ज़िम्मेदारी का बोझ – आरती झा 

“ये आंखें देख कर हम सारी दुनिया भूल जाते हैं… ओह सिया, कितनी खूबसूरत हैं तुम्हारी आंखें।”

राघव सिया की आंखों की गहराइयों में उतर जाना चाहता था। और सचमुच, सिया की आंखें थीं भी किसी जादुई झील जैसी—गहरी, काली और भावनाओं के समंदर को अपने भीतर समेटे हुए। जैसे भगवान ने बड़ी फुर्सत में, किसी रविवार की दोपहर बैठकर उन्हें तराशा हो। हिरनी सी सुंदर, पर उसमें एक ठहराव था जो किसी को भी बांध ले।

“जनाब, धरती पर उतर आइए, मैं यहीं हूं आपके सामने,” सिया अपने मोहक अंदाज में खिलखिलाती हुई बोली, उसकी हंसी में एक खनक थी जो राघव के दिल की धड़कनों को तेज कर देती थी।

“क्या करूं सिया, इन आंखों की कशिश मुझे बरबस अपनी ओर खींचती ही चली जाती है। ऐसा लगता है जैसे मेरी पूरी दुनिया इन्हीं दो प्यालों में सिमट गई हो,” राघव ने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में भरते हुए कहा।

“जनाब, ये आंखें सिर्फ और सिर्फ आपके लिए हैं। इन पर पड़ी पलकों का उठना-गिरना, इन पुतलियों का फैलना-सिकुड़ना, सब आपका है,” सिया ने शरारत और समर्पण के मिले-जुले भाव से कहा।

“ओह सिया, मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूं।”

“प्यार तो राघव, मैं भी तुमसे बहुत ज्यादा करती हूं।”

“कितने खुशनसीब हैं ना हम लोग, जो हमारे पवित्र प्यार को मंजिल मिल गई, वरना बहुत लोगों का प्यार तो मंजिल तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देता है।”

“सचमुच राघव, हम लोग सौभाग्यशाली तो हैं।”

बालकनी में खड़े होकर, पूर्णिमा के चांद को गवाह मानकर कही गई ये बातें उस रात फिजाओं में शहद घोल रही थीं। राघव, जो शहर का एक उभरता हुआ चित्रकार था, उसे सिया में अपनी ‘म्यूज’ (प्रेरणा) मिल गई थी। और सिया, जो साहित्य की छात्रा थी, उसे राघव में अपनी कविताओं का नायक मिल गया था।

यह कहानी की शुरुआत थी। बिल्कुल किसी परीकथा जैसी। लेकिन परियों की कहानियाँ अक्सर वहाँ ख़त्म हो जाती हैं जहाँ से असल ज़िंदगी शुरू होती है—’और वे हँसी-खुशी रहने लगे’ के बाद वाले पन्ने पर।


वक्त का पहिया घूमा। पांच साल बीत गए।

राघव के कैनवस पर अब धूल जमने लगी थी। जिस कला पर उसे इतना नाज़ था, बाज़ारवाद के दौर में उसे खरीदार नहीं मिल रहे थे। राघव एक आदर्शवादी कलाकार था। उसे अपनी कला से समझौता करना पसंद नहीं था। वह कमर्शियल पेंटिंग्स, जो होटलों की लॉबी या अमीरों के ड्राइंग रूम में सजावट के लिए लगाई जाती थीं, उन्हें बनाना अपनी तौहीन समझता था।

“कला आत्मा की आवाज़ है सिया, मैं उसे चंद सिक्कों के लिए बेचकर उसका सौदा नहीं कर सकता,” राघव अक्सर यही दलील देता।

शुरुआत में सिया ने उसका समर्थन किया। लेकिन जब घर का किराया चढ़ने लगा, राशन के डिब्बे खाली होने लगे और बिजली का बिल लाल रंग के नोटिस के साथ आने लगा, तो सिया की आँखों का वो ‘हिरनी जैसा’ चंचलपन कहीं खोने लगा।

सिया ने चुपचाप एक बीपीओ (BPO) में नौकरी कर ली। रात की शिफ्ट। क्योंकि दिन में उसे घर संभालना होता था और राघव के ‘मूड’ का ख्याल रखना होता था। राघव को दिन में शोर पसंद नहीं था, इसलिए सिया दिन भर दबे पांव घर में काम करती और रात भर जागकर दुनिया के किसी दूसरे कोने में बैठे अजनबियों की गालियां और शिकायतें सुनती।

आज रात भी वही हुआ। सुबह के चार बज रहे थे जब सिया घर लौटी। वह बेहद थकी हुई थी। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे अब स्थायी हो चुके थे। वह ‘कजरारी’ आंखें, जिनकी तारीफ में कभी राघव कसीदे पढ़ता था, अब लाल और सूजी हुई रहती थीं। कंप्यूटर स्क्रीन की नीली रोशनी ने उनकी चमक सोख ली थी।

राघव जाग रहा था। वह अपने इज़ल (easel) के सामने बैठा एक खाली कैनवस को घूर रहा था।

सिया ने बैग सोफे पर पटका और पानी पीने किचन की तरफ बढ़ी।

“तुम फिर देर से आई हो,” राघव ने बिना मुड़े कहा। उसकी आवाज़ में चिंता नहीं, एक अजीब सी खीज थी।

“काम था राघव। आज टारगेट पूरा करना ज़रूरी था, इंसेंटिव मिलने वाला है,” सिया ने पानी का गिलास होठों से लगाते हुए कहा।

राघव मुड़ा और उसने सिया को देखा। उसने सिया के चेहरे को, उसकी आँखों को घूरा।

“सिया, तुमने आईने में खुद को देखा है हाल ही में?” राघव ने कड़वाहट से पूछा।

सिया ठिठक गई। “क्या मतलब?”

“मतलब यह कि तुम अब वो सिया नहीं लगती जिसे मैंने प्यार किया था। वो ताजगी, वो खूबसूरती… सब गायब हो गई है। तुम्हारी आंखें… जिन्हें देखकर मैं दुनिया भूल जाता था, अब उन्हें देखकर मुझे डर लगता है। धंसी हुई, लाल, बेजान। तुम एक मशीन बन गई हो सिया। एक रोबोट। कहाँ गई वो साहित्य पढ़ने वाली नाज़ुक लड़की?”

सिया के हाथ से गिलास छूटते-छूटते बचा। उसने मेज का सहारा लिया। थकान उसके पोर-पोर में भरी थी, लेकिन राघव के शब्दों ने उस थकान पर कोड़ों जैसी मार की।

“राघव, मैं मशीन नहीं बनी हूँ,” सिया की आवाज़ कांपी, लेकिन उसमें एक दृढ़ता थी। “मैं ज़िंदा रहने की कोशिश कर रही हूँ। और ये जो आंखें तुम्हें ‘बेजान’ और ‘डरावनी’ लग रही हैं न, इन्हीं आंखों के जागने की वजह से इस घर में बिजली जल रही है ताकि तुम अपनी ‘आत्मा की आवाज़’ को कैनवस पर उतार सको।”

“ओह! तो अब तुम मुझे ताने मारोगी?” राघव खड़ा हो गया, उसका पुरुषवादी अहंकार आहत हो चुका था। “तो मैंने कब कहा था कि तुम ये घटिया नौकरी करो? मैंने कहा था कि मेरा वक़्त आएगा। मेरी पेंटिंग्स बिकेंगी। तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं रहा, इसलिए तुम ये सब कर रही हो। और इस चक्कर में तुमने अपनी सुंदरता, अपना ग्रेस सब खो दिया है।”

सिया चुपचाप उसे देखती रही। आज उसकी आँखों में आंसू नहीं आए। शायद आंसुओं का कोटा रात भर की शिफ्ट में सूख चुका था।

“सुंदरता…” सिया ने एक फीकी मुस्कान के साथ दोहराया। “तुम्हें पता है राघव? जब हम मिले थे, तब मेरी आंखें सुंदर थीं क्योंकि उनमें सिर्फ़ सपने थे। उनमें कोई ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं था। लेकिन आज… आज इन आंखों में मकान मालिक का तकादा है, राशन वाले का उधार है, और तुम्हारे महंगे रंगों की कीमत है। तुम सही कह रहे हो राघव, ये आंखें अब सुंदर नहीं रहीं। क्योंकि इन्होंने अब ‘सपना’ देखना छोड़कर ‘हिसाब’ देखना शुरू कर दिया है।”

सिया बेडरूम में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया।

राघव ड्राइंग रूम में खड़ा रह गया। उसे लगा जैसे सिया ने उसे थप्पड़ मारा हो। लेकिन उसका अहंकार अभी भी उसे अपनी गलती मानने से रोक रहा था। उसने सोचा, “यह समझती नहीं है। कलाकार के लिए सौंदर्य कितना ज़रूरी होता है। यह घर के क्लेश मेरी क्रिएटिविटी को मार रहे हैं।”

अगले दो दिन घर में खामोशी रही। सिया ऑफिस जाती, आती, खाना बनाती और सो जाती। राघव अपने कैनवस के साथ जूझता रहता, लेकिन उस पर एक लकीर भी नहीं खींच पाता।

तीसरे दिन की बात है। राघव घर पर अकेला था। सिया ऑफिस जा चुकी थी। अचानक राघव की नज़र सिया की डायरी पर पड़ी, जो वह अक्सर अपने तकिए के नीचे रखती थी। साहित्य की छात्रा रही सिया को लिखने का शौक था, जो अब छूट चुका था।

कौतूहलवश राघव ने डायरी खोली।

पन्नों पर कविताएं नहीं थीं। पन्नों पर हिसाब लिखा था।

“दूध वाले के 500 बाकी।”

“राघव के लिए नया कैनवस—1200 रुपये (इंसेंटिव से लूँगी)।”

“अपनी आंखों के लिए आई-ड्रॉप्स (Eye drops)—महंगे हैं, अगले महीने लूँगी। अभी काम चल जाएगा।”

राघव का दिल धक से रह गया। उसने पन्ने पलटे। बीच में एक पन्ने पर कुछ लिखा था—

“आज राघव ने कहा कि मेरी आंखें अब सुंदर नहीं रहीं। वो सही कहता है। हिरनी की आंखें शिकार होने से पहले ही सुंदर लगती हैं। जब वो अस्तित्व की लड़ाई लड़ती हैं, तो उनमें सुंदरता नहीं, सिर्फ़ ‘खौफ’ और ‘थकान’ होती है। मुझे दुःख इस बात का नहीं कि मेरी सुंदरता चली गई, दुःख इस बात का है कि राघव को उन लाल लकीरों के पीछे का प्यार दिखाई नहीं दिया। वो मेरी आंखों का प्रेमी था, मेरी दृष्टि (vision) का नहीं।”

राघव के हाथ से डायरी गिर गई। वह धम्म से बिस्तर पर बैठ गया।

उसके दिमाग में पिछले पांच सालों की रील घूमने लगी। कैसे धीरे-धीरे सिया ने अपने शौक छोड़े। कैसे उसने नए कपड़े खरीदना बंद कर दिया। कैसे वह अपनी पुरानी साड़ियों को रफू करके पहनने लगी। और राघव? वह अपनी ‘कला’ के नाम पर नवाब बना बैठा रहा। वह सिर्फ़ सिया की बाहरी सुंदरता को पूजता रहा, जबकि सिया अपनी आंतरिक सुंदरता से उस घर की नींव को सींच रही थी।

“मैं कितना अंधा था,” राघव बुदबुदाया। “सिया की आंखें बदसूरत नहीं हुईं, मेरी नज़र धुंधला गई थी।”

उसी रात, सिया ऑफिस में थी। उसकी आँखों में भयंकर जलन हो रही थी। डॉक्टर ने कहा था कि उसे ‘ड्राई आई सिंड्रोम’ और गंभीर संक्रमण हो रहा है। उसे आराम की ज़रूरत थी, स्क्रीन से दूर रहने की ज़रूरत थी। लेकिन घर का किराया अगले हफ़्ते देना था। वह अपनी आँखों में पानी के छींटे मारकर वापस काम पर लग गई।

अचानक उसकी डेस्क का फोन बजा। रिसेप्शन से कॉल था। “मैम, आपके हस्बैंड आए हैं। कह रहे हैं बहुत ज़रूरी है।”

सिया घबरा गई। क्या हुआ? राघव यहाँ? वह दौड़ते हुए नीचे रिसेप्शन पर पहुँची।

राघव वहां खड़ा था। उसके हाथ में एक बड़ा सा पैकेट था। उसका हुलिया अस्त-व्यस्त था, जैसे वह भागकर आया हो।

“राघव? सब ठीक तो है? तुम यहाँ?” सिया ने हांफते हुए पूछा।

राघव ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने सिया का हाथ पकड़ा और उसे बाहर पार्किंग की तरफ ले गया।

“राघव, बोलो तो सही! मुझे वापस अंदर जाना है, मेरा लॉग-इन टाइम चल रहा है,” सिया ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

राघव रुका। उसने सिया को स्ट्रीट लाइट की रोशनी में देखा। सिया की आंखें सूजी हुई थीं, पलकें भारी थीं और पुतलियां लाल थीं।

राघव ने धीरे से अपनी उंगलियां सिया की आँखों के पास फिराईं।

“इस्तीफ़ा दे दो, सिया,” राघव ने शांत स्वर में कहा।

“क्या? तुम पागल हो गए हो? खाएंगे क्या?” सिया चिल्लाई।

“मैंने अपनी वो ‘ईगो’ वाली पेंटिंग बेच दी,” राघव ने कहा। “नहीं, वो पेंटिंग नहीं बिकी जिस पर मुझे घमंड था। मैंने आज एक कमर्शियल आर्ट गैलरी से कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है। मैं बच्चों की किताबों के लिए इलस्ट्रेशन बनाऊंगा। ग्राफिक डिज़ाइन करूँगा। जो काम मिलेगा, वो करूँगा। एडवांस मिल गया है।”

उसने अपनी जेब से एक चेक निकालकर सिया के हाथ में थमा दिया।

“लेकिन राघव… तुम तो कहते थे कि यह कला का सौदा है। तुम अपनी आत्मा नहीं बेचोगे,” सिया अवाक थी।

“मेरी आत्मा कैनवस पर नहीं, मेरे सामने खड़ी है,” राघव की आवाज़ भर्रा गई। “और उस आत्मा को तिल-तिल कर मरते देख, मैं कौन सा बड़ा कलाकार बन जाऊंगा? सिया, मुझे माफ़ कर दो। मैं ‘आंखों’ का प्रेमी बनकर रह गया था, जबकि मुझे तुम्हारा ‘साथी’ बनना था।”

सिया की आँखों से आंसू बह निकले। वो खारे आंसू उसकी जलती हुई आंखों को और जला रहे थे, लेकिन मन को ठंडक पहुँचा रहे थे।

“घर चलो,” राघव ने कहा। “तुम्हें नींद की ज़रूरत है। और इन आंखों को… इन आंखों को अब सपने देखने हैं, स्प्रेडशीट नहीं।”

अगले दिन सुबह, सिया जब सोकर उठी, तो उसने देखा कि राघव बालकनी में बैठा पेंटिंग कर रहा है। बहुत सालों बाद उसने ब्रश उठाया था।

सिया धीरे-धीरे उसके पास गई। कैनवस पर एक चित्र बन रहा था।

यह किसी सुंदर हिरनी जैसी आंखों वाली लड़की का चित्र नहीं था। यह एक औरत का चेहरा था। बाल बिखरे हुए, माथे पर शिकन, और आंखें… आंखें वैसी ही थीं जैसी सिया की अब थीं—आंखों के नीचे काले घेरे, थोड़ी धंसी हुई, लेकिन उनमें एक अजीब सी आग थी। एक ऐसी चमक जो हार न मानने वाले योद्धा की होती है।

राघव ने मुड़कर सिया को देखा।

“यह क्या बना रहे हो?” सिया ने पूछा।

“सुंदरता,” राघव ने मुस्कुराते हुए कहा। “असली सुंदरता। जानते हो सिया, पहले मुझे लगता था कि तुम्हारी वो चंचल आंखें दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ हैं। लेकिन मैं गलत था।”

उसने कैनवस पर बनी उन थकी हुई आंखों पर ब्रश फेरा।

“ये आंखें… जिन्होंने मेरे स्वाभिमान के लिए अपनी नींद कुर्बान कर दी… जिन्होंने अँधेरे में रहकर मुझे रोशनी दी… ये आंखें उस पुरानी सिया की आंखों से हज़ारों गुना ज़्यादा खूबसूरत हैं। पहले मैं इन आंखों में डूबना चाहता था, लेकिन अब… अब मैं इन आंखों को पूजना चाहता हूँ।”

सिया की आँखों में पानी भर आया। उसने राघव के कंधे पर सिर रख दिया।

“जनाब,” सिया ने अपने पुराने, लेकिन अब थोड़े भारी अंदाज़ में कहा, “धरती पर उतर आए आप?”

“हाँ,” राघव ने उसका हाथ थाम लिया। “और अब यहीं रहूँगा। तुम्हारे साथ। हकीकत की इस खुरदुरी ज़मीन पर, जहाँ हम दोनों मिलकर अपना महल बनाएंगे। सपनों का नहीं, सच का।”

उस दिन के बाद, राघव और सिया की ज़िंदगी आसान नहीं हुई। संघर्ष अब भी था। लेकिन अब उस संघर्ष में कड़वाहट नहीं थी। सिया ने अपनी नौकरी छोड़ दी और एक छोटे स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया, जो उसे पसंद था। राघव कमर्शियल आर्ट के साथ-साथ अपनी पसंद की पेंटिंग भी करता रहा।

अब जब कभी राघव सिया की आंखों में देखता, तो उसे ‘हिरनी’ नहीं, बल्कि एक ‘शेरनी’ दिखाई देती थी। और वह जानता था कि यह रूप, उस नाज़ुक रूप से कहीं ज़्यादा प्यारा और सच्चा है।

प्रेम का अर्थ अब बदल चुका था। प्रेम अब ‘भूल जाने’ का नाम नहीं था, बल्कि एक-दूसरे को ‘याद रखने’ और ‘थामे रखने’ का नाम था, चाहे आंखें सुंदर हों या थकी हुई।

मूल लेखिका : आरती झा 

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