प्रिया को हमेशा यही महसूस होता था कि घर में कभी छोटी बहू नहीं बनना चाहिए। घर में सबसे छोटी होने के कारण लगभग सारी जिम्मेदारियां प्रिया के सर पर ही आ गई थी। दोनों बड़ी भाभी तो अधिकतर अपने कमरे में ही रहती थी। महाराज के साथ दोनों समय टेबल पर खाना लगवाने की जिम्मेदारी प्रिया की ही थी। सासू मां के सारे काम प्रिया को ही करने पड़ते थे। दोनों बहनों के आने के बाद उन्हें शॉपिंग करवाना या कि सासू मां के बैंक के काम उसे ही करने पड़ते थे। उसके ससुर वर्मा जी की दिल्ली के पंचकुइयां रोड में सबसे बड़ी फर्नीचर्स एंड इंटीरियर्स की तीन भागों की दुकान उनकी ही थी।
तीनों भाई भी पिता के साथ वहां ही काम करते थे और बहुत दूर-दूर के इंटीरियर्स के ठेके भी लिया करते थे। दोनों बड़ी बहू का कमरा तो ऊपर ही था क्योंकि प्रिया का कमरा नीचे था तो वह हर वक्त सासू मां की नजरों के कैमरे की निगरानी में ही रहती थी। रसोई भी नीचे थी इसलिए डाइनिंग टेबल पर खाना लगवाने का काम भी उसका ही था। दोनों बहनों की घर आने पर भले ही बड़ी भाभियां ऊपर से नीचे उतर कर आएं या ना आएं प्रिया को तो उनके लिए तैयार रहना ही पड़ता था। गैस्ट रूम के नीचे होने मेहमान भी नीचे ही रहता था। ऊपर बैठी दोनों भाभी ने यह मान लिया था की सारी जिम्मेदारी प्रिया की ही है। हालांकि प्रिया के छोटे बिट्टू को भी उसकी सासू मां बहुत प्यार करती थी जहां और बच्चे तो ऊपर ही पढ़ते रहते थे बिट्टू तो अक्सर सोता भी अपनी दादी मां के ही साथ था।
समय के साथ काम भी बढ़ रहा था और सासू मां और ससुर जी की तबीयत भी ज्यादा ठीक ना रहने के कारण अब ससुर जी भी अक्सर घर में ही रहा करते थे। क्योंकि उनको घर से ही दुकान का हिसाब किताब भी देखना होता था और क्योंकि तीनों भाई दुकान में ही होते थे। यदि कभी बड़े-बड़े बिल्डर के साथ कहीं का इंटीरियर का काम मिल जाता था तो दोनों भाई दूर-दूर जाकर के ठेके भी लेते थे। प्रिया का पति पवन पूरी तरह से फर्नीचर की दुकान ही संभाले हुए था। भाइयों की गैर मौजूदगी में उसको ही अधिकतर दुकान संभालनी होती थी । क्योंकि प्रिया कॉमर्स की पोस्ट ग्रेजुएट थी तो उसे दुकान का हिसाब भी देखना आता था।
जहां दोनों भाभियाऊ सिर्फ मजे करती थी प्रिया को सासू मां ननदें घर बाहर दुकान सब संभालने होते थे। कई बार प्रिया को बहुत गुस्सा आता था और उसे लगता था उसके सास ससुर उसके साथ अन्याय कर रहे हैं और सारा काम उससे ही करवाते हैं बड़ी भाभियों को तो पूरी मौज मिली हुई है। सासू मां के अस्पताल में रूटीन चैक में भी उसे ही सासू मां के साथ जाना होता था। ससुर जी का कब और कौन सा परहेज वाला खाना बनेगा, मेहमानों के लिए क्या बनेगा इन सब चीजों का ख्याल उसे ही रखना पड़ता था ऊपर बैठी दोनों भाभियां तो निश्चिंत थी।
हालांकि बिट्टू तो ऊपर खेलने नहीं जाता था परंतु ऊपर दोनों भाइयों के बच्चे नीचे आकर आराम से खेल सकते थे। बस इन छोटी-छोटी बातों से प्रिया को बहुत गुस्सा आता था और उसे लगता था कि छोटे होने के कारण उसके साथ असमानता का व्यवहार किया जा रहा है। दोनों भाई जब बाहर ठेका लेते हुए जयपुर ,उदयपुर, और आगरा इंटीरियर्स के काम करने जाते थे तो अपनी पत्नी और अपने बच्चों को भी घूमाने ले जाते थे। लेकिन क्योंकि पवन को तो फर्नीचर शॉप पर बैठना होता था तो वह सवेरे का गया रात को ही आता था दुकान पर पवन को और घर पर प्रिया को सारा काम करना पड़ता था यह बात उसे बहुत चुभती थी। सबको आराम के लिए समय मिल जाता था लेकिन प्रिया जरा सा भी आराम के लिए समय पाती तो ससुर जी दुकान का हिसाब देखने के लिए उसे दे देते थे। प्रिया के मन में गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।
अभी पिछले सप्ताह ही ससुर जी की तबीयत बहुत खराब हो गई थी डॉक्टर ने बताया कि यह उनका माइनर हार्ट अटैक था और उनको बीपी शुगर इत्यादि का बहुत ख्याल रखना पड़ेगा। चार दिन तो ससुर जी अस्पताल में भी एडमिट रहे थे। पवन ही उनके साथ रहे और प्रिया घर में सब आने जाने वालों को और सासू मां को देख रही थी। बड़ी भाभी और बच्चे तो भैया के इंटीरियर्स के काम के लिए मुंबई गए हुए थे और मंझली भाभी मेहमान के जैसे ससुर जी के आने के बाद नीचे आकर देख लेती थी। सासू मां को प्रिया का काम करना दिख नहीं रहा था क्या?
ससुर जी ने ठीक होकर घर आने के बाद रविवार को सब बच्चों को बात करने के लिए बुलाया। खाना खाने के बाद सब ड्राइंग रूम में ही बैठे हुए थे। ससुर जी ने तीनों बेटों को बिठाकर कहा अब मेरी इतनी तबीयत ठीक नहीं रहती कि मैं सारा काम खुद संभाल सकूं और मैं देख रहा हूं तुम तीनों बहुत अच्छी तरह से चला रहे हो मैं भी अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहता हूं इसलिए मैंने गगन (बड़ा भाई) और मनन (मंझला भाई) के लिए पीछे वाली पौश सोसाइटी में उनके नाम से फ्लैट्स ले लिए हैं और उन्होंने उन फ्लैट्स की चाबी दोनों भाइयों को दे दी। इसी तरह से दुकान भी मैंने हिस्सों में बांट दी है। इंटीरियर्स के काम के दोनों ऑफिस गगन और मनन के नाम कर दिए गए हैं।
गहने पहले ही सबको सबको दिए जा चुके हैं। क्योंकि हमने देखा है प्रिया हमारा ख्याल बहुत अच्छे से करती है और तभी सासू मां बीच में बोली मैंने प्रिया को अपने हिसाब से देख भी लिया है यह घर के हर काम को हर मेहमान को अकेले ही संभाल सकती है और प्रिया बहू हमारी जरूरत बन चुकी है इसलिए यह हमारे साथ ही रहेगी और यह घर और घर के सारे मेहमान और सारा काम अब पवन और प्रिया ही संभालेंगे। हमको और घर को क्यों कि पवन ने ही संभालना है इसलिए इंटीरियर के काम के लिए वह बाहर नहीं जा सकता उसे फर्नीचर वाली शॉप संभालनी होगी। फिर उन्होंने तीनों बच्चों को देखते हुए कहा मुझे लगता है कि तुमको मेरे इस फैसले से कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि तुम सबने देखा है कि प्रिया ने हीं घर की सारी जिम्मेदारी हमेशा उठाई है और हमें इस पर पूरा विश्वास है कि यह आगे भी जिम्मेदारी उठा लेगी।
सासू मां ने कहा तभी तो मैं अपने इस हीरे को तराश रही थी और इसे सारे काम सिखा रही थी। मेरे ख्याल से यह बटवारा सबको पसंद होगा और तुम तीनों भाई अब भी इकट्ठे ही एक दूसरे से मिलजुल कर काम को आगे बढाओगे यह मैं सबसे आशा करता हूं। प्रिया को अपने विचारों के कारण अपराधबोध हो रहा था क्योंकि कि सासू मां और ससुर जी उसे अधिक काम उसे तंग करने के लिए नहीं दे रहे थे अपितु उसे काम करना सिखा कर काम करने लायक बना रहे थे। तीनों भाइयों ने कहा हमें आपके किसी भी फैसले से कोई एतराज नहीं है और प्रिया आपका ही नहीं पूरे घर का ख्याल करके प्रेम बनाए रख सकती है इस बात का हमें पूरा विश्वास है।
आपका क्या ख्याल है वर्मा जी ने सही बटवारा किया ना?
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा
अपराध बोध विषय के अंतर्गत लिखी कहानी।