मखमली पिंजरा – रश्मि प्रकाश 

“प्रीति, बेटा… अरे वाह! आज तो तुम बहुत सुंदर लग रही हो। कहाँ की तैयारी है?” वंदना जी ने अपनी बहू के कमरे में प्रवेश करते हुए बड़े उत्साह से पूछा। उनके हाथ में गरमा-गरम अदरक वाली चाय का प्याला था।

प्रीति ने कानों में झुमके पहनते हुए आईने में देखा और फीकी मुस्कान के साथ जवाब दिया, “मम्मी जी, आज मेरे कॉलेज के पुराने दोस्तों का रीयूनियन है। बहुत दिनों बाद सब मिल रहे हैं। हम लोग ‘ब्लू डायमंड’ रेस्टोरेंट में लंच के लिए जा रहे हैं।”

“अरे वाह! कॉलेज फ्रेंड्स? यह तो बहुत अच्छी बात है,” वंदना जी की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और बोलीं, “रुको, मैं भी तैयार होकर आती हूँ। वैसे भी घर में अकेले बोर हो रही थी। तुम्हारे दोस्तों से मिलूंगी तो मेरा भी मन बहल जाएगा। और तुम्हें पता है न, मैं मॉडर्न ख्यालात की हूँ, तुम्हारे दोस्तों के साथ खूब जमेगी मेरी।”

प्रीति का हाथ हवा में ही रुक गया। झुमका आधा पहना हुआ था। उसने बेबसी से अपने पति, रोहन की तरफ देखा, जो बिस्तर पर लेटा मोबाइल में गेम खेल रहा था। रोहन ने प्रीति की नज़रें भांप लीं, लेकिन कंधे उचका कर दोबारा गेम में लग गया। यह रोज़ की कहानी थी। वंदना जी, प्रीति की सास कम और ‘साया’ ज्यादा बन गई थीं।

प्रीति ने हिम्मत जुटाई, “मम्मी जी, वो… सब हमउम्र लोग होंगे। पुरानी बातें करेंगे, हंसी-मज़ाक करेंगे। आप बोर हो जाएंगी वहां।”

“अरे, मैं क्यों बोर होऊंगी?” वंदना जी ने हंसते हुए कहा। “मैं तो खुद को अभी भी पच्चीस साल का मानती हूँ। और फिर, बहू अकेली जाए तो मुझे अच्छा नहीं लगता। मेरी सासू माँ तो मुझे कभी बाहर नहीं जाने देती थीं, लेकिन मैं वैसी नहीं हूँ। मैं तो अपनी बहू की सहेली बनकर रहना चाहती हूँ। बस दस मिनट दो, मैं अपनी वो बनारसी साड़ी पहनकर आती हूँ।”

वंदना जी गुनगुनाते हुए अपने कमरे की तरफ चली गईं। प्रीति धम्म से कुर्सी पर बैठ गई।

“रोहन, प्लीज कुछ कहिये न मम्मी जी को,” प्रीति ने रुआंसे होकर कहा। “पिछली बार जब मैं अपनी कलीग्स के साथ शॉपिंग पर गई थी, तब भी मम्मी जी साथ हो ली थीं। मेरी सहेलियां खुलकर बात भी नहीं कर पातीं। मम्मी जी वहां बैठकर अपने ज़माने की बातें और घरेलू नुस्खे बताने लगती हैं। सब अजीब महसूस करते हैं।”

रोहन ने फ़ोन रखा और समझाया, “यार प्रीति, माँ तुमसे प्यार करती हैं। उन्हें लगता है कि वो तुम्हें कंपनी दे रही हैं। पापा के जाने के बाद वो अकेली हो गई हैं। अगर मैं मना करूँगा तो उन्हें लगेगा कि हम उन्हें बोझ समझ रहे हैं। एडजस्ट कर लो न।”

प्रीति चुप हो गई। ‘एडजस्ट’—शादी के बाद इस एक शब्द ने उसकी निजी ज़िंदगी को निगल लिया था। वंदना जी बुरी नहीं थीं, समस्या यही थी कि वो ‘बहुत ज़्यादा अच्छी’ बनने की कोशिश कर रही थीं। वो प्रीति को एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ती थीं। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, यहाँ तक कि अगर प्रीति अपनी माँ से फ़ोन पर बात करे, तो वंदना जी पास आकर बैठ जातीं और इशारों में पूछतीं—”समधन जी क्या कह रही हैं?”

प्रेम जब बंधन बन जाए, तो दम घुटने लगता है। और प्रीति का दम घुट रहा था।

खैर, उस दिन लंच पर वही हुआ जिसका डर था। वंदना जी प्रीति के दोस्तों के बीच बैठ गईं। जहाँ प्रीति के दोस्त अपनी नौकरी, बॉस की बुराई या कॉलेज के क्रश की बातें करना चाहते थे, वहां वंदना जी ने प्रवचन शुरू कर दिया—”आजकल के बच्चे स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखते,” “हमारे ज़माने में दोस्ती ऐसी नहीं होती थी,” और “प्रीति तो घर में बहुत अच्छा खाना बनाती है।”

नतीजा यह हुआ कि दो घंटे का लंच एक घंटे में ही सिमट गया। दोस्तों ने औपचारिक विदाई ली और चले गए। प्रीति का चेहरा पूरे रास्ते उतरा रहा, लेकिन वंदना जी खुश थीं कि उन्होंने बहू का “ध्यान रखा”।

घर लौटने के बाद प्रीति अपने कमरे में बैठी सोच रही थी। उसे वंदना जी से नफरत नहीं थी, लेकिन उसे अपनी ‘स्पेस’ चाहिए थी। उसे वो दायरा चाहिए था जहाँ वो सिर्फ प्रीति हो, किसी की बहू नहीं। उसने रोहन को समझाने की कोशिश की, लेकिन रोहन माँ के खिलाफ कुछ सुनने को तैयार नहीं था।

प्रीति समझ गई कि सीधे कहने से बात बिगड़ेगी और वंदना जी का दिल दुखेगा। उन्हें उनकी ही भाषा में समझाना होगा।

दो दिन बाद बुधवार था। बुधवार का दिन वंदना जी के लिए बहुत खास होता था। इस दिन उनकी पुरानी सहेलियों की मंडली—’कीर्तन सखी ग्रुप’—घर पर आती थी। सरला आंटी, विमला मौसी और कुछ अन्य बुजुर्ग महिलाएं आती थीं। वे ढोलक बजातीं, कीर्तन करतीं और उसके बाद घंटों बैठकर अपने बहुओं, बेटों और पुरानी यादों की गपशप करती थीं। यह उनका अपना समय होता था, जिसमें आम तौर पर प्रीति सिर्फ चाय-नाश्ता रखकर चली जाती थी।

इस बार प्रीति ने अपनी रणनीति बदल दी।

शाम के चार बजे जैसे ही सरला आंटी और बाकी महिलाएं आईं, वंदना जी के चेहरे पर रौनक आ गई। उन्होंने ढोलक कसनी शुरू की।

तभी प्रीति एकदम सज-धज कर, हाथ में एक डायरी और पेन लेकर ड्राइंग रूम में आ धमकी।

“नमस्ते आंटी जी! नमस्ते मौसी जी!” प्रीति ने ज़ोर से अभिवादन किया और वंदना जी के ठीक बगल में सोफे पर जम गई।

वंदना जी हैरान रह गईं। “अरे बहू, तुझे तो बाज़ार जाना था न? और यहाँ क्या कर रही है?”

“अरे मम्मी जी, बाज़ार का काम तो होता रहेगा,” प्रीति ने चहकते हुए कहा। “मैंने सोचा आप लोग हर हफ्ते इतना एन्जॉय करते हैं, आज मैं भी आप लोगों के साथ बैठती हूँ। मुझे भी तो पता चले कि आप लोग क्या बातें करते हैं। वैसे भी, मैं तो आपकी सहेली हूँ न? और मैं मॉडर्न हूँ तो क्या हुआ, मुझे भी पुराने किस्से सुनने में मज़ा आता है।”

सरला आंटी, जो अभी अपनी बहू की बुराई शुरू करने ही वाली थीं, प्रीति को देखकर चुप हो गईं। विमला मौसी, जो अपने घुटनों के दर्द और डॉक्टर की लापरवाही का किस्सा सुनाने वाली थीं, सकपका गईं। एक ‘नई उम्र की बहू’ के सामने वे अपनी बहुओं की शिकायतें कैसे करतीं?

कीर्तन शुरू हुआ। वंदना जी ने भजन शुरू किया। प्रीति ने तुरंत टोक दिया।

“मम्मी जी, सुर थोड़ा ऊपर जा रहा है। आप थोड़ा धीमे गाइये, वरना गले में खराश हो जाएगी। लाइये, मैं ढोलक बजाती हूँ।” प्रीति ने ढोलक ले ली और उसे बेसुरा पीटने लगी।

वंदना जी का चेहरा देखने लायक था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि बहू को मना कैसे करें।

कीर्तन जल्दी ख़त्म हो गया। अब बारी थी गपशप की।

सरला आंटी ने धीरे से कहा, “वंदना, तुझे पता है, कल शर्माइन…”

प्रीति तुरंत बीच में कूद पड़ी, “आंटी, गॉसिप करना अच्छी बात नहीं होती। निंदा रस से पाप लगता है। चलिए हम लोग कुछ ज्ञानवर्धक बातें करते हैं। ग्लोबल वार्मिंग के बारे में आप लोगों का क्या ख्याल है?”

कमरे में सन्नाटा छा गया। सरला आंटी और विमला मौसी ने एक-दूसरे को देखा। उनका सारा मज़ा किरकिरा हो चुका था। वो जिस आज़ादी और अपनेपन के लिए यहाँ आती थीं, वो प्रीति की मौजूदगी ने छीन लिया था।

विमला मौसी ने पाँच मिनट बाद ही घड़ी देखी। “अरे वंदना, आज थोड़ी जल्दी है। घर पर मेहमान आने वाले हैं। मैं चलती हूँ।”

“मैं भी चलती हूँ,” सरला आंटी भी खड़ी हो गईं। “आज वो मज़ा नहीं आया… मतलब, आज काम बहुत है।”

देखते ही देखते, जो महफ़िल तीन घंटे चलती थी, वो आधे घंटे में उजड़ गई।

वंदना जी दरवाजे तक सहेलियों को छोड़ने गईं और जब वापस लौटीं, तो उनका चेहरा गुस्से और हताशा से लाल था। प्रीति सोफे पर इत्मीनान से बैठी पत्रिका पढ़ रही थी।

“यह क्या बचपना था प्रीति?” वंदना जी ने कड़े स्वर में पूछा। “तुझे पता है न कि वो मेरी सहेलियाँ हैं? हम लोग अपने मन की बातें करते हैं। तू वहां आकर बैठ गई, ज्ञान देने लगी… मेरी सहेलियाँ असहज होकर चली गईं। मेरा पूरा हफ्ता ख़राब कर दिया तूने।”

प्रीति ने पत्रिका नीचे रखी और बहुत ही शांत स्वर में, लेकिन दृढ़ता से वंदना जी की आँखों में देखा।

“कैसा लगा मम्मी जी?”

“क्या?” वंदना जी समझ नहीं पाईं।

“कैसा लगा जब आपके अपने दोस्तों के बीच, आपके अपने समय में, कोई ऐसा व्यक्ति घुस आया जिसे वहां नहीं होना चाहिए था? भले ही वो व्यक्ति आपसे प्यार करता हो, भले ही उसका इरादा गलत न हो… लेकिन घुटन हुई न? आपको लगा न कि आपकी प्राइवेसी छिन गई?”

वंदना जी एकदम चुप हो गईं। जैसे किसी ने उन्हें आईना दिखा दिया हो।

प्रीति उठकर उनके पास गई और उनके हाथ थाम लिए। “मम्मी जी, मैं आपकी बहुत इज़्ज़त करती हूँ। आप माँ समान हैं। लेकिन जैसे आपको अपनी सहेलियों के साथ खुलकर हंसने, शिकायतें करने और बेतुकी बातें करने के लिए ‘सिर्फ अपना’ समय चाहिए, वैसे ही मुझे भी चाहिए होता है।”

“जब मैं अपने दोस्तों के साथ होती हूँ, या जब मैं अपने कमरे में किताब पढ़ रही होती हूँ, तो मैं सिर्फ़ ‘प्रीति’ होती हूँ। उस वक्त अगर आप साथ होती हैं, तो मुझे ‘बहू’ बनकर रहना पड़ता है। मैं खुलकर सांस नहीं ले पाती। जैसे आज आपकी सहेलियां मेरे सामने खुलकर बात नहीं कर पाईं।”

वंदना जी की आँखों से गुस्सा गायब हो गया। उसकी जगह एक गहरी समझ ने ले ली। उन्हें उस दिन रेस्टोरेंट में प्रीति के दोस्तों के उतरे हुए चेहरे याद आए। उन्हें याद आया कि कैसे प्रीति फ़ोन पर बात करते हुए उनके आते ही चुप हो जाती थी।

वंदना जी सोफे पर बैठ गईं। “मैं तो बस… मैं तो बस तुझे अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी। मुझे लगा हम सहेलियां बन सकते हैं।”

“हम सहेलियां हैं मम्मी जी,” प्रीति ने उनके घुटनों पर सिर रख दिया। “लेकिन सहेलियां भी तो हर वक्त एक-दूसरे से चिपकी नहीं रहतीं न? हर रिश्ते को सांस लेने के लिए थोड़ी जगह, थोड़ी दूरी चाहिए होती है। अगर हम एक-दूसरे के दायरे का सम्मान करेंगे, तो हमारा प्यार और बढ़ेगा। वरना यह प्यार एक पिंजरा बन जाएगा।”

कमरे में खामोशी थी, लेकिन यह खामोशी भारी नहीं, बहुत सुकून देने वाली थी।

वंदना जी ने प्रीति के सिर पर हाथ फेरा। “मैं समझ गई बेटा। बुढ़ापे में इंसान कभी-कभी अपनी तन्हाई से इतना डर जाता है कि दूसरों की आज़ादी को अपनी ज़रूरत तले कुचल देता है। मुझे माफ़ कर दे। मुझे लगा था मैं प्यार जता रही हूँ, पर मैं तो पहरेदारी कर रही थी।”

प्रीति ने मुस्कुराकर ऊपर देखा। “तो अगली बार जब मेरे दोस्त आएंगे…?”

“तो मैं अपने कमरे में टीवी देखूँगी या पार्क चली जाऊंगी,” वंदना जी ने हंसते हुए कहा। “और खबरदार जो तू अगली बार मेरी मंडली में ग्लोबल वार्मिंग का लेक्चर देने आई तो!”

दोनों सास-बहू खिलखिलाकर हंस पड़ीं।

उस शाम घर का माहौल बदल गया था। कोई किसी से नाराज़ नहीं था, लेकिन हर कोई अपनी-अपनी जगह पर खुश था। रोहन जब घर आया, तो उसने देखा कि वंदना जी अपने कमरे में फ़ोन पर मजे से बात कर रही थीं और प्रीति बालकनी में बैठकर अपनी पसंदीदा किताब पढ़ रही थी। बीच में कोई दीवार नहीं थी, बस एक अदृश्य सम्मानजनक रेखा थी जिसने दोनों के वजूद को सुरक्षित कर रखा था।

मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश 

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