‘रघुनाथ सदन’ के विशाल बरामदे में एक अजीब सी मनहूसियत छाई थी। हवेली के मुखिया, ठाकुर वीरेंद्र प्रताप सिंह का आज तेरहवीं का दिन था। गांव भर के लोग भोजन करके जा चुके थे। घर के सदस्य अब थके-हारे और उदास चेहरों के साथ दीवान पर बैठे थे।
लेकिन यह उदासी किसी अपने को खोने की कम, और किसी ‘चीज़’ के न मिलने की ज्यादा थी।
वीरेंद्र प्रताप के दो बेटे थे—बड़ा बेटा विक्रम, जो शहर में प्रॉपर्टी डीलर था, और छोटा बेटा सुमित, जो गांव में ही रहकर खेती-बाड़ी देखने का नाटक करता था। एक बेटी थी, नंदिनी, जिसकी शादी पास के ही एक रसूखदार परिवार में हुई थी।
“वकील साहब कब आएंगे?” विक्रम ने अपनी कलाई घड़ी देखते हुए झुंझलाहट में पूछा।
“आ रहे होंगे भैया,” सुमित ने पान चबाते हुए कहा। “बाबूजी की वसीयत का खुलना बहुत ज़रूरी है। सुना है उन्होंने अपनी सारी चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा एक लाल डायरी में लिखा है जो वकील साहब के पास है।”
नंदिनी, जो कोने में बैठी थी, ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया। “मुझे तो बस उस पुरानी संदूकची की चिंता है जो बाबूजी अपने पलंग के नीचे रखते थे। माँ कहती थीं कि उसमें दादी माँ के ज़माने के हीरे-जवाहरात हैं। मेरा तो उस पर ही हक़ बनता है, मैं घर की बेटी हूँ।”
इन तीनों की बातचीत सुन रही थीं उनकी माँ, सावित्री देवी। वह एक कोने में सफ़ेद साड़ी पहने बैठी थीं, बिलकुल शांत। उनकी आँखों में वीरेंद्र जी के जाने का गम तो था ही, लेकिन अपनी औलाद के इस रवैये को देख, वह गम कहीं ज्यादा गहरा हो गया था।
तभी गेट पर एक पुरानी एम्बेसडर कार रुकी। वकील मिस्टर सक्सेना अपनी भारी भरकम फाइल और एक पुरानी, धूल जमी लाल डायरी के साथ उतरे।
तीनों भाई-बहन उठ खड़े हुए।
“आइए, आइए सक्सेना चाचा,” विक्रम ने ज़रूरत से ज़्यादा अपनापन दिखाते हुए कहा। “हम आपका ही इंतज़ार कर रहे थे।”
सक्सेना जी ने सावित्री देवी को प्रणाम किया और सोफे पर बैठ गए। उन्होंने अपनी चश्मा साफ किया और फाइल खोली।
“वीरेंद्र जी मेरे बहुत अच्छे मित्र थे,” सक्सेना जी ने गंभीर आवाज़ में कहा। “उन्होंने अपनी वसीयत छह महीने पहले ही बदल दी थी।”
“बदल दी थी?” सुमित चौंक गया। “मतलब?”
“मतलब यह,” सक्सेना जी ने डायरी खोली, “कि उन्होंने अपनी संपत्ति का बंटवारा एक बहुत ही अनोखे तरीके से किया है। उन्होंने इस डायरी में तीन पहेलियां लिखी हैं। जो बच्चा जिस पहेली को सुलझा लेगा, उसे वसीयत का वो हिस्सा मिलेगा।”
तीनों भाई-बहन एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। यह क्या मज़ाक था?
“पहली पहेली विक्रम के लिए है,” सक्सेना जी ने पढ़ना शुरू किया।
“वह ज़मीन जो बंजर है, पर फिर भी सबसे ज्यादा फसल देती है। जो उसे ढूंढेगा, उसे मेरे बैंक लॉकर की चाबी मिलेगी।”
विक्रम का माथा ठनका। “बंजर ज़मीन? हमारे पास तो कोई बंजर ज़मीन नहीं है। सारी ज़मीन उपजाऊ है। यह बाबूजी भी न, बुढ़ापे में सठिया गए थे।”
“दूसरी पहेली नंदिनी के लिए है,” सक्सेना जी ने जारी रखा।
“वह गहना जो तिजोरी में नहीं, बल्कि गले में सजता है पर दिखाई नहीं देता। जो उसे पहचानेगा, उसे संदूकची मिलेगी।”
नंदिनी ने अपने गले में पड़े सोने के हार को हाथ लगाया। “दिखाई नहीं देता? ऐसा कौन सा गहना होता है?”
“और तीसरी पहेली सुमित के लिए,” सक्सेना जी ने सुमित की ओर देखा।
“वह फसल जिसे बोया नहीं जाता, पर काटा रोज़ जाता है। जो उसे खेत में जाकर ढूंढेगा, उसे हवेली के कागज़ात मिलेंगे।”
सुमित खींस निपोरने लगा। “बिना बोए फसल? यह क्या पहेलियां बुझा रहे हैं वकील साहब? सीधा-सीधा बता दीजिये न कि सब कुछ माँ के नाम है या हम तीनों में बराबर बंटेगा।”
सक्सेना जी ने डायरी बंद कर दी। “वीरेंद्र जी की यही शर्त थी। आपके पास एक हफ्ता है। अगर एक हफ्ते में आप पहेलियां नहीं सुलझा पाए, तो सारी संपत्ति ‘वृद्धाश्रम ट्रस्ट’ को दान कर दी जाएगी।”
यह सुनते ही तीनों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। लाखों-करोड़ों की जायदाद हाथ से निकल जाएगी?
अगले दिन से घर में कोहराम मच गया।
विक्रम, जो शहर का बड़ा प्रॉपर्टी डीलर था, उसने पटवारी को बुलाया। पुराने नक्शे निकाले गए। गांव के कोने-कोने में ढूंढा गया कि कहीं कोई ऐसी ज़मीन तो नहीं जिसे बाबूजी ने छुपा कर रखा हो। वह दिन भर धूप में भटकता रहा। जो विक्रम कभी एसी कमरे से बाहर नहीं निकलता था, अब कीचड़ और धूल में सना हुआ खेतों की खाक छान रहा था।
नंदिनी ने माँ की सारी अलमारियां छान मारीं। वह पुराने बक्सों में, स्टोर रूम में, यहाँ तक कि मंदिर में भी गहने ढूंढती रही। उसे लगा शायद ‘दिखाई न देने वाला गहना’ कोई जादुई ताबीज़ होगा। वह रात-रात भर जागकर पुराने कागज़ात पढ़ती रही।
सुमित खेतों में पागलों की तरह घूमने लगा। वह हर पौधे को देखता, हर मजदूर से पूछता। उसे लगा शायद बाबूजी ने अफीम या गांजे की कोई गुप्त खेती कर रखी हो जिसे ‘बिना बोए’ उगाया जाता है।
तीन दिन बीत गए। किसी के हाथ कुछ नहीं लगा। हताशा और थकान से चूर होकर तीनों भाई-बहन रात को आंगन में बैठे थे।
सावित्री देवी उनके पास आईं। उनके हाथ में तीन गिलास छाछ थी।
“थक गए?” उन्होंने प्यार से पूछा।
“माँ, आपको तो पता होगा न?” विक्रम ने झुंझलाते हुए कहा। “बाबूजी ने आपको तो बताया होगा कि वह बंजर ज़मीन कहाँ है?”
सावित्री देवी मुस्कुराईं। “बेटा, तुम्हारे बाबूजी ने मुझे सिर्फ़ एक ही चीज़ बताई थी—कि जीवन का असली धन वह नहीं जो हम जमा करते हैं, बल्कि वह है जो हम जीते हैं।”
“फिर वही ज्ञान,” नंदिनी ने मुंह बनाया। “यहाँ करोड़ों की बात हो रही है और आप फिलॉसफी झाड़ रही हैं।”
तभी वहां रामू काका आए। रामू काका इस घर के पुराने नौकर थे, जिन्होंने इन तीनों को अपनी गोद में खिलाया था। अब वह बूढ़े हो चुके थे और हवेली के पीछे वाली कोठरी में रहते थे।
“छोटे मालिक,” रामू काका ने सुमित से कहा, “खेत में नहर के पास वाली मेड़ टूट गई है। पानी बह रहा है। मजदूर छुट्टी पर हैं। अगर नहीं रोका तो फसल ख़राब हो जाएगी।”
“तो मैं क्या करूँ?” सुमित चिल्लाया। “मैं यहाँ हवेली के कागज़ ढूंढ रहा हूँ और तुम्हें मेड़ की पड़ी है। जा भाग यहाँ से।”
रामू काका चुपचाप चले गए। सावित्री देवी उठीं और खुद फावड़ा उठाने लगीं।
यह देखकर विक्रम को थोड़ी शर्म आई। “माँ, आप रहने दीजिये। मैं देखता हूँ।”
विक्रम गया, तो सुमित को भी शर्म आई। वह भी पीछे-पीछे गया। और जब दोनों भाई जा रहे थे, तो नंदिनी अकेली कैसे रहती? वह भी चल पड़ी।
खेत पर पहुंचकर उन्होंने देखा कि वाकई पानी तेज़ी से बह रहा था। तीनों भाई-बहन, जो कभी अपने कपड़ों पर एक दाग बर्दाश्त नहीं करते थे, कीचड़ में उतर गए। उन्होंने मिट्टी खोदी, पत्थर उठाए और घंटों की मेहनत के बाद मेड़ बांधी।
पसीने से लथपथ होकर जब वे मेड़ पर बैठे, तो ठंडी हवा का एक झोंका आया। सामने लहलहाती हरी फसल थी।
सुमित ने पसीना पोंछते हुए कहा, “यार, बचपन में हम यहीं खेलते थे न? याद है जब बाबूजी हमें कंधे पर बिठाकर यहाँ लाते थे?”
“हाँ,” विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा। “और तुम हमेशा इस नहर में गिर जाते थे।”
नंदिनी हंसी। “और तुम दोनों मुझे डराने के लिए मेंढक पकड़ लाते थे।”
सालों बाद, तीनों खुलकर हंसे। उस हंसी में कोई बनावट नहीं थी, कोई लालच नहीं था। सिर्फ़ बचपन की मासूमियत थी।
घर लौटते समय, रास्ते में उन्होंने देखा कि गाँव के स्कूल की दीवार गिरी हुई थी। कुछ बच्चे धूप में बैठे पढ़ रहे थे।
“यह स्कूल तो बाबूजी ने बनवाया था न?” नंदिनी ने पूछा।
“हाँ,” विक्रम रुका। “कितनी बुरी हालत हो गई है इसकी।”
बिना कुछ कहे, तीनों स्कूल के अंदर गए। मास्टर जी ने उन्हें पहचाना। विक्रम ने तुरंत अपनी जेब से चेकबुक निकाली और स्कूल की मरम्मत के लिए एक बड़ी रकम का चेक काट दिया। नंदिनी ने बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया, और सुमित ने बच्चों के लिए पास की दुकान से बिस्कुट मंगवाए।
शाम को जब वे घर लौटे, तो उनके चेहरे पर थकान तो थी, लेकिन एक अजीब सा सुकून भी था। वह सुकून जो पिछले तीन दिनों की भागदौड़ में नदारद था।
रात को खाने की मेज़ पर, सावित्री देवी ने देखा कि उनके बच्चे बदल रहे हैं। वे आज जायदाद की बात नहीं कर रहे थे, बल्कि स्कूल और खेत की बात कर रहे थे।
सातवां दिन आ गया। सक्सेना वकील फिर आए।
“तो?” सक्सेना जी ने पूछा। “सुलझा ली पहेलियां?”
तीनों भाई-बहन एक-दूसरे को देखने लगे। उनके पास जवाब नहीं था। उन्होंने हार मान ली थी।
“नहीं चाचा जी,” विक्रम ने सिर झुकाकर कहा। “हमें कुछ नहीं मिला। न बंजर ज़मीन, न वो गहना, और न वो फसल। आप यह जायदाद ट्रस्ट को दे दीजिये। शायद हम इसके लायक नहीं हैं।”
सुमित ने जोड़ा, “हाँ, वैसे भी पिछले एक हफ्ते में हमने जो मेहनत की, उससे हमें यह तो समझ आ गया कि हम अपनी मेहनत से भी कमा सकते हैं। बाबूजी की कमाई पर कब तक ऐश करेंगे।”
नंदिनी ने कहा, “और ट्रस्ट में देने से कम से कम किसी गरीब का भला होगा। माँ हमारे साथ रहेंगी, हम उन्हें संभाल लेंगे।”
सक्सेना जी के चेहरे पर एक मुस्कान तैर गई। उन्होंने सावित्री देवी की ओर देखा, जिन्होंने सहमति में सिर हिलाया।
“तुम्हें जवाब नहीं मिले,” सक्सेना जी ने कहा, “लेकिन तुमने पहेलियों को जी लिया।”
“मतलब?” तीनों हैरान थे।
सक्सेना जी ने डायरी खोली। “विक्रम, तुम्हारी पहेली थी—वह ज़मीन जो बंजर है, पर फिर भी सबसे ज्यादा फसल देती है। बेटा, वह ज़मीन ‘इंसान का मन’ है। जब तक मन में अहंकार और लालच है, वह बंजर है। लेकिन जब उसमें सेवा और त्याग का बीज पड़ता है, तो वह सुकून की फसल देती है। तुमने स्कूल में दान देकर उस बंजर ज़मीन को उपजाऊ बना दिया।”
उन्होंने विक्रम को लॉकर की चाबी थमा दी।
“नंदिनी,” सक्सेना जी उसकी ओर मुड़े। “वह गहना जो तिजोरी में नहीं, गले में सजता है। वह गहना है—’वाणी की मिठास और अपनों का प्यार’। तुमने पिछले कुछ दिनों में अपनी माँ और भाइयों से जिस प्यार से बात की, और बच्चों को पढ़ाया, वही असली गहना है। जो दिखाई नहीं देता, पर चमकता है।”
उन्होंने संदूकची की चाबी नंदिनी को दी।
“और सुमित,” सक्सेना जी ने सुमित के कंधे पर हाथ रखा। “वह फसल जिसे बोया नहीं जाता, पर काटा रोज़ जाता है। वह फसल है—’कर्म’। तुम जैसा करोगे, वैसा ही काटोगे। तुमने खेत में पसीना बहाकर अपने आलस्य को काट दिया। और आज जो तुम अपनी मेहनत की बात कर रहे हो, वही असली फसल है।”
उन्होंने हवेली के कागज़ सुमित के हाथ में रख दिए।
तीनों भाई-बहन अवाक रह गए। वीरेंद्र प्रताप ने सिर्फ़ अपनी दौलत नहीं बांटी थी, उन्होंने अपनी औलाद को इंसान बना दिया था।
विक्रम ने लॉकर की चाबी माँ के चरणों में रख दी। “यह आपकी है माँ। मुझे नहीं चाहिए।”
नंदिनी ने संदूकची की चाबी सुमित को दे दी। “तू रख ले, खेती में काम आएगी।”
सुमित ने कागज़ विक्रम को दे दिए। “भैया, आप बड़े हो, यह आपका हक़ है।”
सावित्री देवी की आँखों से आंसू बह निकले। उन्होंने तीनों को गले लगा लिया। “मेरे बच्चों, तुम्हारे बाबूजी यही देखना चाहते थे। वह जानते थे कि जिस दिन तुम लालच छोड़ दोगे, उसी दिन तुम इस दौलत को संभालने के लायक बनोगे।”
उस रात ‘रघुनाथ सदन’ में असली दीवाली मनी। कोई आतिशबाजी नहीं थी, लेकिन दिलों के दीये जल रहे थे। हवेली वही थी, लोग वही थे, लेकिन अब वह ईंट-पत्थर का मकान नहीं, एक ‘घर’ बन गया था।
और वह संदूकची? जब नंदिनी ने उसे खोला, तो उसमें हीरे-जवाहरात नहीं थे। उसमें वीरेंद्र प्रताप की डायरी थी, जिसमें बचपन की उनकी तस्वीरें और हर बच्चे के लिए एक चिट्ठी थी। उस चिट्ठी में लिखा था—“असली वसीयत बैंक में नहीं, तुम्हारे संस्कारों में छोड़कर जा रहा हूँ।”
गांव वालों ने जब सुना कि बच्चों ने जायदाद के लिए लड़ना छोड़ दिया है और सब कुछ माँ के कदमों में रख दिया है, तो उन्हें यकीन नहीं हुआ। लेकिन सच यही था कि पहेलियों के उस खेल ने जिंदगी का सबसे बड़ा सच उनके सामने रख दिया था—कि जब हम मुट्ठी खोलते हैं, तभी हम पूरी दुनिया को थाम सकते हैं।
लेखिका : रमा शुक्ला