संस्कारों की असली परीक्षा – आरती झा 

“सुमित्रा, आज मेरे सामने से हट जाओ। आज या तो इस घर में मेरे उसूल रहेंगे या फिर यह कल का छोकरा, जिसे मैंने अपनी उंगली पकड़कर दुनिया दिखाई है।”

दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक के बीच हरीशंकर जी की गरजती हुई आवाज़ ने घर के सन्नाटे को चीर दिया। उनका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था, और माथे की नसें तनी हुई थीं।

सामने सोफे पर उनका पच्चीस वर्षीय बेटा, आर्यन, सिर झुकाए बैठा था, लेकिन उसकी शारीरिक भाषा में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी ज़िद और लाचारी थी। सुमित्रा जी, जो पिछले तीस सालों से हरीशंकर जी के हर सुख-दुःख की साथी थीं, आज असहाय होकर कभी पति को तो कभी बेटे को देख रही थीं।

बात दरअसल बहुत छोटी सी थी, जो अब पहाड़ बन चुकी थी। हरीशंकर जी एक रिटायर्ड प्रिंसिपल थे। उनका जीवन अनुशासन और समाज की मर्यादाओं की एक सीधी लकीर पर चला था। उन्होंने अपनी पूरी जवानी आर्यन को एक काबिल इंसान बनाने में खपा दी थी। खुद फटी बनियान पहनी,

ताकि आर्यन ब्रांडेड शर्ट पहन सके। खुद टूटी चप्पल घसीटी, ताकि आर्यन महंगे जूतों में कॉलेज जा सके। आर्यन भी होनहार निकला, उसने शहर की बड़ी कंपनी में ऊँचे पद पर नौकरी हासिल की। हरीशंकर जी का सीना गर्व से चौड़ा था।

लेकिन यह गर्व आज कांच के टुकड़ों की तरह बिखर गया था।

शाम को आर्यन ने घोषणा कर दी थी कि वह ‘काव्या’ से शादी करना चाहता है। काव्या… एक अनाथालय में पली-बढ़ी लड़की, जिसका न कोई कुल था, न गोत्र, और न ही समाज में कोई जाना-पहचाना परिवार। और सबसे बड़ी बात, वह आर्यन से दो साल बड़ी थी।

हरीशंकर जी के लिए यह सिर्फ़ एक पसंद का मामला नहीं था, यह उनकी प्रतिष्ठा पर चोट थी।

“मैंने तुझे इसलिए पढ़ाया-लिखाया था कि तू खानदान का नाम डुबो दे?” हरीशंकर जी ने आर्यन पर चिल्लाते हुए कहा था। “हमारा समाज क्या कहेगा? कि मास्टर जी के बेटे को कोई ढंग के घर की लड़की नहीं मिली जो सड़क से किसी को उठा लाया?”

तभी आर्यन ने वह कह दिया था, जो हरीशंकर जी ने सपने में भी नहीं सोचा था। आर्यन ने पहली बार अपनी आवाज़ ऊंची की थी।

“पापा, सड़क से नहीं, इज्जत से लाया हूँ उसे। और समाज? जिस समाज की आप बात कर रहे हैं, उसने मेरे बुरे वक्त में मुझे एक गिलास पानी तक नहीं पूछा था। काव्या ने तब मेरा साथ दिया जब मैं डिप्रेशन में था और आप अपनी उम्मीदों का बोझ मुझ पर लाद रहे थे। और रही बात परवरिश की, तो आपने ही सिखाया था कि इंसान की पहचान उसके कर्म से होती है, उसके कुल से नहीं। आज जब मैं आपकी दी हुई सीख पर अमल कर रहा हूँ, तो आपको ही मिर्ची क्यों लग रही है?”

यह जवाब हरीशंकर जी के लिए किसी तमाचे से कम नहीं था।

अब रात के दस बज रहे थे। खाना मेज़ पर लगा हुआ ठंडा हो रहा था। हरीशंकर जी अपने कमरे में कुर्सी पर बैठे शून्य में घूर रहे थे। सुमित्रा जी दबे पाँव उनके पास आईं।

“खाना खा लीजिए, ठण्डा हो रहा है,” सुमित्रा जी ने धीरे से कहा।

“मुझे भूख नहीं है,” हरीशंकर जी ने बिना मुड़े जवाब दिया। “और उस नालायक से कह दो कि अगर उसे अपनी मनमर्जी करनी है, तो वह यह घर छोड़कर जा सकता है। मेरे जीते जी उस लड़की को मैं अपनी बहू नहीं मानूंगा। जिसका कोई ‘मूल’ नहीं, वह मेरे वंश की बेल क्या बढ़ाएगी?”

सुमित्रा जी ने एक गहरी सांस ली। वह जानती थीं कि अब चुप्पी साधने से घर टूट जाएगा। उन्होंने एक कुर्सी खींची और हरीशंकर जी के सामने बैठ गईं।

“सुनिए,” सुमित्रा जी की आवाज़ में आज एक अलग दृढ़ता थी। “आप हमेशा कहते थे न कि आर्यन बिल्कुल आप पर गया है? जिद्दी, उसूलों का पक्का और सच के लिए लड़ने वाला?”

हरीशंकर जी ने पत्नी की ओर प्रश्नवाचक नज़रों से देखा।

“आज जब उसने आपकी आँखों में आँखें डालकर बात की, तो आपको अपना अपमान लगा। लेकिन मैंने वहां अपमान नहीं, आपका ‘अक्स’ देखा,” सुमित्रा जी ने कहना जारी रखा। “याद है, जब पैंतीस साल पहले आपने अपने पिताजी के खिलाफ जाकर वकालत छोड़कर मास्टरी (शिक्षण) चुनी थी? तब बाबूजी ने भी यही कहा था कि तुमने उनकी नाक कटवा दी। उन्होंने भी खाना छोड़ दिया था। तब आपने मुझसे कहा था—’सुमित्रा, पिता का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन अपनी आत्मा की आवाज़ मारकर मैं ज़िंदा लाश नहीं बन सकता।'”

हरीशंकर जी कुछ बोलने को हुए, लेकिन सुमित्रा जी ने उन्हें रोक दिया।

“आज आर्यन भी वही कर रहा है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि तब आप ‘बटे’ थे, और आज आप ‘पिता’ हैं। आप आहत इसलिए हैं क्योंकि उसने उस लड़की का पक्ष लिया। लेकिन जरा ठंडे दिमाग से सोचिए, अगर कल को आर्यन की जगह कोई और लड़का होता जो समाज के डर से उस लड़की का हाथ छोड़ देता, तो क्या आप उसे ‘मर्द’ कहते? आपने उसे राम जैसी मर्यादा सिखाई, और जब वह सीता (काव्या) के सम्मान के लिए खड़ा हुआ, तो आपको बुरा लग रहा है?”

हरीशंकर जी की आँखों में गुस्सा कम और असमंजस ज्यादा दिखाई देने लगा।

सुमित्रा जी ने फिर कहा, “वह लड़की अनाथ है, यही उसकी गलती है न? लेकिन सोचिए, जिसे माँ-बाप का प्यार नहीं मिला, वह परिवार की अहमियत हमसे ज्यादा समझेगी। और आर्यन… उसने आपसे ऊँची आवाज़ में बात की, यह गलत था। लेकिन उसने यह आवाज़ अपने किसी ऐश-ओ-आराम के लिए नहीं उठाई, बल्कि किसी की गरिमा बचाने के लिए उठाई। क्या यह आपकी परवरिश की जीत नहीं है कि आपका बेटा इतना साहसी है कि वह सच के लिए अपने पिता से भी भिड़ गया?”

कमरे में सन्नाटा पसर गया। हरीशंकर जी की नज़रें झुक गईं। उन्हें अपने अतीत की परछाई आर्यन में दिखाई देने लगी। उन्हें याद आया कि आर्यन ने बदतमीजी नहीं की थी, उसने बस एक सवाल पूछा था—वही सवाल जो कभी उन्होंने अपने पिता से पूछा था।

उसी वक्त, बाहर हॉल से कुछ खटपट की आवाज़ आई। हरीशंकर जी और सुमित्रा जी कमरे से बाहर निकले।

आर्यन अपना सूटकेस पैक कर रहा था। उसकी आँखें लाल थीं, जैसे वह बहुत रोया हो। काव्या दरवाज़े के पास खड़ी थी, सिर झुकाए। वह शायद आर्यन को रोकने आई थी या उसे विदा करने, यह साफ़ नहीं था।

आर्यन ने हरीशंकर जी को देखा और अपना सूटकेस नीचे रख दिया। वह आगे बढ़ा और पिता के चरणों में झुक गया।

“पापा, मैं जा रहा हूँ। मैं काव्या को नहीं छोड़ सकता क्योंकि उसने मुझे इंसान बनाया है। और मैं आपको दुखी नहीं देख सकता क्योंकि आपने मुझे भगवान की तरह पाला है। दोनों में से किसी एक को चुनने का मतलब है खुद को मार देना। इसलिए मैं दूर जा रहा हूँ ताकि मेरी वजह से आपके उसूलों को चोट न पहुंचे। आपकी दवाई की लिस्ट माँ को दे दी है। अपना ख्याल रखिएगा।”

आर्यन की आवाज़ भर्राई हुई थी। वह मुड़ा और काव्या का हाथ पकड़कर दरवाज़े की ओर बढ़ा।

हरीशंकर जी के अंदर का ‘बाप’ तड़प उठा। उन्हें दिखा कि उनका बेटा, जो कल तक उनकी उंगली पकड़कर चलता था, आज इतना बड़ा हो गया है कि अपने दम पर एक नई दुनिया बसाने चला है, लेकिन उसकी नींव में दर्द है। उन्हें महसूस हुआ कि अगर आज आर्यन चला गया, तो घर की ईंटें तो सलामत रहेंगी, लेकिन ‘घर’ हमेशा के लिए ढह जाएगा।

“रुक जा!” हरीशंकर जी की आवाज़ गूंजी। इस बार आवाज़ में गरज नहीं, एक कंपन था।

आर्यन और काव्या रुक गए।

हरीशंकर जी धीरे-धीरे चलते हुए उनके पास पहुंचे। उन्होंने काव्या को ऊपर से नीचे तक देखा। साधारण सूती सूट, चेहरे पर कोई मेकअप नहीं, बस आँखों में एक डर और सम्मान।

हरीशंकर जी ने आर्यन की ओर देखा और बोले, “तुझे मैंने बोलना सिखाया, चलना सिखाया… पर आज तूने मुझे ‘सुनना’ और ‘रुकना’ सिखा दिया।”

उन्होंने काव्या की ओर हाथ बढ़ाया। काव्या सहम गई। हरीशंकर जी ने उसका सिर पर हाथ रखा और बोले, “जिसका कोई नहीं होता, उसका ईश्वर होता है। और अगर मेरे बेटे ने तुझे चुना है, तो तुझमें जरूर कुछ ऐसा होगा जो मेरी बूढ़ी आँखें नहीं देख पाईं। जो लड़का अपने बाप के खिलाफ खड़ा हो सकता है, वह अपनी पत्नी के लिए दुनिया से भी लड़ सकता है। मुझे गर्व है कि मैंने एक कायर नहीं, एक रक्षक पाला है।”

सुमित्रा जी की आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली। आर्यन दौड़कर पिता के गले लग गया। हरीशंकर जी ने उसे भींच लिया, जैसे बरसों बाद कोई खोई हुई चीज़ मिली हो।

“माफ़ कर देना पापा,” आर्यन सिसक रहा था।

“माफ़ी तो मुझे मांगनी चाहिए बेटा,” हरीशंकर जी ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा। “मैं अपनी ‘इज्जत’ बचाने के चक्कर में अपना ‘अभिमान’ (बेटा) खोने जा रहा था। मुझे लगा था कि तू बदल गया है, पर तू तो मुझसे भी बेहतर निकला।”

हरीशंकर जी ने काव्या से कहा, “बहू, इस घर के नियम थोड़े सख्त हैं। सुबह जल्दी उठना पड़ेगा, मेरी चाय में चीनी कम होनी चाहिए, और हाँ… इस घर में बड़ों का जवाब देना मना है, सिवाय तब, जब बात सच और इंसाफ की हो।”

काव्या ने नम आँखों से मुस्कुराते हुए उनके पैर छुए। “जी बाबूजी।”

उस रात घर में खाना देर से खाया गया, लेकिन वह खाना ठंडा होने के बावजूद उसमें जो स्वाद था, वह किसी भी दावत से बढ़कर था। हरीशंकर जी समझ गए थे कि पेड़ की जड़ें अगर मजबूत हों, तो नई टहनियों को अपनी दिशा में बढ़ने की आज़ादी देनी चाहिए। पीढ़ियों का टकराव ‘प्रेम’ और ‘समझ’ के पुल से ही भरा जा सकता है, ज़िद की दीवार से नहीं।

उस दिन हरीशंकर जी ने न केवल एक बेटी पाई थी, बल्कि अपने बेटे को दोबारा पा लिया था—एक नए रूप में, एक जिम्मेदार पुरुष के रूप में।

**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**

क्या हरीशंकर जी ने आर्यन को रोककर सही किया, या पिता का सम्मान ही सर्वोपरि होना चाहिए था? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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मूल लेखिका : आरती झा 

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