“मैंने जो कहा, वो तूने सुना नहीं आरुषि? कल से तेरी जेठानी, वंदना, अस्पताल से घर आ रही है। डॉक्टर ने उसे पूरे दो महीने के ‘बेड-रेस्ट’ (बिस्तर पर आराम) के लिए कहा है। मैंने फैसला किया है कि तू अपनी यह ऑनलाइन नौकरी-वौकरी कुछ दिन के लिए बंद कर दे। घर की इज़्ज़त और बड़ी बहू की सेवा से बढ़कर कुछ नहीं है।”
आरुषि, जो अब तक चुपचाप अपनी रोटी के टुकड़े कर रही थी, ने अपना हाथ रोक लिया। उसने अपनी सास की आँखों में देखा। वहां उम्मीद नहीं, हुक्म था। पास ही बैठे उसके पति, विमल, ने नज़रें झुका लीं। जेठ जी, राकेश, अपने मोबाइल में व्यस्त थे, जैसे यह फैसला पहले ही हो चुका हो और आरुषि की राय की कोई अहमियत ही न हो।
आरुषि ने पानी का घूंट पिया और एक गहरी सांस ली।
“माँ जी,” आरुषि की आवाज़ शांत लेकिन स्पष्ट थी। **”मुझसे भाभी की सेवा चाकरी नहीं होगी।”**
चम्मच गिरने की आवाज़ आई। शकुंतला देवी का मुंह खुला का खुला रह गया। राकेश जी ने मोबाइल मेज पर पटक दिया।
“क्या बकी तू?” शकुंतला देवी चिल्लाईं। “तेरी इतनी हिम्मत? घर की बड़ी बहू मुसीबत में है, उसका पैर टूटा है, और तू सेवा करने से मना कर रही है? यही संस्कार हैं तेरे?”
आरुषि खड़ी हो गई। “माँ जी, शब्दों पर गौर कीजिये। मैंने कहा ‘सेवा-चाकरी’ नहीं होगी। भाभी का पैर टूटा है, उनके हाथ-पैर सलामत हैं, वो कोमा में नहीं हैं। मैं उनकी मदद कर सकती हूँ—समय पर खाना देने में, दवाइयां देने में। लेकिन आप मुझसे उम्मीद करें कि मैं अपनी नौकरी छोड़कर, चौबीस घंटे उनके पास घंटी बजते ही खड़ी रहूँ, उनके पैर दबाऊं, उनकी झूठी प्लेटें उठाऊं जबकि वो खुद सक्षम हैं… तो यह मुझसे नहीं होगा। यह सेवा नहीं, गुलामी है।”
“नौकरी?” राकेश जी ने व्यंग्य से हंसा। “अरे, तेरी उस दस हज़ार की फ्रीलांसिंग की क्या औकात है? मेरी पत्नी वंदना लाखों का दहेज़ लेकर आई थी और वो खानदानी रईस है। अगर उसे आराम चाहिए, तो तुझे करना पड़ेगा। विमल, समझा अपनी बीवी को।”
विमल ने आरुषि का हाथ पकड़ना चाहा, “आरुषि, कुछ दिन की तो बात है…”
आरुषि ने झटके से हाथ छुड़ा लिया। “विमल, बात दिनों की नहीं, नीयत की है। जब मुझे पिछले महीने टाइफाइड हुआ था, तब वंदना भाभी ने मेरे कमरे में झांक कर भी नहीं देखा था। माँ जी ने कहा था—’अपना काम खुद करो, शरीर खुलेगा।’ आज जब बात उनकी लाड़ली बड़ी बहू की है, तो मेरी नौकरी ‘फालतू’ हो गई?”
उस रात घर में आरुषि के लिए दरवाज़े बंद हो गए—भावनाओं के दरवाज़े। उसे ‘स्वार्थी’, ‘घमंडी’ और ‘पत्थर दिल’ घोषित कर दिया गया।
अगले दिन वंदना भाभी एम्बुलेंस से घर आईं। उनका प्लास्टर चढ़ा पैर और चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी। उन्हें पता चल चुका था कि आरुषि ने मना कर दिया है, इसलिए उन्होंने और भी नखरे दिखाने शुरू कर दिए।
शकुंतला देवी ने आरुषि को सबक सिखाने के लिए खुद मोर्चा संभाला। “ठीक है, महारानी जी आप अपना काम करिये। मेरी बहू की सेवा मैं खुद करूँगी। देखूँगी तुझे कब तक शर्म नहीं आती।”
यह एक नाटक था। आरुषि जानती थी कि सास का यह ‘त्याग’ उसे दोषी महसूस कराने के लिए है।
वंदना के कमरे की घंटी हर दस मिनट में बजती।
“माँ जी, पानी दीजिये।”
“माँ जी, तकिया ठीक कर दीजिये।”
“माँ जी, पैर में दर्द है, ज़रा तेल लगा दीजिये।”
बूढ़ी शकुंतला देवी हाँफती-कांपती सीढ़ियां चढ़तीं-उतरतीं। आरुषि अपने कमरे में लैपटॉप पर काम करती रही, लेकिन उसका मन विचलित था। उसे सास को तकलीफ में देखकर दुख होता था, लेकिन वह जानती थी कि अगर आज वह झुक गई, तो ज़िंदगी भर के लिए इस घर की ‘अनपेड मेड’ (बिन पैसे की नौकरानी) बनकर रह जाएगी।
तीसरे दिन आरुषि ने एक कदम उठाया। उसने अपनी सेविंग्स से पैसे निकाले और शहर की एक प्रोफेशनल ‘होम-नर्स’ एजेंसी को फोन किया। शाम को एक नर्स, सिस्टर लिली, घर आ गई।
“माँ जी,” आरुषि ने कहा, “आपसे भागदौड़ नहीं होती। मैंने भाभी के लिए यह नर्स रखी है। इसकी तनख्वाह मैं दूंगी। यह भाभी की मेडिकल ज़रूरतों का, साफ़-सफाई का और समय पर दवा देने का पूरा ख्याल रखेगी।”
शकुंतला देवी और वंदना के चेहरे का रंग उड़ गया। उन्हें ‘काम करने वाली’ नहीं चाहिए थी, उन्हें आरुषि का ‘झुका हुआ सिर’ चाहिए था।
वंदना ने मुंह बनाया। “मुझे किसी बाहरी औरत से सेवा नहीं करवानी। घर की बात घर में रहनी चाहिए।”
“भाभी,” आरुषि ने कड़े शब्दों में कहा, “सेवा तो सेवा होती है। अगर आपको वाक़ई तकलीफ़ है, तो आपको मदद से मतलब होना चाहिए, न कि मदद करने वाला कौन है। लिली ट्रेंड है, वो मुझसे बेहतर ख्याल रखेगी।”
वंदना के पास कोई जवाब नहीं था। नर्स ने काम संभाल लिया।
दिन बीतते गए। आरुषि अपनी दिनचर्या में व्यस्त रही। वह नर्स का खर्चा उठा रही थी, जो उसकी कमाई का आधा हिस्सा था, लेकिन उसने अपनी आज़ादी और आत्मसम्मान नहीं बेचा।
एक दोपहर, नर्स की छुट्टी थी। वंदना घर पर अकेली थी (सास मंदिर गई थीं और पुरुष काम पर थे)। आरुषि अपने कमरे में एक ज़रूरी ऑनलाइन मीटिंग में थी।
अचानक वंदना के कमरे से ज़ोरदार आवाज़ आई और फिर चीखने की।
आरुषि ने हेडफोन फेंका और ऊपर दौड़ी। देखा तो वंदना बाथरूम के दरवाज़े पर गिरी पड़ी थी। वह वॉकर के सहारे बाथरूम जाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन पानी पर फिसल गई। उसका प्लास्टर वाला पैर मुड़ गया था और वह दर्द से तड़प रही थी।
“भाभी!” आरुषि ने दौड़कर उन्हें संभाला।
वंदना रो रही थी। “आरुषि… बहुत दर्द हो रहा है… शायद हड्डी फिर से खिसक गई।”
आरुषि ने पल भर भी नहीं सोचा। उसने अपनी मीटिंग, अपनी नाराज़गी, सब भुला दिया। उसने पूरी ताकत लगाकर वंदना को उठाया और बिस्तर तक ले गई। उसने तुरंत डॉक्टर को वीडियो कॉल किया। डॉक्टर के निर्देशानुसार उसने वंदना के पैर को सही पोजीशन में रखा, बर्फ की सिकाई की और दर्द निवारक इंजेक्शन (जो नर्स ने इमरजेंसी के लिए रखा था) तैयार किया।
वंदना ने देखा कि आरुषि के हाथ कांप नहीं रहे थे। वह किसी मझे हुए डॉक्टर की तरह काम कर रही थी। आरुषि ने वंदना का पसीना पोंछा, उसे पानी पिलाया और उसके सिरहाने बैठकर उसके बाल सहलाने लगी।
“घबराओ मत भाभी, डॉक्टर एम्बुलेंस भेज रहे हैं। सब ठीक हो जाएगा,” आरुषि की आवाज़ में सिर्फ़ अपनापन था।
वंदना आरुषि को देखती रही। वह आरुषि, जिसे उसने ‘पत्थर दिल’ कहा था, आज वही उसका सहारा बनी थी। अगर आरुषि ‘गुलाम’ बनकर नीचे रसोई में बर्तन माँज रही होती (जैसा वे चाहते थे), तो शायद वंदना की चीख सुनने वाला कोई नहीं होता। लेकिन आरुषि ऊपर अपने कमरे में थी, सक्षम थी, इसलिए उसने जान बचा ली।
शाम को जब राकेश और शकुंतला देवी अस्पताल पहुंचे, तो डॉक्टर ने कहा, “मिस्टर राकेश, आपकी पत्नी की हालत बहुत गंभीर हो सकती थी। अच्छा हुआ कि समय पर उन्हें फर्स्ट-एड मिल गया और सही पोजीशन में लिटाया गया। आपकी छोटी बहू ने बहुत समझदारी का काम किया। अगर वो न होतीं, तो शायद पैर काटना पड़ सकता था।”
राकेश ने मुड़कर आरुषि को देखा। आरुषि कोने में खड़ी थी, थकी हुई लेकिन शांत।
वंदना को होश आया तो उसने सबसे पहले आरुषि को बुलाया।
“आरुषि…” वंदना का गला रुंधा हुआ था। “आज तूने साबित कर दिया कि सेवा, पैर दबाने या पानी पिलाने का नाम नहीं है। सेवा का मतलब है ज़रूरत पड़ने पर ढाल बनकर खड़े होना।”
शकुंतला देवी भी नज़रे नहीं मिला पा रही थीं। उन्होंने आरुषि के पास जाकर उसका हाथ पकड़ा।
“बहू, मैंने तुझे बहुत बुरा-भला कहा। मैंने तेरी नौकरी को, तेरे वजूद को छोटा समझा। मुझे लगा था कि तू स्वार्थी है जो मेरी सेवा नहीं करना चाहती। पर आज समझ आया कि तूने ‘चाकरी’ करने से मना किया था, ‘मदद’ करने से नहीं। एक नौकर चाकरी कर सकता है, लेकिन जान सिर्फ़ एक परिवार वाला ही बचा सकता है।”
राकेश जी ने भी सिर झुका लिया। “आरुषि, मुझे माफ़ कर दे। मुझे अपनी अमीरी और वंदना के मायके के पैसे का घमंड था। मैंने तेरी दस हज़ार की कमाई का मज़ाक उड़ाया, लेकिन आज उसी कमाई ने (नर्स रखकर) और तेरी समझदारी ने मेरी पत्नी को बचाया है।”
आरुषि ने मुस्कुराते हुए सास के आंसू पोंछे।
“माँ जी, रिश्ते बराबरी के होते हैं। जब हम एक-दूसरे को ‘मालकिन’ और ‘नौकरानी’ की नज़रों से देखते हैं, तो घर, घर नहीं रहता। मुझे वंदना भाभी से कोई बैर नहीं था, बस मुझे अपनी इज़्ज़त प्यारी थी। जिस दिन हम बहुओं को इंसान समझना शुरू कर देंगे, उस दिन किसी को कहना नहीं पड़ेगा कि ‘सेवा करो’, वो खुद-ब-खुद हो जाएगी।”
वंदना की आँखों से आंसू बह निकले। उसने आरुषि का हाथ अपने हाथ में लिया।
“आरुषि, आज से इस घर में कोई बड़ी या छोटी बहू नहीं होगी। हम दोनों बहनें हैं। और हाँ… कल से नर्स की ज़रूरत नहीं है। अब मैं ठीक हूँ, और अगर ज़रूरत होगी भी, तो मैं तुझसे हक़ से मांगूंगी, हुक्म देकर नहीं।”
उस दिन के बाद उस घर की परिभाषा बदल गई। आरुषि ने सिखा दिया था कि झुकना और सेवा करना दो अलग बातें हैं। स्वाभिमान के साथ की गई मदद, मजबूरी में की गई गुलामी से हज़ारों गुना बड़ी होती है।
**कहानी का संदेश:**
परिवार सहयोग से चलता है, शोषण से नहीं। घर की बहुएं घर की रीढ़ होती हैं, उन्हें पैर की जूती समझना बंद कीजिये। जब सम्मान दिया जाता है, तो समर्पण अपने आप मिलता है।
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**लेखक की कलम से:**
दोस्तों, हमारे समाज में अक्सर बहुओं के ‘ना’ कहने को उनका अहंकार मान लिया जाता है, जबकि कई बार वह उनके आत्मसम्मान की पुकार होती है। सेवा प्रेम से उपजती है, दबाव से नहीं।
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मूल लेखिका : रश्मि झा