ममता की चौखट – हेमलता गुप्ता 

 गरिमा उस रात बहुत रोई। सुमित ने उसे समझाया, “गरिमा, माँ का स्वभाव ऐसा ही है। तुम दिल पर मत लो। मेरे लिए तुम ही इस घर की लक्ष्मी हो।” पर गरिमा के मन में एक सवाल घर कर गया था—क्या प्यार और सेवा का कोई मोल नहीं होता? क्या रिश्तों की बोली सिर्फ पैसों से लगती है?

विमला देवी के दो बेटे थे—अमित और सुमित। अमित बड़ा था, एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट। उसकी पत्नी, शालिनी, एक रईस बिजनेसमैन की बेटी थी। सुमित छोटा था, जो एक सरकारी स्कूल में अध्यापक था और उसकी पत्नी, गरिमा, एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार की गृहणी थी।

सुबह के दस बज रहे थे। गरिमा सुबह पांच बजे से उठकर रसोई में खट रही थी। नाश्ते में पोहा, उपमा और विमला देवी के लिए बिना चीनी की चाय—सब कुछ तैयार था। गरिमा पसीने में लथपथ थी, लेकिन चेहरे पर शिकन नहीं थी।

तभी सीढ़ियों से हील्स की खट-खट आवाज़ आई। शालिनी नीचे उतर रही थी। उसने एक डिज़ाइनर सूट पहना था और हाथ में एक ब्रांडेड बैग था।

“गुड मॉर्निंग मम्मी जी!” शालिनी ने चहकते हुए कहा और विमला देवी के पास सोफे पर बैठ गई।

“जीते रहो बहु रानी,” विमला देवी का चेहरा खिल उठा।

शालिनी ने अपने बैग से एक मखमली डिब्बा निकाला। “मम्मी जी, कल मैं दुबई वाले क्लाइंट के साथ मीटिंग में थी। वहां से आपके लिए यह परफ्यूम और यह गोल्ड प्लेटेड घड़ी लाई हूँ। मुझे लगा आप पर बहुत जंचेगी।”

विमला देवी ने तोहफा हाथ में लिया और उनकी आँखों में चमक आ गई। “अरे वाह! मेरी शालिनी तो लाखों में एक है। तुझे अपनी बिजी लाइफ से मेरे लिए वक्त मिल जाता है, यही बहुत है।”

तभी गरिमा ट्रे में चाय और नाश्ता लेकर आई। उसने टेबल पर नाश्ता लगाया और धीरे से बोली, “माजी, आपकी शुगर की दवाई का समय हो गया है। पहले नाश्ता कर लीजिए।”

विमला देवी ने तोहफे को निहारते हुए रूखे स्वर में कहा, “रख दे वहीं। और सुन, आज पोहा में नमक फिर कम है क्या? कल भी फीका था। तू घर में रहती है, फिर भी एक नाश्ता ढंग का नहीं बनता।”

गरिमा का दिल बैठ गया। उसने सुबह चखकर देखा था, सब ठीक था। लेकिन वह जानती थी कि कमी नमक में नहीं, विमला देवी के नज़रिए में थी। शालिनी ने कोई काम नहीं किया था, बस एक महंगा तोहफा दिया था, इसलिए वह ‘लाखों में एक’ थी। गरिमा ने पूरा घर संभाला था, सास के पैर दबाए थे, लेकिन उसकी झोली में सिर्फ़ आलोचना आई थी।

विमला देवी का व्यवहार मोहल्ले में भी छिपा नहीं था। किटी पार्टी में वह अक्सर कहतीं, “मेरी बड़ी बहू तो साक्षात लक्ष्मी है। जब भी आती है, घर भर देती है। छोटी तो बस… ठीक है, घर का काम-काज देख लेती है, पर उसका हाथ तंग ही रहता है।” विमला देवी का गणित साफ़ था—जहाँ से मिल रहा है, वहीं रिश्ता गहरा है। शालिनी उन्हें महंगे स्पा ले जाती, साड़ियां दिलाती, तो विमला देवी उसकी हर गलती, हर बदतमीजी को नज़रअंदाज़ कर देतीं। गरिमा अगर उनके सर दर्द में बाम भी लगाती, तो उन्हें लगता कि यह तो इसका फ़र्ज़ है, इसमें कौन सा पैसा लगा है?

दिवाली का त्यौहार नज़दीक था। घर की पुताई और साफ़-सफाई का काम जोरों पर था। शालिनी ने साफ़ कह दिया था, “मम्मी जी, मुझे डस्ट से एलर्जी है, मैं सफ़ाई में हेल्प नहीं कर पाऊंगी। मैं डेकोरेशन के लिए इवेंट प्लानर भेज दूंगी।”

विमला देवी ने तुरंत हामी भर दी, “हाँ-हाँ बेटा, तू क्यों परेशान होती है। गरिमा है ना, वह कर लेगी।”

अगले दस दिन गरिमा ने कमर तोड़ मेहनत की। पंखे साफ़ करने से लेकर जाले हटाने तक, रसोई की धुलाई से लेकर पर्दों की सिलाई तक—सब गरिमा ने अकेले किया। उसकी हथेलियाँ घिस गई थीं, कमर में दर्द रहने लगा था। लेकिन उसे उम्मीद थी कि शायद इस बार सासू माँ उसके काम की कद्र करेंगी।

दिवाली की रात आई। शालिनी ने विमला देवी को एक हीरे की अंगूठी गिफ्ट की। विमला देवी ने वह अंगूठी पूरे मोहल्ले को दिखाई।

“मेरी बड़ी बहू ने दी है,” वह गर्व से फूल नहीं समा रही थीं।

गरिमा ने अपनी जमापूंजी से विमला देवी के लिए एक ऊनी शॉल खरीदी थी, क्योंकि सर्दियाँ आने वाली थीं और विमला देवी को अक्सर ठंड लग जाती थी। जब गरिमा ने वह शॉल दी, तो विमला देवी ने उसे खोलकर देखा और सोफे के कोने में फेंकते हुए बोलीं, “अच्छा है। पर गरिमा, तुझे पता है ना मुझे वो कश्मीरी कढ़ाई पसंद है? यह तो बहुत साधारण है। खैर, नौकरानी को देने के काम आ जाएगी।”

गरिमा उस रात बहुत रोई। सुमित ने उसे समझाया, “गरिमा, माँ का स्वभाव ऐसा ही है। तुम दिल पर मत लो। मेरे लिए तुम ही इस घर की लक्ष्मी हो।” पर गरिमा के मन में एक सवाल घर कर गया था—क्या प्यार और सेवा का कोई मोल नहीं होता? क्या रिश्तों की बोली सिर्फ पैसों से लगती है?

वक्त का पहिया घूमा। विमला देवी को अचानक एक दिन बाथरूम में चक्कर आया और वह गिर पड़ीं। कूल्हे की हड्डी (Hip Bone) टूट गई और साथ ही लकवे (Paralysis) का हल्का अटैक भी आया। डॉक्टर ने कहा कि उन्हें बिस्तर पर ही रहना होगा और अगले छह महीने तक चौबीसों घंटे देखभाल की ज़रूरत पड़ेगी।

अस्पताल से घर आने के बाद विमला देवी का जीवन एक कमरे में सिमट गया।

पहले हफ़्ते शालिनी आई। उसने विमला देवी के कमरे में एसी का तापमान सेट किया और बोली, “मम्मी जी, मैंने शहर की बेस्ट नर्सिंग एजेंसी से बात की है। दो नर्सें रहेंगी। मेरा ऑफिस बहुत हेक्टिक है और मुझे अगले महीने लंदन जाना है प्रोजेक्ट के लिए। आप चिंता मत करना, पैसों की कोई कमी नहीं होगी। बेस्ट ट्रीटमेंट मिलेगा।”

विमला देवी ने कांपते होठों से कुछ कहना चाहा, शायद यह कि “बेटा, मुझे नर्स नहीं, अपनों का साथ चाहिए,” पर शालिनी अपने फोन पर बात करते हुए कमरे से निकल गई। उसने अपना “फर्ज़” (पैसे देकर) निभा दिया था।

अब बारी थी गरिमा की।

नर्सें तो थीं, लेकिन वे मशीनी तरीके से काम करती थीं। विमला देवी को करवट बदलने में दर्द होता, पर नर्सें उसे अनसुना कर देतीं। उन्हें दलिया बेस्वाद लगता, पर नर्सें वही खिलातीं।

गरिमा ने अपनी दिनचर्या बदल दी। वह सुबह चार बजे उठती। विमला देवी के लिए घर पर ताज़ा सूप बनाती, अपने हाथों से उन्हें नहलाती (स्पंज बाथ देती), और सबसे बड़ी बात—वह घंटों उनके पास बैठकर उनसे बातें करती।

विमला देवी का शरीर लाचार था, पर दिमाग जाग रहा था। वह देखतीं कि शालिनी हफ्ते में एक बार आती, दूर से ही “हाय मम्मी, हाउ आर यू?” कहती और इत्र की खुशबू छोड़कर चली जाती। शालिनी को उनके पास बैठने में घिन आती थी क्योंकि कमरे में दवाइयों और बुढ़ापे की गंध होती थी।

दूसरी तरफ गरिमा थी। जब विमला देवी को शौच की समस्या होती, या बिस्तर गंदा हो जाता, तो गरिमा बिना नाक-भौं सिकोड़े सब साफ़ करती। वह रात-रात भर जागकर उनके पैरों की मालिश करती।

एक रात, विमला देवी को बहुत तेज़ प्यास लगी। नर्स गहरी नींद में सो रही थी। विमला देवी ने पानी मांगना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। उन्होंने हाथ पटकने की कोशिश की, पर बेजान शरीर ने साथ नहीं दिया। उनका गला सूख रहा था, घबराहट बढ़ रही थी। उन्हें लगा कि शायद आज प्राण निकल जाएंगे।

तभी एक कोमल हाथ ने उन्हें सहारा देकर उठाया। उनके होठों से पानी का गिलास लगाया गया। वह गरिमा थी। गरिमा शायद उनकी बेचैनी को दूसरे कमरे से ही महसूस कर गई थी।

पानी पिलाने के बाद गरिमा ने उनका पसीना पोंछा और धीरे से उनका सिर अपनी गोद में रख लिया। “माजी, घबराइये मत, मैं यहीं हूँ। सो जाइए।”

उस स्पर्श में, उस गोद में विमला देवी को वह सुकून मिला जो शालिनी के दिए मखमली गद्दे और एसी में भी नहीं था। उस रात, अंधेरे कमरे में विमला देवी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। वो आंसू गरिमा की साड़ी को भिगो रहे थे।

“गरिमा…” विमला देवी ने टूटी हुई आवाज़ में पुकारा।

“जी माजी? दर्द हो रहा है?” गरिमा ने चिंतित होकर पूछा।

“हाँ बेटा, दर्द हो रहा है… शरीर में नहीं, आत्मा में,” विमला देवी सिसक पड़ीं। “मैं पूरी ज़िंदगी एक बनिया बनी रही। मैं रिश्तों का सौदा करती रही। मुझे लगा शालिनी अच्छी है क्योंकि वो दौलत लाती है, और मैंने तुझे ठुकराया क्योंकि तू सिर्फ ‘सेवा’ लाती है। मैं भूल गई थी कि जब शरीर टूटता है, तो सोना-चांदी काम नहीं आता, सेवा और अपनापन ही काम आता है। शालिनी ने मेरे लिए नर्स खरीदी, पर तूने मेरे लिए अपनी नींदें बेच दीं।”

गरिमा ने उनके आंसू पोंछे। “माजी, आप यह सब मत सोचिए। आप मेरी माँ समान हैं।”

“नहीं गरिमा,” विमला देवी ने उसे रोका। “मैंने तुझे कभी बेटी नहीं माना, मैंने तुझे हमेशा कमतर आंका। वो जो शॉल तूने दी थी… वो कहाँ है?”

“वो… वो तो शायद आपने स्टोर रूम में…” गरिमा हिचकिचाई।

“उसे निकाल कर ला। मुझे वही शॉल चाहिए। मुझे ठंड लग रही है, और मुझे पता है कि उस शॉल में तेरी मेहनत की गर्माहट है, जो इस एसी कमरे में नहीं मिल सकती।”

अगले दिन जब शालिनी आई, तो उसने देखा कि विमला देवी ने गरिमा की दी हुई वह साधारण सी शॉल ओढ़ रखी है और गरिमा उनके बालों में कंघी कर रही है।

“ओह गॉड मम्मी जी! यह चीप (सस्ती) शॉल हटाइये, मैंने आपके लिए पश्मीना भेजा था ना?” शालिनी ने नाक सिकोड़ते हुए कहा।

विमला देवी ने पहली बार शालिनी की आँखों में आँखें डालीं।

“शालिनी, यह शॉल सस्ती हो सकती है, पर इसमें जो ‘सुकून’ है, वो बेशकीमती है। और सुन, तुम्हें लंदन जाना है ना? तुम जाओ। मुझे तुम्हारी नर्सों की भी ज़रूरत नहीं है। मेरे पास मेरी बहू गरिमा है। जो दौलत तुम मुझे देती हो, वो मैं बाज़ार से खरीद सकती हूँ। लेकिन जो सेवा गरिमा मुझे देती है, वो दुनिया के किसी बाज़ार में नहीं मिलती।”

शालिनी का चेहरा उतर गया। वह समझ गई कि अब पैसों की खनक से वह विमला देवी का दिल नहीं जीत सकती। वह चुपचाप चली गई।

उस दिन के बाद, शांति-विला का माहौल बदल गया। विमला देवी अब पूरी तरह ठीक नहीं हुई थीं, लेकिन उनका मन चंगा हो गया था। अब जब कोई पड़ोसन आती और पूछती, “तुम्हारी बड़ी बहू क्या लाई?”

तो विमला देवी गर्व से गरिमा की तरफ इशारा करतीं और कहतीं, “मेरी छोटी बहू मेरे लिए ‘वक्त’ और ‘जान’ लाई है। और सच कहूं, तो बुढ़ापे में इससे बड़ी दौलत और कुछ नहीं होती। मैंने समझ लिया है कि जहाँ से ‘कुछ’ (पैसा) मिलता है, वहां रिश्ते नहीं, व्यापार होता है। असली रिश्ता वहां होता है जहाँ सब कुछ लुटाकर भी बदले में कुछ न माँगा जाए।”

गरिमा अब घर की सिर्फ ‘काम करने वाली बहू’ नहीं, बल्कि उस घर की धड़कन बन चुकी थी। विमला देवी ने सीख लिया था कि रिश्तों को पैसों की नहीं, प्यार की कसौटी पर परखना चाहिए।

**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**

क्या आपने भी अपने आस-पास ऐसे रिश्ते देखे हैं जहाँ इंसान की कद्र उसकी जेब देखकर की जाती है? क्या विमला देवी का अपनी गलती मानना सही समय पर हुआ? अपने विचार कमेंट में जरूर बताएं।

**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ, तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक और पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!**

मूल लेखिका : हेमलता गुप्ता 

error: Content is protected !!