आज जब लिखने बैठी, तो अपने साथ हुई घटना याद आ गई, और अपनी कहानी को उसी सांचे में ले गई। मेरी ननद, जिन्हें मैं अपनी मां के बाद उन्हीं को स्थान देती थी, अगर मेरे से कोई गलती होती तो वही समझा देती थी। और मुझे ही क्यों, परिवार के हर सदस्य को जोड़कर रखती थी। घर की किसी भी काम में आती थी, तो ऐसा लगता था कि सब आ गए। घर में अलग ही रौनक आ जाती थी। पूरे गांव में उनको सब बहुत मानते थे और उनका सम्मान करते थे।
उनके घुटनों में बहुत दर्द रहता था, फिर भी मेरी सास के मना करने पर भी पूरे गांव में घूम आती थी। दीदी का दिल्ली में एक अपना आलीशान घर है। भगवान ने किसी चीज़ की कमी नहीं दे रखी थी। दो आज्ञाकारी बच्चे हैं। बेटी शादीशुदा है, जो विदेश में रहती है। साथ में पति, बेटा, बहू और दो पोते, जो अपनी दादी को बहुत प्यार करते थे।
दीदी दिल्ली जाने के बाद भी गांव के हर आदमी की खबर रखती थी, जो कि उनकी आदत थी। हम लोग गांव में रहकर भी अनजान रहते थे, लेकिन उन्हें हर बात की खबर हो जाती थी। अगर परिवार में हम लोगों को किसी से अनबन होती थी, तो चुप रहने के लिए बोलती थी। बोलती थी, परिवार बचाने के लिए किसी को तो चुप रहना होगा। घर जोड़ने में समय लगता है, तोड़ने में नहीं। जब तक हो सके, तो परिवार जोड़कर रखो।
दीदी को भी अगर किसी के बात की तकलीफ होती थी, तो वह अपने तक ही रखती थी। पति या बच्चों को किसी को नहीं बताती थी कि कहीं उन्हें बताने से रिश्ता ना टूट जाए। मिला-जुला कर कह सकते हैं, घर से बाहर तक का रिश्ता उन्होंने बहुत अच्छे से संभाल रखा था। दीदी के परिवार के लोग सब उन्हीं पर निश्चित रहते थे, क्योंकि उन्होंने हर रिश्ता संभाल रखा था।
दीदी को खाना बनाने का बहुत शौक था और खिलाने का भी। वह हमेशा सबकी पसंद का खाना बनाती रहती थी। बहू को तो किचन में जाने नहीं देती थी। बोलती थी, मेरे जाने के बाद याद तो करेगी कि सास ने कभी किचन में नहीं आने दिया। बिना किसी टेंशन के, बड़े ही प्यार से सबका खाना बनाती थी।
उनका पोता सब बड़ा हो गया था। घर के अंदर आते ही पूछते थे, मां आज क्या बनाई है। दादी को मां कहकर बुलाते थे। दीदी बोलती, जो तुम लोग खाओगे, वही बनाई हूं। बच्चे बोलते, मां अगर तुम कहीं चली जाओगी तो हम लोगों के पसंद का कौन बनाएगा। जवाब में दीदी बोलती, इतनी जल्दी जाने वाली नहीं हूं। बहू को देखकर ही जाऊंगी।
फिर अचानक कैसे चली गई। सुबह-सुबह रोज उनका फोन आता था। पूरे दिन का हाल-चाल कहती। उस दिन भी उनका फोन आया और बातों-बातों में मैंने उन्हें अपने गांव में लगातार कुछ लोगों की मौत के बारे में बताया। लेकिन उनकी उम्र हो गई थी, वह लोग बहुत दिन से बीमार थे। तो बोली, वह तो ठीक है चले गए। हम लोगों को भगवान चलते-फिरते ले जाते तो अच्छा था।
जवाब में मैंने कहा, यह सब बात अभी आप मत बोलो दीदी। अभी आपको बहुत कुछ देखना है। हंस के जवाब देती, तुम लोगों के हिसाब से तो मैं हमेशा ही जिंदा रहूं।
दीदी अपने अंदर की तकलीफ हमेशा अपने अंदर ही रखती थी। किसी को नहीं बताती थी। यह उनमें गुण कहिए या अपगुण। दीदी को बीपी की शिकायत भी रहती थी। वह उसकी दवाई हमेशा खाती थी। गैस की भी परेशानी थी।
उस दिन मंगलवार था। ठंड भी बहुत ज्यादा थी। दीदी ने उस दिन जीजा जी के लिए नाश्ता बनाया और बोली, तैयार हो गए क्या, टाइम हो गया है। जीजा जी ने जवाब दिया, आज नहीं जाऊंगा, आज बहुत ठंड है।
तब दीदी मेरे से ही बात कर रही थी। मैंने पूछा, क्या हुआ दीदी। दीदी जीजा जी पर गुस्सा आते हुए बोली, देखो ना मैंने नाश्ता बना दिया है और फिर बोल रहे हैं कि नहीं जाऊंगा, आज ठंड ज्यादा है। मैंने कहा, आप मत जाने दो। उनकी भी तबीयत ठीक नहीं रहती है।
दीदी फिर भी गुस्सा हो रही थी। लेकिन जीजा जी ने हंस के फिर कहा, आज भी नहीं जाऊंगा और कल भी नहीं जाऊंगा। कहकर जोर-जोर से हंसने लगे। दीदी जीजा जी पर और भी गुस्सा होकर बोल रही थी। यह नोक-झोंक उन लोगों का रोज का था। सुनके और देखकर भी अच्छा लगता था।
दोपहर होते दीदी के सीने में थोड़ा-थोड़ा दर्द होने लगा। वह अपना सोच रही थी, शायद गैस का दर्द होगा। लेकिन यह दर्द उनको बराबर ही हो रहा था। उन्होंने एक गैस की दवाई ले ली, फिर भी उन्हें आराम नहीं हुआ। थोड़ी देर के बाद जीजा जी ने उन्हें एक गिलास ग्लूकोज पिला दिया, फिर भी आराम नहीं हुआ।
शाम होने पर उन्होंने फिर गैस की दवाई खाली। तभी बहू आई, पूछा क्या हुआ। तो दीदी ने बताया, आज दिन से ही थोड़ा-थोड़ा दर्द हो रहा है। वह बोली, चलिए डॉक्टर के पास ले चलते हैं। दीदी ने कहा, नहीं आज व्रत है, गैस बन गया होगा, इसीलिए दर्द हो रहा है। आज तुम जाकर खाना बना लो। और बहू खाना बनाने चली गई।
तभी पोता आया, बोला मां आज तुम खाना नहीं बना रही हो, क्यों, क्या हुआ है, तबीयत ठीक है क्या। दीदी ने कहा, नहीं थोड़ा गैस का दर्द हो रहा है। पोता बोला, अगर तुम खाना नहीं बना रही हो, इसका मतलब तुम्हारी तबीयत ज्यादा खराब है। चलो डॉक्टर के पास हम लोग ले जाते हैं।
लेकिन दीदी जिद पर अड़ी हुई थी कि नहीं, अगर आज ठीक नहीं हुआ तो कल जरूर जाऊंगी। सब वहीं पर बैठकर बात करने लगे। तभी दीदी उठी, लेकिन उठ नहीं पाई। वहीं बिस्तर पर गिर गई। सब ने देखा तो सब चौंक गए। हुआ शायद बेहोश हो गई है। सब ने पानी डाला, लेकिन होश नहीं आया।
जल्दी-जल्दी से सब उन्हें उठाकर अस्पताल ले गए। लेकिन डॉक्टर उन्हें नहीं बचा पाए। वह जाते ही खत्म हो गई थी। सब बक होकर देख रहे थे। सबको जैसे शॉक लग गया था।
उनकी तकलीफ का किसी को एहसास नहीं हुआ। यही सोच कर उनके परिवार के लोग खुद को अपराधबोध समझ रहे थे कि अगर हमने उनकी बात नहीं मानी होती और दिन में ही डॉक्टर के पास ले जाते तो शायद बच सकती थी। क्योंकि उन्हें अटैक हुआ था और दर्द उन्हें दिन से ही लगातार हो रहा था।
लेकिन उनके जाने का समय हो गया था। सही यही था। क्योंकि इस बार जब वह गांव गई तो हर किसी के घर जाकर मिली थी। और जिनसे उनका मनमुटाव था, उनके साथ भी गिले-शिकवे दूर करके आई थी। इतना ही नहीं, मेरे मायके जो अभी तक नहीं गई थी, वह भी मेरे पापा से मिलने मेरे गांव चली गई थी।
मेरी जेठानी के पापा भी बीमार रहते थे। उनको भी उनके घर जाकर देख आई। लगता था जैसे जो काम उनका इस धरती पर बाकी था, वह सब करने आई थी। और हर अपना काम समाप्त करके जाना चाहती थी। अपने दिल पर किसी तरह का बोझ लेकर नहीं जाना चाहती थी।
लेकिन फिर भी परिवार के मन में एक अपराधबोध रह गया। यह उनको हमेशा रहेगा कि शायद अगर उन्हें समय पर डॉक्टर के पास ले जाते तो बच जाती।
“उनके जाने के बाद भी घर की हर आहट में उनकी यादें गूंजती रहीं, और परिवार के दिलों में वह अपराधबोध हमेशा चुपचाप बैठा रहा—जैसे कोई अधूरा वादा, जो कभी पूरा न हो सका।”
लेखिका बबीता झा