“वाह!” कावेरी देवी ने ताली बजाई। “अब बहू मुझे बताएगी कि मुझे कहाँ रहना है? यह मेरा घर है, तेरे ससुर की निशानी। मैं इसे छोड़कर कहीं नहीं जाउंगी। और तुम दोनों का असल मकसद तो ‘अलग’ होना है। यह लिफ्ट और ऑफिस की दूरी तो बस बहाने हैं। साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहते कि अब बूढ़ी माँ बोझ लगने लगी है?”
श्रीमती कावेरी देवी के ड्राइंग रूम में आज उत्सव जैसा माहौल था। मेज़ पर काजू कतली और समोसे सजे थे। मोहल्ले की तीन-चार औरतें बैठी थीं और कावेरी देवी का चेहरा गर्व से दमक रहा था।
“अरे विमला बहन, तुमने सुना नहीं? मेरी बेटी रश्मि और दामाद जी ने मुंबई के पॉश इलाके में 3-BHK फ्लैट बुक किया है। पूरे दो करोड़ का है! परसों ही गृह-प्रवेश की पूजा है।” कावेरी देवी ने बड़े चाव से बताया।
विमला जी ने समोसा उठाते हुए कहा, “वाह भाई वाह! मान गए तुम्हारे दामाद विवेक को। इतनी कम उम्र में इतना बड़ा मकान बना लिया। रश्मि तो राज करेगी, राज। वाकई, बेटी की किस्मत खुल गई।”
कावेरी देवी ने सीना चौड़ा करते हुए कहा, “और नहीं तो क्या? लड़का होनहार है। रश्मि बता रही थी कि विवेक ने कहा है—’अपना घर तो अपना ही होता है, किराए के मकान में कब तक धक्के खाएंगे?’ देखो, कितनी समझदारी वाली बात है। इसे कहते हैं परिवार के भविष्य की चिंता करना।”
रसोई में चाय बना रही घर की बहू, अंजलि, यह सब सुन रही थी। उसका हाथ चाय की छलनी पर कस गया। पास ही खड़ा उसका पति, और कावेरी देवी का बेटा, सुमित, पानी की बोतल भर रहा था। दोनों की नज़रे मिलीं। सुमित की आँखों में एक अजीब सी लाचारी थी, और अंजलि की आँखों में सवाल।
रात को जब मेहमान चले गए, तो खाने की मेज़ पर सन्नाटा था। सुमित ने हिम्मत करके गला साफ़ किया।
“माँ, मुझे आपसे एक ज़रूरी बात करनी थी,” सुमित ने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए कहा।
कावेरी देवी ने अचार की बरनी खोलते हुए पूछा, “हाँ बोल, क्या बात है? रश्मि के गृह-प्रवेश के लिए कपड़े खरीदने हैं क्या?”
“नहीं माँ,” सुमित ने एक पल के लिए अंजलि की ओर देखा, जिसने उसे आँखों से ढांढस बंधाया। “माँ, आपको तो पता है कि हमारा यह घर अब छोटा पड़ने लगा है। अगले महीने अंजलि की डिलीवरी है, बच्चा आने वाला है। और बाबूजी के जाने के बाद घर की मरम्मत भी ठीक से नहीं हो पाई है।”
“तो?” कावेरी देवी के माथे पर लकीरें उभर आईं।
“माँ, मैंने और अंजलि ने मिलकर लोन पर एक फ्लैट लेने का सोचा है। मेरे ऑफिस के पास ही है। आने-जाने का समय भी बचेगा और बच्चे के लिए भी सही रहेगा। हमने… हमने बुकिंग अमाउंट दे दिया है।”
चम्मच कावेरी देवी के हाथ से छूटकर प्लेट में गिरा। ‘खन्न’ की आवाज़ ने पूरे कमरे में तनाव भर दिया।
कावेरी देवी ने खाना छोड़ दिया। उनका चेहरा, जो शाम को दामाद की तारीफ़ करते नहीं थक रहा था, अब गुस्से और अविश्वास से लाल हो गया। उन्होंने सुमित को नहीं, बल्कि सीधी अंजलि को घूरा।
“मुझे पता था!” कावेरी देवी चिल्लाईं। “मुझे पता था कि यह दिन आएगा। जिस दिन यह घर में आई थी, उसी दिन समझ गई थी कि यह मेरे बेटे को मुझसे दूर ले जाएगी।”
“माँ, इसमें अंजलि की कोई गलती नहीं है, यह मेरा फैसला…” सुमित ने बीच-बचाव करना चाहा।
“तू चुप कर!” कावेरी देवी ने उसे डांट दिया। “जोरू का गुलाम बन गया है तू। अरे, अभी रश्मि ने घर लिया तो मैं फूली नहीं समा रही थी, और शाम होते-होते तूने मुझे यह खबर सुना दी? तुझे शर्म नहीं आई? बुढ़ापे में अपनी माँ को अकेला छोड़कर जा रहा है?”
अंजलि ने डरते हुए कहा, “माँ जी, हम आपको छोड़कर नहीं जा रहे। वो फ्लैट तीसरी मंज़िल पर है, वहां लिफ्ट है। यहाँ आपको सीढ़ियां चढ़ने में दिक्कत होती है। हमने सोचा था कि हम सब वहां शिफ्ट हो जाएंगे, या फिर…”
“वाह!” कावेरी देवी ने ताली बजाई। “अब बहू मुझे बताएगी कि मुझे कहाँ रहना है? यह मेरा घर है, तेरे ससुर की निशानी। मैं इसे छोड़कर कहीं नहीं जाउंगी। और तुम दोनों का असल मकसद तो ‘अलग’ होना है। यह लिफ्ट और ऑफिस की दूरी तो बस बहाने हैं। साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहते कि अब बूढ़ी माँ बोझ लगने लगी है?”
सुमित ने सिर पकड़ लिया। “माँ, विवेक (दामाद) ने घर लिया तो वह ‘काबिल’ और ‘समझदार’ हो गया क्योंकि उसने अपने परिवार का भविष्य सोचा। और मैंने वही किया तो मैं ‘गद्दार’ और ‘बेटा हथियाने वाली बहू’ का शिकार हो गया? यह कैसा न्याय है?”
“जुबान लड़ाता है?” कावेरी देवी ने रोना शुरू कर दिया। “विवेक दामाद है, वह अपना घर नहीं बनाएगा तो क्या सड़क पर रहेगा? लेकिन तेरा तो बना-बनाया घर है। तुझे क्या कमी थी? बस बहू को अपनी मनमर्ज़ी चलानी है, अलग रहकर ऐश करनी है, इसलिए यह सब प्रपंच रचा है।”
अगले दो दिन घर में मातम जैसा माहौल रहा। कावेरी देवी ने खाना-पीना छोड़ दिया। उन्होंने रश्मि (बेटी) को फोन करके बुला लिया।
रश्मि आते ही बरस पड़ी। “भैया, भाभी, यह क्या सुन रही हूँ मैं? माँ रो-रोकर आधी हो गई हैं। आपको शर्म आनी चाहिए। बुढ़ापे में माँ को ऐसे दुख दे रहे हो? भाभी, मुझे तुमसे यह उम्मीद नहीं थी। तुमने तो मेरा भरा-पूरा मायका ही तोड़ दिया।”
अंजलि कोने में खड़ी आंसू बहा रही थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसने क्या गुनाह कर दिया। उसने और सुमित ने पिछले पाँच सालों से एक-एक पैसा जोड़ा था, अपनी इच्छाएं मारी थीं, ताकि एक अपना घर हो सके। लेकिन आज वह मेहनत ‘पाप’ बन गई थी।
सुमित अब तक चुप था, लेकिन रश्मि की बातें सुनकर उसका सब्र टूट गया। वह अपने कमरे में गया और एक फाइल लेकर आया।
“रश्मि,” सुमित ने वह फाइल मेज़ पर पटकी। “तूने अपना घर लिया, बहुत खुशी की बात है। विवेक बहुत अच्छा लड़का है। लेकिन जब विवेक ने घर लिया, तो क्या उसके माँ-बाप ने उसे घर से निकाला? नहीं न? वे तो गर्व से गृह-प्रवेश में आए थे। फिर मेरे साथ यह भेदभाव क्यों?”
रश्मि ने कहा, “भैया, हालात अलग हैं। उनके दो और भाई हैं माँ-बाप को संभालने के लिए। यहाँ माँ अकेली हैं।”
“अकेली?” सुमित हंसा, एक कड़वी हंसी। “रश्मि, इस फाइल को खोल कर देख।”
रश्मि ने झिझकते हुए फाइल खोली। उसमें नए फ्लैट के कागज़ात थे। लेकिन जब उसकी नज़र ‘मालिक के नाम’ (Owner’s Name) पर पड़ी, तो वह सन्न रह गई।
वहां पहले नाम पर लिखा था—**श्रीमती कावेरी देवी**।
कमरे में सन्नाटा छा गया। कावेरी देवी, जो सोफे पर मुँह फेर कर बैठी थीं, ने भी कनखियों से देखा।
“सुमित?” कावेरी देवी की आवाज़ कांपी।
सुमित की आँखों में आंसू थे। “माँ, मैंने घर ‘अपने’ लिए नहीं लिया था। मैंने ‘हमारे’ लिए लिया था। यह घर… बाबूजी का यह घर अब बहुत पुराना हो चुका है। पिछली बरसात में छत टपक रही थी। सीलन की वजह से आपको दमा हो रहा है। डॉक्टर ने कहा था कि आपको खुली हवा और धूप वाली जगह चाहिए। अंजलि ने अपने सारे गहने बेच दिए, मैंने अपना पीएफ तुड़वा लिया, ताकि एक ऐसा घर ले सकें जहाँ आपके कमरे में धूप आती हो और आपको सीढ़ियां न चढ़नी पड़ें।”
सुमित ने अंजलि का हाथ थामा। “आप कह रही थीं न कि बहू आपको ले उड़ी? माँ, अंजलि ने ही ज़िद की थी कि रजिस्ट्री आपके नाम पर हो। उसने कहा था—’माँ जी को कभी यह नहीं लगना चाहिए कि वे बेटे के घर में रह रही हैं, उन्हें लगना चाहिए कि बेटा उनके घर में रह रहा है।’ और आप… आपने बिना सोचे-समझे उसे घर तोड़ने वाली कह दिया?”
रश्मि का सिर शर्म से झुक गया। वह जिस भाभी को कोसने आई थी, उसी भाभी ने उसके मायके की इज़्ज़त और उसकी माँ का सम्मान बचाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था।
कावेरी देवी उठीं। उनके पैर कांप रहे थे। वह धीरे-धीरे अंजलि के पास आईं। अंजलि ने डरकर नज़रें झुका लीं, उसे लगा शायद अब भी कोई ताना मिलेगा।
लेकिन कावेरी देवी ने अंजलि के सिर पर हाथ रखा और फूट-फूट कर रो पड़ीं।
“मुझे माफ़ कर दे बहू। मैं… मैं स्वार्थी हो गई थी। मुझे लगा कि तू मेरे बेटे को छीन रही है। मैं भूल गई थी कि बेटा और बहू मकान बदल सकते हैं, लेकिन माँ-बाप को बदलने का ख्याल उन्हें कभी नहीं आता। मैं दामाद की ईंट-पत्थर की दौलत पर रीझ गई, और अपने घर के अनमोल रत्नों को कंकड़ समझ बैठी।”
सुमित ने माँ को संभाला। “माँ, घर दीवारों से नहीं, नीयत से बनता है। दामाद घर ले तो वो ‘सेटल’ है, और बेटा ले तो वो ‘सेप्रेट’ (अलग) है—यह सोच समाज की हो सकती है, लेकिन एक माँ की नहीं होनी चाहिए।”
रश्मि ने भी आगे बढ़कर भाभी को गले लगा लिया। “सॉरी भाभी। मैं अपनी खुशी में इतनी अंधी हो गई थी कि आपके त्याग को देख ही नहीं पाई।”
उस शाम, कावेरी देवी ने अपने हाथों से अंजलि को मिठाई खिलाई। फ्लैट वही था, कागज़ वही थे, लेकिन अब वह ‘बेटे का अलग घर’ नहीं, बल्कि ‘परिवार का नया आशियाना’ बन गया था।
समाज का यह दोहरा मापदंड उस दिन कावेरी देवी की दहलीज पर हार गया था। उन्हें समझ आ गया था कि काबिल बेटा और समझदार बहू घर तोड़ते नहीं, बल्कि पुराने घर की नींव कमज़ोर होने पर उसे नई छत देते हैं।
**लेखक की कलम से:**
दोस्तों, यह सिर्फ़ एक कहानी नहीं, हमारे समाज की हकीकत है। हम बेटी के घर को ‘महल’ और बेटे के नए प्रयास को ‘बंटवारा’ क्यों मान लेते हैं? ज़रूरी नहीं कि हर बेटा और बहू अलग होने के लिए ही घर लें, कभी-कभी वे परिवार को बेहतर ज़िंदगी देने के लिए भी यह कदम उठाते हैं। शक करने से पहले एक बार उनके नज़रिये को समझना बहुत ज़रूरी है।
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मूल लेखिका : डॉ पारुल अग्रवाल