ज्यों ज्यों चौदह फरवरी का दिन पास आ रहा था महक मन ही मन और भी महकती जा रही थी। सादा लिबास पहनने वाली को अब कुछ सजना संवरना भी आ गया था। कालिज की पढ़ाई का आखरी साल था।पांच साल पहले गांव से पढ़ने के लिए शहर आना जैसे सपने जैसा था।
अच्छे खाते पीते किसान परिवार की लड़की ने जब गांव के सरकारी स्कूल में हर बार बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए तो स्कूल के प्रिंसिपल ने महक के पापा को सलाह दी कि उनकी बेटी अत्यतं होनहार है, विशेषतौर पर मैथ्स में, तो उसे आगे पढने के लिए शहर के कालिज में जाना चाहिए। परिवार थोड़ा रूढ़िवादी था
मगर पढ़ाई के महत्व को तो जानते ही थे, और फिर आर्थिक समस्या भी नहीं थी। दो भाईयों की इकलौती बहन थी महक लेकिन परिवार में चाचा, ताया के इलावा दूर पास के और भी रिश्तेदार थे। इस परिवार की लड़कियां तो क्या लड़के भी दस बारह जमात तक ही पढ़े थे। अपने काम काज ही बहुत थे।
थोड़ी बाधाएं तो आई मगर महक को पढ़ने का सुअवसर मिल ही गया। पढ़ाई सिरफ किताबों का ज्ञाण ही नहीं होता इससे तो इन्सान का व्यक्तित्व, विचार, आचार व्यवहार ,
रहन सहन ही बदल जाता है, अगर सही दिशा मिल जाए।वहां महक की बहुत सी सहेलिंया अजीब से कपड़े पहन तितलियां बन घूमती, पढ़ाई की और कम ही ध्यान रहता उनका। लेकिन एक तो कुछ कर दिखाने की तमन्ना, दूसरा परिवार का डर, इज्जत का ध्यान , तो महक इन सब से दूर अपनी पढ़ाई में ही डूबी रहती।
कभी कभार दोस्तों संग बाहर जाती लेकिन अपनी हद में रहकर। किसी लड़के से उसकी कोई दोस्ती नहीं थी। बातचीत होती लेकिन काम की। उसकी रूममेट अक्षरा का स्वभाव बिल्कुल उसके विपरीत। उसका कहना था कि यही तो दिन है ऐश करने के। शादी के बाद तो गृहस्थी ही संभालनी है।
लेकिन पिछले प्रोग्राम में मुकुल जो कि दूसरे कालिज से आया था किसी डिबेट के सिलसिले में, जब वो स्टेज पर बोल रहा था तो वो बिना पलक झपकाए वो उसकी और देखती रही और जब उसकी बारी आई तो उसकी हिम्मत जवाब दे गई लेकिन किसी तरह उसने अपना पैपर पढ़ा। दोनों के लिए खूब तालियां बजी।
प्रोग्राम के बाद मुकुल ने उसे कहा कि वो अपना पैपर उसे मेल कर दे तो फोन नं एक्चेजं हुए।महक की मेल के जवाब में मुकुल ने अपना पैपर मेल कर दिया। शायद दोनों को ही एक दूसरे का साथ भाने लगा था। महक न चाहते हुए भी उसकी और खिंची चली जाती। वो जान चुकी थी कि मुकुल बहुत ही होनहार है और इसी साल उसे सी. ए. की डिग्री मिल जाएगी। इस बात को छह- सात महीने ही हुए थे।
उसे शहर आ कर पहली बार पता चला कि चौदह फरवरी को वेलेंटाईन डे ‘ प्यार का दिन’ कह कर मनाया जाता है, सिर्फ एक दिन नहीं कई दिन, कभी रोज डे तो कभी प्रपोज डे, तो कभी चाकलेट डे , और भी कई दिन , पूरा हफ्ता ही यह सब चलता रहता है।
पहले पहल तो वह हैरान होती थी, फिर उसे यह सब ढ़कोसला लगता। लेकिन इस बार उसका जी चाह रहा था कि मुकुल अगर उसे चाहता है तो अपने प्यार का इजहार करे, इससे बढ़िया मौका और क्या हो सकता है।
पिछले साल उसकी सहेलियां तोहफे में मिले मंहगे मंहगे गिफ्ट दिखा रही थी, और साथ में मजाक भी उड़ा रही थी। पता नहीं कोई सीरियस थी या फिर शुगल मेला ,
लेकिन महक के दिल में मुकुल के प्रति सच्चा प्यार था। वो ये भी जानती थी कि उसके घर वाले उसका विरोध करेगें, पता नहीं उसके प्यार को मंजिल नसीब होगी या नहीं, क्योंकि जाति ही नहीं चांदी की दीवार भी उसे साफ नजर आ रही थी।
उसे किसी फिल्म का ये डायलाग याद आया कि किसी को दिल से चाहो तो सारी कायनात उसकी मदद में लग जाती है। फरवरी का दूसरा हफ्ता , हर साल की तरह वेलंटाईन डे की चहल पहल। महक कैंटीन में बैठी थी अकेली एक कोने में, नजरे किताब पर, परतुं दिल कहीं और। आसपास सब लड़के लड़कियां चुहलबाजी में व्यस्त।
सब जानते थे महक पढ़ाकू ‘ बहन जी’ को। किसी का ध्यान उसकी तरफ नहीं था। वह उदास सी चुपचाप उठी और बाहर लान में जाकर बैठ गई। बहुत कम विद्यार्थी थे वहां। तभी मुकुल दिखा जो कि वैसे उसके कालिज का नहीं था। झिझकता हुआ उसके पास आकर बैठ गया और पढ़ाई की बातें करने लगा। महक बिल्कुल दिलचस्पी नहीं ले रही थी, मगर मजबूरी में हूं हां करनी पड़ती थी।
वो बहाना बना कर उठने का सोच रही थी कि मुकुल ने कहीं छुपाया हुआ पीला गुलाब उसे पेश किया, महक को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे, पीला गुलाब यानि दोस्ती, उसने चुपचाप पकड़ लिया,
तुरंत मुकुल ने कोट के बीच से खूबसूरत लाल गुलाब एक छोटे से पैकेट पर लगा हुआ पेश किया। महक की मन की खुशी छुपाए नहीं छुप रही थी, लेकिन वो कुछ नहीं बोली और थैंक्स कह कर चल दी। खामोशी ही जुबान बन चुकी थी।
होस्टल के कमरे में जाकर उसने पैकेट खोला तो उसमें ब्रैसलेट था जो कि नकली मोतियों का लेकिन बहुत सुंदर जिसके बीचों बीच दिल का आकार बना हुआ था। साथ में रंगीन कागज पर लिखी चार लाईने” मैं तुम्हारे बराबर नहीं, लेकिन जिंदगी भर के लिए तुम्हारा साथ मिल जाए तो कुछ कर दिखाने की तमन्ना रखता हूं”।
महक के दिल में फूल खिल गए। कीमत उपहार की नहीं, नीयत की होती है। आज इस बात को दस साल हो गए, मुशकिलें बहुत आई लेकिन मजिंल मिल ही गई।अपनी मेहनत और लगन से आज जिंदगी की हर खुशी उनके पास है। वेलेंटाईन डे महक और मुकुल अपनी प्यारी बेटी मानवी के साथ उँटी जा कर मनाने की तैयारी में लगे हुए थे।
विमला गुगलानी
चंडीगढ़
विषय- उपहार की कीमत नहीं, नियत देखी जाती है।