“लो, तुम फिर यहाँ अँधेरे में खड़ी आँसू बहा रही हो… अब क्या हुआ? अभी तो अंदर सब कितना हँस-बोल रहे थे, समीर की प्रमोशन की खुशी मना रहे थे
और तुम अचानक उठ कर यहाँ बालकनी में आकर रोना चालू हो गई।” पति, विवेक ने झुंझलाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में चिंता कम और खीझ ज़्यादा थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आज के दिन, जब घर में जश्न का माहौल है, उसकी पत्नी सुरभि को क्या हुआ है।
“आप नहीं समझेंगे विवेक,” सुरभि ने अपनी रुंधि हुई आवाज़ को संयत करते हुए कहा और अपनी साड़ी के पल्लू से तेज़ी से आँसू पोंछ लिए। उसने एक गहरी सांस ली, चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान चिपकाई और वापस हॉल में जाने के लिए मुड़ गई।
हॉल में विवेक के ऑफिस के कलीग्स और कुछ रिश्तेदार बैठे थे। हंसी-ठिठोली चल रही थी। विवेक की माँ, सुमित्रा जी, सोफे पर बैठीं बड़े गर्व से अपने बेटे की उपलब्धियों के किस्से सुना रही थीं। सुरभि ने अंदर कदम रखा और खुद को सहज दिखाने की कोशिश करने लगी। उसने पानी का जग उठाया और मेहमानों के गिलासों में पानी भरने लगी।
सुमित्रा जी की अनुभवी और बूढ़ी आँखों ने सुरभि की आँखों में उतर आए उस सूनेपन को पढ़ लिया था, जिसे वह काजल की मोटी परत के नीचे छिपाने की कोशिश कर रही थी।
सुरभि की हँसी तो थी, लेकिन वो आँखों तक नहीं पहुँच रही थी। सुमित्रा जी ने कुछ कहा नहीं, बस एक पल के लिए अपनी बहू को गौर से देखा और फिर वापस बातों में मशगूल हो गईं। उन्हें लगा अभी सबके सामने कुछ भी बोलना मुनासिब नहीं होगा।
थोड़ी देर बाद, जब मेहमानों का एक दौर चला गया और घर के करीबी लोग ही बचे, तो सुमित्रा जी ने कमान संभाली।
“चलो, अब बहुत बातें हो गईं। रात का खाना लगाओ। विवेक, तुम अपने दोस्तों को टेबल पर ले जाओ,” सुमित्रा जी ने आदेश दिया।
सुरभि ने राहत की सांस ली। उसे भीड़ से दूर जाने का बहाना मिल गया। वह तेज़ कदमों से रसोई में चली गई और कड़ाही में तेल गरम करने लगी। पूरियां तलने की तैयारी पहले से थी।
रसोई में चिमनी की आवाज़ गूंज रही थी, लेकिन सुरभि के दिमाग में उससे भी तेज़ शोर था। वह यंत्रवत तरीके से आटे की लोई बना रही थी और उसे बेल रही थी।
तभी उसे अपने पीछे किसी की मौजूदगी का अहसास हुआ। वह सुमित्रा जी थीं। उन्होंने धीरे से सुरभि के हाथ से बेलन ले लिया और खुद बेलने लगीं।
“तुम तलो, मैं बेल देती हूँ,” सुमित्रा जी ने कहा। उनकी आवाज़ में वो कड़कपन नहीं था जो अक्सर होता था।
“अरे नहीं माँजी, आप क्यों… मैं कर लूँगी, आप बाहर बैठिए,” सुरभि ने संकोचते हुए कहा।
“चुपचाप तलो,” सुमित्रा जी ने हल्के से डांटा।
थोड़ी देर तक दोनों के बीच सिवाय तेल के छनछनाने के और कोई आवाज़ नहीं थी।
फिर सुमित्रा जी ने सुरभि के चेहरे की तरफ देखे बिना, बस आटे पर नज़र गड़ाए हुए धीमे स्वर में पूछा, “बहू, क्या बात है? मायके की याद आ रही है? या विवेक ने कुछ कह दिया?”
“नहीं तो माँजी… ऐसी कोई बात नहीं है,” सुरभि ने नज़रें चुराते हुए कड़ाही में पूरी डाली। तेल का एक छींटा उसके हाथ पर लगा, पर उसे दर्द महसूस नहीं हुआ। उसके अंदर का दर्द कहीं गहरा था।
सुमित्रा जी रुकीं। उन्होंने बेलन चकले पर रखा और सुरभि का हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर घुमाया।
“सुरभि, मैं इस घर की सास बाद में हूँ, औरत पहले हूँ। और एक औरत की उदासी दूसरी औरत से छिपी नहीं रह सकती। आज विवेक का प्रमोशन हुआ, सब खुश हैं। लेकिन मैंने देखा, जब विवेक बता रहा था कि उसे ‘रीजनल हेड’ बना दिया गया है और अब उसे और ज्यादा ट्रेवल करना पड़ेगा, तब तुम्हारे चेहरे का रंग उड़ गया था। क्यों?”
सुरभि की आँखों के बांध फिर से टूट गए। इस बार वह रोक नहीं पाई। रसोई के उस धुएं और मसालों की महक के बीच, उसका सालों पुराना दबा हुआ गुबार बाहर आ गया।
“माँजी… मैं… मैं खुश हूँ विवेक के लिए। बहुत खुश हूँ। लेकिन…” सुरभि हिचकिचाई।
“लेकिन क्या?” सुमित्रा जी ने नरमी से पूछा।
“लेकिन आज मुझे अपनी हार दिखाई दे रही है माँजी,” सुरभि सिसक उठी। “आपको याद है शादी से पहले मैं क्या करती थी?”
सुमित्रा जी ने सिर हिलाया। “हाँ, तुम एक आर्किटेक्ट फर्म में काम करती थी। बहुत नाम था तुम्हारा।”
“सिर्फ काम नहीं करती थी माँजी, मैं उस फर्म की सबसे यंग पार्टनर बनने वाली थी। विवेक और मैंने साथ ही करियर शुरू किया था। हम दोनों एक ही मुकाम पर थे। फिर शादी हुई… घर की जिम्मेदारियां आईं… फिर आरव का जन्म हुआ।” सुरभि ने अपने आंसू पोंछे। “सबने कहा, बस कुछ साल की बात है, बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाए फिर ज्वाइन कर लेना। मैंने भी सोचा कि ठीक है, परिवार पहले आता है। मैंने अपनी जॉब छोड़ दी। विवेक आगे बढ़ता गया, सीढ़ियां चढ़ता गया। और मैं? मैं घर, रसोइ, आरव का स्कूल, और आपकी दवाइयों में ही सिमट कर रह गई।”
सुमित्रा जी चुपचाप सुनती रहीं।
सुरभि का स्वर अब थोड़ा कड़ा हो गया था, जिसमें शिकायत कम और पीड़ा ज्यादा थी। “आज जब सब विवेक की तारीफ कर रहे थे, तो किसी ने मुझसे पूछा—’भाभीजी आप क्या करती हैं?’ इससे पहले कि मैं कुछ बोलती, विवेक ने हंसते हुए कह दिया—’अरे, ये तो हमारी होम मिनिस्टर हैं, पूरे घर का नक्शा यही संभालती हैं।’ सब हंस पड़े। विवेक को लगा उन्होंने मेरी तारीफ की है। पर मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे वजूद पर तमाचा मारा हो। नक्शे मैं इमारतों के बनाती थी माँजी, अब मैं सिर्फ इस बात का नक्शा बनाती हूँ कि कल टिफिन में क्या जाएगा।”
सुरभि रोते-रोते हाँफने लगी थी। “मुझे जलन नहीं है विवेक से, पर मुझे दुख है ‘उस सुरभि’ के लिए जो कहीं मर गई है। और आज विवेक की सफलता ने मुझे मेरी असफलता का आईना दिखा दिया।”
रसोई में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी की आँखों में एक अजीब सी परछाई थी। उन्होंने गैस बंद कर दी। अधपकी पूरी तेल में ही रह गई।
“हाथ पोंछ लो,” सुमित्रा जी ने आदेश दिया।
सुरभि समझ नहीं पाई। उसने अपने आँसू और हाथ पोंछे।
सुमित्रा जी ने सुरभि का हाथ पकड़ा और उसे रसोई से बाहर हॉल की तरफ ले गईं। विवेक और बाकी मेहमान खाना लगने का इंतज़ार कर रहे थे।
“माँ? खाना नहीं लाया अभी तक?” विवेक ने पूछा।
सुमित्रा जी ने विवेक को एक सख्त नज़र से देखा और फिर मेहमानों की तरफ मुड़ीं।
“खाना बस पाँच मिनट में लग जाएगा। लेकिन उससे पहले मुझे आप सबसे अपनी बहू का एक अलग परिचय करवाना है।”
विवेक और सुरभि दोनों हैरान थे।
सुमित्रा जी ने पास पड़ी एक मेज़ से विवेक की प्रमोशन वाली ट्रॉफी उठाई और उसे नीचे रख दिया। फिर वह अंदर कमरे में गईं और अलमारी से एक पुरानी, धूल जमी हुई फाइल निकाल लाईं। यह सुरभि का पोर्टफोलियो था, जिसे उसने शादी के बाद कभी खोलकर नहीं देखा था।
सुमित्रा जी ने वह फाइल मेहमानों के बीच वाली टेबल पर खोल दी। उसमें बड़ी-बड़ी इमारतों के डिज़ाइन, अवार्ड्स और सुरभि की तस्वीरें थीं जब उसे ‘बेस्ट आर्किटेक्ट ऑफ द ईयर’ का अवार्ड मिला था।
“आप सबने विवेक की तरक्की की बहुत तारीफ की,” सुमित्रा जी की आवाज़ हॉल में गूंजी। “लेकिन किसी ने ये नहीं देखा कि विवेक की इस उड़ान के लिए ज़मीन किसने तैयार की है? विवेक आज ऑफिस में 12 घंटे काम कर पाता है क्योंकि उसे पता है कि घर पर सुरभि है। उसका दिमाग फ्री है क्योंकि सुरभि ने अपनी ज़िंदगी की सारी उलझनों को अपने पल्लू में बांध लिया है।”
उन्होंने विवेक की ओर देखा, “तुमने कहा था न विवेक, कि ये ‘होम मिनिस्टर’ हैं? ये होम मिनिस्टर नहीं, ये वो नींव हैं जिस पर तुम्हारी सफलता की इमारत खड़ी है। और दुख की बात ये है कि हमने इस नींव को मिट्टी में इतना दबा दिया कि ये खुद को ही भूल गई।”
विवेक का सिर शर्म से झुक गया। मेहमान भी खामोश थे।
सुमित्रा जी ने सुरभि के कंधे पर हाथ रखा। “सुरभि को लगता है कि इसने कुर्बानी दी है। लेकिन असलियत ये है कि हमने इसकी कुर्बानी ली है, बड़े हक़ से। जैसे कि ये हमारा अधिकार था।”
फिर सुमित्रा जी ने एक फैसला सुनाया जिसने सबको चौंका दिया।
“कल से इस घर का नक्शा बदलेगा। विवेक, तुम अपनी नई पोस्ट की खुशी मनाओ, लेकिन कल से आरव को स्कूल छोड़ने और लाने की जिम्मेदारी तुम्हारी होगी। शाम की चाय तुम खुद बनाओगे या महाराज (रसोइया) रखे जाएंगे।”
“और सुरभि,” सुमित्रा जी अपनी बहू की ओर घूमीं, “मैंने कल शाम को मेरे पुराने वकील साहब से बात की थी। उनका बेटा शहर में नई आर्किटेक्ट फर्म खोल रहा है। उन्हें सीनियर कंसल्टेंट की ज़रूरत है। मैंने तुम्हारी तरफ से हाँ नहीं की, बस इतना कहा कि मेरी बहू कल सुबह 11 बजे इंटरव्यू के लिए आएगी।”
सुरभि की आँखें फटी की फटी रह गईं। “माँजी… आप…?”
“क्या मैं? मैं सास हूँ, कोई जेलर नहीं। मुझे वो सुरभि चाहिए जिसकी आँखों में चमक हो, न कि वो जो कोने में छुपकर रोए। अगर मेरा बेटा आसमान छू सकता है, तो मेरी बहू क्या ज़मीन पर रेंगने के लिए बनी है?”
विवेक अपनी जगह से उठा और धीरे से सुरभि के पास आया। उसने माँ और पत्नी दोनों के सामने हाथ जोड़ लिए।
“I am sorry Surabhi. सच में, मुझे अंदाज़ा ही नहीं था कि तुम अंदर ही अंदर कितना घुट रही हो। माँ सही कह रही हैं। तुम्हारी कामयाबी मेरी कामयाबी से कम नहीं थी, मैंने बस अपनी चमक में तुम्हें देखना बंद कर दिया था।”
सुरभि की आँखों में फिर से आँसू थे, लेकिन ये आँसू दुख के नहीं थे। उसे ऐसा लग रहा था जैसे सालों बाद उसे सांस लेने के लिए खुली हवा मिली हो।
“जाओ, अब खाना लगाओ,” सुमित्रा जी ने माहौल को हल्का करते हुए कहा। “कल सुबह जल्दी उठना है, इंटरव्यू के लिए तैयार होना है। और हाँ, वो पुरानी साड़ी मत पहनना, वो जो नई सिल्क की साड़ी लाई थी, वो पहनना। आर्किटेक्ट हो, दिखना भी चाहिए।”
सुरभि मुस्कुरा दी। एक सच्ची, खनकती हुई मुस्कान।
उस रात जब सुरभि मेहमानों को खाना परोस रही थी, तो वह सिर्फ विवेक की पत्नी या सुमित्रा जी की बहू नहीं थी। उसकी चाल में एक आत्मविश्वास था। वह वापस ‘सुरभि द आर्किटेक्ट’ बन रही थी।
रसोई में, बर्तन समेटते वक्त सुमित्रा जी ने धीरे से कहा, “क्यों बहू? अब तो मायके की याद नहीं आ रही?”
सुरभि ने दौड़कर अपनी सास को गले लगा लिया। “नहीं माँ, अब ये घर मुझे अपना लग रहा है। सच में अपना।”
उस दिन उस घर की चारदीवारी में सिर्फ एक महिला का करियर दोबारा शुरू नहीं हुआ था, बल्कि एक सास ने समाज की उस पुरानी रीत को भी तोड़ दिया था जहाँ बहू के सपनों की चिता पर बेटे की सफलता का जश्न मनाया जाता है।
कहानी का अंत एक नई शुरुआत के साथ हुआ।
लेखक : मनमोहन तिवारी