“चुप रहिये माँ जी!” काव्या पहली बार सास पर चिल्लाई, लेकिन इस चिल्लाने में डांट नहीं, बल्कि एक बेटी का अधिकार और डर था। “आप हमें अनाथ करके जाना चाहती हैं? इतना दर्द छिपाकर आप… आप हमारे लिए…” काव्या का गला रुंध गया।
रसोई में कुकर की सीटी की आवाज़ ने सुमित्रा जी की तंद्रा तोड़ी। वह दीवार के सहारे खड़ी थीं, एक हाथ अपनी कमर पर टिकाए हुए और दूसरा हाथ गैस के नॉब पर। सुबह के सात बज रहे थे,
लेकिन सुमित्रा जी के लिए दिन चार बजे ही शुरू हो चुका था। उनके जोड़ों में होने वाला दर्द अब ‘गठिया’ की सीमा पार कर कुछ और ही रूप ले चुका था, लेकिन उन्होंने डॉक्टर के पास जाने की बात को यह कहकर टाल दिया था कि—”अभी तो घर में लक्ष्मी आई है, मेरा क्या है, मैं तो पुरानी गाड़ी हूँ, घिसटती रहूँगी।”
उनका बेटा, रमन, नाश्ते की मेज पर बैठा अपने लैपटॉप में व्यस्त था।
“माँ, मेरा टिफिन तैयार है? आज मीटिंग है, जल्दी निकलना है,” रमन ने बिना नज़रें उठाए आवाज़ लगाई।
“हाँ बेटा, बस दो मिनट। आलू के परांठे पैक कर रही हूँ,” सुमित्रा जी ने अपनी लड़खड़ाती आवाज़ को संयत करते हुए जवाब दिया। उन्होंने जल्दी से परांठे पर घी लगाया, लेकिन हाथों में कंपन इतना था कि घी का चम्मच थोड़ा टेढ़ा हो गया और गरम घी उनकी कलाई पर गिर गया। एक हल्की सी ‘सी…!’ की आवाज़ उनके मुंह से निकली, लेकिन उन्होंने तुरंत अपना हाथ ठंडे पानी के नीचे कर लिया और पल्लू से पोंछ लिया। किसी ने नहीं देखा। न बेटे ने, न दीवारों ने।
टिफिन पैक करके उन्होंने रमन को दिया। रमन ने बैग उठाया और जूते पहनते हुए बोला, “माँ, काव्या (बहू) की नींद अभी नहीं खुली है शायद। मुन्ना रात भर रोया है। आप उसे मेथी वाला पानी और दलिया दे देना जब वो उठे। और हाँ, आज कामवाली बाई नहीं आएगी, उसने फोन किया था। आप देख लेना।”
सुमित्रा जी के दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक सी गई। कामवाली नहीं आएगी? यानी झाड़ू, पोछा, बर्तन और कपड़े… सब उन्हें ही करने होंगे? उनकी रीढ़ की हड्डी में एक तीखी लहर दौड़ गई, लेकिन चेहरे पर मुस्कान लाकर बोलीं, “तुझे चिंता करने की ज़रूरत नहीं है बेटा। मैं हूँ न। तू जा।”
रमन चला गया। घर में अब सुमित्रा जी, उनकी बहू काव्या और दस दिन का नन्हा पोता अर्णव थे।
काव्या का सीजेरियन ऑपरेशन हुआ था, इसलिए उसे पूरा आराम (Bed rest) बताया गया था। सुमित्रा जी ने एक गहरी सांस ली, अपनी कमर पर बंधी गर्म पट्टी को थोड़ा और कसा और फिर से रसोई में जुट गईं। काव्या के लिए गोंद के लड्डू, अजवाइन का पानी और दलिया बनाना था।
करीब दस बजे काव्या के कमरे से बच्चे के रोने की आवाज़ आई। सुमित्रा जी, जो अभी बर्तन मांज रही थीं, साबुन वाले हाथ पोंछते हुए तेज़ी से (जितना वो चल सकती थीं) कमरे की ओर बढ़ीं।
“माँ जी!” काव्या की आवाज़ में चिड़चिड़ापन था। “मुन्ना को चुप कराइए न। मेरे टांकों में बहुत दर्द हो रहा है, मैं उठ नहीं पा रही।”
सुमित्रा जी ने तुरंत अर्णव को गोद में उठाया। नन्हीं जान को सीने से लगाते ही उनका सारा दर्द जैसे कुछ पल के लिए छूमंतर हो गया। वे उसे लोरी सुनाने लगीं, कमरे में टहलने लगीं। पंद्रह मिनट, बीस मिनट, आधा घंटा… बच्चा चुप होने का नाम नहीं ले रहा था। सुमित्रा जी के पैर अब जवाब दे रहे थे। उनके घुटने एक-दूसरे से टकरा रहे थे और माथे पर पसीना आ गया था।
“माँ जी, आप इसे बाहर ले जाइये न,” काव्या ने करवट बदलते हुए कहा। “मुझे थोड़ी देर सोने दीजिये।”
सुमित्रा जी बच्चे को लेकर बाहर हॉल में आ गईं। वे सोफे पर बैठना चाहती थीं, लेकिन अर्णव को झुलाने के लिए उन्हें खड़े रहना पड़ रहा था। तभी उनकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उन्हें लगा कि वो गिर पड़ेंगी। उन्होंने दीवार का सहारा लिया और ज़मीन पर ही बैठ गईं। बच्चा अभी भी रो रहा था, लेकिन सुमित्रा जी के गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी। उनका बी.पी. (रक्तचाप) बहुत गिर गया था।
उन्होंने पास रखे पानी के जग से कांपते हाथों से पानी पिया। कुछ देर बाद जब अर्णव सो गया, तो उन्होंने उसे धीरे से पालने में लिटाया। अब उन्हें काव्या का नाश्ता देना था।
थाली सजाकर जब वे काव्या के कमरे में पहुंचीं, तो काव्या फोन पर अपनी माँ से बात कर रही थी।
“हाँ माँ… क्या बताऊँ, बहुत मुश्किल हो रही है। सासू माँ करती तो हैं, पर बहुत धीरे-धीरे। मुझे सुबह से भूख लगी थी, अब जाकर दलिया आया है। उम्र हो गई है न उनकी, तो उनसे काम संभलता नहीं है। मुझे तो लगता है हमें एक फुल टाइम नर्स रख लेनी चाहिए।”
सुमित्रा जी दरवाजे पर ही ठिठक गईं। ‘काम संभलता नहीं है’—ये शब्द उनके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। उन्होंने अपनी पूरी जवानी इस घर को सींचने में लगा दी थी, और आज बुढ़ापे में अपनी बीमारी छिपाकर वे सेवा कर रही थीं, फिर भी यह सिला?
उन्होंने आंसुओं को पी लिया और कमरे में दाखिल हुईं। “काव्या बेटा, नाश्ता कर लो। वो… थोड़ा समय लग गया, गैस खत्म हो गई थी तो सिलेंडर बदलना पड़ा,” उन्होंने झूठ बोला। असल में, उनसे सीढ़ियां चढ़कर ऊपर छत से मसाले लाने में समय लग गया था।
काव्या ने फोन रख दिया। “रख दीजिये माँ जी। और सुनिए, शाम को मेरी सहेलियां आ रही हैं बच्चे को देखने। थोड़ा नाश्ता और चाय का इंतज़ाम कर लीजियेगा।”
सुमित्रा जी ने सिर हिलाया और बाहर आ गईं। शाम के नाश्ते का इंतज़ाम? शरीर का पोर-पोर टूट रहा था। उन्हें याद आया कि डॉक्टर ने उन्हें ‘हर्निया’ के ऑपरेशन के लिए कहा था, जिसे वो टालती आ रही थीं। पेट में एक गांठ थी जो अब दर्द का ज्वालामुखी बन चुकी थी।
दोपहर को सुमित्रा जी ने काव्या के गंदे कपड़े (बच्चे की लंगोट और काव्या के गाउन) धोने के लिए बाथरूम में कदम रखा। झुककर बाल्टी उठाई ही थी कि पेट में एक असहनीय दर्द उठा। ऐसा लगा जैसे किसी ने चाकू घुमा दिया हो। एक चीख उनके गले में ही घुट गई और वे वहीं बाथरूम के गीले फर्श पर गिर पड़ीं।
काफी देर तक वे वहीं पड़ी रहीं। होश ओझल हो रहा था, लेकिन दिमाग में एक ही बात चल रही थी—”अगर रमन को पता चला तो वो परेशान हो जाएगा। काव्या का दूध गर्म करना है।”
किसी तरह, दीवारों को पकड़-पकड़ कर वे खड़ी हुईं। उनका चेहरा पीला पड़ चुका था और होंठ नीले हो रहे थे। उन्होंने खुद को संभाला, कपड़े मशीन में डाले और बाहर आ गईं।
शाम को मेहमान आए। सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए सबका स्वागत किया। समोसे तले, चाय बनाई, बर्फी परोसी। मेहमान काव्या और बच्चे की तारीफ कर रहे थे।
“अरे काव्या, तेरी सासू माँ तो बहुत एक्टिव हैं। हमारी वाली तो खटिया पकड़ चुकी हैं,” एक सहेली ने हंसते हुए कहा।
काव्या ने भी मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, माँ जी तो सुपरवुमन हैं। इन्हें कभी कुछ होता ही नहीं।”
रसोई में खड़ी सुमित्रा जी ने यह सुना और एक फीकी मुस्कान उनके चेहरे पर आ गई। ‘कभी कुछ होता ही नहीं’—यह सबसे बड़ा झूठ था जो भारतीय नारियां सदियों से जीती आ रही हैं।
रात के दस बज चुके थे। रमन आ चुका था और खाना खाकर सो गया था। काव्या भी बच्चे को दूध पिलाकर सो गई थी। घर शांत था। सुमित्रा जी अपने कमरे में आईं। अब और हिम्मत नहीं थी। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू हटाया। पेट पर एक बड़ा सा लाल-नीला निशान पड़ गया था जहाँ हर्निया की गांठ उभर आई थी। दर्द इतना था कि वे बिस्तर पर लेट भी नहीं पा रही थीं।
वे कुर्सी पर ही बैठ गईं और अपनी पुरानी शॉल ओढ़ ली। दर्द से उनकी सिसकियाँ निकल रही थीं। वे मुंह में पल्लू ठूंसकर रो रही थीं ताकि आवाज़ बाहर न जाए।
तभी, काव्या के कमरे से घंटी बजी। यह एक इमरजेंसी बेल थी जो रमन ने लगा दी थी ताकि काव्या को ज़रुरत हो तो वो बजा सके। रमन गहरी नींद में था, उसने नहीं सुना। लेकिन सुमित्रा जी ने सुन लिया।
वे उठने की कोशिश करने लगीं, लेकिन गिर पड़ीं। इस बार वे उठ नहीं पाईं। उन्होंने घिसटते हुए, कोहनियों के बल पर चलना शुरू किया। कमरे से हॉल तक, और हॉल से काव्या के कमरे तक का वो दस मीटर का सफर, किसी पहाड़ की चढ़ाई से कम नहीं था।
काव्या प्यासी थी। उसका जग खाली था। उसने रमन को आवाज़ दी, पर वो नहीं उठा। झुंझलाकर काव्या खुद उठी। उसे लगा कि रसोई से पानी ले लेगी।
जैसे ही काव्या ने अपने कमरे का दरवाज़ा खोला और कॉरिडोर की लाइट जलाई, उसके मुंह से एक चीख निकल गई।
सामने ज़मीन पर सुमित्रा जी रेंग रही थीं। उनका चेहरा पसीने से लथपथ था, साड़ी अस्त-व्यस्त थी और वे दर्द से तड़प रही थीं।
“माँ जी!” काव्या अपना दर्द भूलकर उनकी तरफ दौड़ी। “ये… ये क्या हुआ आपको?”
सुमित्रा जी ने कांपते हाथों से इशारा किया, “प… पानी… तुझे पानी चाहिए था न…”
काव्या सन्न रह गई। वह जिस सास को ‘धीमी’ और ‘बूढ़ी’ समझ रही थी, वह इस हालत में भी उसके लिए पानी लाने की कोशिश कर रही थी?
काव्या ने ज़ोर से रमन को आवाज़ दी। “रमन! उठो! जल्दी आओ!”
रमन हड़बड़ा कर उठा और बाहर आया। अपनी माँ की हालत देख उसके होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत सुमित्रा जी को उठाया और सोफे पर लिटाया।
काव्या ने देखा कि सुमित्रा जी बार-बार अपना पेट छिपाने की कोशिश कर रही थीं। काव्या ने ज़बरदस्ती उनका हाथ हटाया और पेट देखा। वहां की हालत देखकर काव्या की रूह कांप गई। सूजन इतनी ज्यादा थी कि त्वचा फटने को थी।
“रमन, गाड़ी निकालो! अभी अस्पताल चलना है!” काव्या चिल्लाई।
“नहीं… नहीं…” सुमित्रा जी ने क्षीण आवाज़ में कहा। “मुन्ना अकेला है… तुम दोनों रहो… मैं ठीक हो जाऊँगी… बस बाम लगा दो।”
“चुप रहिये माँ जी!” काव्या पहली बार सास पर चिल्लाई, लेकिन इस चिल्लाने में डांट नहीं, बल्कि एक बेटी का अधिकार और डर था। “आप हमें अनाथ करके जाना चाहती हैं? इतना दर्द छिपाकर आप… आप हमारे लिए…” काव्या का गला रुंध गया।
वे उन्हें अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने बताया कि आंत फंस गई थी (Strangulated Hernia) और अगर एक घंटा और देर होती, तो आंत फट सकती थी और जान जा सकती थी। तुरंत ऑपरेशन करना पड़ा।
तीन घंटे बाद ऑपरेशन थिएटर के बाहर रमन और काव्या बैठे थे। काव्या की आँखों से आंसू रुक नहीं रहे थे।
“रमन,” काव्या ने सिसकते हुए कहा, “मैं कितनी बुरी हूँ। मैं उन्हें कोसती रही कि वो काम धीरे करती हैं। मैंने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि वो किस हाल में हैं। उन्होंने अपनी बीमारी को सिर्फ इसलिए छिपाया ताकि मेरा ‘जापा’ ठीक से हो सके। वो माँ नहीं, भगवान हैं रमन।”
रमन ने काव्या का हाथ थामा। “गलती मेरी भी है काव्या। हम अपनी नई गृहस्थी और बच्चे में इतने मगन हो गए कि उस नींव को ही भूल गए जिस पर यह घर टिका है। माँ हमेशा कहती रहीं ‘मैं ठीक हूँ’, और मैं मूर्ख मान भी गया।”
दो दिन बाद सुमित्रा जी को होश आया। उन्होंने आँखें खोलीं तो देखा कि काव्या उनके बिस्तर के पास बैठी है, और उसकी गोद में अर्णव है।
“बहू… मुन्ना ठीक है? तुमने नाश्ता किया?” सुमित्रा जी के पहले शब्द यही थे।
काव्या ने अर्णव को रमन की गोद में दिया और सुमित्रा जी के सीने से लग गई। वह फूट-फूट कर रोई।
“माँ, अब बस। बहुत हो गया आपका ‘सुपरवुमन’ बनना,” काव्या ने आंसुओं के बीच कहा। “अब से इस घर की कमान मेरे हाथ में है। और मेरा पहला आदेश यह है कि आप अगले दो महीने तक बिस्तर से नीचे पैर नहीं रखेंगी।”
“लेकिन काम… मुन्ना…” सुमित्रा जी ने बोलना चाहा।
“सब हो जाएगा,” काव्या ने दृढ़ता से कहा। “हमने दो मेड रख ली हैं। और रमन ने भी एक महीने की ‘वर्क फ्रॉम होम’ ले ली है। आपने हमें पाल लिया माँ, अब हमारी बारी है आपको पालने की।”
सुमित्रा जी की आँखों से आंसू बह निकले और तकिए में जज़्ब हो गए। यह दर्द के आंसू नहीं थे, यह सुकून के आंसू थे। उन्हें पहली बार लगा कि अब वो वाकई ‘बूढ़ी’ हो सकती हैं, बीमार हो सकती हैं, क्योंकि उन्हें संभालने के लिए उनकी बेटी (बहू नहीं) खड़ी थी।
घर लौटने के बाद नज़ारा बदल चुका था। अब सुबह की चाय सुमित्रा जी नहीं, काव्या (या रमन) बनाते थे। सुमित्रा जी अब रसोई में नहीं, बल्कि आंगन में कुर्सी पर बैठकर अर्णव को खिलाती थीं।
एक दिन काव्या ने सुमित्रा जी के बालों में तेल लगाते हुए पूछा, “माँ, आपने इतना दर्द क्यों सहा? बताया क्यों नहीं?”
सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, माँ का दिल एक ऐसा बैंक लॉकर होता है जहाँ बच्चों के लिए सिर्फ़ दुआएं और प्यार रखा होता है, अपनी तकलीफों के लिए वहां जगह नहीं होती। मुझे लगा अगर मैं बीमार पड़ गई, तो मेरी बच्ची (काव्या) को कौन संभालेगा?”
काव्या ने झुककर सुमित्रा जी के माथे को चूम लिया। “और मुझे लगा कि सास सिर्फ हुक्म चलाने के लिए होती हैं। आपने तो मुझे ऋणी बना दिया माँ।”
उस दिन घर के उस कोने से, जहाँ सुमित्रा जी अक्सर दर्द में कराहती थीं, अब खिलखिलाने की आवाज़ें आती थीं। रसोई वही थी, घर वही था, लेकिन रिश्तों की महक बदल गई थी। अब वहां कोई ‘अदृश्य दर्द’ नहीं था, बल्कि ‘परवाह’ का एक ख़ूबसूरत एहसास था।
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अक्सर हमारे घरों में बुज़ुर्ग, ख़ासकर माँएं, अपनी बीमारियों को इसलिए छिपा लेती हैं ताकि बच्चों को परेशानी न हो। हम उनकी खामोशी को उनकी ‘सहमति’ या ‘स्वास्थ्य’ मान लेते हैं। लेकिन याद रखिये, **पुरानी छत से पानी टपकता ज़रूर है, लेकिन वही छत हमें कड़ी धूप से बचाती भी है।** आज ही अपनी माँ या सासू माँ के पास बैठिये, उनका हाल चाल पूछिए, सिर्फ़ ऊपर से नहीं, गहराई से।
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मूल लेखिका :डॉ अनुपमा श्रीवास्तव