रघुनाथ बाबू ने अपने कंधे पर टंगा हुआ पुराना चमड़े का बैग कसकर पकड़ रखा था। उनके चेहरे की लकीरें आज किसी पत्थर की तरह सख्त हो गई थीं। आंगन में तुलसी के चौरे के पास खड़ी उनकी बूढ़ी मां, काशी देवी, कांपती हुई आवाज़ में चिल्ला रही थीं।
“रघुनाथ! तू उस दहलीज को लांघ कर नहीं जाएगा। सुन रहा है मेरी बात? पागल हो गया है क्या? ब्याही हुई बेटी की गृहस्थी में दखल देने का अंजाम जानता है? समाज थूकेगा हम पर। लोग कहेंगे कि रघुनाथ की बेटी को ससुराल वालों ने रखैल बना रखा था या पता नहीं क्या खोट था जो वापस आ गई। अरे, सात फेरे लेने के बाद लड़की की डोली उठती है तो फिर अर्थी ही उस घर से निकलती है। यह रीत है दुनिया की।”
रघुनाथ अपने कदमों पर ठिठके जरूर, लेकिन मुड़े नहीं। उन्होंने बिना पीछे देखे कहा, “रीत इंसानों के लिए होती है अम्मा, लाशों के लिए नहीं। और मैं अपनी ज़िंदा बेटी को लाश बनने का इंतज़ार नहीं कर सकता। सुमन ने कल रात फोन पर कुछ कहा नहीं, बस रोई थी। उसकी वो खामोश सिसकियां मेरे कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर गई हैं। मुझे रीत मत सिखाओ अम्मा, मुझे मेरा धर्म निभाने दो।”
“धर्म?” काशी देवी ने अपना माथा पीट लिया। “धर्म तो यह कहता है कि बेटी को समझा-बुझाकर ससुराल में ही रहने दिया जाए। थोड़ा बहुत ऊंच-नीच किस घर में नहीं होती? बरतन हैं तो खटकेंगे ही। तू वहां जाकर तमाशा करेगा तो जो थोड़ी बहुत इज्जत बची है, वो भी खाक हो जाएगी। बैठ जा शांति से, मैं बात करती हूं समधियाने में।”
तभी रसोई से लोहे की कड़ाही पटकने की तेज़ आवाज़ आई। रघुनाथ की पत्नी, सावित्री, बाहर निकल आईं। उनकी आंखों में आज वो डर नहीं था जो पिछले पच्चीस सालों से रघुनाथ या अपनी सास के सामने रहता था। आज उनकी आंखों में एक मां की पीड़ा और एक औरत का आक्रोश था।
सावित्री ने पल्लू कमर में खोंसते हुए कहा, “रहने दीजिए मां जी। आपकी बातों से अगर गृहस्थियां सुधरतीं, तो आज मेरी फूल सी बच्ची वहां नर्क नहीं भोग रही होती। रघुनाथ जी सही कह रहे हैं। अगर वो आज नहीं गए, तो मैं अकेली चली जाऊंगी। भले ही मुझे पूरी दुनिया से लड़ना पड़े।”
काशी देवी ने अपनी बहू को घूरकर देखा। “तू भी? अरे तुझे तो अकल होनी चाहिए। तू औरत है। औरत ही औरत का घर तोड़ती है। तुझे अपनी बेटी को सहनशक्ति सिखानी चाहिए थी। थोड़ा सब्र करती तो सब ठीक हो जाता।”
सावित्री कड़वाहट से हंसी। “सब्र? सहनशक्ति? यही तो सिखाया था मां जी उसे। और उसी सहनशक्ति का नतीजा है कि आज वो अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी होने के बावजूद घर के पोंछे लगा रही है। दामाद जी का फोन आया था, कह रहे थे सुमन नाटक कर रही है। उसे 103 डिग्री बुखार है मां जी! और वो लोग उससे चौका-बरतन करवा रहे हैं। क्या यही होती है गृहस्थी? क्या यही है वो ‘इज्जत’ जिसकी दुहाई आप दे रही हैं?”
रघुनाथ ने सावित्री के कंधे पर हाथ रखा, मानो उसे शांत कर रहे हों, और फिर अपनी मां की ओर मुड़े।
“अम्मा, मुझे याद है जब पिताजी गुज़रे थे, तो आपने कहा था कि अब इस घर का मान-सम्मान मेरे हाथ में है। आज मैं उसी मान को बचाने जा रहा हूं। मेरा मान मेरी बेटी की मुस्कान में है, समाज की वाहवाही में नहीं। अगर मेरी बेटी उस घर में घुटकर मर गई, तो वो कलंक मेरे माथे से गंगा भी नहीं धो पाएगी।”
इतना कहकर रघुनाथ तेज़ कदमों से बाहर निकल गए। सावित्री भी उनके पीछे दौड़ पड़ी, बस इतना कहकर, “मैं भी चलूंगी।”
गाड़ी में बैठते हुए रघुनाथ का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। रास्ता लंबा था, करीब चार घंटे का। हर बीतते मिनट के साथ उन्हें सुमन का बचपन याद आ रहा था। कैसे वो अपनी छोटी-छोटी उंगलियों से रघुनाथ की मूंछें पकड़कर हंसती थी। कैसे स्कूल से आते ही सबसे पहले ‘पापा’ चिल्लाती थी। और विदाई के वक्त उसने रघुनाथ के गले लगकर कहा था, “पापा, आप मुझे पराया तो नहीं कर दोगे न?” तब रघुनाथ ने कहा था, “बेटियां कभी पराई नहीं होतीं गुड़िया।” आज उसी वादे की परीक्षा थी।
सुमन का ससुराल शहर के पॉश इलाके में था। बाहर से देखने में घर किसी महल से कम नहीं लगता था, लेकिन रघुनाथ जानते थे कि इस चमक-धमक के पीछे कितना अंधेरा है।
दरवाजे की घंटी बजाने पर सुमन की ननद, रेखा ने दरवाजा खोला। रघुनाथ और सावित्री को अचानक वहां देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
“अरे… अंकल-आंटी? आप लोग? अचानक? बताया भी नहीं?” रेखा ने हकलाते हुए कहा और दरवाज़ा पूरा खोलने में हिचकिचाई।
रघुनाथ ने बिना किसी औपचारिकता के दरवाज़ा धकेला और अंदर दाखिल हो गए। “सुमन कहां है?” उनकी आवाज़ में वो कड़कपन था जो अक्सर कोर्ट-कचहरी में जज के सामने वकीलों की होती है। रघुनाथ पेशे से एक साधारण क्लर्क थे, लेकिन आज एक पिता थे।
ड्राइंग रूम में सुमन के ससुर, दीनानाथ जी अखबार पढ़ रहे थे और सास, मनोरमा, चाय की चुस्कियां ले रही थीं।
“अरे समधी जी, आइए आइए। बड़ा सरप्राइज़ दिया आपने,” दीनानाथ जी ने हंसने का नाटक किया, लेकिन उनकी आंखों में घबराहट साफ थी।
सावित्री ने हाथ जोड़ने का नाटक नहीं किया। वह सीधे अंदर के कमरों की तरफ लपकीं।
“अरे रुकिए तो सही, सुमन सो रही है,” मनोरमा ने रोकने की कोशिश की।
लेकिन सावित्री तब तक सुमन के कमरे तक पहुंच चुकी थीं। और जो नज़ारा उन्होंने देखा, उससे उनकी रूह कांप गई।
सुमन एक टूटी हुई खाट पर पड़ी थी, जो शायद स्टोर रूम में रखी जाती थी। कमरे में एसी तो दूर, पंखा भी कछुए की चाल से चल रहा था। सुमन का चेहरा पीला पड़ चुका था, होंठ सूखे थे और वह ठंड से कांप रही थी। उसके माथे पर पसीने की बूंदें थीं और पास ही फर्श पर झूठे बरतन पड़े थे, मानो उसे जानवरों की तरह वहीं खाना दिया गया हो।
“सुमन!” सावित्री की चीख निकल गई। वह दौड़कर बेटी के पास पहुंचीं और उसे सीने से लगा लिया। सुमन का शरीर तवे की तरह तप रहा था।
“मां…” सुमन ने मुश्किल से आंखें खोलीं। उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि सुनने के लिए कान पास ले जाने पड़े। “मां… मुझे ले चलो… प्लीज… मैं मर जाऊंगी यहां।”
रघुनाथ भी कमरे के दरवाजे पर आ खड़े हुए। अपनी लाड़ली की यह हालत देखकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस बेटी को उन्होंने फूलों की तरह पाला था, आज वह मुरझाए हुए पत्ते की तरह पड़ी थी।
पीछे से सुमन के पति, विकास, ने आकर कहा, “अरे पापा जी, आप लोग बेकार परेशान हो रहे हैं। वायरल फीवर है, दो दिन में ठीक हो जाएगी। ये तो बस काम से बचने के बहाने करती रहती है।”
रघुनाथ धीरे से मुड़े। उनकी आंखों में आंसू नहीं, अंगारे थे। उन्होंने विकास के करीब जाकर, बिना आवाज़ ऊंचा किए कहा, “इंसान समझा था तुम्हें विकास, इसलिए अपनी जिगर का टुकड़ा सौंपा था। पर तुम तो कसाई निकले। 104 बुखार को तुम नाटक कहते हो?”
मनोरमा बीच में कूद पड़ीं, “देखिए समधी जी, हमारे घर के मामलों में दखल मत दीजिए। बहुएं ऐसे ही नखरे करती हैं। थोड़ा बुखार क्या हुआ, महारानी बनकर लेट गई। घर का काम कौन करेगा?”
सावित्री ने सुमन को सहारा देकर उठाया। “रघुनाथ जी, गाड़ी निकालिए। एक पल भी अब मेरी बच्ची यहां नहीं रहेगी।”
“खबरदार जो सुमन को यहां से ले गए!” दीनानाथ जी ने अपनी असली रंगत दिखाई। “अगर ये आज इस घर से कदम बाहर निकालेगी, तो फिर कभी वापस नहीं आ पाएगी। हम तलाक के कागज़ भिजवा देंगे। सोच लीजिए, समाज में क्या मुंह दिखाएंगे। तलाकशुदा बेटी का बाप कहलाना आसान नहीं होता।”
रघुनाथ ने सुमन का बैग उठाया। उन्होंने दीनानाथ जी की आंखों में आंखें डालकर कहा, “दीनानाथ जी, समाज का मुंह मैं बंद कर लूंगा, लेकिन अगर मेरी बेटी को कुछ हो गया, तो मैं अपनी अंतरात्मा को क्या मुंह दिखाऊंगा? और रही बात तलाक की… तो जो रिश्ता मेरी बेटी को तिल-तिल कर मार रहा है, उस रिश्ते का टूट जाना ही बेहतर है। मैं तलाकशुदा बेटी का बाप कहलाना पसंद करूंगा, बजाय एक मृत बेटी का बाप कहलाने के।”
“ले जाओ! ले जाओ इसे!” मनोरमा चिल्लाईं। “देखते हैं कौन करेगा इससे दूसरी शादी। दाग लग जाएगा माथे पर।”
रघुनाथ ने सुमन को अपनी बाहों का सहारा दिया और उसे लेकर मुख्य द्वार की ओर बढ़े। उन्होंने मुड़कर कहा, “दाग माथे पर नहीं, आप लोगों की सोच पर है। और दूसरी शादी? मेरी बेटी कोई वस्तु नहीं है जिसे किसी मालिक की ज़रूरत हो। वो ठीक होगी, पढ़ेगी, नौकरी करेगी और अपने दम पर जिएगी। उसे किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है, और सबसे कम आप जैसे लोगों की।”
वे सुमन को लेकर गाड़ी में बैठे। सावित्री ने सुमन का सिर अपनी गोद में रखा और लगातार उसके बाल सहलाती रहीं। गाड़ी जैसे ही उस मनहूस घर से दूर हुई, सुमन ने एक गहरी सांस ली, जैसे बरसों बाद उसे खुली हवा मिली हो।
चार घंटे का सफर खामोशी में कटा, लेकिन यह खामोशी सुकून की थी।
जब गाड़ी रघुनाथ के घर के बाहर रुकी, तो मोहल्ले के कुछ लोग झांकने लगे। काशी देवी अभी भी दरवाजे पर बैठी थीं, चेहरा सख्त किए।
रघुनाथ ने सुमन को सहारा देकर उतारा। सुमन इतनी कमज़ोर थी कि चल भी नहीं पा रही थी।
काशी देवी ने देखा। उन्होंने सुमन की पीली रंगत, धंसी हुई आंखें और लड़खड़ाते कदम देखे। उनके अंदर की ‘सास’ और ‘दादी’ के बीच जंग छिड़ गई।
“ले आए कलंक?” काशी देवी ने ताना मारा, लेकिन उनकी आवाज़ में पहले जैसी धार नहीं थी।
रघुनाथ ने कोई जवाब नहीं दिया। वे सुमन को लेकर सीधे उसके पुराने कमरे में गए, उसे बिस्तर पर लिटाया और डॉक्टर को फोन किया।
सावित्री रसोई में सुमन के लिए खिचड़ी बनाने चली गईं।
थोड़ी देर बाद, जब डॉक्टर आकर और दवा देकर चले गए, रघुनाथ बाहर आंगन में आए। काशी देवी वहीं बैठी थीं।
“अब खुश है तू?” काशी देवी ने पूछा। “पूरे मोहल्ले में थू-थू होगी। शर्मा जी की बहू पूछ रही थी कि सुमन वापस क्यों आ गई।”
रघुनाथ ने थके हुए स्वर में कहा, “अम्मा, शर्मा जी की बहू कुछ भी कहे, उससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अगर आज मैं सुमन को वहां छोड़ आता, तो शायद कल हमें उसकी लाश लेने जाना पड़ता। क्या तब आप खुश होतीं?”
काशी देवी चुप रहीं।
तभी सावित्री बाहर आईं, हाथ में पानी का गिलास लिए। उन्होंने काशी देवी की तरफ देखा और बोलीं, “मां जी, आपको याद है मेरी बुआ की लड़की, विमला दीदी? वही, जिनकी शादी बड़े जमींदार के घर हुई थी?”
काशी देवी चौंक गईं। “हां… याद है। क्यों?”
“वो भी ऐसे ही बीमार थीं,” सावित्री ने याद दिलाया। “ससुराल वालों ने उन्हें मायके नहीं भेजा था, यह कहकर कि घर की इज्जत खराब होगी। मेरे फूफा जी भी आपकी तरह ही समाज से डरते थे। उन्होंने विमला दीदी को वापस नहीं बुलाया। और फिर क्या हुआ? एक महीने बाद खबर आई कि विमला दीदी जल गईं… स्टोव फटने से। हम सब जानते थे कि स्टोव नहीं फटा था, उनका सब्र और उनकी सांसें फटी थीं। वो मर गईं मां जी। फूफा जी आज तक उस बोझ के नीचे जी रहे हैं।”
सावित्री की आंखों में आंसू थे। “मैं नहीं चाहती कि रघुनाथ जी का हाल भी फूफा जी जैसा हो। मेरी बेटी बदकिस्मत हो सकती है कि उसका पति अच्छा नहीं निकला, लेकिन वो इतनी बदनसीब नहीं होनी चाहिए कि उसके मां-बाप भी उसका साथ छोड़ दें।”
काशी देवी का चेहरा फक पड़ गया। विमला की याद ने उनके दिल पर जमी बरसों पुरानी काई को खुरच दिया था। उन्हें याद आया कि विमला कितनी सुंदर और चंचल थी, और कैसे उसकी मौत के बाद उसके ससुराल वालों ने दूसरी शादी कर ली थी, जबकि विमला के मां-बाप जीते जी मर गए थे।
काशी देवी धीरे से उठीं। उनकी लाठी खट-खट करती हुई सुमन के कमरे की तरफ बढ़ी।
रघुनाथ और सावित्री ने एक-दूसरे को देखा, डरे हुए कि कहीं अम्मा सुमन को कुछ बुरा-भला न कह दें।
कमरे में सुमन दवा के असर से नींद में थी। काशी देवी उसके बिस्तर के किनारे बैठ गईं। उन्होंने अपने झुर्रियों वाले हाथ से सुमन का माथा छुआ। बुखार अभी भी तेज़ था।
काशी देवी की आंखों से एक बूंद आंसू टपका और सुमन के गाल पर गिरा। सुमन कसमसाई।
“सो जा… सो जा मेरी बच्ची,” काशी देवी ने फुसफुसाया। “तेरा बाप पागल है, पर आज समझ आया कि सही पागल है। दुनिया जाए भाड़ में। तू जिंदा है, यही बहुत है।”
काशी देवी बाहर निकलीं। रघुनाथ और सावित्री अभी भी वहीं खड़े थे।
काशी देवी ने रघुनाथ की ओर देखा और अपनी साड़ी के पल्लू से आंखें पोंछते हुए कहा, “कल से कोई पूछे तो कह देना कि मेरी पोती रानी है, और रानियां गुलामों के घर में नहीं रहतीं। जब तक वो ठीक नहीं हो जाती, यहीं रहेगी। और अगर वो लोग उसे लेने आएं, तो कह देना कि पहले अपनी औकात सुधारे, फिर बात करें।”
रघुनाथ के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आ गई। उन्होंने झुककर मां के पैर छुए। “धन्यवाद अम्मा।”
“हटो, पैर मत दबाओ,” काशी देवी ने नकली गुस्से से कहा। “जाकर डॉक्टर की पर्ची देख, दवाइयां पूरी हैं या नहीं। और बहू, तू खड़ी क्या है? मूंग की दाल की खिचड़ी बना, उसमें थोड़ा घी डालना। लड़की की हड्डियां दिख रही हैं।”
उस रात, रघुनाथ के घर में एक अजीब सा सुकून था। बाहर समाज की बातें थीं, ताने थे, भविष्य की चिंताएं थीं। लेकिन घर के अंदर, एक सोती हुई बेटी की सांसों की आवाज़ थी, जो यह गवाही दे रही थी कि अगर परिवार साथ हो, तो नर्क से भी वापस लौटा जा सकता है।
रघुनाथ ने आसमान की तरफ देखा और हाथ जोड़ लिए। उन्हें पता था कि लड़ाई लंबी होगी, तलाक के केस चलेंगे, बदनामी होगी। लेकिन उन्हें यह भी पता था कि आज रात उनकी बेटी किसी खौफ में नहीं, बल्कि अपने पिता की छत के नीचे सुरक्षित सो रही है। और एक पिता के लिए, इससे बड़ी जीत कोई और नहीं हो सकती थी।
मूल लेखिका : पुष्पा जोशी