पीली मखमली गद्देदार कुर्सी पर सुमित्रा देवी को बड़े ही आदर के साथ बैठाया गया था। घर के सबसे बड़े हॉल के बीचों-बीच, जहाँ से वो पूरे घर पर नज़र रख सकती थीं। आज ‘रघुवंशी सदन’ में चहल-पहल कुछ ज़्यादा ही थी। घर की सबसे बुजुर्ग और मुखिया होने के नाते सुमित्रा देवी का सम्मान किसी महारानी से कम नहीं था। हर कोई आता, उनके पैरों में झुकता और आशीर्वाद लेता।
देखने वाले को यह दृश्य किसी आदर्श भारतीय परिवार का लग सकता था, जहाँ बुजुर्गों को भगवान का दर्जा दिया जाता है। लेकिन सुमित्रा देवी की बूढ़ी और अनुभवी आँखें उन झुके हुए सिरों के पीछे छिपे चेहरों की असलियत पढ़ रही थीं। वे जानती थीं कि आज का यह आयोजन सिर्फ़ उनके सम्मान के लिए नहीं, बल्कि एक बहुत बड़े ‘फैसले’ के लिए रखा गया है।
यह घर, जो शहर के पॉश इलाके में दो एकड़ में फैला हुआ था, अब करोड़ों की संपत्ति बन चुका था। सुमित्रा देवी के पति के गुज़रने के बाद, पिछले बीस सालों से उन्होंने इस घर को और अपने बिखरते परिवार को एक धागे में पिरोकर रखा था। उनके तीन बेटे थे—विनय, समीर और राजीव। तीनों अपनी-अपनी गृहस्थी और व्यापार में सेटल थे, लेकिन अलग-अलग शहरों में।
आज अचानक ‘माँ के स्वास्थ्य’ का हवाला देकर तीनों बेटे, बहुएं और पोते-पोतियां इकट्ठा हुए थे। दोपहर तक पूरा घर रिश्तेदारों से भर गया। रसोई से तरह-तरह के पकवानों की महक आ रही थी। बड़ी बहू, करुणा, जो अक्सर फोन पर बात करने से कतराती थी, आज सुमित्रा देवी के पास ही बैठी थी, उनके हाथ में बार-बार पानी का गिलास थमा रही थी और पंखा झल रही थी।
“अम्माजी, आप थक गई होंगी, थोड़ा आराम कर लें?” मंझले बेटे समीर ने बड़ी चिंता जताते हुए कहा।
सुमित्रा देवी ने मंद मुस्कान के साथ सिर हिलाया। “नहीं बेटा, आज सब आए हैं, सबको देख लेने दो। पता नहीं फिर कब मौका मिले।”
उनकी इस बात पर तीनों भाइयों ने एक-दूसरे को कनखियों से देखा। एक चोर नज़र का आदान-प्रदान हुआ जिसे सुमित्रा देवी ने पकड़ लिया, पर ज़ाहिर नहीं होने दिया।
दोपहर में पंगत बैठी। चांदी की थालियों में खाना परोसा गया। सुमित्रा देवी को सबसे पहले भोग लगाया गया। लेकिन उन्होंने गौर किया कि उनकी थाली में वही दलिया और उबली सब्ज़ियां थीं जो वे रोज़ खाती थीं, जबकि बाकी सबके लिए छप्पन भोग थे। यह एक छोटा सा संकेत था कि ‘सम्मान’ सिर्फ़ दिखावे का है, असलियत में वे अब इस घर के उत्सवों का हिस्सा नहीं, बल्कि एक ‘ज़िम्मेदारी’ मात्र रह गई हैं।
खाना खाने के बाद, जब दोपहर की धूप ढलने लगी और शाम की तैयारी शुरू हुई, तो घर का माहौल बदलने लगा। रिश्तेदारों को गार्डन में चाय पिलाई जा रही थी, लेकिन घर के मुख्य सदस्य—तीनों बेटे और बहुएं—ड्राइंग रूम में सुमित्रा देवी के इर्द-गिर्द घेरा बनाकर बैठ गए।
माहौल में एक भारीपन आ गया। हंसी-ठिठोली गायब हो गई और चेहरों पर गंभीरता छा गई।
बड़े बेटे विनय ने गला खंखारा। “अम्मा, हम सब सोच रहे थे कि अब आपकी उम्र हो गई है। यह इतनी बड़ी हवेली… इसका रख-रखाव, नौकरों का झंझट, आपकी सुरक्षा… यह सब अब अकेले आपके बस की बात नहीं रही। हमें आपकी बहुत चिंता रहती है।”
सुमित्रा देवी ने अपनी सफ़ेद साड़ी का पल्लू ठीक किया और शांत स्वर में पूछा, “तो? तुम लोगों ने क्या सोचा है?”
मंझली बहू ललिता तुरंत बोल पड़ी, “माँजी, हम चाहते हैं कि आप हमारे साथ मुंबई चलें। वहां फ्लैट में लिफ्ट भी है, आपको सीढ़ियां नहीं चढ़नी पड़ेंगी। और चौबीस घंटे केयरटेकर भी रहेगा।”
तीसरे बेटे राजीव ने जोड़ा, “नहीं भाभी, माँ मेरे साथ बैंगलोर चलेंगी। वहां का मौसम इनके घुटनों के लिए अच्छा है।”
सुमित्रा देवी चुपचाप सुनती रहीं। यह ‘माँ को साथ रखने’ की होड़ नहीं थी, यह उस ‘शर्त’ को पूरा करने की होड़ थी जिसके तहत जायदाद का बंटवारा होना था। वे जानती थीं कि असली मुद्दा ‘माँ’ नहीं, ‘मकान’ है।
विनय ने असली बात छेड़ी, “अम्मा, बात यह है कि इस घर को खाली छोड़ना ठीक नहीं। और हम में से कोई यहाँ वापस आ नहीं सकता। एक बहुत अच्छा बिल्डर है, वह इस ज़मीन के मुहमंगे दाम दे रहा है। अगर हम अभी इसे बेच दें, तो वह पैसा आपके नाम पर फिक्स हो जाएगा और कुछ हम भाइयों में बंट जाएगा ताकि हम अपने बिज़नेस को बढ़ा सकें। आखिर यह सब आपका ही तो है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा देवी ने एक नज़र उस ड्राइंग रूम पर डाली। उस झूमर पर जिसे उनके पति ने पेरिस से मंगवाया था, उन दीवारों पर जहाँ उनके बच्चों की बचपन की तस्वीरें टंगी थीं। यह घर सिर्फ़ ईंट-गारा नहीं था, यह उनका ‘इतिहास’ था।
“तो तुम लोगों ने तय कर लिया है कि घर बेचना है?” सुमित्रा देवी ने पूछा। आवाज़ में कोई कंपन नहीं था।
“हाँ अम्मा, यही प्रैक्टिकल (व्यावहारिक) है,” समीर ने कहा। “और वकील साहब भी बाहर आ गए हैं। बस पेपर पर आपके अंगूठे का निशान चाहिए। आपकी आंखों की रौशनी कम है, इसलिए हमने पढ़ना ज़रूरी नहीं समझा, बस पावर ऑफ़ अटॉर्नी है कि हम सौदा कर सकें।”
सुमित्रा देवी उठीं। उनके उठते ही सब हड़बड़ा गए।
“वकील साहब को अंदर बुलाओ,” उन्होंने आदेश दिया।
वकील मिस्टर खन्ना अंदर आए। वे पुराने पारिवारिक वकील थे, लेकिन आज वे भी नज़रें चुरा रहे थे। शायद बेटों ने उन्हें भी साध लिया था।
सुमित्रा देवी ने कागज़ हाथ में लिए। सबने सोचा कि अब माँ भावुक होकर रोएंगी और अंगूठा लगा देंगी। अक्सर ऐसा ही होता है।
लेकिन सुमित्रा देवी ने अपनी जेब से अपना चश्मा निकाला और उसे पहना। बेटों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं। “अम्मा, आप पढ़ लेंगी?”
“क्यों? क्या अनपढ़ हूँ जो नहीं पढ़ सकती?” सुमित्रा देवी ने कड़क आवाज़ में कहा। उन्होंने पन्ने पलटे।
“विनय,” सुमित्रा देवी ने बड़े बेटे को पुकारा। “तुझे याद है जब तू दसवीं में फेल हुआ था और तेरे बाबूजी तुझे घर से निकालने वाले थे? तब मैंने इसी घर के पिछले कमरे में तुझे छिपाया था और बाबूजी से लड़ गई थी।”
विनय ने सिर झुका लिया।
“समीर,” उन्होंने मंझले की ओर देखा। “जब तेरा बिज़नेस डूब रहा था, तो मैंने अपने कंगन बेचकर तुझे पैसे दिए थे। वो कंगन मुझे मेरी सास ने दिए थे, इसी घर की इज़्ज़त बचाने के लिए।”
“और राजीव,” उन्होंने सबसे छोटे को देखा। “तू जब लव मैरिज करना चाहता था और पूरा समाज खिलाफ था, तब मैंने इसी आंगन में मंडप गड़वाया था।”
तीनों बेटे चुप थे। बहुएं असहज होकर पल्लू ठीक कर रही थीं।
सुमित्रा देवी ने कागज़ मेज़ पर पटक दिए।
“तुम लोगों को लगता है कि मैं बूढ़ी हो गई हूँ तो मेरी अक्ल भी बूढ़ी हो गई है? तुम लोग मेरी ‘सुरक्षा’ के लिए घर नहीं बेच रहे, तुम अपनी ‘लालच’ के लिए बेच रहे हो। तुम्हें लगता है कि मुझे ले जाकर किसी कोने वाले कमरे में पटक दोगे और यहाँ करोड़ों के वारे-न्यारे करोगे।”
“नहीं माँ, ऐसा नहीं है…” विनय ने सफाई देने की कोशिश की।
“चुप रहो!” सुमित्रा देवी की आवाज़ शेरनी की तरह गूंजी। “मैं तुम्हारी माँ हूँ, मैंने तुम्हें चलना सिखाया है, तुम मुझे चाल चलना मत सिखाओ।”
उन्होंने वकील मिस्टर खन्ना की ओर देखा। “खन्ना साहब, वो दूसरा लिफ़ाफ़ा निकालिये जो मैंने पिछले हफ़्ते आपको भिजवाया था।”
सब चौंक गए। दूसरा लिफ़ाफ़ा?
वकील साहब ने अपने बैग से एक नीला लिफ़ाफ़ा निकाला। सुमित्रा देवी ने उसे खोला।
“यह मेरी नई वसीयत है,” सुमित्रा देवी ने घोषणा की।
“वसीयत?” तीनों बेटे एक साथ बोले।
“हाँ। इस वसीयत के मुताबिक,” सुमित्रा देवी ने पढ़ना शुरू किया, “यह ‘रघुवंशी सदन’ न तो बेचा जाएगा और न ही इसका बंटवारा होगा।”
“क्या? तो फिर इसका क्या होगा?” ललिता चिल्ला पड़ी।
“यह घर,” सुमित्रा देवी ने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा, “आज से एक ‘ट्रस्ट’ को सौंपा जा रहा है। इस घर में एक ‘वृद्धाश्रम’ और ‘अनाथालय’ खुलेगा। उन बुजुर्गों के लिए जिन्हें उनके बच्चों ने बोझ समझ लिया, और उन बच्चों के लिए जिनका कोई नहीं है।”
कमरे में मानो बम फट गया हो।
“माँ, आप पागल हो गई हैं? करोड़ों की प्रॉपर्टी दान कर रही हैं?” समीर चीखा।
“हाँ, कर रही हूँ। क्योंकि मुझे दिख गया है कि जिनके अपने बच्चे होते हैं, वो भी बुढ़ापे में अनाथ ही हो जाते हैं। कम से कम मेरे घर में रहने वाले बुजुर्ग अकेले नहीं मरेंगे। और रही बात मेरी…”
सुमित्रा देवी ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “इस ट्रस्ट की डीड में लिखा है कि मैं अपनी आखिरी सांस तक इसी घर के मुख्य कमरे में रहूँगी। ट्रस्ट के लोग मेरी देखभाल करेंगे, सम्मान से। वो सम्मान जो दिखावे का नहीं होगा। और मेरे बाद, यह कमरा किसी और बेसहारा माँ को मिलेगा।”
“हम इसे कोर्ट में चैलेंज करेंगे!” राजीव गुस्से में खड़ा हो गया। “पापा की प्रॉपर्टी पर हमारा हक़ है।”
सुमित्रा देवी हंस पड़ीं। एक ठंडी, व्यंग्यात्मक हंसी।
“बैठ जा राजीव। भूल गया? तेरे पिता ने मरने से पहले यह घर मेरे नाम किया था। वो जानते थे कि तुम लोग कैसे निकलोगे। यह मेरी स्व-अर्जित संपत्ति मानी जाएगी क्योंकि मैंने अपने गहने और मायके से मिली ज़मीन बेचकर इसे नीलाम होने से बचाया था, जब तुम्हारे पिता पर कर्ज़ था। क़ानूनी तौर पर मैं इसका कुछ भी कर सकती हूँ।”
तीनों बेटे निरुत्तर हो गए। उनकी सारी योजना, सारी चालाकी धरी की धरी रह गई।
सुमित्रा देवी उठीं।
“शाम की आरती का समय हो गया है। तुम लोग चाहो तो खाना खाकर जा सकते हो, और चाहो तो अभी निकल सकते हो। अब मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। आज तक मैं डरती थी कि अकेले कैसे रहूँगी। लेकिन आज तुमने मेरे अंदर का वो डर ख़त्म कर दिया। अब यह घर मेरा परिवार होगा, वो अनाथ बच्चे मेरे पोते-पोतियां होंगे।”
वे मुड़ीं और हॉल से बाहर जाने लगीं। उनकी चाल में अब वो बुढ़ापे की लचक नहीं थी, बल्कि एक स्वाभिमान की अकड़ थी।
दरवाज़े पर खड़ी उनकी सबसे छोटी पोती, ‘प्रिया’, जो अब तक चुपचाप सब देख रही थी, दौड़कर आई और दादी के गले लग गई।
“दादी, मैं भी आपके साथ रहूँगी। मैं इस नए ‘घर’ की मैनेजर बनूँगी। मुझे नहीं चाहिए पापा की दौलत। मुझे आपका यह साहस चाहिए।”
सुमित्रा देवी ने पोती के सिर पर हाथ फेरा और उनकी आँखों से एक आंसू टपक पड़ा। यह आंसू दुख का नहीं, जीत का था।
उस शाम ‘रघुवंशी सदन’ में जब दिए जले, तो उनकी रौशनी कुछ अलग थी। वो रौशनी विदाई की नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की थी। घर के बाहर खड़ी रिश्तेदारों की गाड़ियां धीरे-धीरे लौटने लगीं। बेटे और बहुएं भी मुंह लटकाए चले गए।
सुमित्रा देवी अपनी उस पीली मखमली कुर्सी पर वापस आकर बैठीं। हॉल खाली था, लेकिन उन्हें भरा-भरा लग रहा था। उन्होंने महसूस किया कि ‘सम्मान’ मांगा नहीं जाता, और न ही यह कुर्सी पर बैठाकर मिलता है। सम्मान अपनी शर्तों पर जीने और सही के लिए खड़े होने से मिलता है।
उन्होंने वकील साहब को फ़ोन लगाया, “खन्ना साहब, ट्रस्ट का बोर्ड कल ही लगा दीजियेगा—’सुमित्रा स्नेह छाया’।”
रात गहरी हो गई थी, लेकिन सुमित्रा देवी के जीवन का सूरज अभी-अभी उगा था। उन्होंने साबित कर दिया था कि घर की ‘बड़ी’ होने का मतलब सिर्फ़ उम्र में बड़ा होना नहीं, बल्कि जिगर में बड़ा होना होता है।
मूल लेखिका : रश्मि झा मिश्रा