आख़िर उसके सब्र का बांध टूट ही गया – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

सुबह के छह बजते ही ‘शांति-निवास’ में घंटी की नहीं, बल्कि सावित्री देवी के नाम की गूंज शुरू हो जाती थी। सत्तर वर्षीय दीनदयाल जी की चाय से लेकर, पोते चिंटू के स्कूल के मोज़े तक,

सब कुछ सावित्री के हाथों से होकर ही गुजरता था। वह इस घर की वो नींव थीं जो ज़मीन के नीचे दबी रहती है, दिखाई नहीं देती, लेकिन पूरी इमारत का बोझ अपने कंधों पर उठाए रखती है।

सावित्री का जीवन एक शांत नदी की तरह था, जो सबके किनारों को भिगोती थी, सबकी प्यास बुझाती थी, लेकिन खुद कहाँ से आ रही है और कहाँ जा रही है, इसकी परवाह किसी को नहीं थी।

पति दीनदयाल जी पुराने उसूलों वाले सख्त इंसान थे। बड़ा बेटा, राजीव, अपनी कॉर्पोरेट दुनिया में इतना व्यस्त था कि उसे घर एक होटल जैसा लगता था। छोटी बहू, निमिषा, आधुनिक ख्यालात की थी, जो अक्सर अपनी सास के ‘पुराने तरीकों’ से चिढ़ जाती थी। और छोटा बेटा, सुमित, जो अभी भी अपनी ज़िम्मेदारियों से भागता फिरता था।

इन सबके बीच सामंजस्य बिठाने का काम सावित्री का था। अगर सुमित रात को देर से आता, तो सावित्री चुपके से दरवाजा खोल देती ताकि दीनदयाल जी का गुस्सा न भड़के।

अगर निमिषा से सब्जी में नमक तेज हो जाता, तो सावित्री चुपचाप उसमें आटे की लोई डालकर ठीक कर देती ताकि राजीव खाने की मेज पर हंगामा न करे। वह सबकी गलतियों पर पर्दा डालती, टूटे हुए तारों को जोड़ती और घर का सुर बिगड़ने नहीं देती थी।

लेकिन उस दिन कुछ अलग हुआ।

रविवार की सुबह थी। डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगा था।

“माँ! आपने मेरी ब्लू शर्ट लॉन्ड्री में नहीं दी? आज मुझे क्लाइंट मीटिंग के लिए जाना था!” राजीव चिल्लाया।

“सावित्री! मेरी बी.पी. की गोली कहाँ है? तुम चीज़ें रखकर भूलने लगी हो,” दीनदयाल जी ने अखबार पटकते हुए कहा।

“मम्मी जी, चिंटू का टिफिन अभी तक पैक नहीं हुआ? मुझे भी पार्लर जाना है, देर हो रही है,” निमिषा ने रसोई में झांककर झुंझलाहट जताई।

“माँ, मेरे दोस्तों के साथ ट्रिप के लिए पैसे चाहिए थे, आपने पापा से बात की?” सुमित ने भी अपनी मांग रख दी।

रसोई में खड़ी सावित्री के हाथ रुक गए। गैस पर चढ़ा दूध उफन कर बाहर गिर गया, ठीक वैसे ही जैसे आज उसके सब्र का बांध टूट गया था। उसने गैस बंद की। पल्लू से माथे का पसीना पोंछा और बाहर आई।

उसने देखा कि डाइनिंग टेबल पर सब अपनी-अपनी शिकायतों का पुलिंदा लिए बैठे हैं। किसी ने यह नहीं पूछा कि “माँ, आज आपकी तबीयत कैसी है?” जबकि कल रात से उसे हल्का बुखार था।

सावित्री चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठ गई। उसने पानी का घूंट भरा और बहुत ही शांत स्वर में कहा, “मैं कल दस दिनों के लिए हरिद्वार जा रही हूँ। मेरी बचपन की सहेली का आश्रम है वहां। बहुत दिनों से बुला रही है।”

सन्नाटा छा गया। चम्मचों की खनखनाहट रुक गई।

“क्या?” दीनदयाल जी ने चश्मा ठीक किया। “अचानक? और घर कौन देखेगा?”

“तुम लोग,” सावित्री ने सपाट लहजे में कहा। “सब समझदार हो, बड़े हो गए हो। दस दिन की तो बात है।”

राजीव हंसा, “अरे माँ, आप भी न। कोई ज़रूरत नहीं है जाने की। हम आपको यहीं किसी रिसॉर्ट में भेज देते हैं दिन भर के लिए। हरिद्वार जाकर क्या करेंगी?”

“टिकट हो गया है। और मैं जा रही हूँ,” सावित्री ने फैसला सुना दिया। यह उसके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत था। वह तो कभी बिना पूछे बाजार भी नहीं जाती थी।

अगले दिन सुबह, सावित्री अपना छोटा सा बैग लेकर निकल गई। घर वालों को लगा कि शायद माँ को थोड़ा ‘ब्रेक’ चाहिए, दो दिन में फोन करके रोएंगी और वापस आ जाएंगी। उन्हें क्या पता था कि यह ‘ब्रेक’ उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा ‘टेस्ट’ बनने वाला था।

पहला दिन तो जैसे-तैसे निकल गया। पुराना बचा हुआ खाना था, काम चल गया। असली तांडव दूसरे दिन शुरू हुआ।

सुबह दीनदयाल जी नहाकर निकले तो तौलिया नहीं मिला। वे गीले बदन ही चिल्लाते रहे, “बहू! सुमित! तौलिया कहाँ है?”

निमिषा रसोई में थी, जहाँ उसे समझ नहीं आ रहा था कि चाय पहले चढ़ाए या चिंटू का दूध। उसी हड़बड़ी में उसने चीनी की जगह नमक डाल दिया। राजीव ने जैसे ही चाय की चुस्की ली, उसने कप बेसिन में थूक दिया।

“यह क्या है निमिषा? तुम्हें चाय बनानी नहीं आती?”

“राजीव, चिल्लाओ मत! मैं अकेली क्या-क्या करूँ? मम्मी जी पता नहीं कैसे मैनेज करती थीं,” निमिषा भी रोने जैसी हो गई।

तीसरे दिन तक घर ‘शांति-निवास’ से ‘युद्ध-निवास’ बन चुका था।

सुमित रात को देर से लौटा। उसके पास चाबी नहीं थी। उसने बेल बजाई। दीनदयाल जी की नींद खुल गई। उन्होंने दरवाजा खोला और सुमित को शराब के नशे में देखकर उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया।

“यह तमाशा है तुम्हारा? रोज़ यही करते हो?” दीनदयाल जी चिल्लाए।

“पापा, मैं तो रोज़ इसी समय आता हूँ,” सुमित की जुबान फिसल गई। “माँ दरवाज़ा खोल देती थीं।”

“क्या?” दीनदयाल जी को झटका लगा। “इसका मतलब तुम्हारी माँ तुम्हारे पापों पर पर्दा डाल रही थी इतने सालों से?”

उस रात बाप-बेटे में जमकर झगड़ा हुआ। राजीव बीच-बचाव करने आया तो उसे भी खरी-खोटी सुननी पड़ी। निमिषा अपने कमरे में कान बंद करके बैठी रही। वह घर, जो सावित्री की मौजूदगी में एक सुर में बजता था, अब बेसुरा हो चुका था। हर कोई एक-दूसरे की गलती निकाल रहा था।

पांचवें दिन, नौकरानी ने काम छोड़ दिया क्योंकि उसे निर्देश देने वाला कोई नहीं था। घर में धूल की परतें जमने लगीं। कपड़ों का ढेर लग गया। बाहर का खाना खा-खाकर सबका पेट खराब हो चुका था।

शाम को बिजली चली गई। इन्वर्टर काम नहीं कर रहा था। पूरा परिवार मोमबत्ती जलाकर ड्राइंग रूम में बैठा था। उनके चेहरे पर थकान, हताशा और गुस्सा साफ दिख रहा था।

“यह इन्वर्टर क्यों नहीं चल रहा?” दीनदयाल जी ने पूछा।

“पापा, इसमें पानी डालना पड़ता है,” राजीव ने सिर पकड़ते हुए कहा। “माँ हमेशा याद दिलाती थीं मैकेनिक को बुलाने के लिए। मुझे याद नहीं रहा।”

अंधेरे में बैठे हुए, अचानक सुमित बोला, “मुझे भूख लगी है।”

“ब्रेड रखी है, खा लो,” निमिषा ने चिढ़कर कहा। “मुझसे अब और नहीं होगा।”

तभी दीनदयाल जी की नज़र सामने दीवार पर लगी सावित्री की तस्वीर पर पड़ी (जो उनकी शादी की तस्वीर थी)। उन्हें याद आया कि परसों उन्होंने अपनी दवा नहीं ली थी, और कल रात उन्हें घबराहट हो रही थी। सावित्री होती तो उनका सिर दबाती, हल्दी वाला दूध देती।

“हम सब अपाहिज हैं,” दीनदयाल जी ने धीमे स्वर में कहा।

“क्या?” राजीव ने पूछा।

“हाँ, हम सब अपाहिज हैं,” दीनदयाल जी की आवाज़ भारी हो गई। “सावित्री कोई जादूगरनी नहीं थी, लेकिन वह हम सबकी कमियों को अपने आंचल में समेट लेती थी। सुमित, तुम्हारी लापरवाही… राजीव, तुम्हारा अहंकार… निमिषा, तुम्हारा आलस्य… और मेरा गुस्सा। वह सब कुछ पी जाती थी ताकि हम एक-दूसरे से न टकराएं। वह दीवार थी हमारे बीच, जो हमें एक-दूसरे की कड़वाहट से बचाती थी। उसके हटते ही हम सब बिखर गए।”

राजीव की आँखों में आंसू आ गए। उसे अपनी मीटिंग याद आई जो उसकी शर्ट की वजह से खराब नहीं हुई थी, बल्कि इसलिए खराब हुई थी क्योंकि उसका दिमाग घर की उलझनों में फंसा था। उसे एहसास हुआ कि उसकी सफलता के पीछे उसकी माँ का कितना बड़ा हाथ था, जो उसे घर की हर छोटी-बड़ी टेंशन से मुक्त रखती थीं।

निमिषा सिसकने लगी। “पापा जी, मैंने कभी मम्मी जी को थैंक यू भी नहीं बोला। मुझे लगता था कि घर संभालना कौन सी बड़ी बात है। आज पता चला कि यह सबसे मुश्किल काम है।”

सातवें दिन सावित्री का फोन आया। लैंडलाइन की घंटी बजी तो चारों दौड़ पड़े।

“हेलो? सावित्री?” दीनदयाल जी की आवाज़ कांप रही थी।

“हाँ, कैसी चल रही है गृहस्थी?” सावित्री की आवाज़ शांत थी।

“सावित्री… वापस आ जाओ,” दीनदयाल जी रुआंसे हो गए। “घर… घर नहीं रहा। चिड़ियाघर बन गया है।”

“अभी तो तीन दिन बाकी हैं,” सावित्री ने कहा।

“नहीं माँ, प्लीज आ जाओ,” सुमित पीछे से चिल्लाया। “मैं कसम खाता हूँ, अब कभी देर से नहीं आऊंगा।”

“माँ, हम आपको लेने आ रहे हैं,” राजीव ने कहा।

सावित्री जब दसवें दिन वापस लौटी, तो उसे घर का नज़ारा बदला हुआ मिला।

घर अभी भी थोड़ा बिखरा हुआ था, लेकिन हवा में तनाव नहीं था।

दरवाज़ा राजीव ने खोला। उसने सबसे पहले माँ के पैर छुए और बैग अपने हाथ में लिया।

अंदर निमिषा चाय लेकर आई। “मम्मी जी, चीनी कम है, आप चेक कर लीजिये।”

दीनदयाल जी अपनी दवाइयां खुद निकालकर बैठे थे।

सावित्री सोफे पर बैठी। सब उसे ऐसे देख रहे थे जैसे कोई जंग जीतकर लौटा हो।

“नाराज़ हो?” सावित्री ने मुस्कुराते हुए पूछा। “मैंने तुम लोगों को मुसीबत में छोड़ दिया।”

दीनदयाल जी ने सावित्री का हाथ अपने हाथों में लिया। “नहीं सावित्री। तुमने हमें मुसीबत में नहीं छोड़ा, तुमने हमें आईना दिखाया। अगर तुम नहीं जाती, तो हमें कभी पता नहीं चलता कि हम एक ‘परिवार’ की तरह नहीं, बल्कि एक ‘धर्मशाला’ के यात्रियों की तरह रह रहे थे, जिसका सारा बोझ सिर्फ़ एक मैनेजर पर था।”

राजीव ने कहा, “माँ, हमने एक फैसला किया है। अब से घर का काम बंटेगा। और रविवार… रविवार आपकी छुट्टी रहेगी। पूरी तरह छुट्टी।”

निमिषा ने आगे बढ़कर सास को गले लगा लिया। “मम्मी जी, आपने सही कहा था। हम सब बड़े तो हो गए थे, पर समझदार नहीं हुए थे। आपकी अनुपस्थिति ने हमें वह सिखा दिया जो आपकी मौजूदगी कभी नहीं सिखा पाती।”

सावित्री की आँखों में संतोष के आंसू थे। उसने जो मौन व्रत साधा था, जो दूरी बनाई थी, उसने वो काम कर दिया था जो सालों की बहस और समझाना नहीं कर पाया था।

उस शाम ‘शांति-निवास’ में फिर से चाय बनी। लेकिन इस बार चाय सावित्री ने नहीं, सुमित ने बनाई थी। चाय थोड़ी फीकी थी, अदरक ज़्यादा था, लेकिन सावित्री को वह दुनिया की सबसे बेहतरीन चाय लगी। क्योंकि उस प्याले में सिर्फ़ चायपत्ती और पानी नहीं था, उसमें उसके परिवार का ‘एहसास’ और ‘सम्मान’ घुला हुआ था।

रिश्ते सिर्फ़ खून से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की कद्र करने से बनते हैं। और कभी-कभी किसी की अहमियत समझने के लिए, उसके खालीपन को महसूस करना बेहद ज़रूरी होता है। उस दस दिन की दूरी ने उन दिलों को जोड़ दिया था जो एक छत के नीचे रहकर भी मीलों दूर थे।

लेखिका : डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

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