अपराध बोध – संजय सिंह

सुजान पंडित और सूजान पंडिताइन अपने गांव में जानी-मानी शख्सियत  थे ।वक्त बीतने के साथ-साथ उनके घर पर एक पुत्र ने जन्म लिया। बड़े प्यार से उसका नाम बृजेश  रखा । सुजान पंडित और सूजान पंडिताइन ने बड़े प्यार के साथ अपने बेटे बृजेश का लालन-पालन किया। माता-पिता के अधिक लाड – प्यार के कारण बृजेश  शिक्षा में केवल दसवीं ही पास कर सका।

गांव के कुछआर्मी से रिटायर लोगों ने बृजेश को आर्मी में भर्ती करवा दिया परंतु बृजेश इस बात को जानता था कि उसके माता-पिता के पास काफी धन दौलत और जमीन जायदाद है। जिस कारण वह आर्मी की नौकरी को बीच में ही छोड़कर घर लौट आया। माता-पिता की इकलौती औलाद , जमीन जायदाद काफी होने , गांव में अच्छे रसूक के कारण माता-पिता ने उसकी शादी एक अच्छे खानदान में कर दी।

समय बितता गया और एक दिन बृजेश के पिताजी इस दुनिया  को अलविदा कह गए।  बृजेश की जिंदगी पर इसका कोई भी असर नहीं हुआ। माता अब बूढी हो चुकी थी। उसकी सेवा करने की बजाय वह पूरा दिन आवारा गर्दी ही करता रहता। यह सब देखकर उसकी पत्नी भी माता की सेवा करने से परहेज करती और देखते ही देखते एक दिन बृजेश की माता भी स्वर्ग सिधार गई। बृजेश धीरे-धीरे नशे तथा गलत आदतों में घिरने लगा ।वह स्वयं तो गलत काम करता परंतु गांव के सीधे-साधे नौजवान लड़कों को भी अपने साथ इन गंदी आदतों में शामिल करता।

गांव के सभी लोग उससे बहुत नफरत करने लगे थे ।रोजाना गांव में किसी न किसी बात पर वह लड़ाई झगड़ा करता ।उसकी इन सब आदतों से उसकी पत्नी काफी परेशान थी । वह उससे काफी डरती थी । जिस कारण उसका कभी भी विरोध नहीं करती थी।वह हमेशा गांव के लोगों का ही दोष निकलती। जिसके कारण बृजेश का हौसला और भी बढ़ता जाता। बस इसी माहौल में समय ने करवट ली और ब्रजेश एक बेटे का बाप बन गया।

उसकी पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया।  बृजेश स्वयं भी पढ़ा लिखा नहीं था। ना ही अच्छी आदतों की कदर करता था। जिस कारण वह अपने बेटे को भी एक अच्छा इंसान बनाने से चुकता रहा ।दिन गुजरते गए परंतु बृजेश के व्यवहार में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं आया।  वह अपने बेटे की उम्र के गांव के नौजवान लड़कों को नशे  का आदी बनाता गया और उनके हौसले को बढ़ाने के लिए सदैव उनका साथ देता गया ।

देखते-देखते कुछ एक परिवारों के बच्चे गलत आदतों और नशे में पड़कर मृत्यु तक को प्राप्त हो गए। परंतु बृजेश 2 मिनट शोक मना कर पुनः उसी रास्ते पर अग्रसर हो जाता ।समय बितता गया और बृजेश का लड़का  अब 20 साल का हो गया। बृजेश के लड़के का नाम राजू था। माता-पिता के व्यवहार के कारण वह दसवीं तक की कक्षा को पास नहीं कर सका और माता-पिता की तरफ से रोक-टोक ना होने के कारण, वह भी धीरे-धीरे पिता ब्रजेश के रास्ते पर चलने लगा। कुछ समय तक तो वह छुप-छुप कर नशे करता था परंतु जब पिता ब्रजेश शरीर से कमजोर हो गए। 

तो उनका बेटा राजू अब उनके सामने ही नशा करने लगा। माता-पिता का लाड प्यार इतनी हद तक बढ़ गया कि गांव के लोग बृजेश तथा उसकी पत्नी को उनके बेटे राजू की गलत हरकतों के बारे में बताते तो वह गांव के लोगों को ही दोषी ठहराते। इस पर राजू के हौसले बुलंद होते गए ।राजू अब नशा पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गया ।जब पिता उसे नशे के लिए मना करते तो वह उनके साथ ही गाली -गलौज और हाथापाई पर उतर आता। यह सब देखकर पिता ब्रजेश मन ही मन में बहुत दुखी होता।बृजेश चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था क्योंकि वह स्वयं भी इस नशे की लत में गिरफ्तार हो चुका था ।

अब तो घर के हालात यह हो गए थे कि जिस समय बृजेश नशे में चूर होकर घर पहुंचता ।उसके बाद उसका बेटा राजू भी नशे में चूर होकर घर पर पहुंचता ।बाप बेटा दोनों एक ही राह पर अग्रसर थे। मन ही मन बृजेश यह चाहता कि उसका बेटा नशे को छोड़कर सही राह पर चल पड़े परंतु बेटा एक ना सुनता। गांव के लोग जब उसके बेटे को इस हालत में देखते। तो उसे सिर्फ यही कहते  कि जैसा बाप वैसा बेटा ।

एक बार बृजेश ने अपने बेटे को अच्छे से समझाया कि उसे गंदी आदतों को छोड़कर एक अच्छा इंसान बनना चाहिए। इस पर बृजेश के बेटे राजू ने एक शर्त रखी कि यदि वह उसे एक गाड़ी खरीद कर दे दें ।तो वह सभी बुरी आदतें छोड़ देगा। यह सुनकर बृजेश और उसकी पत्नी दोनों खुश हो गए । उनको उम्मीद की एक किरण नजर आई। उन्होंने तुरंत एक नई गाड़ी अपने बेटे को लेकर दे दी। बेटा राजू गाड़ी पाकर बहुत खुश था।

दो-चार दिन वह माता-पिता की नजरों के सामने घर का कामकाज और उनकी आज्ञा का पालन करने लगा। माता पिता को लगा कि अब उनका बेटा सुधर गया है और वह उसकी शादी के विषय में सोचने लगे। बृजेश और उसकी पत्नी अपने बेटे की शादी की बात  को आगे बड़ा ही रहे थे। एक दिन राजू ने अपने पिता ब्रजेश और माता से कहा कि वह दोस्तों के साथ घूमने जा रहा है और जल्दी ही शाम तक लौट आएगा। माता-पिता ने उसे जाने की आज्ञा दे दी और खुश थे कि अब उनका बेटा आज्ञाकारी हो गया है और हर काम उनसे पूछ कर ही करता है।

राजू ने अपने दोस्तों, गांव के कुछ लड़कों को गाड़ी में बिठाया और निकल गया ।बृजेश और उसकी पत्नी घर पर काफी खुश थे और अपने बेटे और अपने भविष्य के सपने संजो रहे थे कि एकाएक फोन की घंटी बजती है।बृजेश की पत्नी भागते-भागते कमरे में गई और फोन उठाया। बृजेश बाहर धूप सेक रहा था। एकाएक पत्नी के चिल्लाने की और रोने की आवाज आने लगी। बृजेश भागता हुआ अंदर गया और पत्नी से पूछने लगा कि वह क्यों रो रही है। पत्नी ने यह कहा कि राजू की गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया है और वह अस्पताल में एडमिट है। यह सब सुनकर बृजेश सन्न रह गया ।वह फटाफट भागता हुआ कमरे से बाहर निकला और दोस्त के घर जाकर मोटरसाइकिल लेकर अस्पताल की तरफ रवाना हो गया।

अस्पताल पहुंचकर वहां उसने देखा। गांव के उसके बेटे के दोस्त जो उसके साथ घूमने गए थे ।वह सब वहां खड़े थे और नशे की हालत में थे। उसने उनसे पूछा कि  राजू कैसा है? लड़कों ने कहा कि राजू अब इस दुनिया में नहीं रहा। यह सुनकर बृजेश उनसे हाथापाई पर उतर आया और कहने लगा कि उन्होंने ही उसके बेटे को मारा है ।इस समय गांव के बहुत सारे लोग वहां पर इकट्ठे हो गए। उन्होंने बृजेश से उन लड़कों को छुड़वाया और बृजेश को बताया कि वह लड़के तो पहले ही घर पर आ चुके थे परंतु राजू फिर से गाड़ी लेकर अकेला ही चला गया था और रास्ते में उसकी गाड़ी पेड़ से टकरा गई और वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई। इसमें लड़कों का कोई भी दोष नहीं है।

बृजेश जोर-जोर से रोने लगा। पीछे-पीछे उसकी पत्नी भी दौड़ती हुई आई और यह खबर सुनकर कि उसका बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा है। बेहोश हो गई। बृजेश रोते-रोते अपने बीते दिनों को याद करने लगा। लोग, गांव के बड़े बुजुर्ग यहां वहां बातें कर रहे थे कि बृजेश ने नशे की लत में गांव के बहुत सारे लड़कों को मौत के हवाले किया था। आज स्वयं का बेटा भी उसी रास्ते पर गया है। इसमें किसी का दोष नहीं है ।इसमें सिर्फ बृजेश और उसकी पत्नी दोषी है। बृजेश ने नशे की आग से लोगों के घरों को जलाया है। उनके घरों का चिराग बुझाए है।

आज स्वयं नशे की आग से उसका घर भी जला है और उसका चिराग भी बुझ गया है। वह पूर्ण रूप से स्वयं ही इसका दोषी है ।बृजेश यह सब बातें सुन रहा था और मन ही मन पछता रहा था कि काश समय रहते वह ना नशा करता ना ही किसी को इसका आदी बनाता। यदि उसने नशा अपनी जिंदगी में न अपनाया होता तो आज उसका बेटा जिंदा होता। आज बृजेश को अपने अपराध का पूर्ण बोध हो गया था परंतु अब यह अपराध बोध किसी काम का नहीं था क्योंकि यह अपराध बोध बहुत से नौजवानों की बलि लेकर उसके मन में आया था। 

धन्यवाद।

कहानी – अपराध बोध

 लेखक : संजय सिंह

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