“चुप रहो!” हेमंत बाबू ने हाथ उठाया। “मैं गलत नहीं समझ रहा। मैं साफ़ देख रहा हूँ। तुझे डर है कि तेरे गंवार रिश्तेदार, तेरे फटेहाल पिता और तेरी साधारण माँ तेरी ‘हाई प्रोफाइल’ दुनिया में धब्बा लगा देंगे? तुझे शर्म आती है न कि तेरे मामा धोती पहनते हैं? अरे, उसी मामा ने अपनी ज़मीन गिरवी रखकर तेरी एमबीए की पहली फीस भरी थी।
पुराने लोहे के बक्से से फिनाइल की गोलियों और पुराने कपड़ों की मिली-जुली महक आ रही थी। हेमंत बाबू ने कांपते हाथों से अपनी वो शेरवानी निकाली जो उन्होंने अपनी शादी में पहनी थी। जरी का काम अब काला पड़ चुका था, लेकिन कपड़े की चमक में उनकी यादें अभी भी तरोताज़ा थीं।
“सुधा, ज़रा देखना,” हेमंत बाबू ने अपनी पत्नी को आवाज़ दी। “अगर इसमें थोड़ी रफू हो जाए और ड्राई-क्लीन करवा लें, तो विकास की शादी में पहनने लायक हो जाएगी न?”
सुधा रसोई से हाथ पोंछती हुई आईं। शेरवानी देखकर उनकी आँखों में नमी और होठों पर मुस्कान एक साथ आ गई। “अजी, आप तो इसमें आज भी राजकुमार लगेंगे। और वैसे भी, बेटे की शादी है, पिता पुराने कपड़े पहने या नए, चमक तो उसकी आँखों में होती है।”
हेमंत बाबू एक रिटायर्ड स्कूल टीचर थे। जीवन भर साइकिल घिसी, ट्यूशन पढ़ाया, खुद दिवाली पर नए कपड़े नहीं लिए, ताकि इकलौता बेटा विकास कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ सके, एमबीए कर सके। आज विकास एक मल्टीनेशनल कंपनी में वी.पी. था। उसकी शादी शहर के एक बड़े उद्योगपति की बेटी, तान्या, से तय हुई थी।
तभी बाहर कार रुकने की आवाज़ आई। विकास आया था। वह आजकल अलग फ्लैट में रहता था—’प्राइवेसी’ और ‘ऑफिस के पास’ होने का हवाला देकर।
विकास अंदर आया। एसी की आदत पड़ चुकी थी, इसलिए कमरे का पंखा उसे धीमा लगा। उसने पसीना पोंछते हुए पानी का गिलास माँगा।
“विकास, देख बेटा,” हेमंत बाबू ने उत्साह से शेरवानी दिखाई। “मैं सोच रहा था कि रिसेप्शन वाले दिन यही पहन लूँ। तान्या के पिता जी ने बहुत बड़ा होटल बुक किया है, नए कपड़े सिलवाऊँगा तो दस-पंद्रह हज़ार का खर्चा आएगा। यह शेरवानी अच्छी है, बस ज़रा सी…”
विकास ने शेरवानी की तरफ एक नज़र डाली और फिर नज़रें फेर लीं। उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी।
“पापा, मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी,” विकास ने सोफे पर बैठते हुए कहा।
सुधा ने भाँप लिया कि कुछ गड़बड़ है। “क्या हुआ बेटा? तान्या को पसंद नहीं आई क्या कोई रस्म?”
“नहीं माँ, वो बात नहीं है,” विकास ने हिचकिचाते हुए कहा। “दरअसल, रिसेप्शन की गेस्ट लिस्ट फाइनल करनी थी। तान्या के डैड ने शहर के मेयर, बड़े बिजनेसमैन और अपने विदेशी क्लाइंट्स को बुलाया है। वह पार्टी बहुत… मतलब बहुत ‘हाई प्रोफाइल’ होने वाली है।”
हेमंत बाबू कुर्सी पर बैठ गए। “तो? अच्छी बात है। हमारे लिए तो गर्व की बात है।”
“हाँ पापा, लेकिन…” विकास ने थूक निगला। “मैं सोच रहा था कि हम अपनी तरफ से गेस्ट कम ही रखें। मतलब… मामा जी, बुआ जी और गाँव वाले चाचा… वो लोग वहाँ बहुत असहज महसूस करेंगे। उनको काँटे-छुरी से खाना नहीं आता, और उनकी वेशभूषा… वहां सब सूट-बूट में होंगे। वो लोग वहां ‘मिसफिट’ लगेंगे। लोग मज़ाक उड़ाएंगे तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। हेमंत बाबू की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई। सुधा ने अपने साड़ी के पल्लू को कसकर पकड़ लिया।
विकास ने अपनी बात जारी रखी, जैसे वह कोई बोझ उतार रहा हो। “और पापा, वो शेरवानी… वो बहुत पुरानी लग रही है। तान्या के डैड ने कहा था कि अगर आप बुरा न मानें तो वो आपके और माँ के लिए डिज़ाइनर कपड़े भिजवा देंगे। और… उन्होंने कहा है कि स्टेज पर आप लोग ज़्यादा देर खड़े मत रहिएगा, आपके घुटनों में दर्द रहता है न… तो बस रस्म करके वीआईपी लाउंज में बैठ जाइयेगा।”
हेमंत बाबू ने धीरे से वह पुरानी शेरवानी वापस बक्से में रख दी। उन्होंने बक्सा बंद किया। उस ‘खट’ की आवाज़ ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया।
“विकास,” हेमंत बाबू की आवाज़ बहुत धीमी थी, लेकिन उसमें एक ऐसी गूंज थी जिसने विकास को अंदर तक हिला दिया।
“बेटा, ये तो सच है कि मैं तुझसे नाराज़ हूँ। और मैं ही नहीं, दुनिया के हर माँ-बाप ऐसी औलाद से नाराज़ होंगे जिन्हें वो अपने खून-पसीने से रात-रात भर जागकर पालते हैं, अपने सपने पूरे नहीं करते, अपने सपनों को अपने बच्चों में पलता देखते हैं। और सालों के त्याग, प्यार और सपनों को उनकी औलाद कल-परसों से मिले रिश्तों की भेंट चढ़ा देते हैं बिना सही-गलत जाने।”
विकास कुछ बोलने लगा, “पापा, आप गलत समझ रहे हैं…”
“चुप रहो!” हेमंत बाबू ने हाथ उठाया। “मैं गलत नहीं समझ रहा। मैं साफ़ देख रहा हूँ। तुझे डर है कि तेरे गंवार रिश्तेदार, तेरे फटेहाल पिता और तेरी साधारण माँ तेरी ‘हाई प्रोफाइल’ दुनिया में धब्बा लगा देंगे? तुझे शर्म आती है न कि तेरे मामा धोती पहनते हैं? अरे, उसी मामा ने अपनी ज़मीन गिरवी रखकर तेरी एमबीए की पहली फीस भरी थी। तुझे शर्म आती है कि चाचा ज़ोर से बोलते हैं? उसी चाचा ने तुझे कंधे पर बैठाकर पूरा मेला घुमाया था जब मेरे पास रिक्शे के पैसे नहीं थे।”
विकास की नज़रें झुक गईं।
“और रही बात मेरी और तेरी माँ की,” हेमंत बाबू की आँखों में आंसू थे, मगर गला सख्त था। “तो सुन ले, हमें किसी डिज़ाइनर कपड़े की ज़रूरत नहीं है अपनी इज़्ज़त ढकने के लिए। मेरी इज़्ज़त मेरे कपड़ों से नहीं, मेरे संस्कारों से थी, जो शायद मैं तुझे दे नहीं पाया। तान्या के पिता अमीर होंगे, पर वो इतना नहीं जानते कि पेड़ की जड़ें अगर बदसूरत भी हों, तो उन्हें छिपाया नहीं जाता, क्योंकि उन्हीं जड़ों से पेड़ खड़ा रहता है।”
सुधा रोने लगीं। “जी, शांत हो जाइये। बच्चे की शादी है, अपशगुन मत कीजिये।”
“अपशगुन तो इसने कर दिया सुधा,” हेमंत बाबू खड़े हो गए। “इसने आज अपने वजूद का सौदा कर लिया। विकास, तू जा। अपनी शादी कर, अपना रिसेप्शन कर। हम नहीं आएंगे। हम वहीं रहेंगे जहाँ हमारी औकात है—अपने उसी पुराने घर में, अपने उसी गंवार रिश्तेदारों के साथ। हम वहां आकर तेरी चमक फीकी नहीं करेंगे।”
विकास हड़बड़ा गया। “पापा, आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? आप नहीं आएंगे तो लोग क्या कहेंगे?”
“तुझे ‘लोग क्या कहेंगे’ की चिंता है, और मुझे इस बात की चिंता है कि ‘मेरा जमीर क्या कहेगा’। जा यहाँ से।” हेमंत बाबू ने मुँह फेर लिया।
विकास को खाली हाथ लौटना पड़ा।
अगले दो दिन तक घर में मातम जैसा माहौल था। न शहनाई की बात, न हल्दी की तैयारी। हेमंत बाबू चुपचाप बालकनी में बैठे रहते।
शादी से एक दिन पहले शाम को विकास फिर आया। लेकिन इस बार वह अकेला नहीं था। उसके साथ तान्या थी। और पीछे… पीछे तान्या के पिता, मिस्टर खन्ना भी थे।
हेमंत बाबू और सुधा हैरान रह गए।
तान्या की आँखों में आंसू थे। वह सीधे आकर हेमंत बाबू के पैरों में गिर गई। “अंकल, मुझे माफ़ कर दीजिये। मुझे नहीं पता था कि विकास ने आपसे ऐसी बातें कही हैं।”
हेमंत बाबू ने उसे उठाया। “अरे बेटी, यह क्या कर रही हो?”
मिस्टर खन्ना आगे बढ़े। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “हेमंत जी, मैं शर्मिंदा हूँ। कल विकास जब मेरे घर आया, तो मैंने देखा यह बहुत उदास था। मैंने कुरेदकर पूछा तो इसने बताया कि आप नाराज़ हैं। पर जब इसने वजह बताई… तो यकीन मानिये, मुझे अपनी परवरिश पर तो गर्व हुआ, पर अपने दामाद पर शर्म आई।”
विकास सिर झुकाए खड़ा था।
मिस्टर खन्ना ने विकास की ओर कठोर नज़रों से देखा। “मैंने विकास से कहा कि जिस इंसान को अपने माँ-बाप और अपनी जड़ों पर शर्म आती हो, मैं उसे अपनी बेटी नहीं दे सकता। जो अपने बूढ़े बाप के पुराने कपड़ों का मान नहीं रख सकता, वो कल मेरी बेटी के बूढ़े होने पर उसका मान क्या रखेगा? मैंने यह रिश्ता तोड़ने का फैसला कर लिया था।”
सुधा घबरा गई। “नहीं-नहीं भाई साहब, ऐसा मत कीजिये।”
“रुकिये भाभी जी,” मिस्टर खन्ना ने कहा। “फिर तान्या ने इसे समझाया। इसे एहसास दिलाया कि वो ‘हाई प्रोफाइल’ लोग, वो विदेशी क्लाइंट्स… वो सब आज हैं, कल नहीं होंगे। लेकिन आप लोग इसकी नींव हैं। इसे अपनी गलती का अहसास है। यह यहाँ आपको शादी में बुलाने नहीं आया है, यह अपनी सजा मांगने आया है।”
विकास आगे बढ़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसने अपने पिता के पैर पकड़ लिए। “पापा, मैं बहक गया था। मुझे माफ़ कर दीजिये। मुझे लगा कि मैं बड़ा आदमी बन गया हूँ, इसलिए मुझे ‘क्लास’ मेंटेन करनी है। मैं भूल गया था कि मेरी सबसे बड़ी ‘क्लास’ आप हैं। आप वो पुरानी शेरवानी ही पहनियेगा। अगर आप नहीं गए, तो मैं यह शादी नहीं करूँगा।”
हेमंत बाबू का दिल पिघल गया। पिता का दिल आखिर कब तक पत्थर रह सकता था? उन्होंने विकास को उठाया और गले लगा लिया।
“पगले,” हेमंत बाबू ने उसकी पीठ थपथपाई। “आदमी पैसा कमाकर अमीर नहीं होता, रिश्तों को कमाकर अमीर होता है। तूने आज मुझे डरा ही दिया था कि कहीं मेरा बेटा खो न गया हो।”
तान्या मुस्कुराई। “अंकल, मैंने अपनी डिज़ाइनर साड़ी कैंसिल कर दी है। माँ जी के पास एक पुरानी बनारसी साड़ी है जो वो मुझे हमेशा दिखाना चाहती थीं। मैं फेरों में वही पहनूंगी। मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए, दिखावा नहीं।”
हेमंत बाबू ने बक्सा फिर से खोला। शेरवानी निकाली। “सुधा, लो। इसे प्रेस कर दो। मेरा बेटा बारात लेकर जाएगा, तो उसका बाप किसी राजा से कम नहीं लगना चाहिए।”
शादी के दिन, रिसेप्शन के भव्य हॉल में, जब हेमंत बाबू अपनी पुरानी, थोड़ी फीकी पड़ चुकी शेरवानी में स्टेज पर चढ़े, तो उनके बगल में खड़ा विकास, जिसने लाखों का सूट पहना था, दुनिया को फीका लग रहा था। विकास ने माइक लिया और सबके सामने कहा,
“आज मैं जो कुछ भी हूँ, अपने पिता के संघर्ष की वजह से हूँ। यह शेरवानी पुरानी ज़रूर है, लेकिन इसका हर धागा मेरे पिता की मेहनत और ईमानदारी से बुना गया है। मेरे लिए यह दुनिया का सबसे महंगा लिबास है।”
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। हेमंत बाबू की आँखों से आंसू छलक आए, लेकिन ये आंसू शिकायत के नहीं, गर्व के थे। उन्हें अपना बेटा वापस मिल गया था—वही बेटा, जिसे उन्होंने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था।
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लेखिका :रमा मिश्रा