“देखो नेहा, घड़ी देखो। शाम के आठ बजने वाले हैं और तुम्हारी भाभी का अभी तक कोई अता-पता नहीं है। पूरा दिन निकल जाता है, न घर की सुध है, न सास की। मैं तो कहती हूँ, ऐसी नौकरी किस काम की जो घर के सुख-चैन को ही निगल जाए?”
सावित्री देवी ने सोफे पर टेक लगाते हुए अपनी बेटी नेहा से शिकायत की। उनके घुटनों पर गर्म पट्टी बंधी थी और हाथ में चाय का प्याला था। नेहा, जो दो दिन के लिए मायके आई थी, चुपचाप माँ की बातें सुन रही थी।
सावित्री जी ने बात जारी रखी, “पड़ोस वाली वर्मा जी की बहू को देख। दिन भर घर में रहती है। सास को समय पर खाना देती है, शाम को उनके पैर दबाती है, और एक मेरी बहू है, शिखा… सुबह टिफिन लेकर भागती है और रात को थकी-हारी आती है। आते ही कमरे में बंद। मुझे तो लगता है उसे मुझसे कोई लगाव ही नहीं है। बस पैसों के पीछे भाग रही है।”
नेहा ने चाय का कप मेज पर रखा और एक गहरी सांस ली। उसे लगा कि अब चुप रहना ठीक नहीं होगा।
“माँ,” नेहा ने शांत स्वर में कहा, “आपको पता है पिछले महीने पापा के हर्निया के ऑपरेशन का बिल कितना आया था?”
सावित्री जी थोड़ा सकपकाईं। “हाँ… कुछ दो लाख के आसपास था। पर उसका अभी क्या मतलब?”
“मतलब है माँ,” नेहा ने सीधे उनकी आँखों में देखा। “भैया की सैलरी कितनी है, यह आप भी जानती हैं और मैं भी। साठ हज़ार महीना। उसमें घर की ईएमआई जाती है पच्चीस हज़ार। राशन, बिजली, पानी, पेट्रोल मिलाकर बीस हज़ार और निकल जाते हैं। बचे पंद्रह हज़ार। क्या पंद्रह हज़ार में पापा का ऑपरेशन, आपकी ये महँगी दवाइयां, घर का एसी और हम भाई-बहनों के त्योहारों का खर्च निकल सकता है?”
सावित्री देवी चुप हो गईं। उनके पास इसका कोई जवाब नहीं था।
नेहा ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “माँ, आप जिस वर्मा आंटी की बहू की मिसाल दे रही थीं, उनके घर में एसी नहीं चलता, कूलर चलता है। वो लोग सरकारी अस्पताल में इलाज कराते हैं, प्राइवेट में नहीं। आप जिस आराम की ज़िंदगी जी रही हैं—शाम को एसी वाले कमरे में बैठना, बेस्ट डॉक्टर से इलाज कराना, और हर त्यौहार पर नए कपड़े पहनना—यह सब इसलिए मुमकिन है क्योंकि शिखा भाभी सुबह नौ से रात आठ बजे तक खटती हैं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।
“आप कहती हैं कि वो पैसों के पीछे भागती है,” नेहा की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई। “माँ, वो अपने शौक के लिए नहीं, इस घर की ‘ज़रूरतों’ के लिए भागती है। उसे भी मन करता होगा कि शाम को घर आकर आराम से चाय पिए, आपके पास बैठकर बातें करे। लेकिन अगर वो ‘वर्मा जी की बहू’ बन गई, तो इस घर की छत तो रहेगी, पर ये सुख-सुविधाएं नहीं रहेंगी। भैया अकेले यह सब नहीं खींच पाएंगे, वो टूट जाएंगे।”
सावित्री देवी ने अपनी नज़रें झुका लीं। उन्हें याद आया कि पिछले हफ़्ते जब डॉक्टर ने उन्हें महँगा कैल्शियम सप्लीमेंट लिखा था, तो शिखा ने बिना एक पल सोचे उसे ऑर्डर कर दिया था। उसने कभी नहीं कहा कि पैसे नहीं हैं।
“तो क्या… क्या मैं गलत हूँ?” सावित्री जी ने धीमे स्वर में पूछा, जैसे खुद से सवाल कर रही हों।
“गलत नहीं, बस आप देख नहीं पा रही थीं,” नेहा ने माँ का हाथ थामा। “सेवा सिर्फ पैर दबाना या दिन भर रसोई में रहना नहीं होती माँ। बुढ़ापे में माता-पिता को आर्थिक सुरक्षा देना, ताकि उन्हें किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े, यह आज के ज़माने की सबसे बड़ी सेवा है। शिखा भाभी बेटे जैसा फ़र्ज़ निभा रही हैं, और आप उनसे पारंपरिक बहू वाली उम्मीदें लगा रही हैं।”
तभी बाहर मुख्य दरवाज़े पर चाबी घूमने की आवाज़ आई। शिखा अंदर दाखिल हुई। उसका चेहरा पसीने से तर था और कंधे पर लैपटॉप का भारी बैग लटका था। वह बेहद थकी हुई लग रही थी।
शिखा ने आते ही बैग सोफे पर रखा और डरते हुए सावित्री जी की ओर देखा। “माफ़ करना माँ जी, आज ऑफिस में ऑडिट था, इसलिए देर हो गई। मैं बस अभी फ्रेश होकर खाना बनाती हूँ।”
वह रसोई की तरफ जाने के लिए मुड़ी ही थी कि सावित्री जी की आवाज़ ने उसे रोक लिया।
“रुक जा बहू।”
शिखा सहम गई। उसे लगा आज फिर डांट पड़ेगी।
सावित्री जी ने अपनी लाठी का सहारा लिया और धीरे से खड़ी हुईं। “नेहा, तू जा रसोई में। शिखा के लिए एक कप बढ़िया अदरक वाली चाय बना और साथ में कुछ नाश्ता ला। खाना आज हम बाहर से मंगवा लेंगे।”
शिखा हैरान होकर अपनी सास को देखने लगी।
“ऐसे क्या देख रही है?” सावित्री जी ने शिखा का हाथ पकड़कर उसे सोफे पर बैठाया। “दिन भर मशीन की तरह काम करके आई है। मशीन को भी आराम चाहिए होता है, तू तो फिर भी इंसान है। बैठ, सुस्ता ले थोड़ा।”
शिखा की आँखों में नमी आ गई। उसने नेहा की तरफ देखा, नेहा ने आँखों ही आँखों में मुस्कुराकर इशारा किया।
उस शाम, घर में किसी ने खाना नहीं बनाया। पिज़्ज़ा और बर्गर आए। सावित्री जी ने पहली बार अपनी ‘शुगर’ की परवाह किए बिना बहू के साथ बैठकर कोल्ड ड्रिंक पी। उन्होंने शिखा के पैर तो नहीं दबाए, लेकिन उसे ‘मानसिक सुकून’ का जो मरहम दिया, उसने शिखा की दिन भर की थकान को पलों में गायब कर दिया।
उस दिन सावित्री जी समझ गईं कि प्यार जताने के तरीके समय के साथ बदल जाते हैं। अगर बहू घर की नींव मज़बूत करने के लिए बाहर उड़ रही है, तो सास का फ़र्ज़ उसके पर कतरना नहीं, बल्कि उसके लिए खुला आसमान और ज़मीन पर एक महफ़ूज़ घोंसला बनाए रखना है।
लेखिका : गरिमा चौधरी
#अपराध बोध