रामनाथ बाबू अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे, चश्मे के मोटे शीशों के पीछे से दीवार पर टंगी उस बड़ी सी तस्वीर को निहार रहे थे। तस्वीर में तीन जवान लड़के और एक गर्वित माता-पिता मुस्कुरा रहे थे। यह तस्वीर पंद्रह साल पुरानी थी। आज उस फ्रेम पर धूल की एक बारीक परत जम गई थी, बिल्कुल वैसे ही जैसे रामनाथ और उनकी पत्नी सुमित्रा के जीवन पर अकेलेपन की धूल जम गई थी।
रामनाथ बाबू शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से प्रिंसिपल के पद से रिटायर हुए थे। उन्होंने अपनी पूरी जमा-पूंजी, अपना समय और अपने सपने अपने तीन बेटों—आलोक, विकास और समीर—पर लगा दिए थे। उन्हें गर्व था कि उनकी परवरिश रंग लाई। आलोक अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, विकास मुंबई में एक बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी का वीपी था, और सबसे छोटा समीर दिल्ली में अपना स्टार्टअप चला रहा था।
समाज की नज़रों में रामनाथ और सुमित्रा “किस्मत वाले” थे।
“अरे रामनाथ जी, आपके जैसा भाग्य तो किसी का नहीं। तीनों बेटे हीरा हैं, हीरा!” पड़ोस के शर्मा जी अक्सर शाम की सैर के वक्त यही कहते। रामनाथ जी मुस्कुरा देते, लेकिन वह मुस्कान अब उनकी आँखों तक नहीं पहुँचती थी।
रसोई से सुमित्रा की खांसने की आवाज़ आई। रामनाथ जी का ध्यान टूटा। वे उठे और पानी का गिलास लेकर अंदर गए।
“दवा ली तुमने?” उन्होंने पूछा।
सुमित्रा ने कमजोर हाथों से गिलास थामते हुए कहा, “ले लूंगी। तुम क्यों परेशान होते हो?”
“परेशान न होउं तो क्या करूँ? डॉक्टर ने कहा है कि तुम्हारे घुटनों का ऑपरेशन ज़रूरी है। और मेरे मोतियाबिंद का भी अब पक गया है,” रामनाथ जी ने एक गहरी सांस ली।
“तो बेटों को खबर कर दो न,” सुमित्रा ने दबी आवाज़ में कहा, जैसे वह कोई गुनाह करने की बात कह रही हो।
“खबर…” रामनाथ जी ने कड़वाहट से कहा। “पिछले महीने आलोक को वीडियो कॉल किया था। उसने कहा—’पापा, अभी प्रोजेक्ट डेडलाइन है, दो मिनट बाद करता हूँ।’ वो दो मिनट आज तक नहीं आए। विकास को फोन करो तो उसकी पी.ए. उठाती है। और समीर… समीर तो कहता है, ‘पैसे भेज दिए हैं न पापा, अच्छे डॉक्टर को दिखा लो, मैं आकर क्या करूँगा, मैं डॉक्टर थोड़ी हूँ’।”
सुमित्रा चुप हो गई। यह संवाद उनके बीच अब आम हो गया था।
अगले हफ्ते दीवाली थी। हर साल की तरह इस साल भी सुमित्रा ने उम्मीद का एक दीया जला रखा था। शायद इस बार कोई आ जाए। उसने गुझिया बनाने के लिए सामान निकाल कर रखा था।
दीवाली से दो दिन पहले, घर के बाहर एक बड़ी सी लग्ज़री कार आकर रुकी।
रामनाथ जी बालकनी में थे। कार देखते ही उनका दिल ज़ोर से धड़का। “सुमित्रा! देखो, शायद विकास आया है!”
वे लाठी टेकते हुए तेज़ी से नीचे उतरे। दरवाज़ा खोला।
सामने विकास खड़ा था। सूट-बूट में, कान में ब्लूटूथ लगाए। उसके साथ एक और आदमी था जो शायद कोई प्रॉपर्टी डीलर लग रहा था।
“विकास! मेरे बच्चे!” सुमित्रा दौड़ते हुए आईं और बेटे को गले लगाना चाहा।
विकास ने हल्का सा आलिंगन किया और तुरंत अलग हो गया। “माँ, प्लीज़। अभी सफ़र से आया हूँ, कपड़े गंदे हो जाएंगे। और हाँ, खुश रहो।”
वह अंदर आया और सोफे पर बैठ गया। उसके हाथ में एक फाइल थी।
“पानी लाऊँ?” सुमित्रा ने पूछा। “तेरी पसंद के लड्डू बनाए हैं।”
“नहीं माँ, मैं यहाँ खाना खाने नहीं आया हूँ। मेरे पास सिर्फ़ दो घंटे हैं। मेरी फ्लाइट है रात की,” विकास ने घड़ी देखते हुए कहा।
रामनाथ जी, जो अभी तक खुशी से गदगद थे, ठिठक गए। “दो घंटे? दीवाली पर भी नहीं रुकोगे?”
विकास ने फाइल टेबल पर रखी। “पापा, प्रैक्टिकल बनिए। मेरे पास दीवाली मनाने का टाइम नहीं है। दरअसल, मैं, आलोक भैया और समीर… हम तीनों ने मिलकर एक फैसला लिया है।”
“कैसा फैसला?” रामनाथ जी ने पूछा।
“देखिए, आप दोनों अब बूढ़े हो गए हैं। यह इतना बड़ा घर आपसे संभलता नहीं है। माँ बीमार रहती हैं, आपको भी दिक्कत है। यहाँ की सुरक्षा भी ठीक नहीं है। इसलिए हमने सोचा है कि इस घर को बेच दिया जाए।”
सुमित्रा के हाथ से पानी का गिलास छूटकर गिर गया। कांच के टुकड़े बिखर गए।
“घर बेच दें?” रामनाथ जी की आवाज़ कांपी। “यह घर नहीं है विकास, यह तुम्हारे दादाजी की निशानी है। हमने इसकी एक-एक ईंट अपनी यादों से जोड़ी है। हम कहाँ जाएंगे?”
“वही तो बता रहा हूँ,” विकास ने एक ब्रोशर (brochure) निकाला। “हमने शहर के बाहर एक बहुत ही प्रीमियम ‘सीनियर सिटिजन होम’ (वृद्धाश्रम) में आप दोनों के लिए बुकिंग कर दी है। उसका नाम ‘स्वर्ग धाम’ है। फाइव स्टार फैसिलिटी है पापा। एसी कमरे, 24 घंटे डॉक्टर, खाना-पीना सब वहीं मिलेगा। आपको कुछ करने की ज़रूरत नहीं। और वहाँ आप जैसे बहुत से लोग होंगे, आपका मन लगा रहेगा।”
रामनाथ जी सन्न रह गए। उनका बेटा उन्हें घर से निकालकर अनाथालय छोड़ने की बात कर रहा था, और उसे नाम दे रहा था ‘स्वर्ग धाम’।
“और अगर हम न जाना चाहें तो?” रामनाथ जी ने दृढ़ता से पूछा।
विकास के चेहरे पर झुंझलाहट आ गई। “पापा, ज़िद मत कीजिये। आलोक भैया ने पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी के पेपर्स भेज दिए हैं। समीर ने भी साइन कर दिया है। घर की डील लगभग पक्की है। एडवांस ले लिया है मैंने। आपको अगले हफ्ते शिफ्ट होना होगा।”
“एडवांस ले लिया?” सुमित्रा फफक कर रो पड़ी। “बिना हमसे पूछे? बेटा, हमने तुम्हें इसलिए पढ़ाया-लिखाया था कि तुम हमें ही बेघर कर दो?”
“माँ, ड्रामा मत करो,” विकास ने रूखेपन से कहा। “हम आपके भले के लिए ही कर रहे हैं। हम तीनों अपनी-अपनी लाइफ में बिजी हैं। हम आपकी देखभाल के लिए यहाँ नहीं बैठ सकते। वहाँ आप सुरक्षित रहेंगे। और हाँ, खर्चा हम तीनों मिलकर उठाएंगे। आपको पैसों की कोई कमी नहीं होगी।”
रामनाथ जी ने बेटे की आँखों में देखा। वहां शर्मिंदगी नहीं, सिर्फ एक व्यापरिक शून्यता थी। उन्हें अहसास हुआ कि उनके सामने उनका बेटा नहीं, एक कॉर्पोरेट मशीन बैठी है।
“ठीक है,” रामनाथ जी ने शांत स्वर में कहा। “जैसा तुम लोग ठीक समझो।”
“क्या कह रहे हो जी?” सुमित्रा चीखी।
“चुप रहो सुमित्रा,” रामनाथ जी ने पत्नी को रोका। “जब पेड़ ही जड़ को उखाड़ना चाहे, तो मिट्टी कब तक पकड़ कर रख पाएगी?”
विकास खुश हो गया। उसने पेपर्स आगे बढ़ाए। रामनाथ जी ने बिना पढ़े साइन कर दिए। उनकी उंगलियां कांप नहीं रही थीं, वे पत्थर हो चुकी थीं।
विकास चला गया। जाते-जाते उसने कहा, “अगले हफ्ते गाड़ी आ जाएगी आपको ले जाने। सामान कम ही रखना।”
अगला एक हफ्ता उस घर में मातम जैसा बीता। सुमित्रा हर दीवार को छूकर रोती थी। रामनाथ जी चुपचाप अपनी किताबें समेटते रहे।
जिस दिन गाड़ी आई, पड़ोसी शर्मा जी बाहर खड़े थे।
“अरे रामनाथ जी, कहाँ की तैयारी है? बच्चों के पास जा रहे हैं क्या?” शर्मा जी ने पूछा।
रामनाथ जी ने एक फीकी मुस्कान दी। “हाँ शर्मा जी, बच्चों ने बहुत जिद्द की। कह रहे थे बुढ़ापे में हमसे दूर नहीं रहा जाता। बहुत बड़ा ‘धाम’ है जहाँ ले जा रहे हैं।”
वे झूठ बोल रहे थे। अपनी औलाद का पर्दा रख रहे थे।
‘स्वर्ग धाम’ वाकई खूबसूरत था। संगमरमर के फर्श, बगीचे, और हर कमरे में टीवी। लेकिन वहां एक चीज़ की कमी थी—अपनापन।
वहाँ पहुँचने के बाद, रामनाथ और सुमित्रा की ज़िंदगी एक टाइम-टेबल में बंध गई। सुबह नाश्ता, दोपहर की दवा, शाम की चाय, रात का खाना। सब कुछ वक्त पर था, बस ‘वक्त’ काटने वाला कोई अपना नहीं था।
शुरुआत में बेटे पैसे भेजते रहे। महीने में एक बार रस्मी वीडियो कॉल भी आ जाता।
“हेलो पापा, सब ठीक है? यहाँ की फैसिलिटी तो अच्छी है न? कोई दिक्कत हो तो मैनेजर को बोल देना, मैंने पेमेंट कर दी है।”
रामनाथ जी बस सिर हिला देते। वे कभी नहीं बताते कि सुमित्रा रात भर रोती है। वे कभी नहीं बताते कि यहाँ का ‘हेल्दी खाना’ उनके गले से नहीं उतरता। वे कभी नहीं बताते कि उन्हें अपने पुराने आंगन की नीम की छांव याद आती है।
एक साल बीत गया। सुमित्रा की तबीयत बिगड़ने लगी। उसे निमोनिया हो गया था और वह आईसीयू में थी।
रामनाथ जी ने कांपते हाथों से आलोक को फोन किया।
“बेटा, माँ बहुत बीमार है। शायद नहीं बचेगी। एक बार आ जाओ।”
“ओह! पापा, आई एम सो सॉरी,” आलोक ने कहा। “लेकिन अभी मेरा वीज़ा रिन्यूअल प्रोसेस में है। मैं देश नहीं छोड़ सकता। मैं विकास को बोलता हूँ।”
विकास को फोन किया। “पापा, अभी मेरा मर्जर चल रहा है। करोड़ों की डील है। मैं कोशिश करता हूँ, पर वादा नहीं कर सकता। समीर से बात कीजिये।”
समीर का फोन नेटवर्क कवरेज से बाहर था।
सुमित्रा ने तीन दिन तक मौत से संघर्ष किया। वह बार-बार दरवाजे की तरफ देखती रही। उसकी धुंधली आँखें अपने ‘हीरों’ को ढूंढ रही थीं।
तीसरे दिन की रात, सुमित्रा ने रामनाथ जी का हाथ पकड़ा।
“आए?” उसने बहुत धीमे स्वर में पूछा।
रामनाथ जी से झूठ नहीं बोला गया। उन्होंने सिर झुका लिया।
सुमित्रा की आँखों से एक आंसू गिरा और वहीं उसकी सांसें थम गईं। वह चली गई, इस इंतज़ार के साथ कि शायद चिता को आग देने तो उसके बेटे आएंगे।
रामनाथ जी ने फिर बेटों को फोन किया।
“माँ नहीं रही।”
उधर से सन्नाटा रहा। फिर रोने की औपचारिक आवाज़ें।
“पापा, हम तुरंत निकलने की कोशिश कर रहे हैं, पर फ्लाइट्स नहीं मिल रहीं,” विकास ने कहा। “आप… आप कृपया अंतिम संस्कार की तैयारी कीजिये। हम तेरहवीं तक पहुँचने की पूरी कोशिश करेंगे। मैनेजर को बोल दिया है, वो सारा इंतज़ाम कर देगा।”
रामनाथ जी ने फोन काट दिया।
उस दिन ‘स्वर्ग धाम’ के कर्मचारियों और कुछ साथी बुजुर्गों ने मिलकर सुमित्रा का अंतिम संस्कार किया। मुखाग्नि रामनाथ जी ने दी। जिन तीन बेटों के लिए सुमित्रा ने अपनी कोख की, अपनी नींद की, अपने गहनों की कुर्बानी दी थी, उनमें से एक भी अपनी माँ के ठंडे शरीर को कंधा देने नहीं आया।
तेरहवीं बीत गई। बेटे नहीं आए। बस पैसे आए—”पापा, शानदार भोज करवा देना। ब्राह्मणों को दान में कमी नहीं होनी चाहिए।”
रामनाथ जी अब पूरी तरह अकेले थे। लेकिन सुमित्रा की मौत ने उनके अंदर कुछ तोड़ दिया था, और साथ ही कुछ जोड़ भी दिया था।
एक सुबह, मैनेजर उनके कमरे में आया।
“सर, आपके बेटे विकास जी का फोन था। वो पूछ रहे थे कि क्या आपको किसी और चीज़ की ज़रूरत है? और वो कह रहे थे कि अगले महीने वो आपसे मिलने आ सकते हैं।”
रामनाथ जी खिड़की के पास खड़े बाहर बगीचे को देख रहे थे।
“मैनेजर साहब,” रामनाथ जी ने मुड़कर कहा। “क्या आप मेरे लिए एक काम करेंगे?”
“जी सर, हुकुम कीजिये।”
“मेरे बेटों को एक पत्र भेजना है। और मेरे वकील को बुला दीजिये।”
मैनेजर हैरान हुआ, पर मान गया।
रामनाथ जी ने अपनी वसीयत बदल दी। घर बेचने से जो करोड़ों रुपये मिले थे (जो बेटों ने चालाकी से रामनाथ जी के जॉइंट अकाउंट में डाले थे ताकि टैक्स बच सके और बाद में वे ले सकें), रामनाथ जी ने वो सारा पैसा एक अनाथालय के नाम कर दिया।
और फिर उन्होंने अपने बेटों को एक आखिरी पत्र लिखा:
“मेरे प्यारे बेटों,
तुम्हारी माँ चली गई। तुम नहीं आए। कोई बात नहीं। तुम लोग बिजी थे, अपनी दुनिया बनाने में। हमने ही तुम्हें सिखाया था कि सफलता सबसे ज़रूरी है। शायद हम ही तुम्हें ‘रिश्ते’ और ‘इंसानियत’ का पाठ पढ़ाना भूल गए।
तुमने हमें ‘स्वर्ग धाम’ भेजा। सच कहूँ, तो यहाँ आकर मुझे एक बात समझ आ गई। औलाद का होना और बुढ़ापे का सहारा होना—ये दो अलग बातें हैं। हम सोचते रहे कि हमारे तीन बेटे हैं, तो हमारा बुढ़ापा सुरक्षित है। पर देखो, आज मैं यहाँ हूँ, और मेरा अंतिम संस्कार करने के लिए भी मुझे ‘पैकेज’ खरीदना पड़ा।
मैंने अपनी सारी संपत्ति, वो पैसा जो घर बेचकर मिला था, अनाथ बच्चों के लिए दान कर दिया है। कम से कम वो बच्चे इस पैसे से पढ़ेंगे, तो शायद किसी का बुढ़ापा सुधार सकें। तुम्हारे पास तो बहुत पैसा है, तुम्हें इसकी ज़रूरत नहीं।
और हाँ, अब मुझे मिलने आने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि जिस पिता को तुम यहाँ छोड़ गए थे, वो अब मर चुका है। अब यहाँ सिर्फ़ एक ‘सीनियर सिटिजन’ रहता है, जिसका कोई बेटा नहीं है।
खुश रहो, अपनी दौलत के साथ।
— रामनाथ”
पत्र पोस्ट करने के बाद, रामनाथ जी ने अपनी कुर्सी बालकनी में लगाई। शाम हो रही थी। उन्होंने चश्मा उतारा और उसे साफ़ किया।
तभी आश्रम के बगीचे में खेल रहा एक अनाथ बच्चा (आश्रम का एक हिस्सा अनाथालय भी था) उनकी तरफ दौड़ा।
“बाबा! बाबा! मेरी पतंग पेड़ में फंस गई, निकाल दो न!”
रामनाथ जी ने उस बच्चे को देखा। उसकी मैली कमीज़ और चमकती आँखें।
“अभी चलता हूँ बेटा,” रामनाथ जी अपनी लाठी लेकर खड़े हुए।
उस बच्चे ने दौड़कर रामनाथ जी का हाथ थाम लिया। उस नन्हे से हाथ की गर्मी ने रामनाथ जी के ठंडे पड़े दिल को छू लिया।
उन्हें अहसास हुआ कि खून का रिश्ता ही सब कुछ नहीं होता। कभी-कभी अजनबी भी वो सहारा दे जाते हैं जो अपनी औलाद नहीं दे पाती।
रामनाथ जी अब ‘बदनसीब’ नहीं थे। उन्होंने बदनसीबी का वो चोला उतार फेंका था जो ‘बेटों की उम्मीद’ से बना था। वे अब आज़ाद थे।
वे बच्चे के साथ बगीचे की ओर चल पड़े, चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान लिए जो अब उनकी आँखों तक पहुँच रही थी। उन्होंने जान लिया था कि परिवार वो नहीं जो खून से बनता है, परिवार वो है जो वक्त पर खड़ा रहता है। और अगर बेटे वक्त पर न हों, तो वे बेटे नहीं, सिर्फ़ एक ‘भ्रम’ हैं। और रामनाथ जी का भ्रम अब टूट चुका था।
मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल