जिस घर की दहलीज से एक विधवा माँ और उसकी मासूम बेटी को धक्के मारकर निकाला गया था, ठीक बीस साल बाद उसी बेटी ने उस घर की रजिस्ट्री अपनी माँ के हाथों में रखकर पुराने अपमान का हिसाब चुकता कर दिया।”
अंजलि ने जैसे ही उस पुराने, काई लगे लोहे के गेट का ताला खोला, उसकी माँ, सावित्री का हाथ कांप गया। वह चाबी, जो अंजलि ने अभी-अभी उनकी हथेली पर रखी थी, उसका वज़न सावित्री को पहाड़ जैसा लग रहा था। यह सिर्फ़ एक मकान की चाबी नहीं थी, यह उस खोए हुए सम्मान की वापसी थी जिसे पाने के लिए उन्होंने अपनी पूरी जवानी होम कर दी थी।
सावित्री की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। अंजलि ने माँ को कसकर गले लगा लिया। “माँ, अब यह घर हमारा है। वही घर, जिसे बाबूजी ने अपने हाथों से बनाया था। अब कोई हमें यहाँ से जाने के लिए नहीं कहेगा।”
सावित्री का मन अतीत के उस काले अध्याय में चला गया, जिसे वह चाहकर भी अपनी यादों से मिटा नहीं पाई थीं।
बात बीस साल पुरानी थी। अंजलि के पिता, केशव, शहर के एक छोटे लेकिन ईमानदार व्यापारी थे। उन्होंने अपनी सारी जमा-पूंजी और कुछ कर्ज लेकर शहर के बीचों-बीच यह मकान बनवाया था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। गृह-प्रवेश के छह महीने बाद ही केशव को एक लाइलाज बीमारी ने जकड़ लिया। इलाज में पैसा पानी की तरह बहा। दुकान बिक गई, जेवर बिक गए, लेकिन केशव को बचाया न जा सका।
केशव की मौत के तेरहवें दिन ही, उनके बड़े भाई (अंजलि के ताऊजी), गजेन्द्र, ने अपना असली रंग दिखा दिया था। गजेन्द्र ने कुछ जाली कागज़ात दिखाए और दावा किया कि केशव ने मकान बनाने के लिए उनसे भारी रकम उधार ली थी और अब वह मकान गजेन्द्र के नाम है।
सावित्री उस वक़्त अनपढ़ और लाचार थी। गोद में पांच साल की अंजलि थी, जो पोलियो की शिकार थी। उसके एक पैर में लोहे का कैलिपर लगा होता था। सावित्री ने बहुत हाथ-पैर जोड़े, “भाईसाहब, अभी तो इनके फूल भी ठंडे नहीं हुए। मुझे और इस विकलांग बच्ची को लेकर कहाँ जाऊंगी? कम से कम एक कमरा दे दीजिये।”
लेकिन गजेन्द्र ने एक न सुनी। उसने सावित्री का सामान आंगन में फेंक दिया था। “इस लंगड़ी को लेकर कहीं भी जा, यह मकान अब मेरा है। कर्ज़ नहीं चुका सकती तो घर खाली कर।”
वह काली रात सावित्री आज तक नहीं भूली थी। बारिश हो रही थी, और वह अंजलि को साड़ी के पल्लू में छिपाए सड़क किनारे एक बस स्टॉप के नीचे बैठी थी। अंजलि ठंड से कांप रही थी और पूछ रही थी, “माँ, हम अपने घर क्यों नहीं जा रहे?” सावित्री के पास कोई जवाब नहीं था।
मायके वालों ने कहा, “जवान हो, दूसरी शादी कर लो। बच्ची को अनाथालय छोड़ दो, कोई भी लंगड़ी बच्ची के साथ तुम्हें नहीं अपनाएगा।”
सावित्री ने उस दिन कसम खाई थी। “मेरी बेटी बोझ नहीं, मेरी ताकत बनेगी। मैं भीख मांग लूंगी, बर्तन मांज लूंगी, लेकिन अपनी बच्ची को किसी के सहारे नहीं छोड़ूंगी।”
सावित्री ने शहर के दूसरे छोर पर एक झोपड़पट्टी में छोटा सा कमरा किराए पर लिया। गुज़ारा करने के लिए वह लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा करने लगी और रात को सिलाई मशीन चलाती। अंजलि का बचपन अभावों में बीता, लेकिन सावित्री ने उसके आत्मसम्मान में कोई कमी नहीं आने दी।
अंजलि को चलने में दिक्कत होती थी, स्कूल के बच्चे उसे ‘लंगड़ी’ कहकर चिढ़ाते थे। कई बार वह रोते हुए घर आती, “माँ, मुझे स्कूल नहीं जाना।”
तब सावित्री उसे अपनी गोद में बैठाती और उसके आंसुओं को पोंछते हुए कहती, “बेटा, लोग पैरों से नहीं, हौसलों से चलते हैं। तुझे इतना पढ़ना है, इतना बड़ा बनना है कि जो लोग आज तेरी चाल देखकर हंसते हैं, कल वही तुझे देखने के लिए अपनी गर्दन ऊंची करें।”
सावित्री ने अपनी नींदें बेच दीं ताकि अंजलि के लिए किताबें खरीद सके। वह दिन भर काम करती और रात-रात भर जागकर सिलाई करती ताकि अंजलि की फ़ीस भर सके। कई बार ऐसा हुआ कि घर में आटा नहीं होता था, तो सावित्री पानी पीकर सो जाती, लेकिन अंजलि के लिए कहीं न कहीं से दूध का इंतज़ाम ज़रूर करती।
अंजलि ने भी माँ के संघर्ष को अपनी प्रेरणा बना लिया था। उसने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाया। वह पढ़ाई में हमेशा अव्वल आती। जब वह दसवीं कक्षा में थी, तब सावित्री की सिलाई मशीन खराब हो गई। उसे ठीक कराने के पैसे नहीं थे। उस रात सावित्री चुपचाप रो रही थी। अंजलि ने देख लिया।
अगले दिन अंजलि ने स्कूल के बाद ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। अपनी छोटी सी कमाई से उसने माँ की मशीन ठीक करवाई। उस दिन सावित्री को लगा कि उसकी बेटी अब बड़ी हो गई है।
अंजलि का सपना था वकील बनने का। वह जानना चाहती थी कि कानून क्या होता है, ताकि जिस धोखे से उसका घर छीना गया, वैसा किसी और के साथ न हो। उसने लॉ कॉलेज में दाखिला लिया। स्कॉलरशिप मिली, लेकिन शहर के बड़े वकीलों के बीच अपनी जगह बनाना आसान नहीं था।
कॉलेज के आखिरी साल में एक मूट कोर्ट (नकली अदालत) प्रतियोगिता थी। अंजलि ने उसमें इतना शानदार तर्क रखा कि वहां मौजूद शहर के नामी वकील, मिस्टर दीवान, ने उसे अपनी फर्म में जूनियर रख लिया।
अंजलि ने दिन-रात एक कर दिया। वह कोर्ट में अपनी दलीलों से जजों को भी सोचने पर मजबूर कर देती थी। पांच साल के अंदर ही अंजलि शहर की सबसे नामी कॉर्पोरेट लॉयर बन गई। उसके पास पैसा, शोहरत सब कुछ आ गया, लेकिन उसके दिल में एक टीस अब भी बाकी थी—’बाबूजी का घर’।
दूसरी तरफ, गजेन्द्र (ताऊजी) के दिन बुरे आ गए थे। उनके बेटे ने जुए और सट्टे में सब कुछ उड़ा दिया था। जिस घर को उन्होंने धोखे से हड़पा था, वह अब बैंक के पास गिरवी था। बैंक ने नीलामी का नोटिस लगा दिया था।
जब अंजलि को यह पता चला, तो उसने तुरंत बैंक से संपर्क किया।
नीलामी वाले दिन गजेन्द्र कोर्ट के बाहर हताश बैठे थे। उन्हें उम्मीद थी कि शायद कोई चमत्कार हो जाए और उनका घर बच जाए। तभी एक काली लंबी कार वहां आकर रुकी। उसमें से अंजलि उतरी—काला कोट, हाथ में फाइल और चाल में वो आत्मविश्वास जो किसी महारानी में होता है। उसके पैर में अब भी हल्का लंगड़ापन था, लेकिन अब वह उसकी कमजोरी नहीं, उसकी पहचान थी।
गजेन्द्र ने उसे पहचाना नहीं। अंजलि सीधे बैंक मैनेजर के केबिन में गई। आधे घंटे बाद वह बाहर निकली। घर बिक चुका था।
गजेन्द्र दौड़कर मैनेजर के पास गए, “साहब, किसने लिया मेरा मकान? मैं उससे बात करूँगा, मैं धीरे-धीरे पैसे चुका दूंगा।”
मैनेजर ने अंजलि की तरफ इशारा किया, “इन मैडम ने खरीदा है। और इन्होंने आपके सारे कर्ज़े भी एक मुश्त चुका दिए हैं।”
गजेन्द्र कांपते कदमों से अंजलि के पास गए। “बेटी, तुम कौन हो? तुमने मेरा घर क्यों खरीदा? क्या तुम मुझे वहां किराए पर रहने दोगी?”
अंजलि ने अपना चश्मा उतारा और गजेन्द्र की आँखों में देखा। “पहचाना नहीं ताऊजी? मैं अंजलि हूँ। केशव की बेटी। वही ‘लंगड़ी’ बच्ची जिसे आपने बारिश की रात घर से बाहर फेंक दिया था।”
गजेन्द्र के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनका चेहरा शर्म से पीला पड़ गया। वे कुछ बोल न सके, बस उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
अंजलि ने शांत स्वर में कहा, “ताऊजी, मैं चाहूँ तो आज आपको उसी तरह सड़क पर फेंक सकती हूँ जैसा आपने मेरे और माँ के साथ किया था। कानूनन अब यह घर मेरा है। लेकिन मेरी माँ ने मुझे यह नहीं सिखाया। उन्होंने मुझे सिखाया है कि गिराने वाले से उठाने वाला बड़ा होता है।”
अंजलि ने अपनी फाइल से कुछ कागज़ निकाले। “मैंने यह घर खरीद लिया है, लेकिन मैं आपको बेघर नहीं करूँगी। आप ऊपर वाले कमरे में रह सकते हैं, जब तक आपका बेटा सुधर नहीं जाता। लेकिन घर का मालिकाना हक़ अब मेरी माँ, सावित्री देवी के नाम पर होगा।”
गजेन्द्र फूट-फूट कर रोने लगे। वे अंजलि के पैरों में गिरना चाहते थे, लेकिन अंजलि पीछे हट गई। “माफ़ी मुझसे नहीं, मेरी माँ से मांगियेगा, जब हम गृह-प्रवेश करेंगे।”
और आज, वही दिन था।
सावित्री अभी भी गेट पर खड़ी अतीत के भंवर में थी। अंजलि ने माँ का हाथ दबाया, “माँ, अंदर चलो। बाबूजी इंतज़ार कर रहे होंगे।”
सावित्री ने कांपते हाथों से गेट खोला। आंगन में वही पुराना नीम का पेड़ खड़ा था, जिसे केशव ने लगाया था। घर की दीवारों पर नया पेंट था, लेकिन खुशबू वही पुरानी थी।
सामने गजेन्द्र सिर झुकाए खड़े थे। सावित्री को देखते ही वे उनके पैरों में गिर पड़े। “भाभी, मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया। यह अंजलि… यह बेटी नहीं, देवी है। इसने मेरी इज़्ज़त बचा ली।”
सावित्री ने एक पल के लिए गजेन्द्र को देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, करुणा थी। उन्होंने गजेन्द्र को उठने का इशारा किया। “भाईसाहब, समय सबसे बड़ा न्यायधीश है। इसने आज हिसाब बराबर कर दिया। बस दुआ कीजियेगा कि मेरी बेटी हमेशा ऐसे ही सिर उठाकर चले।”
अंजलि ने माँ को घर के अंदर ले जाकर बाबूजी की तस्वीर के सामने खड़ा किया। सावित्री ने तस्वीर पर हार चढ़ाया और चाबी वहीं रख दी।
“देख रहे हैं आप?” सावित्री ने तस्वीर से बात की। “आपकी लाडली ने आज आपका मान लौटा दिया। लोग कहते थे कि बिना बाप की बेटी और बिना पति की औरत समाज में सरवाइव नहीं कर सकती। देखिये, हमारी बेटी ने न सिर्फ़ सरवाइव किया, बल्कि राज कर रही है।”
अंजलि ने माँ को सोफे पर बैठाया—उसी जगह जहाँ से बीस साल पहले उन्हें उठाया गया था।
“माँ,” अंजलि घुटनों के बल बैठकर बोली, “यह घर ईंट-पत्थर का नहीं है। यह तुम्हारे उस पसीने से बना है जो तुमने दूसरों के कपड़े सिलते हुए बहाया था। यह उन आंसुओं से बना है जो तुमने मेरी फ़ीस भरने के लिए पिए थे। आज मैं जो कुछ भी हूँ, तुम्हारी वजह से हूँ। यह घर, यह कामयाबी, सब तुम्हारे चरणों की धूल है।”
सावित्री ने बेटी का माथा चूमा। “नहीं पगली, यह घर तेरी ज़िद और तेरे हौसले का है। तूने साबित कर दिया कि अगर नीयत साफ़ हो और हौसला बुलंद हो, तो झोपड़ी से निकलकर भी महलों की नींव हिलाई जा सकती है।”
उस दिन उस घर में फिर से दीये जले। यह रौशनी सिर्फ़ बिजली के बल्बों की नहीं थी, यह एक माँ के त्याग और एक बेटी के संघर्ष की जीत की रौशनी थी। अंजलि ने दुनिया को दिखा दिया था कि शारीरिक कमी इंसान को अपाहिज नहीं बनाती, बल्कि छोटी सोच अपाहिज बनाती है। और असली उत्तराधिकारी वो नहीं होता जो विरसत में घर पाता है, बल्कि वो होता है जो खोई हुई विरासत को अपनी मेहनत से वापस लाता है।
मित्रों, माता-पिता का संघर्ष और संतान की सफलता जब मिल जाते हैं, तो इतिहास रचा जाता है। अंजलि की कहानी हमें सिखाती है कि अपमान का बदला लड़कर नहीं, बल्कि इतना सफल होकर लिया जाता है कि सामने वाला खुद शर्मिंदा हो जाए।
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मूल लेखिका : लतिका श्रीवास्तव