चार लोगों का ‘छोटा’ सा संसार – प्रियंका पटेल 

“तो क्या हम बुढ़ापे में झाड़ू लगाएंगे?” निर्मला देवी ने बात काट दी। “अरे, हमारे ज़माने में तो दस-दस लोगों का खाना हम अकेले चूल्हे पर बनाते थे, कुएं से पानी भरते थे, हाथ से कपड़े धोते थे। और एक तुम हो कि गैस, मिक्सी, वाशिंग मशीन सब होने के बाद भी रोती रहती हो।

रसोई घर में बर्तनों के टकराने की आवाज़ सुबह के 6 बजे से ही गूंजने लगी थी। बाहर अभी सूरज ठीक से निकला भी नहीं था, लेकिन शर्मा सदन के इस हिस्से में दिन का आगाज़ हो चुका था।

गैस के एक चूल्हे पर चाय उबल रही थी, दूसरे पर कुकर में आलू की सीटी बजने को तैयार थी, और स्लैब पर आटे की लोइयां प्रतीक्षा में थीं। इन सबके बीच एक मशीन की तरह हाथ चला रही थी—कावेरी। माथे पर पसीने की बारीक बूंदें थीं, जिन्हें पोंछने का भी उसके पास वक़्त नहीं था।

कावेरी ने जल्दी से रोटियां सेंककर हॉटकेस में रखीं, फिर बच्चों के टिफिन पैक किए। अभी उसे सास-ससुर की शुगर-फ्री चाय छाननी थी और पति, सुमित के लिए नाश्ता टेबल पर लगाना था।

घड़ी की सुई 8 बजा रही थी। सुमित तैयार होकर डाइनिंग टेबल पर आया। “कावेरी, मेरा रुमाल कहाँ है? और आज नाश्ते में फिर से आलू के परांठे? यार, थोड़ा हल्का बनाया करो, पेट भारी हो जाता है।”

कावेरी ने बिना कोई जवाब दिए परांठे की प्लेट टेबल पर रखी और अंदर कमरे से रुमाल लाकर दिया। अभी वह रसोई में वापस मुड़ी ही थी कि उसकी सास, निर्मला देवी की आवाज़ आई।

“बहू, आज फिर कामवाली नहीं आई क्या? झाड़ू-पोछा पड़ा है और तुम अभी तक रसोई में ही हो?”

कावेरी ने एक गहरी सांस ली। उसने पल्लू से चेहरा पोंछा और डाइनिंग टेबल के पास आकर खड़ी हो गई, जहाँ निर्मला देवी और उसके ससुर जी चाय की चुस्की ले रहे थे।

“माँजी,” कावेरी ने हिम्मत जुटाई, “कामवाली शालू ने काम छोड़ दिया है। कह रही थी कि काम ज़्यादा है और पैसे कम। मैं सोच रही थी कि हम एक फुल-टाइम मेड रख लें जो बर्तन और झाड़ू-पोछा दोनों कर दे। मेरी कमर में कल रात से बहुत दर्द है।”

निर्मला देवी ने चाय का कप मेज़ पर रखा, जिससे एक खनकदार आवाज़ हुई। उनकी आँखों में वही पुराना असंतोष तैर गया जो कावेरी अक्सर देखती थी।

“फुल-टाइम मेड?” निर्मला देवी ने तंज कसते हुए कहा। “कावेरी, घर में लोग ही कितने हैं? मैं, तुम्हारे बाबूजी, सुमित और तुम। कुल मिलाकर 4 लोगों का काम ही कितना होता है.. तुमसे तो बस फिजूलखर्ची करवा लो बहू!

कावेरी का दिल एक पल के लिए सिहर गया। यह वाक्य उसने इस घर में पिछले पांच सालों में हज़ारों बार सुना था।

“माँजी, लोग चार हैं, लेकिन काम तो पूरे घर का होता है,” कावेरी ने दबी आवाज़ में कहने की कोशिश की। “सुबह 5 बजे से रात 11 बजे तक मैं बस भागती ही रहती हूँ। सुमित ऑफिस चले जाते हैं, आप लोग बुजुर्ग हैं, तो सारा भार…”

“तो क्या हम बुढ़ापे में झाड़ू लगाएंगे?” निर्मला देवी ने बात काट दी। “अरे, हमारे ज़माने में तो दस-दस लोगों का खाना हम अकेले चूल्हे पर बनाते थे, कुएं से पानी भरते थे, हाथ से कपड़े धोते थे। और एक तुम हो कि गैस, मिक्सी, वाशिंग मशीन सब होने के बाद भी रोती रहती हो। यह सब आलस है और कुछ नहीं। चार कटोरी माँजने के लिए तुम्हें नौकरानी चाहिए? पैसे पेड़ पर नहीं उगते सुमित की कमाई में।”

सुमित ने चुपचाप अपना परांठा खत्म किया और बैग उठाकर खड़ा हो गया। “माँ सही कह रही हैं कावेरी। अभी मेड के रेट बहुत बढ़ गए हैं। थोड़ा एडजस्ट कर लो। शाम को मैं जल्दी आ जाऊंगा तो हेल्प कर दूंगा।”

यह ‘जल्दी आने’ और ‘हेल्प करने’ का वादा कावेरी के लिए किसी चुनावी वादे जैसा था, जो कभी पूरा नहीं होता था। सुमित चला गया। निर्मला देवी अपनी भजन मंडली की तैयारी करने लगीं और बाबूजी अखबार पढ़ने में व्यस्त हो गए।

कावेरी अकेली रह गई। सिंक में पड़े बर्तनों का पहाड़ उसे मुंह चिढ़ा रहा था। उसे लगा जैसे वो चार लोग नहीं, बल्कि चालीस लोगों की पंगत जीम कर गई हो। नाश्ते के बर्तन, चाय के पतीले, कल रात के दूध के भगौने… और इन सबके बाद पूरे 3 बीएचके फ्लैट का झाड़ू-पोछा।

कावेरी की रीढ़ की हड्डी में एक टीस उठी। डॉक्टर ने उसे झुकने से मना किया था, स्लिप डिस्क की शुरुआती शिकायत थी। लेकिन ‘4 लोगों का काम’ तो करना ही था। उसने दर्द निवारक गोली खाई और काम में जुट गई।

दोपहर होते-होते कावेरी की हालत खराब हो गई। बदन तप रहा था। उसे अहसास हुआ कि उसे तेज़ बुखार चढ़ रहा है। उसने किसी तरह दोपहर का खाना बनाया और फिर बिस्तर पर गिर पड़ी।

शाम को 5 बजे जब निर्मला देवी सत्संग से लौटीं, तो घर में सन्नाटा था। चाय की मेज़ खाली थी।

“कावेरी! ओ कावेरी!” उन्होंने आवाज़ लगाई। कोई जवाब नहीं।

वे बड़बड़ाते हुए कावेरी के कमरे में गईं। “महारानी अभी तक सो रही हैं? शाम की चाय का वक़्त हो गया है।”

वे पास गईं और कावेरी को झकझोरा। कावेरी का बदन आग की तरह तप रहा था। उसने मुश्किल से आँखें खोलीं। “माँजी… उठने की हिम्मत नहीं हो रही… बहुत तेज़ बुखार है।”

निर्मला देवी ठिठक गईं। “अच्छा, तुम लेटे रहो। मैं देखती हूँ।”

वे बाहर आईं। मन ही मन सोचा, “बुखार ही तो है, कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। आज मैं ही कर लेती हूँ, वैसे भी काम ही कितना है।”

निर्मला देवी रसोई में गईं। शाम की चाय बनाने के लिए उन्होंने दूध का पतीला चढ़ाया। आदत न होने के कारण आंच तेज़ रह गई और दूध उफन कर पूरे चूल्हे पर फैल गया। जलने की बदबू से वे घबरा गईं। साफ़ करने के लिए कपड़ा ढूंढा, तो मिला नहीं। जैसे-तैसे साफ़ किया तो हाथ में जलन होने लगी।

चाय बनी, तो बाबूजी ने एक घूँट पीकर मुंह बना लिया। “निर्मला, चीनी की जगह नमक डाल दिया क्या?”

निर्मला देवी ने चखा, वाकई चाय खारी थी। हड़बड़ाहट में चीनी के डिब्बे की जगह पास रखा नमक का डिब्बा उठा लिया था।

“उफ्फ! यह कावेरी भी न, डिब्बों पर नाम नहीं लिख सकती थी?” वे अपनी गलती का ठीकरा बहू पर फोड़कर फिर से रसोई में घुस गईं।

शाम के 7 बज गए। अब रात के खाने की चिंता थी। सुमित आने वाला था। निर्मला देवी ने सोचा दाल-चावल बना लेती हूँ। कुकर चढ़ाया, लेकिन उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि चार लोगों के लिए कितनी दाल डालनी है। कभी पानी ज़्यादा हो जाता, कभी कम।

खड़े-खड़े उनके घुटनों में दर्द शुरू हो गया। सिंक में दोपहर के बर्तन अभी भी पड़े थे जिन्हें कावेरी धो नहीं पाई थी। निर्मला देवी ने सोचा, “पहले ये धो लूं।”

जैसे ही उन्होंने पहला बर्तन उठाया, ठंडे पानी ने उनकी उंगलियों में सिहरन पैदा कर दी। चिकनाई साफ़ नहीं हो रही थी। दस मिनट में ही उनकी कमर जवाब दे गई। सिंक अभी भी आधा भरा था।

“हे भगवान! यह लड़की रोज़ इतना कैसे करती है?” उनके मुँह से अनायास ही निकल गया।

तभी डोरबेल बजी। सुमित आ गया था। घर की हालत देखकर वह चौंक गया। सोफे पर कपड़े बिखरे थे, रसोई से जलने की बदबू आ रही थी, और माँ सोफे पर निढाल बैठी अपनी कमर दबा रही थीं।

“माँ? क्या हुआ? और कावेरी कहाँ है?”

“कावेरी को तेज़ बुखार है बेटा,” निर्मला देवी ने कराहते हुए कहा। “मैंने सोचा मैं कर लूँगी, पर… बेटा, यह घर का काम तो खत्म ही नहीं होता।”

सुमित रसोई में गया। वहां का नज़ारा किसी युद्ध के मैदान जैसा था। उसने खिचड़ी बनाने की कोशिश की, लेकिन उसे मसाले नहीं मिल रहे थे। वह बार-बार कावेरी को आवाज़ लगाने वाला था, लेकिन फिर रुक गया। उसे याद आया कि कावेरी बीमार है।

रात के 10 बज गए। बाप-बेटे और माँ ने मिलकर जैसे-तैसे खिचड़ी खाई। स्वाद का तो कोई अता-पता नहीं था। खाने के बाद टेबल पर झूठे बर्तन पड़े थे।

सुमित ने कहा, “माँ, आप रहने दो, मैं सुबह धो दूंगा।”

लेकिन सुबह की कहानी और भी भयानक थी।

सुमित को ऑफिस जाना था, लेकिन कोई साफ़ शर्ट नहीं थी क्योंकि कावेरी ने प्रेस नहीं की थी (बीमारी की वजह से)। नाश्ता नहीं बना था। बाथरूम साफ़ नहीं था।

निर्मला देवी सुबह 6 बजे उठीं, लेकिन शरीर ने साथ छोड़ दिया। रात भर की भागदौड़ से उनकी पुरानी गठिया का दर्द उभर आया था। वे बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थीं।

घर ‘चार लोगों’ का ही था, लेकिन उस दिन वह घर किसी भूत-बंगले जैसा अस्त-व्यस्त लग रहा था।

कावेरी अभी भी बुखार में थी, लेकिन घर की आवाज़ें सुनकर वह उठने की कोशिश करने लगी। वह लड़खड़ाते हुए बाहर आई। देखा तो सुमित ब्रेड पर जैम लगा रहा था और बाबूजी बिस्किट खाकर पानी पी रहे थे। निर्मला देवी अपने कमरे में लेटी कराह रही थीं।

कावेरी ने दीवार का सहारा लिया और रसोई की तरफ बढ़ी।

“कावेरी, तुम रहने दो,” सुमित ने उसे देखा तो दौड़कर आया। “तुम्हें बहुत तेज़ बुखार है।”

“तो कौन करेगा सुमित?” कावेरी की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी। “माँजी से नहीं होगा, बाबूजी कर नहीं सकते, और तुम्हें ऑफिस जाना है। ‘चार लोगों का काम’ ही तो है, मैं कर लूँगी।”

यह व्यंग्य नहीं, एक कड़वी सच्चाई थी। कावेरी ने सिंक की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि निर्मला देवी लंगड़ाते हुए कमरे से बाहर आईं।

“खबरदार बहू, जो तूने एक भी बर्तन को हाथ लगाया!” निर्मला देवी की आवाज़ में एक कम्पन था।

सबने चौंककर उनकी तरफ देखा।

निर्मला देवी ने अपनी आँखों से आंसू पोंछे और कावेरी के पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया। उनका हाथ कांप रहा था, लेकिन पकड़ मज़बूत थी।

“सुमित,” निर्मला देवी ने बेटे की तरफ देखा, “अभी के अभी डॉक्टर को बुलाओ। और हाँ, उस एजेंसी को फ़ोन करो जहाँ से फुल-टाइम मेड मिलती है।”

“लेकिन माँ…” सुमित कुछ कहना चाहता था।

“लेकिन-वेकिन कुछ नहीं!” निर्मला देवी चिल्लाईं। “कल सिर्फ़ 4 घंटे रसोई में खड़ी रही, तो मेरी नानी याद आ गई। मेरी कमर सीधी नहीं हो रही, उंगलियाँ सुन्न पड़ गई हैं। और यह लड़की… यह पिछले पांच साल से, बिना एक भी छुट्टी लिए, रोज़ यह सब कर रही है और हम कहते हैं कि ‘काम ही कितना है’?”

वे कावेरी की ओर मुड़ीं। कावेरी की आँखों में बुखार की तपन और आंसुओं की नमी दोनों थी।

“मुझे माफ़ कर दे बहू,” निर्मला देवी का गला भर आया। “हम भूल गए थे कि ये चार लोग सिर्फ़ चार पेट नहीं हैं, ये चार ज़िम्मेदारियाँ हैं। चार लोगों के कपड़े गंदे होते हैं, चार लोग पानी गिराते हैं, चार लोग चीज़ें बिखेरते हैं। और इन सबको समेटने वाला हाथ सिर्फ़ एक था—तेरा। हमने तुझे मशीन समझ लिया था। कल जब मैंने वो जूठे बर्तनों का ढेर देखा, तो मुझे समझ आया कि वो सिर्फ़ बर्तन नहीं थे, वो तेरा रोज़ का संघर्ष था जिसे हम ‘फ़िज़ूल’ कह रहे थे।”

कावेरी रो पड़ी। उसने कभी उम्मीद नहीं की थी कि उसकी सास ये शब्द बोलेंगी।

“माँजी, आप रोइए मत,” कावेरी ने उन्हें संभालना चाहा।

“रोऊँ नहीं तो क्या करूँ?” निर्मला देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से कावेरी का पसीना पोंछा। “सुमित, सुन ले कान खोलकर। आज से घर में मेड आएगी। और सिर्फ़ झाड़ू-पोछा के लिए नहीं, खाना बनाने के लिए भी। कावेरी इस घर की बहू है, कोई बंधुआ मज़दूर नहीं। अगर हम चार लोग मिलकर उसकी कद्र नहीं कर सकते, तो हमें उसके हाथ का खाना खाने का भी हक़ नहीं है।”

सुमित ने सिर झुका लिया। उसे अपनी और अपने परिवार की असंवेदनशीलता पर शर्म आ रही थी। “जी माँ, मैं अभी फ़ोन करता हूँ।”

उस दिन, शर्मा सदन में पहली बार शांति थी। काम बिखरा पड़ा था, बर्तन गंदे थे, लेकिन रिश्तों पर जमी धूल साफ़ हो चुकी थी।

दोपहर को जब मेड एजेंसी वाली आई, तो निर्मला देवी ने मोलभाव नहीं किया। उन्होंने बस एक ही बात कही, “मुझे ऐसी बाई चाहिए जो मेरी बहू को आराम दे सके। पैसे जो लगेंगे, मैं अपनी पेंशन से दूंगी। क्योंकि दवाई पर खर्च करने से बेहतर है कि मैं अपनी बहू की मुस्कुराहट पर खर्च करूँ।”

कावेरी अपने कमरे में लेटी यह सब सुन रही थी। बुखार अभी भी था, लेकिन मन का बोझ उतर चुका था। उसे आज पहली बार महसूस हुआ कि वह इस घर का हिस्सा है, फ़र्नीचर का नहीं।

शाम को निर्मला देवी कावेरी के लिए सूप बनाकर लाईं।

“लो, पी लो,” उन्होंने प्यार से कहा। “थोड़ा फीका हो सकता है, मुझे तुम्हारी तरह स्वाद का जादू जगाना नहीं आता। पर इसमें ‘फिज़ूलखर्ची’ नहीं है, सिर्फ़ ‘फ़िक्र’ है।”

कावेरी मुस्कुरा दी। उस सूप का स्वाद दुनिया के किसी भी पकवान से बेहतर था।

उस दिन के बाद से घर में चार लोग ही थे, लेकिन अब काम ‘एक’ पर नहीं था। ज़िम्मेदारियाँ बंट गई थीं, और सबसे बड़ी बात—कावेरी की मेहनत को अब ‘दिखाई’ देने का दर्जा मिल गया था।

सच ही तो है, घर का काम तभी ‘कम’ लगता है जब वह किसी और के कंधों पर हो। जिस दिन वह बोझ अपने कंधे पर आता है, तब पता चलता है कि वह ‘चार लोगों का छोटा सा काम’ असल में एक पहाड़ खोदने जैसा होता है।


प्रिय पाठकों,

इस कहानी ने हम सबके घरों की उस कड़वी सच्चाई को छुआ है जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। हमारे घर की औरतें—चाहे वो माँ हो, पत्नी हो या बहू—बिना किसी छुट्टी, बिना किसी वेतन के दिन-रात खटती हैं, और बदले में उन्हें सुनने को मिलता है, “दिन भर करती ही क्या हो?”

निर्मला देवी को अपनी गलती का अहसास तब हुआ जब उन पर खुद बीती। लेकिन क्या यह ज़रूरी है कि हम ठोकर खाकर ही संभलें? क्या हम आज ही अपने घर की ‘अन्नपूर्णा’ को थोड़ा आराम और बहुत सारा सम्मान नहीं दे सकते?

सवाल: क्या आपके घर में भी काम को लेकर ऐसी बातें होती हैं? आप अपनी घर की महिलाओं का सहयोग कैसे करते हैं? कमेंट में ज़रूर बताएं।

अगर कावेरी के दर्द और निर्मला देवी के पछतावे ने आपके दिल को छुआ, तो लाइक और कमेंट ज़रूर करें। इस कहानी को शेयर करें ताकि हर उस घर तक यह संदेश पहुँचे जहाँ गृहणियों की मेहनत को ‘फ़िज़ूल’ समझा जाता है।

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धन्यवाद!

मूल लेखिका : प्रियंका पटेल 

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