समीर रोता हुआ उठा था। उसे चोट शरीर पर नहीं, बल्कि रूह पर लगी थी। उस दिन उसके पिता रामदीन ने भी उसे डांटा था और समझाया था कि “बेटा, हम छोटे लोग हैं। हमें बड़े लोगों की बराबरी नहीं करनी चाहिए।
वो सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं और हम लोहे की कुदाल।” उस रात समीर सोया नहीं था। उसने अपनी गीली आंखों से छत को घूरते हुए कसम खाई थी कि एक दिन वह इतना बड़ा आदमी बनेगा कि कोई उसे उसकी औकात याद दिलाने की जुर्रत नहीं कर सकेगा।
शहर के सबसे पॉश इलाके में बनी पच्चीस मंजिला इमारत के सबसे ऊपर वाले फ्लोर पर समीर का आलीशान ऑफिस था। कांच की दीवारों से पूरा शहर किसी खिलौने जैसा नजर आता था। एयर कंडीशनर की धीमी-धीमी आवाज और महंगे रूम फ्रेशनर की खुशबू के बीच समीर अपनी घूमने वाली कुर्सी पर बैठा फाइलों में उलझा हुआ था।
वह आज शहर का माना-जाना बिजनेसमैन था। उसकी कंपनी ‘स्काईलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर’ देश भर में बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स संभाल रही थी।
उसकी मेज पर रखी कॉफ़ी ठंडी हो रही थी, लेकिन उसका ध्यान एक बायोडाटा पर अटक गया था जो उसके एच.आर. मैनेजर ने थोड़ी देर पहले ही उसकी टेबल पर रखा था। यह इंटरव्यू एक साधारण क्लर्क की नौकरी के लिए था, जिसे समीर खुद नहीं लेने वाला था, लेकिन उस बायोडाटा पर लिखे नाम ने उसे चौंका दिया था।
नाम था – ‘विक्रम सिंह रंधावा’।
समीर ने अपनी आंखों से चश्मा उतारा और उसे साफ करके दोबारा लगाया। शायद पढ़ने में कोई गलती हुई हो। लेकिन नहीं, नाम वही था और साथ में लगी पासपोर्ट साइज फोटो में चेहरे पर पड़ी झुर्रियों और उदासी के बावजूद, वह उस नक्श को पहचान गया। यह वही विक्रम था।
वही तीखी नाक, वही चौड़ा माथा, बस आंखों से वह गुरूर गायब था जो कभी वहां स्थायी रूप से बसा करता था। समीर का दिमाग वर्तमान के इस आलीशान ऑफिस से निकलकर तीस साल पीछे की धूल भरी गलियों में चला गया।
समीर के पिता, रामदीन, रंधावा मेंशन में एक ड्राइवर थे। रंधावा मेंशन… नाम लेते ही पूरे शहर में अदब से सिर झुक जाते थे। शहर के सबसे बड़े रईस, ठाकुर बलदेव सिंह रंधावा का वह महलनुमा घर, जिसकी ऊंची दीवारों के पार झांकना भी आम आदमी के बस की बात नहीं थी। विक्रम, ठाकुर साहब का इकलौता बेटा था। समीर और विक्रम की उम्र लगभग एक ही थी, शायद कुछ महीनों का फर्क रहा होगा। समीर अक्सर स्कूल की छुट्टियों में अपने पिता के साथ उस हवेली में जाता था। पिता गैराज में गाड़ियां चमकाते और समीर गैराज के कोने में बैठकर अपनी फटी-पुरानी किताबों में सिर खपाया करता था।
विक्रम जब भी घर से बाहर निकलता, तो ऐसा लगता जैसे कोई राजकुमार आया हो। उसके कपड़े हमेशा इस्त्री किए हुए, जूते ऐसे चमकते कि शक्ल देख लो, और हाथ में हमेशा कोई न कोई महंगा खिलौना। समीर को याद है कि एक बार विक्रम एक रिमोट कंट्रोल वाली कार लेकर आया था। उस जमाने में वह कार किसी जादू से कम नहीं थी। समीर गैराज के दरवाजे से छिपकर उस लाल रंग की कार को ललचाई नजरों से देख रहा था। उसका मन हुआ कि बस एक बार, सिर्फ एक बार उसे छूकर देखे।
जब विक्रम खेलने के बाद कार वहीं छोड़कर अंदर पानी पीने गया, तो समीर खुद को रोक नहीं पाया। वह दबे पांव गया और कांपते हाथों से उस कार को उठाया। वह प्लास्टिक की कार उसे दुनिया की सबसे कीमती चीज लग रही थी। तभी पीछे से एक कड़क आवाज आई, “ओए! हिम्मत कैसे हुई तेरी मेरी कार को हाथ लगाने की?”
समीर कांप गया। कार उसके हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गई। विक्रम दौड़कर आया और उसने समीर को एक जोरदार धक्का दिया। समीर धूल में जा गिरा। विक्रम ने चिल्लाते हुए कहा था, “तू ड्राइवर का बेटा है, अपनी औकात में रह। यह कार तेरी पूरे घर की कमाई से भी महंगी है। दोबारा अगर मेरे किसी सामान को हाथ लगाया तो पिताजी से कहकर तुझे और तेरे बाप को नौकरी से निकलवा दूंगा।”
समीर रोता हुआ उठा था। उसे चोट शरीर पर नहीं, बल्कि रूह पर लगी थी। उस दिन उसके पिता रामदीन ने भी उसे डांटा था और समझाया था कि “बेटा, हम छोटे लोग हैं। हमें बड़े लोगों की बराबरी नहीं करनी चाहिए। वो सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं और हम लोहे की कुदाल।” उस रात समीर सोया नहीं था। उसने अपनी गीली आंखों से छत को घूरते हुए कसम खाई थी कि एक दिन वह इतना बड़ा आदमी बनेगा कि कोई उसे उसकी औकात याद दिलाने की जुर्रत नहीं कर सकेगा।
वक्त का पहिया घूमा। रंधावा परिवार के लिए वक्त शायद वहीं ठहर गया था, लेकिन समीर के लिए वह भाग रहा था। समीर ने दिन-रात पढ़ाई की। सरकारी स्कूल की टूटी टाट-पट्टी पर बैठकर उसने आसमान छूने के सपने बुने। वजीफा मिला, इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, और फिर अपनी मेहनत के दम पर अपनी कंपनी खड़ी की। दूसरी तरफ, शहर में खबरें उड़ती रहीं कि ठाकुर बलदेव सिंह के जाने के बाद विक्रम ने सारा कारोबार डुबो दिया। शराब, जुआ और गलत संगत ने रंधावा साम्राज्य की नींव हिला दी। धीरे-धीरे वह आलीशान मेंशन बिका, गाड़ियां बिकीं, और रंधावा परिवार शहर के किसी कोने में गुम हो गया।
आज तीस साल बाद, वही विक्रम, समीर की कंपनी में एक क्लर्क की नौकरी के लिए अर्जी लेकर खड़ा था।
समीर ने इंटरकॉम का बटन दबाया, “शर्मा जी, उस कैंडिडेट विक्रम सिंह को अंदर भेजिए।”
दरवाजा खुला और एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति अंदर दाखिल हुआ। उसके कपड़े साफ थे लेकिन बहुत पुराने। शर्ट का कॉलर घिसा हुआ था और पैंट का रंग उड़ चुका था। वह थोड़ा लंगड़ा कर चल रहा था। विक्रम ने अंदर आते ही हाथ जोड़कर कहा, “नमस्कार सर, मैं इंटरव्यू के लिए…”
समीर अपनी कुर्सी पर पीछे की ओर झुक गया और उसे गौर से देखा। विक्रम उसे पहचान नहीं पाया था। शायद पहचानता भी कैसे? उस धूल में सने, सहमे हुए ड्राइवर के बेटे और आज के इस सूट-बूट वाले एमडी में जमीन-आसमान का फर्क था।
“बैठिए,” समीर ने भारी आवाज़ में कहा।
विक्रम झिझकते हुए सामने रखी कुर्सी के किनारे पर बैठ गया। वह नर्वस था। उसके हाथ कांप रहे थे। समीर ने पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया। विक्रम ने एक ही घूंट में पानी पी लिया।
“अपने बारे में कुछ बताइए, मिस्टर रंधावा,” समीर ने जानबूझकर उसके सरनेम पर जोर दिया।
विक्रम ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “सर, क्या बताऊं। वक्त ने सब कुछ सिखा दिया है। कभी हमारा खुद का बहुत बड़ा कारोबार था, लेकिन मेरी नादानियों और वक्त की मार ने मुझे यहाँ ला खड़ा किया है। अब बस परिवार पालने के लिए एक नौकरी की सख्त जरूरत है। मुझे कंप्यूटर का थोड़ा बहुत ज्ञान है और हिसाब-किताब भी कर लेता हूँ।”
समीर ने पूछा, “आपको पता है यह कंपनी किसकी है?”
विक्रम ने सिर हिलाया, “जी, सुना है कि समीर सर बहुत मेहनती इंसान हैं। उन्होंने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है।”
समीर मुस्कुराया, एक कड़वी मुस्कान। “विक्रम जी, क्या आपको बचपन का कोई दोस्त याद है? या कोई ऐसा जिसे आपने कभी बहुत छोटा समझा हो?”
विक्रम चौंका। उसने अपनी धुंधली आंखों से समीर को गौर से देखा। वह कुछ पल के लिए शांत रहा, जैसे यादों के पन्ने पलट रहा हो। फिर अचानक उसकी आंखों में एक चमक आई, जो तुरंत शर्मिंदगी में बदल गई। उसका चेहरा पीला पड़ गया।
“स… समीर?” विक्रम की आवाज़ लड़खड़ा गई। “रामदीन काका के बेटे… समीर?”
समीर अपनी कुर्सी से उठा और खिड़की की तरफ जाकर खड़ा हो गया, शहर की ओर देखते हुए। “हां विक्रम। वही समीर। वही ड्राइवर का बेटा, जिसे तुमने अपनी लाल कार छूने पर धक्का दिया था। वही, जिसे तुमने औकात याद दिलाई थी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। केवल घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। विक्रम का सिर शर्म से झुक गया था। वह अपनी जगह से खड़ा हो गया।
“मुझे… मुझे माफ कर दो समीर भाई,” विक्रम की आवाज़ भर्रा गई थी। “मैं… मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था। मैं चलता हूँ।” वह मुड़ा और दरवाजे की तरफ बढ़ा। उसे लगा कि अब उसे और अपमानित होना पड़ेगा। उसे लगा कि समीर अब अपना बदला लेगा, उसे भी वैसे ही धक्के मारकर निकालेगा जैसे उसने बचपन में किया था।
“रुको!” समीर की आवाज़ गूंजी।
विक्रम दरवाजे के हैंडल पर हाथ रखे रुक गया। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
समीर उसके पास गया और उसके कंधे पर हाथ रखा। विक्रम सिहर गया।
“कहाँ जा रहे हो? नौकरी नहीं चाहिए?” समीर ने नरमी से पूछा।
विक्रम ने पलटकर देखा। समीर की आंखों में प्रतिशोध नहीं, करुणा थी।
“समीर, मैं इस लायक नहीं हूँ। मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया था। आज तुम बादशाह हो और मैं एक फकीर। तुम चाहो तो मेरा मजाक उड़ा सकते हो, मुझे गालियां दे सकते हो। मेरा हक नहीं बनता तुम्हारी दया का।” विक्रम की आंखों से आंसू बह निकले।
समीर ने उसे वापस कुर्सी पर बैठाया और खुद उसके सामने वाली टेबल पर बैठ गया। “विक्रम, वक्त ने हम दोनों को एक बहुत बड़ा सबक सिखाया है। तुम्हें यह सिखाया कि अहंकार किसी का सगा नहीं होता, और मुझे यह सिखाया कि इंसान की असली कीमत उसके कपड़ों या खिलौनों से नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और नीयत से होती है। अगर मैं आज तुम्हें धक्के मारकर निकाल दूं, तो मुझमें और उस दिन के विक्रम में क्या फर्क रह जाएगा?”
समीर ने आगे कहा, “मैंने वो कार वाला किस्सा कभी नहीं भुलाया। सच कहूं तो उसी किस्से ने मुझे यहाँ तक पहुंचाया है। अगर तुम उस दिन मुझे धक्का न देते, तो शायद मैं आज भी किसी गैराज में काम कर रहा होता। तुम्हारी उस नफरत ने मेरे अंदर एक आग जलाई थी। लेकिन आज… आज तुम्हें इस हाल में देखकर वो आग बुझ गई है।”
विक्रम रो रहा था। एक बच्चे की तरह। वह अभिमान जो कभी उसका गहना था, आज आंसुओं के रूप में पिघल रहा था। “मेरे पिता के जाने के बाद सबने मेरा साथ छोड़ दिया, समीर। वो दोस्त जो मेरे पैसों पर पलते थे, मुझे पहचानने से भी इनकार कर दिया। आज मुझे समझ आ रहा है कि असली अमीरी क्या होती है।”
समीर ने अपनी जेब से रुमाल निकालकर विक्रम को दिया। “पुरानी बातें भूल जाओ दोस्त। आज हम दोनों एक नई शुरुआत करेंगे। तुम्हें नौकरी मिलेगी, लेकिन किसी एहसान के तौर पर नहीं, बल्कि तुम्हारी काबिलियत पर। मैंने तुम्हारा बायोडाटा देखा है, तुम्हें तजुर्बा है। मुझे अपनी लॉजिस्टिक्स टीम के लिए एक भरोसेमंद आदमी चाहिए।”
विक्रम ने अविश्वास से समीर को देखा। “तुम… तुम मुझे अपनी कंपनी में रखोगे? मेरे इतने बुरे बर्ताव के बाद भी?”
“बदला लेकर मैं सिर्फ अपने अतीत को शांत कर पाता, विक्रम। लेकिन मदद करके मैं अपना भविष्य संवार सकता हूँ। और वैसे भी,” समीर मुस्कुराया, “चांदी का चम्मच लेकर पैदा होने वाले और लोहे की कुदाल चलाने वाले, दोनों की मिट्टी अंत में एक ही होती है। वक्त ने बिसात पलट दी है, अब हम मोहरे नहीं, खिलाड़ी बनेंगे।”
समीर ने एच.आर. को फोन किया, “शर्मा जी, मिस्टर विक्रम की जॉइनिंग फॉर्मेलिटीज पूरी कीजिए। यह कल से लॉजिस्टिक्स हेड के रूप में ज्वाइन करेंगे।”
विक्रम अपने कांपते हाथों से समीर के हाथ पकड़ना चाहता था, शायद पैर छूना चाहता था, लेकिन समीर ने उसे गले लगा लिया। उस आलीशान केबिन में दो दोस्त खड़े थे – एक जिसने वक्त को हराया था, और दूसरा जो वक्त से हारकर फिर से जीना सीख रहा था। बाहर सूरज ढल रहा था, लेकिन उस कमरे में इंसानियत का एक नया सवेरा हो रहा था।
समीर ने महसूस किया कि आज उसे वो लाल कार मिल गई थी। नहीं, उससे भी कुछ कीमती मिल गया था – मन की शांति और क्षमा करने का सुकून। उसने जाना कि किसी को नीचा दिखाकर बड़ा बनने में वो मजा नहीं है, जो गिरते हुए को उठाकर गले लगाने में है।
गाड़ी से घर जाते वक्त समीर ने अपनी कार का शीशा नीचे किया। हवा ठंडी थी। उसे अपने पिता के शब्द याद आए – “हम छोटे लोग हैं।” उसने आसमान की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए सोचा, “नहीं पिताजी, कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। यह सब वक्त का खेल है, और वक्त की इस बिसात पर राजा और रंक की जगह बदलते देर नहीं लगती।”
कहानी का सार:
दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि घमंड एक ऐसा दीमक है जो सोने के महलों को भी खाक में मिला देता है। वहीं, मेहनत और विनम्रता वो नींव है जिस पर बनी इमारत आंधियों में भी नहीं डगमगाती। वक्त कब किसकी झोली में क्या डाल दे, कोई नहीं जानता। इसलिए जब आप ऊंचाई पर हों, तो नीचे देखना न भूलें, क्योंकि उतरते वक्त उन्हीं लोगों से दोबारा मुलाकात होगी।
प्रश्न आपके लिए:
क्या समीर ने विक्रम को माफ करके सही किया या उसे विक्रम को उसकी पुरानी गलतियों की सजा देनी चाहिए थी? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
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