गिरवी रखे कंगन – नम्रता सिंह 

जेठ की तपती दुपहरी थी। सूरज आग उगल रहा था और गांव की पगडंडियों पर सन्नाटा पसरा हुआ था। अमराइयों में छिपी कोयल भी गर्मी के मारे चुप थी। इसी सन्नाटे को चीरती हुई एक सफेद रंग की बड़ी गाड़ी धूल उड़ाती हुई ‘चौधरी विला’ के पुराने लेकिन भव्य लोहे के गेट पर आकर रुकी।

गाड़ी की आवाज सुनते ही घर के बरामदे में बैठी कावेरी देवी की उंगलियां माला फेरते-फेरते रुक गईं। उन्होंने चश्मे के ऊपर से झांका। “आ गए,” उन्होंने मन ही मन बुदबुदाया, लेकिन चेहरे पर कोई खास खुशी के भाव नहीं आए। यह उनका बेटा सुमित, बहू रिया और पोता आरव थे, जो शहर से दो साल बाद गांव आ रहे थे।

गाड़ी का दरवाजा खुला। रिया नीचे उतरी। आसमानी रंग का सूती सूट, आंखों पर काला चश्मा और कंधे पर एक बड़ा सा बैग। गांव की औरतें, जो आसपास के घरों की छतों से झांक रही थीं, फुसफुसाने लगीं, “देखो, शहर वाली मेमसाहब आ गईं। अब देखना, कावेरी काकी का घर कैसे सिर पर उठाएगी।”

आरव दौड़ता हुआ आया, “दादी!” और कावेरी देवी के गले लग गया। कावेरी का कठोर चेहरा पल भर के लिए पिघल गया। उन्होंने पोते को भींच लिया, माथा चूमा। सुमित ने भी पैर छुए, तो उन्होंने “जीते रहो” का आशीर्वाद दिया। लेकिन जब रिया ने झुककर पैर छुए, तो कावेरी देवी ने बस हल्का सा सिर हिलाया और बिना कुछ बोले अंदर पानी लेने चली गईं।

रिया ने एक गहरी सांस ली। वह जानती थी कि यह आसान नहीं होगा। सुमित की शादी रिया से लव मैरिज थी। कावेरी देवी, जो अपने जमाने की कड़क मिजाज जमींदारनी थीं, चाहती थीं कि उनके घर में गांव की ही कोई संस्कारी लड़की आए, जो सिर पर पल्ला रखे और गाय-भैंस संभाले। लेकिन रिया तो मल्टीनेशनल कंपनी में एच.आर. मैनेजर थी। कावेरी को लगता था कि इस ‘शहर की गुड़िया’ ने उनके बेटे को उनसे छीन लिया है।

घर के अंदर आते ही रिया ने देखा कि सब कुछ वैसा ही व्यवस्थित था जैसा सुमित बताता था। लेकिन एक अजीब सी ठंडक थी, जो दीवारों से नहीं, रिश्तों से आ रही थी।

“मां जी, मैंने आपके लिए बनारसी साड़ी लाई हूं,” रिया ने शाम को अपना सूटकेस खोलते हुए कहा। उसने एक बेहद खूबसूरत बैंगनी रंग की साड़ी निकाली।

कावेरी देवी ने साड़ी की तरफ देखा भी नहीं। “मेरे पास बहुत साड़ियां हैं, संदूक भरा पड़ा है। तुम अपने लिए रखो, शहर में पहनना,” उन्होंने रूखेपन से कह दिया और वहां से उठकर तुलसी को दिया जलाने चली गईं।

सुमित ने रिया का हाथ दबाया, जैसे कह रहा हो, ‘मैंने कहा था न, मां नहीं बदलेंगी।’ लेकिन रिया की आंखों में हार नहीं थी। वह उस मिट्टी की बनी थी जो टूटने के बजाय ढलना जानती थी।

अगले तीन दिन तक घर में एक अजीब सा अघोषित युद्ध चलता रहा। कावेरी देवी सुबह चार बजे उठ जातीं, पूरा काम खुद करतीं। रिया मदद के लिए आती तो मना कर देतीं। “तुम्हें नहीं आएगा, तुम रहने दो,” यह उनका तकिया कलाम बन गया था।

खाने की मेज पर कावेरी देवी सुमित की थाली में घी डालतीं, आरव को अपने हाथों से खिलातीं, लेकिन रिया से पूछतीं तक नहीं। रिया चुपचाप यह सब सहती रही। वह जानती थी कि शब्दों के तीर चलाने से रिश्ते नहीं जुड़ते, मूक सेवा ही पत्थर को पिघला सकती है।

गांव में गर्मी बढ़ती जा रही थी। कावेरी देवी को गठिया (Arthritis) की शिकायत थी। रिया ने देखा कि रात में मां जी कराहती हैं, लेकिन किसी को कुछ नहीं बतातीं। वे पुराने ख्यालात की थीं, दर्द सहना जानती थीं, दवा मांगना नहीं।

चौथे दिन की बात है। दोपहर में बिजली चली गई थी। उमस से बुरा हाल था। कावेरी देवी बरामदे में लेटी पंखा झल रही थीं। उनके पैरों में भयानक दर्द था। रिया ने देखा कि मां जी की आंखों में आंसू हैं।

बिना कुछ पूछे, रिया अपने कमरे से बाम और गरम पट्टी लेकर आई।

“अरे, क्या कर रही हो?” कावेरी देवी ने पैर खींचने की कोशिश की।

“मां जी, चुपचाप लेटी रहिए,” रिया की आवाज में पहली बार एक अधिकार था, बहू का नहीं, बेटी का। “सुमित बता रहे थे कि डॉक्टर ने मालिश के लिए कहा है। आप खुद तो करेंगी नहीं।”

रिया ने कावेरी देवी के सूजे हुए घुटनों पर तेल लगाना शुरू किया। कावेरी देवी ने रोकना चाहा, लेकिन रिया के हाथों के स्पर्श में जो अपनापन था, उसने उनकी जुबान बंद कर दी। रिया पसीने से लथपथ थी, गर्मी में उसका मेकअप कब का उतर चुका था, लेकिन वह लगातार मां जी के पैर दबाती रही।

कावेरी देवी कनखियों से अपनी बहू को देख रही थीं। उन्होंने सुना था कि शहर की लड़कियां नाज़ुक होती हैं, कामचोर होती हैं। लेकिन यह लड़की, जो एसी ऑफिस में बैठती है, वह इस तपती गर्मी में उनके बूढ़े पैरों की सेवा कर रही थी। कावेरी का मन थोड़ा डोल गया, लेकिन अहंकार की दीवार अभी पूरी तरह नहीं टूटी थी।

अगले दिन गांव में ‘वट सावित्री’ की पूजा थी। गांव की सारी औरतें वट वृक्ष के पास इकट्ठा हुई थीं। कावेरी देवी भी अपनी पूजा की थाली लेकर पहुंचीं। रिया ने जिद की थी कि वह भी व्रत रखेगी, भले ही उसे गांव के रीति-रिवाज ज्यादा नहीं पता थे।

पूजा के दौरान, पड़ोस की विमला काकी ने ताना मारा, “अरे कावेरी, तेरी बहू को तो मंत्र भी नहीं आते होंगे। जींस पहनने वाली क्या जाने वट सावित्री का महत्व?”

रिया चुप रही, लेकिन कावेरी देवी के चेहरे पर एक सख्त लकीर खिंच गई।

तभी पूजा के बाद प्रसाद बांटते समय, एक गरीब बुढ़िया, जो अक्सर मंदिर के बाहर भीख मांगती थी, चक्कर खाकर गिर पड़ी। गर्मी और भूख से उसका बुरा हाल था। गांव की औरतें “अरे, हट जाओ, छूत लग जाएगी” कहकर पीछे हट गईं।

लेकिन रिया ने आव देखा न ताव, अपनी पूजा की थाली किनारे रखी और उस बुढ़िया को सहारा देकर उठाया। उसने अपनी पानी की बोतल से उसे पानी पिलाया और अपने बैग से ग्लूकोज के बिस्किट निकालकर उसे खिलाए। उसने अपनी महंगी साड़ी के पल्लू से बुढ़िया का पसीना पोंछा।

“काकी, एम्बुलेंस को फोन करो,” रिया चिल्लाई।

“अरे बिटिया, यह नीची जात की है, तूने इसे छू लिया?” विमला काकी ने नाक सिकोड़ी।

रिया ने पलटकर जो जवाब दिया, उसने वहां सन्नाटा फैला दिया। “काकी, जात तो इंसान बनाता है, पर जान भगवान देता है। सावित्री ने अपने पति के प्राण यमराज से छीने थे, क्या हम एक जीती-जागती जान को ऐसे ही मरने दें? यही धर्म है?”

सुमित अपनी गाड़ी लेकर आ गया और रिया उस बुढ़िया को लेकर अस्पताल चली गई।

शाम को जब रिया लौटी, तो घर का माहौल बदला हुआ था। कावेरी देवी दरवाजे पर खड़ी थीं। विमला काकी और गांव की बाकी औरतें जा चुकी थीं, लेकिन जाने से पहले वे कावेरी से कह गई थीं, “कावेरी, मान गए, तेरी बहू में तो देवी का रूप है। आज उसने सबकी बोलती बंद कर दी।”

रिया डरते-डरते अंदर आई। उसे लगा मां जी डांटेंगी कि पूजा अधूरी छोड़कर चली गई।

“मां जी, वो…”

“चुप कर,” कावेरी देवी ने भारी आवाज में कहा। “हाथ-मुंह धो ले। खाना लगा दिया है।”

रिया हैरान थी। खाने की मेज पर आज तीन थालियां लगी थीं। कावेरी देवी ने खुद परोसा। और पहली बार, उन्होंने रिया की थाली में एक बड़ा चम्मच देसी घी डाला।

“खा ले, दिन भर से भूखी है। अस्पताल में दौड़-भाग करके आई है,” कावेरी देवी ने बिना उसकी तरफ देखे कहा।

रिया की आंखों में आंसू आ गए। वह घी सिर्फ घी नहीं था, वह मां जी का पिघलता हुआ स्नेह था।

लेकिन असली बदलाव उस रात आया। सुमित और आरव छत पर सो रहे थे। रिया नीचे पानी लेने आई। उसने देखा कावेरी देवी अपने कमरे में पुराने संदूक के सामने बैठी रो रही हैं।

रिया ठिठक गई। उसने देखा, मां जी एक पुरानी खाली मखमली डिब्बी को सहला रही हैं।

रिया दबे पांव अंदर गई। “मां जी?”

कावेरी देवी ने जल्दी से आंसू पोंछे। “तू सोई नहीं अभी तक?”

रिया ने पास जाकर वह डिब्बी देखी। वह खाली थी।

“यह मेरे कंगन की डिब्बी है,” कावेरी देवी ने भरी हुई आवाज में कहा। “जब सुमित की इंजीनियरिंग की आखिरी फीस भरनी थी, और फसल बर्बाद हो गई थी… तब मैंने अपने खानदानी कंगन बेच दिए थे। यह डिब्बी बची रह गई। सोचा था बहू आएगी तो उसे दूंगी, पर अब देने को कुछ है ही नहीं। शायद इसीलिए मुझे अपनी गरीबी पर गुस्सा आता था, और वह गुस्सा तुझ पर निकल जाता था।”

कावेरी देवी का सच बाहर आ गया था। उनकी कठोरता के पीछे एक मां की विवशता और एक सास का अधूरा सपना था। वे रिया से नफरत नहीं करती थीं, वे बस शर्मिंदा थीं कि वे अपनी ‘अमीर’ बहू को कुछ दे नहीं सकतीं।

रिया ने धीरे से कावेरी देवी का हाथ थामा और अपनी जेब से एक छोटी सी पोटली निकाली।

“मां जी, आपको याद है सुमित ने बताया था कि जब वह पहली बार शहर में नौकरी पर लगे थे, तो उन्होंने अपनी पहली कमाई से कुछ पैसे अलग जमा करना शुरू किया था?”

कावेरी देवी ने प्रश्नवाचक नजरों से देखा।

रिया ने पोटली खोली। उसमें सोने के दो भारी कंगन चमक रहे थे। बिल्कुल वैसे ही, जैसे उस खाली डिब्बी में कभी रहे होंगे।

“सुमित ने यह नहीं खरीदे मां जी,” रिया ने मुस्कुराते हुए कहा। “मैंने अपनी सेविंग्स से खरीदे हैं। मुझे पता था कि आपको अपने कंगन जाने का कितना गम है। मैं दो साल से सिर्फ इसलिए गांव नहीं आ रही थी क्योंकि मैं खाली हाथ नहीं आना चाहती थी। मैं चाहती थी कि जब मैं आऊं, तो आपकी वह ‘अमानत’ वापस कर सकूं जो आपने अपने बेटे के भविष्य के लिए गिरवी रख दी थी।”

रिया ने कावेरी देवी के हाथों में कंगन पहना दिए। “यह कोई तोहफा नहीं है मां जी। यह आपका कर्ज था जो सुमित और मुझ पर था। बस ब्याज के बदले में मुझे थोड़ा सा प्यार दे दीजिए।”

कावेरी देवी सन्न रह गईं। वह जिस बहू को घमंडी और पराया समझ रही थीं, उसने तो उनके मन की वह गांठ खोल दी जिसे वे सालों से ढो रही थीं। उनका अहंकार, उनकी झिझक, सब उन कंगनों की चमक के आगे फीके पड़ गए।

उन्होंने रिया को खींचकर अपने सीने से लगा लिया। उस रात ‘चौधरी विला’ की पुरानी दीवारों ने एक सास को फूट-फूटकर रोते हुए सुना।

“पगली… तू तो मेरी बेटी से भी बढ़कर निकली। मैं ही पत्थर थी जो तुझे पहचान नहीं पाई,” कावेरी देवी सिसक रही थीं।

अगली सुबह का सूरज कुछ अलग ही रोशनी लेकर आया।

कावेरी देवी बरामदे में बैठी थीं, लेकिन आज उनके चेहरे पर तनाव नहीं, सुकून था। रिया चाय लेकर आई।

“मां जी, चाय।”

कावेरी देवी ने चाय का कप लिया और अपनी कलाई आगे कर दी। सोने के कंगन सूरज की रोशनी में दमक रहे थे।

“देख रही हो विमला?” कावेरी देवी ने गेट से गुजर रही पड़ोसन को आवाज दी। “मेरी बहू लाई है। शहर की है, पर दिल एकदम सोना है। सोना!”

रिया मुस्कुरा दी। वह जानती थी कि यह कंगन सिर्फ गहना नहीं हैं, यह दो पीढ़ियों, दो विचारों और दो दिलों के बीच का पुल बन गए थे। उसने न केवल कंगन लौटाए थे, बल्कि उस घर का खोया हुआ सुकून भी लौटा दिया था।

अब गांव में चर्चा थी तो बस इस बात की—कि कावेरी की बहू ने सिर्फ सास के हाथ नहीं, बल्कि उनका दिल भी सोने से मढ़ दिया है।

लेखिका : नम्रता सिंह 

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