माँ का ‘किरायेनामा – सीमा गुप्ता 

” सुमित्रा जी ने वकील साहब की तरफ देखा। वकील साहब ने गला साफ किया और बोले, “मिस्टर विकास, यह एग्रीमेंट आपके और आपकी पत्नी के नाम पर है। सुमित्रा देवी जी, जो इस मकान की मालकिन हैं, उन्होंने फैसला किया है कि अब से आप दोनों को इस घर में रहने के लिए किराया देना होगा।”

कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे किसी ने बम फोड़ दिया हो। विकास का मुंह खुला का खुला रह गया।

नाश्ते की मेज पर सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन बर्तनों की खनखनाहट साफ सुनाई दे रही थी। सुमित्रा जी ने चुपचाप परांठे की प्लेट मेज पर रखी और वापस रसोई की ओर मुड़ गईं।

“मम्मी, आज फिर नमक कम है सब्जी में,” उनके बेटे, विकास ने मोबाइल से नजर हटाए बिना शिकायत की। “आपको कितनी बार कहा है कि बीपी की दवाई आप खाती हैं, हम नहीं। थोड़ा तो स्वाद का ख्याल रखा कीजिए।”

सुमित्रा जी के कदम ठिठक गए। उन्होंने पलटकर बेटे को देखा। वही बेटा जिसे कभी अपने हाथों से खिलाए बिना उन्हें चैन नहीं मिलता था, आज उसे मां के हाथ के खाने में सिर्फ कमियां नजर आ रही थीं।

तभी उनकी बहू, रश्मि, अपने कमरे से तैयार होकर निकली। उसके हाथ में एक बड़ा सा सूटकेस था।

“विकास, कैब बुक कर दी है?” रश्मि ने घड़ी देखते हुए पूछा। “हमें देर हो रही है। और मम्मी जी, हम लोग मनाली जा रहे हैं एक हफ्ते के लिए। आप अपना ख्याल रखिएगा। और हां, वो कामवाली बाई को पैसे मत दीजिएगा, वो ठीक से सफाई नहीं कर रही है। हम आकर देखेंगे।”

सुमित्रा जी ने धीरे से पूछा, “बेटा, बिजली का बिल आया था, कल आखिरी तारीख है। अगर तुम लोग जा रहे हो तो…”

विकास ने झुंझलाते हुए पर्स निकाला और दो हजार रुपये मेज पर पटक दिए। “लो मम्मी। हर वक्त बस पैसों की किचकिच। अभी पिछले हफ्ते ही तो घर के राशन के लिए पैसे दिए थे। अब बिजली का बिल। हम कमाने वाले एक और खर्चे हजार। कभी तो चैन से जीने दिया करो।”

सुमित्रा जी ने वो नोट नहीं उठाए। उनकी नजरें उस सूटकेस पर थीं। बेटा-बहू मनाली घूमने जा रहे थे, जिसमें कम से कम पचास हजार का खर्चा होगा, लेकिन मां को बिजली के बिल के दो हजार रुपये देने में उन्हें ‘किचकिच’ लग रही थी।

“रखो अपने पैसे,” सुमित्रा जी की आवाज में एक अजीब सी सख्ती थी। “बिल मैं भर दूंगी। तुम लोग जाओ।”

रश्मि ने विकास को आंख मारी, जैसे कह रही हो—’बच गए पैसे’। दोनों बिना पैर छुए, बिना ठीक से बाय बोले निकल गए।

सुमित्रा जी वहीं कुर्सी पर बैठ गईं। यह घर, यह ‘शांति-कुंज’, जिसे उन्होंने और उनके पति स्वर्गीय रमाकांत जी ने एक-एक ईंट जोड़कर बनाया था, आज उन्हें ही बेगाना लग रहा था। रमाकांत जी के जाने के बाद उन्हें लगा था कि बेटा सहारा बनेगा। लेकिन विकास और रश्मि ने तो उन्हें घर का एक ‘फालतू सामान’ समझ लिया था। वे घर में रहती थीं, खाना बनाती थीं, घर की रखवाली करती थीं, लेकिन उनकी हैसियत एक बिन-पगार की नौकरानी से ज्यादा नहीं थी। ऊपर से हर छोटी-बड़ी चीज के लिए बेटे के आगे हाथ फैलाना उन्हें अंदर ही अंदर मार रहा था।

“नहीं रमाकांत जी,” उन्होंने दीवार पर लगी पति की तस्वीर से बात की। “अब और नहीं। आपने मुझे स्वाभिमान से जीना सिखाया था, मैं उसे ऐसे घुट-घुट कर मरने नहीं दूंगी।”

एक हफ्ता बीत गया। विकास और रश्मि मनाली से लौटे। वे बहुत खुश थे, हाथों में शॉपिंग बैग्स थे।

जैसे ही वे घर में दाखिल हुए, उन्होंने देखा कि ड्राइंग रूम में सोफे पर सुमित्रा जी बैठी हैं और उनके सामने एक अजनबी आदमी बैठा है—वकील मिस्टर खन्ना।

“अरे मम्मी, ये कौन हैं?” विकास ने जूते उतारते हुए पूछा।

सुमित्रा जी ने इशारा किया। “बैठो विकास। रश्मि, तुम भी बैठो। मुझे तुम दोनों से कुछ जरूरी बात करनी है।”

विकास और रश्मि एक-दूसरे को देखकर हैरान हुए, फिर सोफे पर बैठ गए।

सुमित्रा जी ने एक कागज का पुलिंदा टेबल पर सरकाया।

“यह क्या है?” विकास ने पूछा।

“यह ‘रेंट एग्रीमेंट’ (किरायेनामा) है,” सुमित्रा जी ने सपाट आवाज में कहा।

“रेंट एग्रीमेंट? किसका?” रश्मि ने हंसी में उड़ाना चाहा। “क्या हमने ऊपर वाला कमरा किसी को किराए पर दिया है?”

“नहीं,” सुमित्रा जी ने वकील साहब की तरफ देखा। वकील साहब ने गला साफ किया और बोले, “मिस्टर विकास, यह एग्रीमेंट आपके और आपकी पत्नी के नाम पर है। सुमित्रा देवी जी, जो इस मकान की मालकिन हैं, उन्होंने फैसला किया है कि अब से आप दोनों को इस घर में रहने के लिए किराया देना होगा।”

कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे किसी ने बम फोड़ दिया हो। विकास का मुंह खुला का खुला रह गया।

“क्या बकवास है यह मम्मी?” विकास चिल्लाया। “आप अपने ही बेटे से किराया मांग रही हैं? लोग क्या कहेंगे?”

“लोग तब क्या कहते हैं जब एक बेटा अपनी मां को घर के खर्च के लिए ताने मारता है?” सुमित्रा जी की आवाज ऊंची नहीं थी, लेकिन उसमें चट्टान जैसी मजबूती थी। “सुनो विकास, यह घर मेरे और तुम्हारे पिताजी की मेहनत का है। जब तक तुम बच्चे थे, हमारी जिम्मेदारी थे। अब तुम कमाते हो, शादीशुदा हो। अगर तुम बाहर कहीं रहते, तो किराया देते या नहीं?”

“लेकिन यह हमारा घर है!” रश्मि बीच में बोल पड़ी। “हम आपके बच्चे हैं।”

“बच्चे हो, इसीलिए तो अब तक मुफ्त में रह रहे थे,” सुमित्रा जी ने एग्रीमेंट पर उंगली रखी। “देखो, इस इलाके में 2BHK का किराया पच्चीस हजार रुपये है। लेकिन क्योंकि तुम मेरे बेटे हो, मैं तुमसे सिर्फ पंद्रह हजार रुपये महीना लूंगी। प्लस, बिजली का बिल और अपने खाने का खर्च तुम्हें अलग से देना होगा। रसोई भी अब अलग होगी। मैं अपने लिए बनाऊंगी, तुम लोग अपना देख लेना।”

“आप मजाक कर रही हैं न?” विकास ने नर्वस होकर हंसा।

“यह कोई मजाक नहीं है,” सुमित्रा जी ने स्टैम्प पेपर आगे किया। “पहली तारीख तक किराया मेरे अकाउंट में आ जाना चाहिए। वरना… वरना खाली करने के लिए एक महीने का नोटिस पीरियड भी लिखा है इसमें।”

विकास ने गुस्से में कागज फाड़ने की कोशिश की, लेकिन वकील साहब ने रोक दिया। “मिस्टर विकास, यह ओरिजिनल नहीं है। यह सिर्फ ड्राफ्ट है। असली कॉपी रजिस्टर्ड है। और कानूनी तौर पर यह घर सुमित्रा जी का है। वे जिसे चाहें रख सकती हैं, जिसे चाहें निकाल सकती हैं।”

विकास और रश्मि सन्न रह गए। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि उनकी सीधी-सादी मां ऐसा कुछ कर सकती हैं।

“ठीक है!” विकास ने तमतमाते हुए कहा। “अगर आपको पैसों का इतना ही शौक है, तो हम देंगे किराया। लेकिन फिर याद रखिएगा, आज से आप सिर्फ हमारी मकान मालकिन हैं, मां नहीं। हम भी फिर उसी हिसाब से रहेंगे।”

“मंजूर है,” सुमित्रा जी ने कहा और अपने कमरे में चली गईं।

अगले दिन से घर का नक्शा बदल गया।

रसोई में एक लकीर खींच दी गई। रश्मि को अब सुबह उठकर चाय-नाश्ता खुद बनाना पड़ता था। पहले उसे आदत थी कि वह उठकर टेबल पर आती थी और सुमित्रा जी गरमा-गरम परांठे परोस देती थीं। अब उसे ऑफिस जाने की जल्दी में ब्रेड-बटर से काम चलाना पड़ता था।

दोपहर का खाना बाहर से आता या रश्मि को रात में बनाकर रखना पड़ता। घर की सफाई के लिए जो बाई आती थी, सुमित्रा जी ने उसे सिर्फ अपने कमरे और हॉल की सफाई के लिए रख लिया। रश्मि को अपने कमरे और बाथरूम की सफाई खुद करनी पड़ती या अलग से बाई को पैसे देने पड़ते।

महीने की पहली तारीख आई। विकास ने गुस्से में पंद्रह हजार रुपये सुमित्रा जी के अकाउंट में ट्रांसफर किए। स्क्रीनशॉट भेजते हुए मैसेज लिखा—”किराया जमा हो गया है।”

सुमित्रा जी ने कोई जवाब नहीं दिया।

शुरुआत में विकास और रश्मि ने इसे अपने अहंकार की लड़ाई बना लिया। वे जानबूझकर सुमित्रा जी के सामने पिज्जा ऑर्डर करते, वीकेंड पर पार्टियां करते, यह दिखाने के लिए कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता।

लेकिन तीन महीने बीतते-बीतते उनकी हालत खराब होने लगी।

बाहर का खाना खा-खाकर विकास का पेट खराब रहने लगा। रश्मि, जो ऑफिस और घर के काम के बीच पिस रही थी, अब चिड़चिड़ी हो गई थी। बिजली का बिल, जो पहले “कॉमन” होता था, अब उन्हें अपने हिस्से का पूरा देना पड़ता था। और सबसे बड़ी बात, पंद्रह हजार किराया देने के बाद उनकी जेब पर जो असर पड़ रहा था, वह उन्हें चुभने लगा था। पहले वे यह पैसा कपड़ों और घूमने में उड़ा देते थे।

एक रात, विकास को तेज बुखार हो गया। रश्मि घबरा गई। रात के दो बज रहे थे। घर में कोई दवाई नहीं थी। रश्मि ने विकास के माथे पर पट्टी रखी, लेकिन बुखार उतर नहीं रहा था।

उसे सुमित्रा जी की याद आई। पहले जब भी विकास बीमार पड़ता था, सुमित्रा जी रात-रात भर जागकर काढ़ा बनाती थीं, सिर दबाती थीं। लेकिन अब? अब तो वे “किरायेदार” थे। रश्मि की हिम्मत नहीं हुई कि वह “मकान मालकिन” का दरवाजा खटखटाए।

लेकिन मां तो मां होती है। विकास के कराहने की आवाज दीवार के उस पार सुमित्रा जी तक पहुंच गई।

दरवाजा खुला। सुमित्रा जी हाथ में बाम और तुलसी का काढ़ा लेकर खड़ी थीं।

“मम्मी जी…” रश्मि की आंखों में आंसू आ गए।

सुमित्रा जी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने रश्मि को किनारे किया और विकास के पास बैठ गईं। उसके माथे पर हाथ रखा, पट्टियां बदलीं, और उसे अपने हाथों से काढ़ा पिलाया। पूरी रात वे कुर्सी पर बैठी रहीं।

सुबह जब विकास की आंख खुली, तो उसका बुखार उतर चुका था। उसने देखा कि माँ वहीं सोफे पर झपकी ले रही हैं।

विकास का दिल भर आया। उसने सोचा था कि मां बदल गई हैं, लालची हो गई हैं। लेकिन मां तो वही थीं। फिर यह किराया क्यों? यह दूरी क्यों?

अगले दिन रविवार था। नाश्ते की मेज पर रश्मि ने हिम्मत करके दो कप चाय बनाई—एक विकास के लिए और एक सुमित्रा जी के लिए।

“मम्मी जी,” रश्मि ने चाय का कप सुमित्रा जी की तरफ बढ़ाया। “चाय पी लीजिए।”

सुमित्रा जी ने कप ले लिया।

विकास ने सिर झुकाकर कहा, “मम्मी, हमें माफ कर दीजिए। इन तीन महीनों में हमें अक्ल आ गई है। हमें लगता था कि हम घर चला रहे हैं, लेकिन सच तो यह है कि घर आप चला रही थीं। पंद्रह हजार तो बहुत कम हैं, इस घर में जो सुकून और सुविधा मिलती है, उसकी कोई कीमत नहीं है।”

रश्मि भी रो पड़ी। “मम्मी जी, मुझसे घर और ऑफिस दोनों नहीं संभल रहा। हम बहुत थक गए हैं। प्लीज, यह नाटक बंद कर दीजिए। हम यह किराया नहीं दे सकते। आप जो कहेंगी हम करेंगे, बस हमें फिर से अपना बेटा-बहू बना लीजिए।”

सुमित्रा जी ने चाय का घूंट भरा और मुस्कुराईं। वे उठीं और अपनी अलमारी से एक बैंक की पासबुक लेकर आईं।

“यह देखो,” सुमित्रा जी ने पासबुक विकास के हाथ में दी।

विकास ने पन्ने पलटे। उसमें पिछले तीन महीनों के जमा हुए 45,000 रुपये थे। एक भी रुपया निकाला नहीं गया था।

“यह क्या है?” विकास ने हैरान होकर पूछा।

“यह तुम्हारा किराया है,” सुमित्रा जी ने कहा। “बेटा, मुझे तुम्हारे पैसों की भूख नहीं है। भगवान की दया से और तुम्हारे पापा की पेंशन से मेरा खर्चा आराम से चलता है। लेकिन मुझे भूख थी ‘इज्जत’ की। मुझे भूख थी ‘अहसास’ की।”

सुमित्रा जी की आंखों में नमी आ गई। “तुम लोग मुझे बोझ समझने लगे थे। तुम्हें लगता था कि बिजली, पानी, राशन—यह सब मुफ्त में आता है। तुम अपनी कमाई अपनी ऐश-ओ-आराम पर उड़ाते थे और घर के छोटे-मोटे खर्चे के लिए मुझे आंखें दिखाते थे। मैं चाहती थी कि तुम्हें पता चले कि एक गृहस्ती चलाने में कितना पसीना लगता है। मैं चाहती थी कि तुम ‘जिम्मेदार’ बनो।”

उन्होंने रश्मि के सिर पर हाथ रखा। “बहू, जब तक तुम मुफ्त में रह रही थी, तुम्हें मेरे हाथ का बना खाना भी बेस्वाद लगता था। और आज जब तुम्हें खुद बनाना पड़ा, तो तुम्हें मेरी कीमत समझ आई। मैं तुमसे किराया इसलिए नहीं मांग रही थी कि मुझे अमीर बनना है। मैं यह पैसा तुम्हारे ही भविष्य के लिए जमा कर रही थी। आने वाले समय में अगर तुम्हें अपना घर लेना हो, या कोई मुसीबत आए, तो यह पैसा तुम्हारे ही काम आएगा।”

विकास और रश्मि के पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे। वे शर्मिंदा थे। वे अपनी मां को ‘लालची मकान मालकिन’ समझ रहे थे, जबकि वह एक ‘गुरु’ बनकर उन्हें जिंदगी का पाठ पढ़ा रही थीं।

विकास ने उठकर मां के पैर पकड़ लिए। “मैं बहुत नालायक हूँ मम्मी। मैंने आपको बहुत दुख दिया है।”

सुमित्रा जी ने उसे उठाया और गले लगा लिया। “नालायक नहीं है, बस थोड़ा भटक गया था। अब वापस आ गया है न?”

उस दिन के बाद ‘शांति-कुंज’ में कोई रेंट एग्रीमेंट नहीं रहा। लेकिन एक नया नियम जरूर बन गया। घर का खर्च अब विकास खुशी-खुशी उठाता था, और रसोई में रश्मि और सुमित्रा जी मिलकर खाना बनाती थीं।

अब महीने की पहली तारीख को विकास सुमित्रा जी के हाथ में कुछ पैसे जरूर रखता था, लेकिन ‘किराया’ बोलकर नहीं, बल्कि ‘शगुन’ बोलकर। और सुमित्रा जी भी उसे मना नहीं करती थीं, क्योंकि वे जानती थीं कि अब उन पैसों के साथ ‘अहंकार’ नहीं, बल्कि ‘सम्मान’ आ रहा है।

वह पासबुक आज भी सुमित्रा जी के पास है, जिसमें हर महीने की रकम जुड़ती जा रही है—एक सुरक्षित भविष्य और एक सुधरे हुए वर्तमान की गवाही बनकर।

**प्रिय पाठकों,**

अक्सर हम अपने माता-पिता के त्याग और उनकी दी हुई सुविधाओं को अपना ‘जन्मसिद्ध अधिकार’ मान लेते हैं। हम भूल जाते हैं कि जिस छत के नीचे हम बेफिक्र सोते हैं, उसकी नींव हमारे माता-पिता ने अपने खून-पसीने से सींची है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि रिश्तों में *मुफ्तखोरी* नहीं, बल्कि *जिम्मेदारी* और *सम्मान* होना चाहिए। माँ-बाप को हमारे पैसों की नहीं, हमारे प्यार और कद्र की ज़रूरत होती है।

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मूल लेखिका : सीमा गुप्ता 

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