रिश्ते प्रेम से निभाए जाते हैं -स्वाति जैन 

मीरा ने सूटकेस की चेन बंद की ही थी कि कमरे के दरवाजे पर खड़े प्रतीक की परछाई फ़र्श पर लंबी होती दिखाई दी। उसने सिर उठाकर देखा। प्रतीक के चेहरे पर वही चिरपरिचित शिकन थी, जो हर उस वक़्त उभर आती थी जब मीरा अपने मायके जाने की बात करती थी।

“तुम सच में पैकिंग कर रही हो मीरा?” प्रतीक ने कमरे में दाखिल होते हुए, अपनी आवाज़ में बनावटी आश्चर्य और हल्की नाराज़गी घोलते हुए कहा। “मैंने तुम्हें कल रात ही समझाया था न कि अभी हालात ठीक नहीं हैं। मौसम ख़राब है, और दिल्ली का रास्ता कोई छोटा-मोटा नहीं है। पूरा छह घंटे का सफ़र है बाई रोड। और वोल्वो बस में तो धक्के खाने पड़ेंगे।”

मीरा ने एक गहरी सांस ली और सूटकेस को बेड से नीचे उतारा। “प्रतीक, मैंने बताया था न कि दीदी की सर्जरी है कल। जीजू अकेले हैं, और माँ-पापा भी बूढ़े हो चले हैं। ऐसे वक़्त में मेरा वहाँ होना ज़रूरी है। और रही बात रास्ते की, तो यह वही नेशनल हाईवे है जिस पर हम पिछले महीने तुम्हारे दोस्त की शादी में गए थे। तब तो मौसम या दूरी की कोई बात नहीं हुई थी?”

प्रतीक झल्लाया, “अरे, तब मैं साथ था न! एक मर्द साथ हो तो बात अलग होती है। तुम अकेली औरत, इतनी दूर कैसे जाओगी? दुनिया का हाल देख रही हो? आए दिन अख़बारों में क्या-क्या छपता है। मुझे तुम्हारी फ़िक्र है, इसीलिए मना कर रहा हूँ। ऐसा करो, वीडियो कॉल पर बात कर लो। सर्जरी ही तो है, डॉक्टर कर लेंगे। तुम्हारे वहाँ खड़े रहने से दीदी ठीक थोड़ी हो जाएंगी?”

मीरा चुपचाप प्रतीक को देखती रही। उसकी फ़िक्र, उसका यह ‘सुरक्षा’ का कवच… सब कितना तर्कसंगत लगता था न? लेकिन मीरा का मन इस तर्क के पीछे छिपे उस दोहरेपन को देख पा रहा था, जो अक्सर शादीशुदा औरतों के हिस्से आता है।

उसे याद आया ठीक चार महीने पहले का वो वाकया।

तब प्रतीक की बुआजी बीमार थीं। उनका गाँव शहर से करीब बारह घंटे की दूरी पर था, और वो भी ऐसा रास्ता जहाँ आखिरी के पचास किलोमीटर तक पक्की सड़क भी नहीं थी। उस वक़्त प्रतीक को अपनी कंपनी के किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में मुंबई जाना था।

तब प्रतीक ने ही कहा था, “मीरा, बुआजी ने तुम्हें बहुत याद किया है। मेरा जाना मुमकिन नहीं है, पर घर की बहू का जाना ज़रूरी है। तुम चली जाओ। ट्रेन से जाना, आगे बस बदल लेना और फिर गाँव के टेंपो मिल जाते हैं। तुम तो समझदार हो, मैनेज कर लोगी।”

उस दिन मीरा को ‘समझदार’ और ‘सक्षम’ बताया गया था। उस दिन बारह घंटे का उबड़-खाबड़ सफ़र, तीन बार गाड़ियाँ बदलना और अनजान गाँव के रास्तों पर अकेले चलना… सब कुछ ‘सुरक्षित’ था। क्यों? क्योंकि वह सफ़र ससुराल के रिश्ते निभाने के लिए था। उस सफ़र के अंत में प्रतीक की बुआजी का घर था, जो प्रतीक की इज़्ज़त और सामाजिक दायित्व का हिस्सा था।

और आज?

आज जब मीरा की अपनी सगी बहन अस्पताल में भर्ती होने वाली थी, जब उसे अपने खून के रिश्तों के पास जाना था, तो मात्र छह घंटे का सीधा हाईवे ‘असुरक्षित’ और ‘बहुत दूर’ हो गया था।

मीरा ने अलमारी से अपना पर्स निकाला और प्रतीक की आँखों में सीधे देखते हुए बोली, “प्रतीक, जब मैं तुम्हारी बुआजी को देखने के लिए रायगढ़ के उस बीहड़ गाँव में अकेले जा सकती हूँ, जहाँ नेटवर्क भी नहीं आता था, तो क्या मैं जयपुर से दिल्ली के सिक्स-लेन हाईवे पर सफ़र नहीं कर सकती? तब मुझे ‘शेरनी’ कहा गया था, आज मैं अचानक ‘अबला’ कैसे हो गई?”

प्रतीक सकपका गया। उसने शायद उम्मीद नहीं की थी कि मीरा पुराना बही-खाता खोल देगी। “वो… वो मजबूरी थी मीरा। बुआजी बहुत सीरियस थीं। और गाँव में सब अपने ही लोग थे।”

“सीरियस तो दीदी भी हैं प्रतीक,” मीरा ने शांत स्वर में कहा। “और मजबूरी मेरी भी है। फ़र्क बस इतना है कि ससुराल के लिए किया गया सफ़र ‘फ़र्ज़’ कहलाता है, और मायके के लिए किया गया सफ़र ‘ज़िद’ या ‘मनमानी’ बन जाता है। ससुराल की दूरी को ‘कदम भर’ माना जाता है, और मायके की दूरी को ‘सात समंदर पार’।”

तभी बाहर से सासू माँ, विमला देवी, की आवाज़ आई। “अरे, क्या बहस चल रही है तुम दोनों में? नाश्ता ठंडा हो रहा है।”

प्रतीक और मीरा बाहर ड्राइंग रूम में आए। विमला देवी ने मीरा के हाथ में सूटकेस देखा तो उनके माथे पर लकीरें खिंच गईं।

“बहू, तुम मान नहीं रही हो? मैंने प्रतीक से कहा था कि तुम्हें समझाए। देखो, परसों हमारे घर ‘सुंदरकांड’ का पाठ है। पड़ोस की सारी औरतें आएँगी। ऐसे में घर की बहू का गायब रहना कितना ख़राब लगेगा? लोग क्या कहेंगे कि बहू को घर के पूजा-पाठ से ज़्यादा मायके की पड़ी है?”

मीरा को हंसी आ गई, एक बहुत ही फीकी और उदास हंसी। “माँजी, दीदी का यूट्रस का ऑपरेशन है। वो दर्द से तड़प रही हैं। और आपको सुंदरकांड में पड़ोसियों के सामने मेरी नुमाइश की पड़ी है? क्या भगवान राम नाराज़ हो जाएंगे अगर मैं अपनी बीमार बहन की सेवा करने चली जाऊँ?”

विमला देवी ने चाय का कप मेज़ पर जोर से रखा। “देखो मीरा, ज़बान मत लड़ाओ। हर घर के कुछ नियम होते हैं। शादी के बाद लड़की का असली घर ससुराल होता है। मायके वाले तो अब मेहमान हैं। सुख-दुःख में फ़ोन पर बात कर लो, पर घर की इज़्ज़त और ज़िम्मेदारियाँ छोड़कर ऐसे भागना शोभा नहीं देता। और फिर अकेले सफ़र करना… प्रतीक को चैन नहीं पड़ेगा यहाँ।”

प्रतीक ने माँ की बात का समर्थन किया, “हाँ मीरा, माँ सही कह रही हैं। मैं तुम्हें वीकेंड पर छोड़ आऊँगा, तब तक सर्जरी भी हो जाएगी और तुम दीदी को देख भी लेना। अभी रुक जाओ।”

मीरा ने एक पल के लिए अपनी सास और पति को देखा। ये वही लोग थे जो अक्सर ‘बेटी और बहू में कोई फ़र्क नहीं’ का नारा लगाते थे। लेकिन आज भूगोल (Geography) ने इनकी पोल खोल दी थी। सुविधा के नक्शे पर ससुराल हमेशा ‘पास’ और मायका हमेशा ‘पहुँच से बाहर’ क्यों होता है?

मीरा ने एक गहरा निर्णय लिया। वह जानती थी कि अगर आज वह रुक गई, तो वह सिर्फ़ अपनी बहन से नहीं, बल्कि अपने आत्मसम्मान से भी दूर हो जाएगी। यह लड़ाई अब सिर्फ़ दिल्ली जाने की नहीं थी, यह लड़ाई उस मानसिक बेड़ियाँ तोड़ने की थी जो औरत की गतिशीलता (Mobility) को अपनी शर्तों पर नियंत्रित करती है।

“माँजी, प्रतीक,” मीरा ने अपनी आवाज़ में एक नई दृढ़ता भरते हुए कहा। “सुंदरकांड का पाठ भगवान हनुमान का है, जिन्होंने सीता जी की ख़बर लाने के लिए समुद्र लांघ दिया था। उन्होंने ‘दूरी’ या ‘सुरक्षा’ का बहाना नहीं बनाया था। मैं अपनी बहन के पास जा रही हूँ। यह मेरी ज़िम्मेदारी है, और मुझे इसे निभाने के लिए किसी की अनुमति की नहीं, बल्कि आप लोगों के सहयोग की ज़रूरत थी। पर अफ़सोस, वो मुझे नहीं मिल रहा।”

प्रतीक ने गुस्से में कहा, “तुम मेरी बात नहीं मानोगी? अगर तुम आज इस दरवाज़े से बाहर गई, तो…”

“तो क्या प्रतीक?” मीरा ने उसे बीच में ही काट दिया। “तो तुम मुझे छोड़ दोगे? या घर में घुसने नहीं दोगे? सिर्फ़ इसलिए कि मैं अपनी बीमार बहन को देखने गई? अगर हमारे रिश्ते की डोर इतनी कमज़ोर है कि छह घंटे के सफ़र से टूट जाए, तो शायद उसका टूट जाना ही बेहतर है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। विमला देवी ने पल्लू से मुंह पोंछा और बुदबुदाईं, “आजकल की लड़कियों को तो पर ही लग गए हैं। हम तो पति की इज़ाज़त के बिना देहरी नहीं लांघते थे।”

मीरा ने अपना सूटकेस उठाया। “माँजी, आपने इज़ाज़त के इंतज़ार में शायद अपने मायके के कई ज़रूरी पल खो दिए होंगे, कई बार अपने माँ-बाप को अंतिम बार देखने भी नहीं जा पाई होंगी, यह सोचकर कि पति क्या कहेंगे। और उसका मलाल आज भी आपकी आँखों में दिखता है जब आप अपने मायके की बात करती हैं। मैं अपनी ज़िन्दगी में वो मलाल नहीं रखना चाहती।”

मीरा ने उबर (Uber) बुक कर ली थी। गाड़ी गेट पर आ चुकी थी।

प्रतीक अब भी अविश्वास में खड़ा था। उसे लगा था कि थोड़ा डराने और ‘सुरक्षा’ का वास्ता देने से मीरा रुक जाएगी, जैसा वह अक्सर करती थी। लेकिन आज मीरा के चेहरे पर डर नहीं, बल्कि एक स्पष्टता थी।

मीरा दरवाज़े तक गई, फिर रुकी और मुड़ी।

“प्रतीक, जब तुम पिछले महीने अपने दोस्तों के साथ मनाली ट्रिप पर गए थे, तब रास्ते में लैंडस्लाइड की ख़बरें आ रही थीं। मैंने तुम्हें मना किया था, याद है? तब तुमने कहा था – ‘अरे, डर के आगे जीत है, हम एडल्ट हैं, अपना ध्यान रख सकते हैं।’ आज वही नियम मुझ पर भी लागू होता है। मैं भी एडल्ट हूँ। अपना ध्यान रख सकती हूँ। तुम बस घर का और माँजी का ध्यान रखना।”

मीरा बाहर निकल गई।

टैक्सी में बैठते ही उसने खिड़की से पीछे मुड़कर देखा। प्रतीक बालकनी में खड़ा उसे देख रहा था। मीरा की आँखों से एक आँसू गिरा, लेकिन मन हल्का हो गया था।

सफ़र शुरू हुआ। गाड़ी शहर की भीड़भाड़ से निकलकर हाइवे पर आ गई। रफ़्तार बढ़ी तो हवाएं तेज़ हो गईं। मीरा ने अपना फ़ोन निकाला और अपनी बहन के पति को मैसेज किया – “मैं आ रही हूँ जीजू, शाम तक पहुँच जाऊँगी।”

रास्ते भर मीरा सोचती रही। यह ‘दूरी’ असल में किलोमीटरों की नहीं होती। यह दूरी मानसिकता की होती है। जब ससुराल वालों को ज़रूरत होती है, तो बहू को ‘झाँसी की रानी’ बना दिया जाता है जो मीलों का सफ़र तय कर सकती है, भारी सामान उठा सकती है, और अकेले सब संभाल सकती है। लेकिन जैसे ही गंतव्य (Destination) बदलता है, जैसे ही दिशा ‘मायके’ की ओर मुड़ती है, वही बहू ‘कांच की गुड़िया’ बन जाती है जिसे टूटने का ख़तरा होता है। यह पाखंड का एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें औरत उम्र भर फंसी रहती है।

करीब तीन घंटे बाद गाड़ी एक ढ़ाबे पर रुकी। मीरा ने चाय का ऑर्डर दिया। बगल की टेबल पर एक और परिवार बैठा था। एक बुजुर्ग महिला अपनी बहू से कह रही थी, “अरे बिटिया, तू खा ले, फिर बच्चे को संभाल लेना। हमें तो अभी चार घंटे और जाना है तेरी ननद के घर, उसे बेटा हुआ है।”

मीरा ने सुना और मुस्कुरा दी। ननद के घर जाने के लिए बुज़ुर्ग सास भी सफ़र कर रही थी, थकान की परवाह किए बिना। क्योंकि वो ‘बेटी’ का घर था। मीरा को समझ आ गया कि यह सिर्फ़ उसके घर की कहानी नहीं है, यह हर उस घर की कहानी है जहाँ रिश्तों का वज़न तराजू के दो अलग-अलग पलड़ों पर तौला जाता है।

शाम के पांच बजे मीरा अस्पताल पहुँची।

आईसीयू के बाहर उसके पिता बेचैनी से टहल रहे थे। माँ कोने में बैठकर माला जप रही थीं। जैसे ही उन्होंने मीरा को देखा, उनकी आँखों में चमक आ गई।

“मीरा! तू आ गई?” माँ ने दौड़कर उसे गले लगा लिया। “मैं तो डर रही थी कि तेरे ससुराल वाले आने देंगे या नहीं। प्रतीक बेटा मान गए?”

मीरा ने माँ को कसकर भींच लिया। “माँ, मैं ‘मानने’ या ‘मनाने’ के लिए नहीं रुकी। मैं बस आ गई। क्योंकि मुझे आना था।”

जीजू ने राहत की सांस ली। “शुक्रिया मीरा। दीदी अंदर होश में आ रही हैं, बार-बार तुम्हारा नाम ले रही थीं।”

मीरा जब वार्ड में गई, तो उसकी दीदी, रश्मि, की आँखें आधी खुली थीं। एनेस्थीसिया का असर अभी बाकी था। मीरा ने दीदी का हाथ थामा। रश्मि ने धीरे से उंगलियां दबाईं। उस एक स्पर्श ने मीरा की सारी थकान, सारा तनाव और ससुराल में हुई उस बहस की कड़वाहट को मिटा दिया।

उस रात मीरा अस्पताल में ही रुकी। करीब दस बजे उसका फ़ोन बजा। प्रतीक का नाम स्क्रीन पर था।

मीरा ने कुछ पल फ़ोन को देखा। उसे पता था कि उधर से क्या सुनने को मिलेगा – शिकायतें, ताने, या शायद एक ठंडा सन्नाटा। लेकिन उसने फ़ोन उठाया।

“पहुँच गई?” प्रतीक की आवाज़ में गुस्सा कम और चिंता ज़्यादा थी, या शायद यह उसकी हार की स्वीकृति थी।

“हाँ, पहुँच गई। दीदी ठीक हैं। डॉक्टर ने कहा है ऑपरेशन सफल रहा,” मीरा ने सामान्य स्वर में कहा।

उधर थोड़ी खामोशी रही। फिर प्रतीक बोला, “माँ बहुत नाराज़ हैं। उन्होंने खाना नहीं खाया।”

मीरा ने गहरी सांस ली। “प्रतीक, माँजी को समझाना कि नाराज़गी से पेट नहीं भरता। और अगर वो अपनी बेटी के पास होतीं और उनकी बहू ऐसे वक़्त में नखरे दिखाती, तो उन्हें कैसा लगता? मैं रविवार शाम तक वापस आ जाऊंगी। तब तक के लिए, प्लीज़, घर संभाल लेना। जैसे मैं तुम्हारी ग़ैरमौजूदगी में संभालती हूँ।”

प्रतीक के पास कोई जवाब नहीं था। शायद आज उसे पहली बार एहसास हुआ था कि मीरा अब सिर्फ़ उसकी पत्नी नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्ति भी है जिसके अपने फ़ैसले हैं।

“ठीक है। अपना ध्यान रखना,” प्रतीक ने धीमे स्वर में कहा और फ़ोन रख दिया।

मीरा ने फ़ोन साइड में रखा और अस्पताल की खिड़की से बाहर देखा। शहर की बत्तियाँ जगमगा रही थीं। उसे महसूस हुआ कि आज उसने सिर्फ़ एक सफ़र तय नहीं किया था, बल्कि उसने अपने और अपनी आज़ादी के बीच की एक बहुत बड़ी दूरी को पाट दिया था।

उसने सीख लिया था कि जो सांप अपनी सुविधानुसार दो सिर दिखाता है – कभी ‘सुरक्षा’ का और कभी ‘फ़र्ज़’ का – उसे कुचलने का एक ही तरीका है: अपने क़दमों पर भरोसा करना और चलते जाना। चाहे रास्ता ससुराल का हो या मायके का, नक्शा अब मीरा खुद बनाएगी।

उसने अपने पर्स से डायरी निकाली और उसमें एक वाक्य लिखा:

“रिश्ते प्रेम से निभाए जाते हैं, परमिट से नहीं। और मेरा मायका मेरे दिल के उतना ही करीब है, जितना मेरा स्वाभिमान।”

वार्ड में बीप करती मशीनों की आवाज़ के बीच मीरा ने एक सुकून भरी नींद ली। उसे पता था कि जब वह वापस जाएगी, तो घर का माहौल शायद तनावपूर्ण होगा, लेकिन अब वह डरने वाली नहीं थी। क्योंकि उसने वह रास्ता देख लिया था जो उसे खुद तक ले जाता था। और वह रास्ता अब कभी बंद नहीं होगा।

मूल लेखिका : स्वाति जैन 

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