“दीदी, एक बात पूछूं? आप बुरा तो नहीं मानेंगी ना? मैं पिछले छह महीने से आपके यहाँ काम कर रही हूँ, घर का कोना-कोना चमक जाता है, लेकिन आपका चेहरा कभी नहीं चमकता। मैंने आपको कभी खुलकर हंसते हुए नहीं देखा। आपकी आँखों में हमेशा एक ऐसा सन्नाटा क्यों रहता है जैसे कोई बहुत बड़ा तूफ़ान गुजर चुका हो?”
रसोई में बर्तन मांजते हुए रधिया काकी ने आखिरकार वह सवाल पूछ ही लिया जो उनके मन में महीनों से खटक रहा था। रधिया काकी इस घर की पुरानी नौकरानी नहीं थीं, लेकिन उम्रदराज होने के नाते वह वंदना को अपनी बेटी जैसा ही मानती थीं।
वंदना, जो बालकनी में बैठी ढलते सूरज को निहार रही थी, काकी का प्रश्न सुनकर चौंकी नहीं। उसने धीरे से अपनी गोद में रखी खुली किताब को बंद किया और एक गहरी, ठंडी सांस ली। उसकी नज़रें अभी भी क्षितिज पर अटकी थीं।
“काकी,” वंदना की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी, जैसे टूटे हुए कांच के टुकड़े आपस में टकरा रहे हों। “हंसना तो मैं भी चाहती हूँ, लेकिन हंसी अब मेरे होठों का पता भूल गई है। एक वक्त था जब मेरे पिताजी मुझे ‘घर की चिड़िया’ कहते थे। मेरी चहचहाहट के बिना इस घर में सुबह नहीं होती थी। लेकिन फिर मैंने जाना कि कभी-कभी हम जिसे अपनी उड़ान समझते हैं, वही हमारे पिंजरे की वजह बन जाता है।”
इतना कहते-कहते वंदना की आँखों के कोर गीले हो गए। वह रधिया काकी को अपने अतीत के उस गलियारे में ले गई, जहाँ जाने से वह खुद भी डरती थी।
यह कहानी है बनारस के एक खुशहाल परिवार की। वंदना अपने माता-पिता की इकलौती बेटी नहीं थी, बल्कि अपने छोटे भाई, समर की ‘दूसरी माँ’ भी थी। जब वंदना पंद्रह साल की थी, तभी एक सड़क दुर्घटना में उसके माता-पिता का साया सर से उठ गया था। रिश्तेदारों ने वंदना और दस साल के समर को अलग-अलग अनाथालयों में भेजने की बात की, या फिर जायदाद हड़प कर उन्हें नौकर बनाकर रखने की साजिश रची।
लेकिन वंदना, जो कल तक गुड़ियों से खेलती थी, रातों-रात बड़ी हो गई। उसने रिश्तेदारों से साफ कह दिया, “यह मेरे पिताजी का घर है और हम यहीं रहेंगे। मैं अपने भाई को पालूँगी।”
वंदना ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी। घर में जो जमा-पूंजी थी, उससे एक छोटी सी बुटीक शुरू की। वह दिन-रात कपड़ों की सिलाई करती, आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं होता था, बस एक ही सपना था—समर। समर को किसी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिए।
समर बीमार पड़ता, तो वंदना पूरी रात उसके सिरहाने जागती। समर को क्रिकेट किट चाहिए होती, तो वंदना अपनी दवाइयों के पैसे बचाकर उसे दिलाती। वंदना की अपनी जवानी, उसके अपने सपने, उसकी शादी के अरमान—सब उसने समर के भविष्य की भट्टी में झोंक दिए।
वक्त पंख लगाकर उड़ा। वंदना की तपस्या रंग लाई। समर पढ़ाई में होशियार निकला। उसने इंजीनियरिंग की और फिर एमबीए के लिए विदेश जाने की ज़िद की।
“दीदी, अमेरिका जाकर पढ़ाई करूँगा तो हमारी ज़िंदगी बदल जाएगी। मैं वहाँ सेटल हो जाऊँगा और फिर आपको भी बुला लूँगा। हम राज करेंगे, राज!” समर ने चमकती आँखों से कहा था।
वंदना के पास इतने पैसे नहीं थे। उसने पिताजी की आखिरी निशानी—वह पुश्तैनी हवेली—गिरवी रख दी। लोगों ने समझाया, “वंदना, यह पागलपन है। बुढ़ापे के लिए छत तो रहने दे।”
लेकिन वंदना ने हंसकर कहा था, “मेरा भाई ही मेरा बुढ़ापा है। जब वह बड़ा आदमी बन जाएगा, तो क्या अपनी दीदी को बेसहारा छोड़ देगा? मेरा समर ऐसा नहीं है।”
समर अमेरिका चला गया। वंदना यहाँ अकेले, किराए के एक छोटे से मकान में रहकर, बुटीक चलाकर बैंक की किश्तें भरती रही। वह हर महीने समर को पैसे भेजती, ताकि उसे परदेस में कोई तकलीफ न हो। समर के फोन आते, तो वंदना की खुशी का ठिकाना न रहता। वह घंटों उससे बात करती, उसकी तरक्की की कहानियां सुनती और अपनी सूखी रोटियों का ज़िक्र तक न करती।
पाँच साल बीत गए। समर अब एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था। उसने वहीं एक भारतीय लड़की, तान्या, से शादी कर ली थी। वंदना को शादी में बुलाया नहीं गया, यह कहकर कि “दीदी, वीज़ा मिलने में दिक्कत होगी, हम बाद में आकर रिसेप्शन करेंगे।” वंदना ने इसे भी समर की मजबूरी मानकर स्वीकार कर लिया। उसे तो बस इस बात की खुशी थी कि उसका भाई खुश है।
फिर वह दिन आया जिसका वंदना को बेसब्री से इंतज़ार था। समर और तान्या भारत आ रहे थे। वंदना ने अपनी जमा-पूंजी से घर को सजाया, समर के पसंदीदा पकवान बनाए। वह हवाई अड्डे पर घंटों खड़ी रही।
जब समर बाहर आया, तो वह बदला हुआ लग रहा था। सूट-बूट में, आँखों पर महंगा चश्मा। तान्या भी मॉडर्न थी। वंदना दौड़कर समर को गले लगाने गई, लेकिन समर ने एक औपचारिक सी मुस्कान के साथ उसे हल्के से थपथपाया और तान्या से मिलवाया। वंदना को वह आलिंगन अधूरा लगा, पर उसने सोचा शायद थकान होगी।
घर आकर समर ने जो बम फोड़ा, उसने वंदना की दुनिया ही उजाड़ दी।
रात के खाने के बाद, समर ने एक फाइल वंदना के सामने मेज पर रखी।
“दीदी, मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी है,” समर ने बिना नज़रे मिलाए कहा। “मैं और तान्या वापस अमेरिका जा रहे हैं, हमेशा के लिए। हमने वहाँ घर ले लिया है।”
वंदना की आँखों में चमक आ गई। “अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी खबर है। तो मेरा वीज़ा कब लगवा रहे हो? मैं भी कब तक यहाँ अकेले रहूँगी। अब तो मैं भी थक गई हूँ समर, तेरे बच्चों को खिलाना चाहती हूँ।”
कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। तान्या अपने फोन में व्यस्त होने का नाटक करने लगी और समर पानी पीने लगा।
“दीदी… वो…” समर ने अटकते हुए कहा। “बात दरअसल यह है कि अमेरिका का लाइफस्टाइल बहुत अलग है। वहाँ एडजस्ट करना आपके लिए मुश्किल होगा। आप तो हिंदी बोलती हैं, वहां के तौर-तरीके… और तान्या को अपनी प्राइवेसी चाहिए। हम न्यूक्लियर फैमिली में विश्वास रखते हैं।”
वंदना के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा। “क्या मतलब? तुम मुझे साथ नहीं ले जाओगे?”
“साथ ले जाने का तो सवाल ही नहीं है दीदी,” समर ने अब थोड़ी सख्ती से कहा। “लेकिन मैं आपका ध्यान रखूंगा। यह फाइल देखिए। मैंने यह पुश्तैनी हवेली बेचने का सौदा पक्का कर दिया है। पिताजी के नाम पर थी, पर कानूनी वारिस हम दोनों हैं। मैंने आपके हिस्से के पैसे एक ओल्ड एज होम (वृद्धाश्रम) में जमा करवा दिए हैं। वह शहर का सबसे महंगा ‘सीनियर सिटीजन होम’ है। वहाँ आपको खाना, दवाई, सब मिलेगा। आपको काम करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।”
वंदना को लगा जैसे किसी ने उसका दिल निकालकर उसके सामने निचोड़ दिया हो। जिस भाई के लिए उसने अपनी शादी नहीं की, अपना घर गिरवी रखा, दिन-रात एक करके उसे इस काबिल बनाया—वह आज उसे ‘प्राइवेसी’ के नाम पर वृद्धाश्रम भेज रहा था?
“समर?” वंदना की आवाज़ कांप रही थी। “तू हवेली बेच रहा है? और मुझे… मुझे वृद्धाश्रम? मैंने तुझे इसलिए पाला था? मैंने मां बनकर तेरी सेवा की, और तू…”
समर चिढ़ गया। “दीदी, प्लीज इमोशनल ड्रामा मत करो। मैंने जो किया, प्रैक्टिकल होकर किया। मैंने आपका बुढ़ापा सुरक्षित कर दिया है। और मैंने क्या नहीं किया? आपके कर्ज़ चुकाए, हवेली छुड़वाई। अब मुझे अपनी ज़िंदगी जीने का हक़ है या नहीं? मैंने तान्या से वादा किया है कि हम अपनी शर्तों पर जिएंगे। आप वहाँ खुश रहेंगी, आपकी उम्र के लोग होंगे।”
तान्या ने भी बीच में टोका, “हाँ दीदी, प्लीज़ समझने की कोशिश कीजिए। समर का करियर पीक पर है। हम आपकी ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकते। आप वहाँ ज़्यादा कम्फर्टेबल रहेंगी।”
वंदना ने उस रात समर की आँखों में देखा। उसे वहाँ अपना छोटा भाई ‘गुड्डू’ नहीं दिखा, जो बचपन में अंधेरे से डरकर उसकी रजाई में घुस जाता था। उसे वहाँ एक व्यापारी दिखा जो रिश्तों का सौदा कर रहा था।
वंदना ने कांपते हाथों से उस फाइल को उठाया।
“तुझे हवेली बेचनी है न समर?” वंदना ने बेहद शांत स्वर में कहा। “बेच दे। तुझे पैसे चाहिए? ले जा। लेकिन मुझे तेरे उस वृद्धाश्रम की भीख नहीं चाहिए। मैं अभी मरी नहीं हूँ। मेरे हाथ-पैर सलामत हैं। मैंने तुझे पाला था, क्योंकि वो मेरा प्रेम था, कोई निवेश (investment) नहीं जिसका रिफंड मैं तुझसे मांगू।”
“दीदी, आप जिद्दी हो रही हैं…” समर ने कहा।
“बस!” वंदना ने हाथ दिखाया। “आज के बाद तू मेरे लिए मर गया। और मैं तेरे लिए। जा, अपनी ‘प्राइवेसी’ के साथ जी ले। लेकिन याद रखना समर, जिस नींव को खोदकर तूने अपना महल बनाया है, वो नींव मेरी हड्डियों से बनी थी। जब वो महल हिलेगा, तो तुझे सहारा देने वाला कोई नहीं होगा।”
अगली सुबह, समर और तान्या चले गए। वंदना ने हवेली खाली कर दी। उसने अपने हिस्से का एक पैसा भी नहीं लिया। वह अपने पुराने किराए के मकान में वापस आ गई। उसने दोबारा अपनी सिलाई मशीन उठाई।
वर्तमान में लौटते हुए वंदना ने अपनी साड़ी के पल्लू से चेहरा पोंछा। रधिया काकी, जो यह सब सुन रही थीं, सन्न रह गई थीं। उनके हाथ से जूठा बर्तन छूटकर सिंक में गिर गया।
“हे भगवान! सगा भाई ऐसा कैसे कर सकता है? कलयुग है बिटिया, घोर कलयुग!” रधिया काकी ने अपनी छाती पीटते हुए कहा। “जिसने ऊंगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी का हाथ झटक दिया? इसीलिए… इसीलिए तुम पत्थर हो गई हो।”
वंदना ने फीकी मुस्कान के साथ काकी की ओर देखा। “काकी, दर्द यह नहीं है कि उसने मुझे घर से निकाल दिया। दर्द यह है कि उसने मेरे ‘ममत्व’ को ‘बोझ’ का नाम दे दिया। जब एक औरत अपना सब कुछ त्यागकर किसी को बनाती है, तो उसे बदले में पैसा या ऐश-ओ-आराम नहीं चाहिए होता। उसे बस ‘अपनापन’ और ‘सम्मान’ चाहिए होता है। समर ने मेरा घर नहीं तोड़ा, उसने मेरा विश्वास तोड़ा है।”
वंदना उठी और रधिया काकी के पास गई।
“काकी, उस दिन के बाद मैंने रोना छोड़ दिया। क्योंकि आंसू उन लोगों के लिए बहाए जाते हैं जो अपने हों। जो पराया हो गया, उसके लिए क्या रोना? अब मैं सिर्फ अपने लिए जीती हूँ। यह खामोशी मेरी कमजोरी नहीं, मेरी ताकत है। मैंने शोर मचाना छोड़ दिया है क्योंकि मेरी चीख सुनने वाला अब कोई नहीं है, और गैरों को तमाशा दिखाने का मुझे शौक नहीं।”
रधिया काकी ने अपने गीले हाथों से वंदना का माथा चूमा। “बिटिया, तुम अकेली नहीं हो। ऊपर वाला सब देख रहा है। वह समर महलों में रहकर भी चैन की नींद नहीं सो पाएगा, और तुम अपनी मेहनत की रोटी खाकर भी रानी हो। देखना, एक दिन उसे अपनी गलती का अहसास ज़रूर होगा।”
वंदना वापस खिड़की के पास गई। उसने देखा कि बाहर एक सूखा पत्ता पेड़ से टूटकर गिर रहा था।
“शायद हो, काकी। शायद न हो,” वंदना ने बुदबुदाते हुए कहा। “पर अब मुझे उसके आने या न आने का इंतज़ार नहीं है। मैंने सीख लिया है कि जीवन में सबसे बड़ा सहारा हम खुद होते हैं। उम्मीद दूसरों से करोगे, तो टूटोगे। खुद से करोगे, तो संवरोगे।”
उस शाम, रधिया काकी ने देखा कि वंदना ने अपनी सिलाई मशीन पर एक नया, चटक लाल रंग का कपड़ा चढ़ाया है। उसकी आँखों में अभी भी दर्द था, लेकिन वह दर्द अब लाचार नहीं था। वह एक स्वाभिमानी औरत का दर्द था जिसने राख से उठकर फिर से जीना सीख लिया था, बिना किसी हंसी के, पर पूरे स्वाभिमान के साथ।
और शायद, यही असली ‘हंसी’ थी—हालातों के मुंह पर करारा तमाचा।
लेखक : मुकेश पटेल