“मुझे अपनी लाचारी पर गुस्सा आता है, सुमन। मुझे गुस्सा आता है कि मैं अब ‘जरूरत’ नहीं रही, बस एक ‘बोझ’ बन गई हूँ। जब मैं तुझे घर के काम करते देखती हूँ, तो मुझे अपनी जवानी याद आती है। और जब तू कोई काम छोड़ देती है या गलती करती है, तो मुझे लगता है कि मेरा घर बिखर रहा है, और मैं कुछ नहीं कर पा रही। मेरा वो गुस्सा तुझ पर नहीं होता, वो मेरी अपनी बेबसी पर होता है कि मैं उठकर खुद वो काम क्यों नहीं कर पा रही।”
रसोई में कुकर की सीटी बजी और उसके साथ ही ड्राइंग रूम से भारी-भरकम आवाज़ आई, “अरे बहु! गैस बंद कर दे। पूरे मोहल्ले को दाल खिलाने का इरादा है क्या? तीन सीटी हो गई, सुनाई नहीं देता?”
सुमन ने हड़बड़ाकर गैस बंद की। उसका सिर भारी हो रहा था। आज सुबह से ही तबियत कुछ नासाज़ थी, लेकिन घर के काम थे कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उसने माथे पर आया पसीना पोंछा और पानी का गिलास लेकर ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ी।
सामने आराम कुर्सी पर उसकी सास, सुभद्रा देवी, बैठी थीं। उनके घुटनों पर बाम लगा हुआ था और चेहरे पर वही चिर-परिचित तल्खी थी। सुमन ने पानी का गिलास मेज पर रखा।
“मम्मी जी, पानी,” सुमन ने धीरे से कहा।
सुभद्रा देवी ने गिलास उठाया नहीं, बस तिरछी नज़रों से सुमन को देखा। “पानी तो ले आई, पर ये देख रही है कि सामने की टेबल पर धूल जमी है? या अब मुझे उठकर सफाई करनी पड़ेगी? वैसे ही मेरे घुटने जवाब दे चुके हैं, अब क्या कमर भी तुड़वानी है तुझे?”
सुमन का मन हुआ कि कह दे—’मम्मी जी, सुबह ही पोंछा लगाया था, धूल हवा से आ गई होगी।’ लेकिन उसने होंठ सी लिए। पिछले दो सालों में, जब से वह ब्याह कर इस घर में आई थी, उसने यही सीखा था कि सुभद्रा देवी की बातों का जवाब देने का मतलब है, घर में महाभारत छिड़ना।
सुमन ने चुपचाप डस्टर उठाया और टेबल साफ़ करने लगी। उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा रहा था। डॉक्टर ने कल ही बताया था कि उसका हीमोग्लोबिन कम है और उसे आराम की ज़रूरत है। लेकिन आराम? इस घर में ‘आराम’ शब्द शायद शब्दकोश में था ही नहीं।
शाम को जब सुमन के पति, निमेष, दफ्तर से लौटे, तो घर का माहौल हमेशा की तरह तनावपूर्ण था।
“आज खाने में नमक कम है,” सुभद्रा देवी ने थाली सरकाते हुए कहा। “लगता है बहू का मन अब रसोई में लगता नहीं है। निमेष, देख ले भाई, अगर तुझे होटल का खाना पसंद हो तो बता दे, मैं तो बूढ़ी हूँ, जैसे-तैसे ब्रेड खाकर गुज़ारा कर लूँगी।”
निमेष ने बेचारगी से सुमन की तरफ देखा। सुमन ने सिर झुका लिया। वह जानती थी कि नमक ठीक है, यह बस सुभद्रा देवी की आदत है—नुस्खे निकालना।
रात को बर्तन धोते समय सुमन की आँखों से आंसू बह निकले। वह खुद को बहुत अकेली महसूस कर रही थी। उसे लगा कि उसकी सास उससे नफरत करती हैं। वे चाहती ही नहीं कि वह इस घर में खुश रहे।
अगले दिन रविवार था। काम का बोझ दोगुना था। सुमन सुबह से मशीन की तरह चल रही थी। कपड़े धोना, नाश्ता बनाना, सफाई करना। दोपहर होते-होते उसकी हिम्मत जवाब दे गई।
वह छत पर सूखे कपड़े उतारने गई थी। धूप तेज़ थी। अचानक उसे चक्कर आया। उसने तार पकड़ने की कोशिश की, लेकिन हाथ फिसल गया और वह धम्म से छत की गरम ज़मीन पर गिर पड़ी। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
जब सुमन को होश आया, तो उसने खुद को अपने बिस्तर पर पाया। सिर पर गीली पट्टी रखी थी। कमरे में पंखा तेज़ चल रहा था। उसने आँखें खोलने की कोशिश की तो धुंधली सी आकृति दिखाई दी।
वह सुभद्रा देवी थीं।
लेकिन… यह क्या? सुभद्रा देवी, जो अपने घुटनों के दर्द के कारण ठीक से चल भी नहीं पाती थीं, इस वक्त सुमन के पैरों के तलवों पर तेल मल रही थीं। उनके चेहरे पर वह हमेशा वाला गुस्सा नहीं था, बल्कि एक घबराहट थी, एक डर था।
सुमन ने हिलने की कोशिश की। “मम्मी जी…”
सुभद्रा देवी चौंक गईं। उन्होंने जल्दी से अपने आंसू पोंछे और चेहरे पर वही पुराना सख्त भाव लाने की कोशिश की, लेकिन इस बार वे नाकाम रहीं।
“चुपचाप लेटी रह,” सुभद्रा देवी की आवाज़ में डांट थी, लेकिन वह खोखली थी। “बड़ी आई काम करने वाली। जब शरीर में जान नहीं है, तो छत पर मरने जाने की क्या ज़रूरत थी? अगर निमेष समय पर ऊपर न जाता तो आज क्या होता? तुझे ज़रा भी अक्ल नहीं है?”
सुमन ने देखा कि सुभद्रा देवी के हाथ कांप रहे थे। वे अब भी सुमन के ठंडे पैरों को अपनी गरम हथेलियों से रगड़ रही थीं ताकि उसे गर्माहट मिल सके।
“मम्मी जी, आप रहने दीजिये, आपके घुटनों में दर्द होगा,” सुमन ने उठने की कोशिश की।
“खबरदार जो उठी!” सुभद्रा देवी ने उसे वापस लेटा दिया। “मेरे घुटनों का दर्द तेरी जान से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। डॉक्टर को बुलाया था। कह रहा था खून की कमी है, कमज़ोरी है। और तू है कि महारानी की तरह मुँह सिलकर काम किए जा रही है। एक बार भी नहीं बोल सकती थी कि तबियत ख़राब है?”
“मुझे लगा आप नाराज़ होंगी… कि मैं कामचोर हूँ,” सुमन की आँखों से आंसू छलक पड़े।
सुभद्रा देवी का हाथ रुक गया। कमरे में सन्नाटा छा गया। सुभद्रा देवी ने एक गहरी सांस ली और बिस्तर के किनारे बैठ गईं। उनकी नज़रें फर्श पर थीं।
“तुझे लगता है मैं कसाई हूँ?” सुभद्रा देवी की आवाज़ धीमी पड़ गई। “सुमन, मैं जानती हूँ कि मैं चिड़चिड़ी हो गई हूँ। बात-बात पर चिल्लाती हूँ। तुझे ताने देती हूँ।”
सुमन चुप रही।
“जानती है क्यों?” सुभद्रा देवी ने सुमन की आँखों में देखा। उनकी आँखों में वर्षों का जमा दर्द पिघल रहा था। “क्योंकि मैं डरती हूँ। जब मैं जवान थी, तो इस घर का कोना-कोना मेरी उंगलियों के इशारे पर नाचता था। मैं दस-दस किलो गेहूँ अकेले पीस लेती थी। कभी थकान नहीं होती थी। लेकिन अब… अब जब मैं सुबह उठती हूँ, तो मेरे ही पैर मेरा साथ नहीं देते। मैं पानी का जग उठाना चाहती हूँ, तो कलाई कांपती है। मैं साफ़-सफाई करना चाहती हूँ, पर कमर झुकती नहीं।”
सुभद्रा देवी की आँखों से एक आंसू लुढ़क कर उनके गाल पर आ गया।
“मुझे अपनी लाचारी पर गुस्सा आता है, सुमन। मुझे गुस्सा आता है कि मैं अब ‘जरूरत’ नहीं रही, बस एक ‘बोझ’ बन गई हूँ। जब मैं तुझे घर के काम करते देखती हूँ, तो मुझे अपनी जवानी याद आती है। और जब तू कोई काम छोड़ देती है या गलती करती है, तो मुझे लगता है कि मेरा घर बिखर रहा है, और मैं कुछ नहीं कर पा रही। मेरा वो गुस्सा तुझ पर नहीं होता, वो मेरी अपनी बेबसी पर होता है कि मैं उठकर खुद वो काम क्यों नहीं कर पा रही।”
सुमन सन्न रह गई। उसने कभी इस नज़रिये से सोचा ही नहीं था। वह जिसे सास का अहंकार समझ रही थी, वह दरअसल एक बुजुर्ग महिला का अपनी ढलती उम्र और खोती सत्ता से संघर्ष था।
“और आज…” सुभद्रा देवी का गला रुंध गया। “आज जब तू छत पर गिरी, तो मेरी जान निकल गई थी। मुझे लगा कि मेरी वजह से हुआ। अगर मैं तुझे इतना काम न बताती, तो तू ठीक होती। निमेष की माँ तो कब की मर गई, अब अगर इस घर की लक्ष्मी को कुछ हो जाता, तो मैं भगवान को क्या मुँह दिखाती?”
सुमन ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और सुभद्रा देवी के झुर्रियों भरे हाथ को थाम लिया।
“मम्मी जी, मुझे माफ़ कर दीजिये,” सुमन ने सिसकते हुए कहा। “मैं आपको कभी समझ ही नहीं पाई। मुझे लगा आप मुझे पराया समझती हैं।”
“पगली,” सुभद्रा देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरा। “पराया समझती तो अभी तेरे तलवे नहीं मल रही होती। मैं सास हूँ, पुरानी ज़माने की। हमें प्यार जताना नहीं आता, बस हुकुम चलाना आता है। पर इसका मतलब यह नहीं कि दिल में पत्थर है।”
तभी निमेष कमरे में आया। उसके हाथ में जूस का गिलास था। उसने देखा कि उसकी माँ और पत्नी, दोनों की आँखें नम हैं, लेकिन चेहरे पर एक सुकून है।
सुभद्रा देवी ने निमेष से गिलास लिया और खुद सुमन के मुँह से लगाया। “पी इसे। और सुन, कल से सुबह का खाना मैं बनाऊँगी।”
“लेकिन मम्मी जी, आपके घुटने…” सुमन ने विरोध करना चाहा।
“चुप!” सुभद्रा देवी ने अपनी पुरानी कड़क आवाज़ में कहा, लेकिन इस बार उसमें मिठास थी। “स्टूल रखकर बैठूँगी। सब्ज़ी काटूँगी, दाल छौंकूँगी। और तू चुपचाप बैठकर आराम करेगी। जब तक तेरे गालों पर लाली नहीं आती, रसोई में तेरा घुसना बंद। और हाँ, निमेष… कल से एक कामवाली बाई लगवा ले जो पोंछा और बर्तन कर दे। मेरी बहू कोई मशीन नहीं है।”
निमेष मुस्कुरा दिया। “जी माँ।”
उस रात सुमन को नींद बहुत अच्छी आई। उसे लगा कि आज उसने सिर्फ अपना स्वास्थ्य नहीं, बल्कि एक माँ भी पाई है।
अगले दिन सुबह, जब सुमन की आँख खुली, तो रसोई से खुशबू आ रही थी। वह धीरे-धीरे चलकर वहां गई। देखा तो सुभद्रा देवी एक ऊंचे स्टूल पर बैठी थीं। गैस पर कड़ाही चढ़ी थी। वे कुछ गुनगुना रही थीं।
सुमन ने दरवाज़े पर खड़े होकर देखा। सुभद्रा देवी के हाथ कांप रहे थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक संतोष था—कुछ ‘करने’ का संतोष, उपयोगी होने का संतोष।
“अरे, तू उठ गई?” सुभद्रा देवी ने मुड़कर देखा। “जा, मुँह धोकर आ। मैंने तेरे लिए सूजी का हलवा बनाया है। इसमें खूब सारा ड्राई-फ्रूट डाला है। खून बढ़ाएगा।”
सुमन मुस्कुराई। “मम्मी जी, मुझे भी क्या करूँ… बहुत कमज़ोरी महसूस होती है, पर आपकी यह डांट वाली ममता मिल जाए, तो सारी कमज़ोरी भाग जाएगी।”
सुभद्रा देवी ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए चमचा उठाया। “ज्यादा मक्खन मत लगा। जा तैयार हो जा, और सुन… आज शाम को हम दोनों पार्क चलेंगे। डॉक्टर ने कहा है, तुझे ताज़ी हवा की ज़रूरत है… और मुझे भी लगता है कि अब इन चार दीवारों से बाहर निकलना चाहिए।”
उस दिन घर की दीवारों का रंग वही था, लेकिन नींव और मजबूत हो गई थी। सास और बहू के बीच की दीवार ढह चुकी थी। अब वहां सिर्फ दो स्त्रियाँ थीं—एक जो अपनी जवानी की जिम्मेदारियों से जूझ रही थी, और दूसरी जो अपने बुढ़ापे की लाचारी से लड़ रही थी। दोनों ने समझ लिया था कि एक-दूसरे का सहारा बनकर ही इस लड़ाई को जीता जा सकता है।
उस दिन के बाद, सुभद्रा देवी का चिड़चिड़ापन कम हो गया। क्यों? क्योंकि अब उन्हें अपना ‘महत्व’ वापस मिल गया था। सुमन ने समझदारी दिखाई—वह जानबूझकर उनसे छोटे-मोटे काम पूछती, उनसे सलाह लेती। इससे सुभद्रा देवी को लगता कि घर की चाबी अभी भी उन्हीं के पास है। और बदले में, सुमन को वह बेपनाह प्यार और सुरक्षा मिली, जो शायद उसे अपनी सगी माँ से भी न मिल पाती।
रिश्ते कांच के नहीं होते जो एक ठोकर से टूट जाएं, वे तो मिट्टी के होते हैं… अगर दरार आ भी जाए, तो प्यार के पानी से उन्हें फिर से जोड़ा जा सकता है। बस ज़रूरत है—थोड़ी सी समझ और थोड़े से सब्र की।
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**पाठकों के लिए एक संदेश:**
अक्सर हमारे घरों में बुज़ुर्गों का गुस्सा उनकी नफरत नहीं, बल्कि उनकी असुरक्षा और लाचारी की आवाज़ होता है। वे बस यह चाहते हैं कि उन्हें ‘अनदेखा’ न किया जाए। थोड़ा सा वक्त, थोड़ा सा सम्मान और उनकी छोटी-मोटी ज़िद को प्यार से अपनाकर देखिये… वो ‘चिड़चिड़ी सास’ या ‘गुस्सैल ससुर’ कब आपके सबसे अच्छे दोस्त बन जाएंगे, आपको पता भी नहीं चलेगा।
**क्या आपके घर में भी कोई ऐसा है जिसके गुस्से के पीछे प्यार छिपा है?**
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मूल लेखिका : लतिका श्रीवास्तव