खामोश प्यार की गूंज – पुष्पा जोशी

दरवाजे की घंटी बजी तो सुमित्रा जी अपनी पुरानी आदत के मुताबिक थोड़ा बुदबुदाईं, “इस वक्त कौन आ गया? दोपहर की नींद का भी समय नहीं मिलता।” उन्होंने पल्लू ठीक किया और दरवाजा खोला। सामने अपनी बेटी रिया को खड़ा देख उनकी आँखों में चमक आ गई।

“अरे रिया! तू? और वो भी बिना बताए?” सुमित्रा जी ने खुश होकर कहा, लेकिन अगले ही पल उनकी नज़र रिया के पीछे रखे दो बड़े सूटकेस पर गई। उनकी मुस्कुराहट धीरे-धीरे चिंता की लकीरों में बदल गई।

“समीर नहीं आया बेटा? आज तो शनिवार है, उसकी छुट्टी होती है न?” सुमित्रा जी ने बाहर झांकते हुए पूछा।

रिया ने एक झटके से अपना पर्स सोफे पर फेंका और बिना जूतें उतारे धम्म से बैठ गई। उसका चेहरा तमतमाया हुआ था और आँखों में आंसुओं का सैलाब रुका हुआ था जो किसी भी पल बांध तोड़ सकता था।

“माँ, प्लीज! समीर का नाम मत लो मेरे सामने। मुझे उस इंसान की शक्ल भी नहीं देखनी,” रिया की आवाज़ में इतना गुस्सा था कि सुमित्रा जी सहम गईं।

रसोई से पानी का गिलास लेकर आते हुए रिया के पिता, मनोहर बाबू भी ठिठक गए। उन्होंने गिलास रिया की तरफ बढ़ाया। “क्या बात है गुड़िया? झगड़ा हुआ है क्या?”

रिया ने पानी का गिलास एक घूंट में खाली किया और फट पड़ी। “झगड़ा? पापा, झगड़ा तो तब होता है जब सामने वाला बात करे। वो इंसान तो पत्थर है, पत्थर! न कोई जज़्बात, न कोई रोमांस, न मेरे सपनों की कद्र। बस दिन-रात काम, काम और काम! मैं पक गई हूँ ऐसी बोरिंग ज़िंदगी से। मुझे तलाक चाहिए।”

सुमित्रा जी के हाथ से पानी की ट्रे छूटते-छूटते बची। “तलाक? पागल हो गई है क्या? अभी शादी को दो साल ही तो हुए हैं। समीर जैसा सीधा और सुलझा हुआ लड़का तुझे चिराग लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलता।”

“हाँ माँ, दुनिया के लिए बहुत सीधा है। पर मेरे लिए? मेरे लिए क्या किया है उन्होंने?” रिया रोने लगी। “मेरी सहेली नेहा को देखो, उसकी सालगिरह पर उसके पति ने उसे डायमंड नेकलेस दिया, पेरिस लेकर गया। और समीर? हमारी सालगिरह पर क्या दिया? एक एफडी (Fixed Deposit) के कागज़! कोई पत्नी को तोहफे में एफडी के कागज़ देता है क्या? कहते हैं- ‘रिया, ये तुम्हारे भविष्य के लिए है।’ अरे, मुझे आज जीना है, मुझे आज खुशियाँ चाहिए, मुझे बुढ़ापे का सहारा नहीं चाहिए अभी से!”

मनोहर बाबू ने सुमित्रा जी को शांत रहने का इशारा किया और खुद रिया के पास बैठ गए।

“बेटा, तो सिर्फ तोहफों की वजह से तू घर छोड़ आई?” मनोहर बाबू ने नरमी से पूछा।

“सिर्फ तोहफे नहीं पापा,” रिया ने सिसकते हुए कहा। “वो मुझे टाइम नहीं देते। कल रात मैंने कहा कि चलो मूवी चलते हैं, तो बोले- ‘रिया, अभी एक प्रोजेक्ट की डेडलाइन है, एक्स्ट्रा काम करना पड़ेगा।’ हमेशा पैसे बचाने की रट लगाए रहते हैं। एसी मत चलाओ, बिजली का बिल ज्यादा आएगा। बाहर मत खाओ, घर का खाना सेहतमंद है। पापा, उन्होंने मेरी ज़िंदगी को एक बजट शीट बनाकर रख दिया है। मुझे घुटने होती है। मुझे लगता है वो मुझसे प्यार ही नहीं करते, उन्हें बस एक हाउसकीपर चाहिए थी जो उनका घर संभाले।”

रिया अपनी भड़ास निकालती रही। वह बताती रही कि कैसे उसकी सहेलियों के पति उन्हें सरप्राइज देते हैं, सोशल मीडिया पर लंबी-लंबी पोस्ट लिखते हैं, और समीर ने आज तक फेसबुक पर एक फोटो भी ढंग से अपलोड नहीं की। उसे समीर का हर व्यवहार कंजूसी और बेरुखी लगता था।

मनोहर बाबू चुपचाप सुनते रहे। जब रिया चुप हुई, तो उन्होंने उससे कहा, “जा बेटा, मुँह-हाथ धो ले। तू थक गई है। हम शाम को बात करेंगे।”

रिया अपने पुराने कमरे में चली गई। सुमित्रा जी परेशान होकर बोलीं, “सुनिए, आप कुछ बोले क्यों नहीं? समीर दामाद जी गलत नहीं हो सकते। जरूर इस लड़की के दिमाग में वो सोशल मीडिया का फितूर चढ़ गया है।”

मनोहर बाबू ने एक गहरी सांस ली। “जानता हूँ सुमित्रा। पर अभी वो गुस्से में है। लोहा जब गरम हो तो उस पर चोट नहीं मारनी चाहिए, पिघलने का इंतज़ार करना चाहिए। मैं शाम को उसे कुछ दिखाऊँगा।”

शाम को मनोहर बाबू ने रिया को अपनी अलमारी के पास बुलाया। रिया अब थोड़ी शांत थी, लेकिन उसका इरादा पक्का था।

“रिया, तूने कहा न कि समीर तुझे प्यार नहीं करता क्योंकि वो तुझे महंगे तोहफे नहीं देता?” मनोहर बाबू ने एक पुरानी डायरी निकालते हुए पूछा।

“हाँ पापा। प्यार जताने के तरीके होते हैं। वो मुझे स्पेशल फील नहीं कराते,” रिया ने मुंह बनाकर कहा।

मनोहर बाबू ने वो डायरी रिया के हाथ में थमा दी। “जरा इसे पढ़ना।”

रिया ने डायरी खोली। वो उसके पिता की हिसाब-किताब की डायरी थी। लेकिन उसमें कुछ पन्नों पर अलग ही एंट्री थी।

तारीख: 12 मार्च 2024 – अस्पताल का बिल: 3 लाख रुपये (समीर ने जमा किए).

तारीख: 15 अप्रैल 2024 – घर की छत की मरम्मत: 50 हज़ार रुपये (समीर ने दिए).

तारीख: 20 मई 2024 – रिया की कार की डाउन पेमेंट: 2 लाख रुपये (समीर ने दी).

रिया के हाथ कांपने लगे। “पापा… ये सब क्या है? मार्च में तो आपको हार्ट अटैक आया था न? आपने कहा था कि आपकी इंश्योरेंस पॉलिसी से पैसे मिले हैं।”

मनोहर बाबू की आँखों में नमी आ गई। “झूठ कहा था बेटा। मेरी इंश्योरेंस पॉलिसी दो साल पहले ही लैप्स हो गई थी, मैं प्रीमियम नहीं भर पाया था। जब मुझे अटैक आया, तो डॉक्टर ने कहा था कि तुरंत सर्जरी करनी होगी। मेरे पास फूटी कौड़ी नहीं थी। मैंने समीर को फोन किया। वो उसी वक्त ऑफिस छोड़कर आया और उसने अपनी कार बेचने के पैसे, जो उसने नई कार के लिए जमा किए थे, वो सब अस्पताल के काउंटर पर जमा करा दिए।”

रिया सन्न रह गई। उसे याद आया कि समीर उस दौरान कितना परेशान था, और जब रिया ने पूछा था कि ‘नई कार कब ले रहे हो’, तो उसने टाल दिया था कि ‘अभी पुरानी ही ठीक है’। रिया ने उसे ‘कंजूस’ कहा था।

मनोहर बाबू ने आगे कहा, “और वो 50 हज़ार? याद है जब बारिश में हमारे घर की छत टपकने लगी थी? तूने समीर से शिकायत की थी कि ‘मेरे मायके में पानी टपकता है’। तुझे लगा मैंने ठीक करवाई? नहीं बेटा, समीर ने चुपचाप मिस्त्री भेजकर पैसे दिए थे। और उसने कसम दी थी मुझे कि मैं तुझे न बताऊँ। वो कहता था— ‘रिया को बुरा लगेगा कि उसके पापा के पास पैसे नहीं हैं, उसकी खुद्दारी को चोट पहुंचेगी। पापा, मैं हूँ न।'”

रिया की आँखों से अब आंसुओं की धार बह रही थी।

“तू जिस एफडी को ‘कागज़ का टुकड़ा’ कह रही थी न,” मनोहर बाबू ने उसके सिर पर हाथ रखा, “समीर पिछले छह महीनों से लंच में कैंटीन का खाना छोड़कर घर से टिफिन ले जा रहा है, ओवरटाइम कर रहा है, ताकि वो एफडी तेरे नाम कर सके। वो कह रहा था— ‘पापा, लाइफ का कोई भरोसा नहीं। अगर मुझे कल कुछ हो जाए, तो मेरी रिया को किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।'”

सुमित्रा जी भी वहां आ गई थीं। उन्होंने रिया को पकड़कर झकझोरा। “पगली! तू जिसे पत्थर समझ रही थी, वो हीरा है। सोशल मीडिया पर प्यार का ढिंढोरा पीटने वाले बहुत मिलेंगे, लेकिन जो इंसान अपनी खुशियाँ मारकर तेरी और तेरे परिवार की इज़्ज़त ढके, वो देवता होता है। नेहा के पति ने उसे हार दिया होगा, लेकिन क्या उसने नेहा के पिता की जान बचाई?”

रिया घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसे अपने हर ताने, हर शिकायत पर घिन आ रही थी। उसे याद आया कि कैसे वो समीर को ‘बोरिंग’ कहती थी जब वो थका-हारा घर आता था। वो इसलिए नहीं थका होता था कि उसे काम का शौक था, बल्कि इसलिए कि वो रिया के सुरक्षित भविष्य की नींव खोद रहा था।

“मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी पापा… मैंने हीरे को कांच समझ लिया,” रिया सिसक रही थी। “मैं कितनी स्वार्थी हो गई थी। मुझे लगा प्यार मतलब घूमना-फिरना और तोहफे है। मुझे नहीं पता था कि प्यार मतलब ‘जिम्मेदारी’ है।”

तभी बाहर कार रुकने की आवाज़ आई।

सुमित्रा जी ने खिड़की से देखा। “समीर आया है।”

रिया घबरा गई। “मैं… मैं उससे कैसे नज़र मिलाऊँगी माँ? मैंने उसे क्या-क्या नहीं कहा। मैंने उसे घर से निकलते वक्त कहा था कि ‘तुम मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती हो’।”

मनोहर बाबू ने रिया को उठाया। “गलती सुधारने का वक्त अभी गया नहीं है बेटा। जा, उसे बता कि तूने आज प्यार का असली मतलब समझ लिया है।”

दरवाजे की घंटी बजी। सुमित्रा जी ने दरवाजा खोला।

सामने समीर खड़ा था। थका हुआ चेहरा, पसीने से भीगी शर्ट। उसके हाथ में एक छोटा सा पैकेट था।

“माँजी, वो रिया…” समीर की आवाज़ में घबराहट थी। “वो गुस्से में आ गई थी। गलती मेरी ही होगी, मैंने शायद उसे वक़्त नहीं दिया। मैं उसे मनाने आया हूँ। प्लीज उसे बुला दीजिये।”

रिया दौड़ती हुई आई और सीधे समीर के गले लग गई। समीर हक्का-बक्का रह गया। उसने सोचा था कि रिया चिल्लाएगी, लड़ेगी।

“अरे, अरे… क्या हुआ?” समीर ने घबराकर पूछा। “रिया, सॉरी बाबा। मैं प्रॉमिस करता हूँ, अगले हफ्ते पक्का छुट्टी लूँगा। हम कहीं बाहर चलेंगे।”

रिया ने उसका मुँह अपने हाथों से बंद कर दिया। उसकी आँखों में पश्चाताप के आंसू थे। “नहीं समीर, मुझे कहीं नहीं जाना। मुझे पेरिस नहीं जाना, मुझे डायमंड नहीं चाहिए। मुझे बस तुम चाहिए। और… और मुझे माफ़ कर दो।”

समीर समझ नहीं पा रहा था कि अचानक क्या हुआ। उसने धीरे से वो पैकेट रिया के हाथ में थाम दिया।

“ये… ये तुम्हारे लिए। रास्ते में तुम्हारी पसंदीदा काजू कतली ले आया था। सोचा शायद इससे तुम्हारा गुस्सा थोड़ा कम हो जाए,” समीर ने मासूमियत से कहा।

रिया ने उस साधारण सी मिठाई को सीने से लगा लिया जैसे वो दुनिया का सबसे कीमती खज़ाना हो। उसने देख लिया कि इस डिब्बे के पीछे समीर की वो फिक्र छिपी थी जो बिना कहे, बिना जताए हमेशा उसके साथ चलती थी।

मनोहर बाबू और सुमित्रा जी दूर खड़े यह नज़ारा देख रहे थे।

मनोहर बाबू ने धीरे से कहा, “आज की पीढ़ी ‘दिखावे’ को प्यार समझती है, सुमित्रा। उन्हें नहीं पता कि जो पेड़ घना छाया देता है, वो अक्सर खामोश खड़ा रहता है। शुक्र है, हमारी रिया को वक्त रहते समझ आ गया।”

रिया ने समीर का हाथ थाम लिया। “समीर, चलो घर चलते हैं। हमारा घर।”

समीर मुस्कुराया। उसकी थकान जैसे पल भर में गायब हो गई। उसने मनोहर बाबू और सुमित्रा जी के पैर छुए और रिया का हाथ थामे बाहर निकल गया।

सूटकेस अब भी वहीं रखे थे, लेकिन अब उनमें शिकायतों का बोझ नहीं था। रिया खाली हाथ आई थी, लेकिन अब वो ‘समझ’ और ‘सम्मान’ से भरकर वापस जा रही थी। उसे समझ आ गया था कि ‘रील लाइफ’ (Reel Life) और ‘रियल लाइफ’ (Real Life) में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। सच्चा प्यार शोर नहीं मचाता, वो बस साथ निभाता है।


निष्कर्ष:

दोस्तों, आज के ज़माने में हम अक्सर दूसरों की चकाचौंध भरी ज़िंदगी देखकर अपने सादे और सच्चे रिश्तों को कमतर आंकने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि जो पति या पत्नी सोशल मीडिया पर आपके लिए कविताएं नहीं लिखते, हो सकता है वे असल ज़िंदगी में आपके लिए अपनी पूरी दुनिया कुर्बान कर रहे हों। प्यार का असली रूप त्याग और समर्पण में है, दिखावे में नहीं। अपने साथी की खामोश कोशिशों को पहचानिए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।

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मूल लेखिका : पुष्पा जोशी

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