।

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मूल लेखिका : आरती झा

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