वो दूसरा कमरा – रमा शुक्ला 

“जब एक बहू ने अपनी सास के लिए वृद्धाश्रम का फॉर्म भरा, तो उसे नहीं पता था कि उसी फॉर्म पर अगला नाम उसकी अपनी माँ का लिखा जाने वाला है। एक ऐसा सच जो आपको झकझोर कर रख देगा।

शाम की चाय की चुस्की लेते हुए वंदना ने अपने पति, समीर की ओर देखा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता थी, जो पिछले कई दिनों से समीर महसूस कर रहा था। वंदना एक आधुनिक विचारों वाली कामकाजी महिला थी, जो घर और ऑफिस दोनों बखूबी संभालती थी। लेकिन पिछले कुछ महीनों से घर का माहौल उसे काटने को दौड़ रहा था। वजह थीं समीर की माँ, यानी वंदना की सास, सुमित्रा देवी।

सुमित्रा जी को अस्थमा की शिकायत थी। रात-बेरात उनकी खांसी की आवाज़ वंदना की नींद में खलल डालती थी। कभी-कभी वे पुरानी आदतों के चलते वंदना के मॉडर्न किचन में कुछ बदलाव कर देती थीं, या बच्चों को ज्यादा लाड़-प्यार देकर बिगाड़ देती थीं। वंदना को लगता था कि उसकी निजता (प्राइवेसी) पूरी तरह खत्म हो चुकी है।

समीर ने चाय का कप टेबल पर रखा और पूछा, “क्या बात है वंदना? तुम कुछ परेशान लग रही हो।”

वंदना ने गहरी सांस ली और अपनी बात शुरू की, “समीर, मुझे लगता है कि हमें अब कुछ व्यावहारिक फैसले लेने होंगे। मम्मी जी की तबीयत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। घर में बच्चों की पढ़ाई का भी हर्जा हो रहा है। रात-रात भर खांसी की आवाज़ से न बच्चे सो पाते हैं, न हम। और सच कहूं तो, उनके पुराने ख्यालात और मेरे तौर-तरीकों में अब बहुत टकराव होने लगा है।”

समीर चुपचाप सुनता रहा। वह जानता था कि वंदना क्या कहना चाहती है।

वंदना ने थोड़ा हिचकिचाते हुए आगे कहा, “मैंने शहर के बाहरी इलाके में बने ‘आनंदम सीनियर लिविंग’ के बारे में पता किया है। वह कोई साधारण वृद्धाश्रम नहीं है, समीर। वह एक लग्जरी रिसॉर्ट जैसा है। वहाँ डॉक्टर्स की टीम 24 घंटे रहती है, उनके हमउम्र लोग हैं, भजन-कीर्तन होता है, और खाना भी बहुत सात्विक मिलता है। मुझे लगता है कि मम्मी जी वहाँ यहाँ से ज्यादा खुश रहेंगी। हम हर हफ्ते उनसे मिलने जाएंगे। प्लीज, तुम भावुक होकर नहीं, प्रैक्टिकल होकर सोचो।”

समीर ने वंदना की आँखों में देखा। उसे वंदना की परेशानी समझ आ रही थी, लेकिन माँ को घर से निकालने का विचार उसके गले नहीं उतर रहा था। फिर भी, उसने वंदना से बहस नहीं की। उसने एक शांत मुस्कान के साथ कहा, “वंदना, अगर तुम्हें लगता है कि यही हम सबके लिए बेहतर है, तो ठीक है। मैं कल ही जाकर वहाँ की सारी औपचारिकताएं पूरी कर आता हूँ।”

वंदना का चेहरा खिल उठा। उसे यकीन नहीं था कि समीर इतनी आसानी से मान जाएगा। उसने समीर का हाथ पकड़कर कहा, “थैंक यू समीर! तुम देखना, यह फैसला मम्मी जी के लिए भी अच्छा होगा और हमारी गृहस्थी के लिए भी। हम फिर से खुलकर जी पाएंगे।”

अगले दिन समीर ऑफिस के लिए निकला, लेकिन शाम को घर लौटते वक्त उसके हाथ में एक फाइल थी। वंदना बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी।

“क्या हुआ? बात पक्की हो गई?” वंदना ने उत्सुकता से पूछा।

समीर ने सोफे पर बैठते हुए पानी पिया और फाइल वंदना की ओर बढ़ा दी। “हाँ, मैंने बात कर ली है। जगह वाकई बहुत अच्छी है। लेकिन वंदना, वहाँ एक नियम है। वे लोग सिंगल रूम बहुत मुश्किल से देते हैं, डबल शेयरिंग रूम आसानी से मिल जाता है और सस्ता भी पड़ता है। सिंगल रूम के लिए वेटिंग बहुत लंबी है।”

वंदना ने माथे पर शिकन लाते हुए कहा, “तो क्या मम्मी जी किसी अजनबी के साथ रूम शेयर करेंगी? वे एडजस्ट नहीं कर पाएंगी समीर।”

समीर ने संजीदगी से कहा, “मैंने उसका भी इंतज़ाम कर दिया है। इत्तेफाक से, आज जब मैं वहाँ फॉर्म भर रहा था, तो मुझे एक और फैमिली मिली जो अपनी माँ के लिए ही रूम देख रही थी। मैंने सोचा कि अगर मम्मी जी अपनी जान-पहचान वालों के साथ रहें, तो उनका मन भी लग जाएगा और वे अकेलापन महसूस नहीं करेंगी। इसलिए मैंने दो बेड वाला एक बड़ा डीलक्स रूम बुक कर दिया है।”

वंदना थोड़ी राहत महसूस करते हुए बोली, “यह तो अच्छा किया। लेकिन वो दूसरी महिला कौन है? क्या वे अच्छी फैमिली से हैं? मम्मी जी की पटेगी उनसे?”

समीर ने एक पल के लिए चुप्पी साधी, फिर अपनी जेब से अपना मोबाइल निकाला। “तुम खुद ही देख लो। मैंने उस फैमिली से बात करते हुए वीडियो रिकॉर्ड कर लिया था ताकि तुम्हें दिखा सकूं कि वे लोग कितने अच्छे हैं।”

समीर ने वीडियो प्ले किया और मोबाइल वंदना के हाथ में दे दिया।

वंदना ने स्क्रीन पर नज़र डाली। वीडियो में एक आलीशान रिसेप्शन एरिया दिख रहा था। कैमरा थोड़ा हिला और फिर एक युवा जोड़ा रिसेप्शनिस्ट के सामने बैठा दिखाई दिया। जैसे ही वंदना ने उस जोड़े का चेहरा देखा और उनकी आवाज़ सुनी, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

वह जोड़ा कोई और नहीं, वंदना का अपना सगा छोटा भाई, रोहन और उसकी पत्नी, कृतिका थे।

वीडियो में रोहन कह रहा था, “मैम, प्लीज बुकिंग जल्दी कंफर्म कर दीजिए। मेरी माँ, निर्मला देवी, अब हमारे साथ नहीं रह सकतीं। हमारा फ्लैट छोटा है और कृतिका की उनसे बिल्कुल नहीं बनती। माँ दिन भर पुराने किस्से सुनाती रहती हैं और कृतिका को अपनी प्राइवेसी चाहिए। हम चाहते हैं कि माँ यहाँ रहें, कम से कम हमें थोड़ी शांति मिलेगी।”

कृतिका (वंदना की भाभी) भी पीछे से बोली, “हाँ, और प्लीज रूम ऐसा दीजिएगा जहाँ से वे हमें बार-बार कॉल न कर सकें। हम वीकेंड पर आकर मिल लिया करेंगे। उनके खर्चे की चिंता मत कीजिए, बस हमें मेंटल पीस चाहिए।”

वंदना के हाथ से मोबाइल छूटकर सोफे पर गिर गया। उसका पूरा शरीर कांपने लगा। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। निर्मला देवी… उसकी अपनी माँ! जिसने वंदना को राजकुमारियों की तरह पाला था, जिसके हाथ के बने खाने की खुशबू आज भी वंदना को याद आती थी। उसके पिता के गुजरने के बाद माँ ने ही तो रोहन को पाल-पोसकर बड़ा किया था, अपना सब कुछ बेचकर उसे विदेश पढ़ने भेजा था। और आज वही रोहन… वही कृतिका… माँ को “बोझ” और “शांति में बाधा” बता रहे थे?

“यह… यह क्या बकवास है?” वंदना चिल्लाई, उसकी आवाज़ में गुस्सा और दर्द दोनों थे। “रोहन ऐसा कैसे कर सकता है? और वो कृतिका… कल की आई लड़की मेरी माँ को घर से निकालेगी? उसकी हिम्मत कैसे हुई? माँ ने उनके लिए क्या नहीं किया? समीर, अभी फोन लगाओ रोहन को। मैं उसे छोडूंगी नहीं। मेरी माँ किसी वृद्धाश्रम में नहीं रहेंगी!”

वंदना का गुस्सा सातवें आसमान पर था। वह रोहन और कृतिका को कोस रही थी। “कृतिका को शर्म नहीं आती? एक बूढ़ी औरत जो कोने में पड़ी रहती है, उसे भी वो बर्दाश्त नहीं कर सकती? कैसी औरत है वो? पत्थर दिल है क्या?”

समीर ने वंदना को शांत नहीं कराया। वह बस चुपचाप बैठा उसे देखता रहा। जब वंदना का गुबार थोड़ा कम हुआ और वह रोने लगी, तब समीर ने बहुत धीमे और शांत स्वर में बोला।

“वंदना, तुम कृतिका पर क्यों चिल्ला रही हो? कृतिका ने वही तो किया है जो तुम कर रही हो।”

वंदना ने झटके से सिर उठाया और समीर की ओर देखा। “क्या मतलब?”

समीर ने वंदना की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “ध्यान से सोचो वंदना। कृतिका के लिए निर्मला जी (तुम्हारी माँ) वही हैं, जो मेरे लिए सुमित्रा जी (मेरी माँ) हैं। तुम अपनी सास को वृद्धाश्रम भेज रही हो क्योंकि उनकी खांसी तुम्हें परेशान करती है, उनकी आदतें तुम्हें दखलअंदाजी लगती हैं। कृतिका भी अपनी सास को वृद्धाश्रम भेज रही है क्योंकि उसे अपनी प्राइवेसी चाहिए।”

समीर रुका, फिर उसने वह बात कही जो तीर की तरह वंदना के दिल में चुभ गई।

“फर्क सिर्फ इतना है वंदना, कि निर्मला जी तुम्हारी माँ हैं, तो तुम्हें दर्द हो रहा है। तुम्हें कृतिका ‘डायन’ और ‘पत्थर दिल’ लग रही है। लेकिन सुमित्रा जी मेरी माँ हैं, और जब तुम उन्हें निकालने की बात कर रही थीं, तो तुम्हें लग रहा था कि तुम ‘प्रैक्टिकल’ हो रही हो। जो दर्द आज तुम्हें अपनी माँ के लिए महसूस हो रहा है, क्या तुम्हें लगता है मुझे अपनी माँ के लिए नहीं हुआ होगा?”

कमरे में सन्नाटा पसर गया। घड़ी की टिक-टिक भी वंदना को हथौड़ों जैसी लग रही थी। समीर के शब्द किसी आईने की तरह उसके सामने थे, जिसमें उसे अपना ही दोहरा चेहरा नज़र आ रहा था।

वह जिस ‘कृतिका’ को कोस रही थी, असल में वह खुद भी तो वही थी। एक तरफ वह अपनी माँ के लिए दुनिया से लड़ने को तैयार थी, उन्हें घर में रखने की वकालत कर रही थी, और दूसरी तरफ अपने पति की माँ को घर से बेघर कर रही थी।

वंदना को याद आया कि कैसे उसकी माँ (निर्मला जी) ने हमेशा उसे सिखाया था कि ससुराल को अपना घर समझना। लेकिन उसने उस घर को तो अपना समझा, पर उस घर की नींव (सास) को कभी अपना नहीं माना। उसने अपनी माँ की खांसी में ‘ममता’ देखी थी, लेकिन सास की खांसी में उसे सिर्फ ‘शोर’ सुनाई दिया।

समीर ने आगे कहा, “वंदना, मैंने रोहन से बात की थी। मैंने ही उसे वहाँ बुलाया था। मैंने ही वो डबल रूम बुक करने का नाटक किया। सच तो यह है कि मैं तुम्हें यह एहसास दिलाना चाहता था कि माँ, माँ होती है। चाहे वो तुम्हारी हो या मेरी। दर्द दोनों का एक जैसा होता है, बुढ़ापा दोनों का एक जैसा होता है। अगर तुम अपनी माँ को वृद्धाश्रम में तड़पते हुए नहीं देख सकतीं, तो तुम मुझसे यह उम्मीद कैसे कर सकती हो कि मैं अपनी माँ को वहाँ छोड़ आऊं?”

वंदना फूट-फूट कर रो पड़ी। वह शर्मिंदगी के मारे समीर से नज़रें नहीं मिला पा रही थी। उसका आधुनिकता का अहंकार, उसका ‘प्रैक्टिकल’ होने का भ्रम, सब चकनाचूर हो गया था।

वह उठी और दौड़कर सुमित्रा जी (सास) के कमरे में गई। सुमित्रा जी बिस्तर पर लेटी थीं, खांस रही थीं। वंदना ने जाकर उनके पैर पकड़ लिए और उनकी गोद में सिर रखकर रोने लगी।

“अरे बहू? क्या हुआ? क्यों रो रही है?” सुमित्रा जी घबरा गईं। उन्होंने अपने कांपते हाथों से वंदना के सिर पर हाथ फेरा। “समीर ने कुछ कहा क्या? पगली, रो मत। मैं हूँ न।”

वंदना को सुमित्रा जी के स्पर्श में अपनी माँ का ही स्पर्श महसूस हुआ। वही खुरदरे हाथ, वही ममता, वही चिंता। उसे एहसास हुआ कि उसने एक ‘सास’ में ‘माँ’ को देखने की कभी कोशिश ही नहीं की थी। अगर उसने कृतिका की जगह खुद को रखकर देखा होता, तो शायद यह नौबत ही न आती।

थोड़ी देर बाद, वंदना ने अपने आंसू पोंछे। वह बाहर आई जहाँ समीर खड़ा था।

“समीर,” वंदना ने भारी आवाज़ में कहा, “वह फाइल फाड़ दो। माँ जी कहीं नहीं जा रही हैं। यह घर उनका है, हम उनके साथ रहते हैं, वे हमारे साथ नहीं।”

समीर मुस्कुराया। उसने वंदना के कंधे पर हाथ रखा।

“और रोहन?” समीर ने पूछा। “तुम्हारी माँ का क्या होगा?”

वंदना की आँखों में एक नई चमक थी। उसने अपना फोन उठाया।

“मैं अभी रोहन से बात करती हूँ। अगर कृतिका को अपनी सास के साथ रहने में दिक्कत है, तो मेरी माँ अनाथ नहीं हैं। हमारे घर में एक कमरा खाली है। अगर हम एक माँ की सेवा कर सकते हैं, तो दो की क्यों नहीं? मेरी माँ और तुम्हारी माँ साथ रहेंगी। कम से कम उन्हें एक-दूसरे का सहारा तो मिलेगा, और हमें बड़ों का आशीर्वाद।”

समीर ने वंदना को गले लगा लिया। उस दिन वंदना ने न सिर्फ अपना घर टूटने से बचाया था, बल्कि एक बेटी और एक बहू के बीच की उस अदृश्य दीवार को भी गिरा दिया था जो अक्सर रिश्तों का दम घोंट देती है।

उसने सीख लिया था कि रिश्ते ‘सुविधा’ से नहीं, ‘संवेदना’ से चलते हैं। और अगर आप चाहते हैं कि दुनिया आपकी माँ की इज़्ज़त करे, तो शुरुआत आपको अपने घर की बुजुर्ग औरत को वही इज़्ज़त देकर करनी होगी। क्योंकि कर्मा का पता नहीं, लेकिन वक्त का पहिया घूमकर वहीं आता है जहाँ से आपने शुरुआत की थी।

उस रात घर में खांसी की आवाज़ फिर आई, लेकिन इस बार वंदना को चिढ़ नहीं हुई। वह उठी, गर्म पानी का गिलास लेकर सास के कमरे में गई, और मन ही मन मुस्कुराई कि जल्द ही इस कमरे में एक और बिस्तर लगेगा—उसकी अपनी माँ के लिए। घर अब सचमुच ‘घर’ बनने वाला था।

लेखिका : रमा शुक्ला 

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