मां कोई ज़रूरत नहीं होती, मां तो वो नीव होती है – लतिका श्रीवास्तव 

“मां..! अब मैं यहां एक पल भी नहीं रुक सकता। इस घर की दीवारों में अब मेरा और मेघा का दम घुटता है।” राघव ने अपना सूटकेस डाइनिंग टेबल पर पटकते हुए चीखकर कहा। उसकी आंखों में आंसू और गुस्सा दोनों एक साथ तैर रहे थे।

“तो रुकने को कहा किसने है?” कौशल्या देवी ने अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे, बिना नज़रें उठाए सपाट लहज़े में कहा। “यह घर अब वैसे भी अभय का है। जिसे इस घर के नियमों से दिक्कत है, वो अपना रास्ता नाप सकता है।”

राघव सन्न रह गया। उसे उम्मीद थी कि मां उसे रोकेंगी, समझाएंगी, या कम से कम अभय को डांटेंगी। लेकिन मां के मुंह से निकले इन शब्दों ने उसे भीतर तक तोड़ दिया।

“हां मां… ठीक है। हम ही चले जाएंगे,” राघव ने एक कड़वी हंसी के साथ कहा। “वैसे भी, अब दुकान चल पड़ी है, कर्ज़ उतर गया है, तो मेरी ज़रूरत क्या है? और दुनिया का दस्तूर है मां, जहां ज़रूरत खत्म हो जाए, वहां इज़्ज़त अपने आप खत्म हो जाती है।”

अब तक की कहानी पढ़कर आपको लग रहा होगा कि यह दो भाइयों, राघव और अभय के बीच जायदाद की लड़ाई है, जिसमें मां, कौशल्या देवी, अपने छोटे और नाकारा बेटे अभय का पक्ष ले रही हैं। लेकिन क्या सच वही होता है जो आँखों को दिखाई देता है? या फिर इस कठोरता के पीछे ममता का कोई ऐसा रूप छिपा था जिसे समझने के लिए राघव की उम्र अभी कच्ची थी?

आइए, इस कहानी के पन्ने शुरू से पलटते हैं।

राघव के पिता, दीनानाथ जी, शहर के मशहूर स्वर्णकार (सुनार) थे। उनकी दुकान ‘दीनानाथ एंड संस’ की साख पूरे बाज़ार में थी। लेकिन जिस रात दीनानाथ जी को दिल का दौरा पड़ा, उस रात सिर्फ उनकी सांसें नहीं थमीं, बल्कि उस घर की खुशियां भी हमेशा के लिए थम गईं।

उस वक्त राघव महज इक्कीस साल का था और अभय ग्यारह साल का। राघव का सपना था कि वह सिविल सर्विसेज़ की तैयारी करे और कलेक्टर बने। वह पढ़ने में होनहार था, उसकी आंखों में बड़े सपने थे। लेकिन पिता की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि लेनदारों ने घर का दरवाज़ा खटखटाना शुरू कर दिया।

दीनानाथ जी ने अपनी बीमारी के इलाज और व्यापार को बढ़ाने के लिए बाज़ार से बहुत पैसा उठा रखा था। स्थिति यह थी कि दुकान और घर, दोनों गिरवी पड़े थे।

उस नाजुक वक्त में, कौशल्या देवी ने अपने जेवर राघव के हाथों में रख दिए थे और कहा था, “बेटा, अब तू ही इस घर का मुखिया है। अभय अभी बच्चा है, उसे इस आंच से बचाना तेरी ज़िम्मेदारी है।”

और राघव ने वह ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई। उसने अपनी किताबें रद्दी में बेच दीं और पिता की गद्दी पर बैठ गया। जिस उम्र में लड़के दोस्तों के साथ घूमते हैं, राघव उस उम्र में ब्याज का हिसाब जोड़ रहा था। उसने दिन-रात एक कर दिया। अपनी जवानी, अपने सपने, अपनी खुशियां—सब कुछ उस भट्टी में झोंक दिया ताकि घर बच सके और अभय की पढ़ाई पूरी हो सके।

पंद्रह साल गुज़र गए। राघव ने न सिर्फ सारा कर्ज़ उतारा, बल्कि दुकान को शहर का सबसे बड़ा शोरूम बना दिया। उसने अभय को एमबीए करने के लिए विदेश भेजा। राघव की शादी मेघा से हुई, जो एक सुलझी हुई लड़की थी और राघव के संघर्ष का सम्मान करती थी।

लेकिन कहानी में मोड़ तब आया जब अभय विदेश से पढ़ाई पूरी करके लौटा।

राघव ने सोचा था कि अब छोटा भाई आ गया है, तो उसका हाथ बंटाएगा। लेकिन अभय के सिर पर तो कुछ और ही नशा सवार था। उसे लगता था कि राघव का काम करने का तरीका ‘पुराना’ और ‘देहाती’ है। वह शोरूम को बेचकर उस पैसे से शेयर बाज़ार और क्रिप्टो में पैसा लगाना चाहता था।

“भैया, आप कब तक यह तराजू लेकर बैठे रहेंगे?” अभय अक्सर खाने की मेज पर ताना मारता। “यह सब बेचो, लिक्विड कैश करो और लाइफ एन्जॉय करो। आपने पूरी ज़िंदगी गधों की तरह काम किया है।”

राघव को दुख होता, लेकिन वह चुप रहता। उसे लगता था कि अभय अभी नादान है। लेकिन धीरे-धीरे अभय की बदतमीज़ियां बढ़ने लगीं। वह मेघा को बात-बात पर अपमानित करने लगा। वह नौकरों के साथ, और यहां तक कि पुराने ग्राहकों के साथ भी बदसलूकी करने लगा।

और सबसे हैरानी की बात यह थी कि कौशल्या देवी, जो कभी राघव की एक छींक आने पर भी परेशान हो जाती थीं, अब अभय की हर गलती पर पर्दा डालने लगी थीं।

आज दोपहर तो हद ही हो गई थी।

राघव दुकान पर था जब उसे पता चला कि अभय ने एक बड़े बिल्डर को घर का मुआयना करने के लिए बुलाया है। अभय घर बेचना चाहता था। जब राघव ने घर आकर इसका विरोध किया, तो अभय ने सबके सामने राघव का कॉलर पकड़ लिया।

“यह घर मेरे बाप का है!” अभय चिल्लाया था। “और अब इस पर मेरा हक़ है। आपने तो वैसे भी दुकान से बहुत कमा लिया, अब इस घर के पैसे मुझे चाहिए।”

राघव ने हाथ उठाना चाहा, लेकिन कौशल्या देवी बीच में आ गईं। राघव को लगा कि मां अभय को तमाचा मारेंगी। लेकिन हुआ उल्टा।

कौशल्या देवी ने राघव का हाथ झटक दिया और कहा, “खबरदार जो अभय को हाथ लगाया। वह सही कह रहा है। उसे उसकी हिस्सा चाहिए। और अगर तुझे इस घर में क्लेश करना है, तो तू निकल जा यहां से।”

यही वह पल था जब राघव का सब्र टूट गया।

वर्तमान में, राघव और मेघा अपना सामान पैक कर चुके थे। हॉल में सन्नाटा पसरा था। अभय सोफे पर पैर फैलाकर बैठा था, उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी। कौशल्या देवी अपनी जगह पर पत्थर की मूरत बनी बैठी थीं।

राघव अपने सूटकेस के साथ मुख्य द्वार तक पहुंचा। वह एक आखिरी बार रुका। उसे उम्मीद थी कि शायद अब भी मां उसे रोक लेंगी। शायद कहेंगी कि ‘मैं तो बस गुस्सा थी’।

“मां, मैं जा रहा हूं,” राघव का गला रुंध गया। “अपना ख्याल रखना। अभय को तो शायद वक्त ही नहीं मिलेगा।”

कौशल्या देवी ने अपनी आंचल की गांठ से चाबियों का एक गुच्छा निकाला और मेज पर रख दिया।

“यह ले,” कौशल्या देवी ने कहा। “यह शहर के दूसरे छोर वाले उस पुराने गोदाम की चाबियां हैं जो तेरे पिता ने कभी खरीदा था। वह खाली पड़ा है। जब तक तू अपना नया घर नहीं ले लेता, वहां रह सकता है। बस, इससे ज़्यादा की उम्मीद मत रखना।”

अभय हंसा। “अरे वाह मां! जाते-जाते भी खैरात? गोदाम में रहेगा हमारा ‘महान’ भाई?”

राघव ने बिना कुछ बोले चाबियां उठाईं और मेघा का हाथ पकड़कर घर से बाहर निकल गया। उसके पीछे लोहे का भारी गेट बंद होने की आवाज़ आई, जो सीधे उसके दिल पर लगी।

राघव और मेघा टैक्सी में बैठकर उस गोदाम की तरफ चल पड़े। पूरी रास्ते राघव रोता रहा। उसे घर छूटने का गम नहीं था, उसे गम था उस विश्वास के टूटने का जो उसने अपनी मां पर किया था। उसे लग रहा था कि मां ने उसे दूध में से मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया।

वे उस पुराने इलाके में पहुंचे। गोदाम की हालत बाहर से खस्ता थी। राघव ने भारी मन से शटर का ताला खोला। अंदर अंधेरा था और धूल की परत जमी थी।

मेघा ने मोबाइल की टॉर्च जलाई। “राघव, यहां कैसे रहेंगे? यहां तो…”

मेघा की आवाज़ अचानक रुक गई। उसने दीवार पर चिपके एक लिफाफे की तरफ इशारा किया। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—’मेरे बेटे राघव के लिए’।

राघव ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला। अंदर एक पत्र था और कुछ कानूनी कागज़ात। राघव ने पढ़ना शुरू किया।

*”मेरे प्यारे राघव,*

*मुझे पता है कि आज तू मुझे दुनिया की सबसे बुरी मां समझ रहा होगा। शायद तू मुझे नफरत भरी निगाहों से देख रहा होगा। लेकिन बेटा, कभी-कभी पेड़ को बचाने के लिए उसकी सबसे मज़बूत शाखा को काटना पड़ता है ताकि उसे दूसरी जगह लगाया जा सके और वह अपनी जड़ें फैला सके।*

*तूने पंद्रह साल इस परिवार के लिए अपनी ज़िंदगी होम कर दी। तूने अपने सपने मार दिए ताकि अभय पढ़ सके, ताकि मैं आराम से रह सकूं। तू ‘श्रवण कुमार’ बनकर हमारी पालकी ढोता रहा। लेकिन बेटा, पालकी ढोने वाला कभी अपनी मंज़िल तक नहीं पहुंचता, वह बस दूसरों को उनकी मंज़िल तक पहुंचाता है।*

*अभय लालची है, यह मैं जानती हूं। लेकिन तू यह नहीं जानता कि तेरे पिता अपने पीछे एक और बड़ा कर्ज़ छोड़ गए थे—एक ऐसा गुप्त समझौता जो उन्होंने अपने भाई (तेरे ताऊजी) के साथ किया था। इस हवेली के कागज़ात असली नहीं हैं राघव। इस हवेली पर पिछले दस सालों से कोर्ट केस चल रहा है और अगले महीने इसका फैसला आने वाला है। हमारे हारने की पूरी उम्मीद है क्योंकि तेरे पिता ने कुछ गलतियों की थीं।*

*अगर तू वहां रहता, तो तू अपनी सारी जमा-पूंजी, अपनी दुकान की कमाई, सब कुछ इस खण्डहर को बचाने में लगा देता। मैं जानती हूं तुझे, तू भावनाओं में बहकर फिर से ‘त्याग’ की मूरत बन जाता। और अभय? वह तुझे नोच खाता। वह चाहता है कि तू दुकान बेचकर उसे पैसे दे।*

*इसलिए मुझे तुझे ‘धक्का’ देना पड़ा। मुझे तुझे उस घर से बेइज्जत करके निकालना पड़ा, ताकि तेरा मोह भंग हो सके। ताकि तू पलटकर उस डूबते हुए जहाज को बचाने न आए।*

*तू जिस ‘गोदाम’ में खड़ा है, यह मैंने अपनी स्त्री-धन और छिपायी हुई बचत से दस साल पहले तेरे नाम खरीदा था। यह शहर के नए मास्टर प्लान के बीच में आता है। इसकी कीमत आज उस पुरानी हवेली से तीन गुनी है। यह तेरा है, सिर्फ तेरा। इस पर न अभय का हक़ है, न किसी कर्ज़दार का।*

*अभय को हवेली चाहिए थी, मैंने उसे दे दी। अब वह मुकदमों और लेनदारों से निपटे। उसे सबक सीखने के लिए ठोकर खानी ज़रूरी है। लेकिन तू… तू बहुत थक चुका है मेरे बच्चे। अब तेरे लिए अपने सपनों को जीने का वक्त है। उड़ जा, अब तुझे मेरे आंचल की छांव की ज़रूरत नहीं, और मुझे इस बात का सुकून है कि मेरा शेर अब आज़ाद है।*

*मुझे माफ़ मत करना, बस खुश रहना।*

*- तेरी अभागन, पर तेरी ही मां।”*

राघव के हाथों से चिट्ठी छूटकर गिर गई। वह घुटनों के बल बैठ गया और दहाड़ें मारकर रोने लगा। मेघा ने भी चिट्ठी पढ़ी और उसकी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे।

वह जिसे ‘निष्कासन’ समझ रहा था, वह असल में ‘मुक्ति’ थी। मां ने खुद को उस नर्क में, उस लालची बेटे और मुकदमों के बीच अकेला छोड़ दिया था, ताकि राघव अपनी नई दुनिया बसा सके। वह अभय के ताने, रिश्तेदारों की बातें और बुढ़ापे की तकलीफें अकेले सहने के लिए वहां रुक गई थीं।

“मां…” राघव बुदबुदाया। “आपने मुझे घर से नहीं निकाला… आपने मुझे बचा लिया।”

उसी वक्त राघव का फोन बजा। स्क्रीन पर ‘वकील अंकल’ का नाम था। राघव ने फोन उठाया।

“राघव,” वकील साहब की आवाज़ गंभीर थी। “तुम्हारी मां ने मुझे अभी फोन किया था। उन्होंने वसीयत बदल दी है। दुकान का पूरा मालिकाना हक़ तुम्हारे नाम है। और हां… अभय ने अभी-अभी हवेली बेचने का एग्रीमेंट साइन करने की कोशिश की, लेकिन पता चला कि हवेली तो पहले से ही कोर्ट के रिसीवर के पास है। वहां बहुत हंगामा हो रहा है। कौशल्या भाभी जी… वो बहुत शांत हैं। कह रही हैं कि उन्हें पता था।”

राघव ने आंसू पोंछे और खड़ा हुआ। उसका चेहरा अब बदला हुआ था। उसमें दुख नहीं, एक दृढ़ निश्चय था।

“मेघा,” राघव ने कहा। “समान मत खोलो।”

“हम वापस जा रहे हैं?” मेघा ने पूछा।

“नहीं,” राघव ने गोदाम के शटर को देखा। “हम वापस उस नर्क में नहीं जाएंगे। मां ने मुझे आज़ाद किया है, मैं उस आज़ादी का अपमान नहीं करूंगा। हम यहां, इसी गोदाम से शुरुआत करेंगे। एक नई दुनिया बनाएंगे। लेकिन मां वहां अकेली नहीं रहेंगी।”

“मतलब?”

“मतलब यह कि अभय को हवेली चाहिए थी, उसे मिल गई (भले ही मुकदमों वाली)। लेकिन मां… मां मेरी हैं। और मेरी ज़रूरत और मेरी इज़्ज़त, दोनों मां के चरणों में है।”

राघव ने गाड़ी की चाबी उठाई। “मैं मां को लेने जा रहा हूं। अगर यह गोदाम मेरा महल है, तो उसकी रानी कौशल्या देवी ही होंगी।”

मेघा मुस्कुराई और गाड़ी में बैठ गई।

जब राघव वापस हवेली पहुंचा, तो वहां पुलिस और वकील खड़े थे। अभय चिल्ला रहा था, अपना सिर पीट रहा था। उसे समझ आ गया था कि उसके हाथ में सिर्फ ईंट-पत्थर आए हैं, जिनकी कोई कीमत नहीं।

कौशल्या देवी बरामदे में अपनी माला जप रही थीं। जैसे ही उन्होंने राघव को देखा, उनकी माला रुक गई। उनकी आंखों में एक सवाल था—*तू वापस क्यों आया?*

राघव सीधा उनके पास गया, बिना कुछ बोले उन्हें गोद में उठा लिया।

“क्या कर रहा है? छोड़ मुझे! मैंने कहा था न निकल जा!” कौशल्या देवी ने विरोध किया, लेकिन उनकी आवाज़ में अब वह सख्ती नहीं थी।

“आपने घर से निकाला था मां, दिल से नहीं,” राघव ने मुस्कुराते हुए कहा। “अभय को घर मुबारक। मुझे मेरा ‘घर’ मिल गया।”

उसने मां को गाड़ी में बैठाया। अभय पीछे से चिल्लाता रहा, “भैया! भैया मुझे बचा लो! यह सब फ्रॉड है!”

राघव ने कांच नीचे किया और कहा, “अभय, तूने कहा था न कि जहां ज़रूरत खत्म, वहां इज़्ज़त खत्म? आज से मेरी ज़रूरत तुम दोनों को नहीं है। लेकिन मां… मां कोई ज़रूरत नहीं होती, मां तो वो नीव होती है जिसके बिना इमारत खड़ी नहीं रह सकती। तू ईंटें रख, मैं नीव ले जा रहा हूं।”

गाड़ी धूल उड़ाती हुई निकल गई। पीछे रह गया एक लालची बेटा और एक वीरान हवेली। और आगे जा रहा था एक छोटा सा परिवार, जिसके पास भले ही गोदाम की चार दीवारें थीं, लेकिन उनके पास दुनिया की सबसे बड़ी दौलत थी—एक मां का त्याग और एक बेटे का समर्पण।

उस रात, गोदाम के ठंडे फर्श पर भी राघव को जो नींद आई, वह पिछले पंद्रह सालों में मखमली गद्दों पर भी नहीं आई थी।

मूल लेखिका : लतिका श्रीवास्तव 

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