पड़ोसियों और रिश्तेदारों की बातें सुनकर कावेरी देवी का गुस्सा थोड़ा शांत जरूर हुआ था, लेकिन उनके चेहरे पर अभी भी तमतमाहट साफ़ झलक रही थी। वे अपने बड़े बेटे, विक्रम, की बातों पर आँख मूंदकर विश्वास करती थीं, और आज विक्रम ने जो मंज़र पेश किया था, उसने कावेरी देवी के दिल में छोटे बेटे, केशव, के प्रति नफ़रत की एक दीवार खड़ी कर दी थी।
केशव आंगन के एक कोने में सिर झुकाए खड़ा था। उसे अपनी माँ की डांट का उतना दुख नहीं था, जितना दुख उस ‘आग’ को महसूस करके हो रहा था जो उसके सगे बड़े भाई ने लगाई थी। केशव जानता था कि विक्रम भैया स्वभाव से थोड़े कड़क हैं, व्यापार में नफा-नुकसान को लेकर वे अक्सर झल्ला जाते थे, लेकिन उनके भीतर अपने ही छोटे भाई के लिए इतना ‘विष’ भरा होगा, यह उसने आज पहली बार, बहुत करीब से महसूस किया था।
यह कहानी लखनऊ के मशहूर ‘अवध टेक्सटाइल्स’ परिवार की है। पिता के गुज़रने के बाद विक्रम और केशव ने मिलकर इस पुश्तैनी चिकनकारी के कारोबार को संभाला था। विक्रम गद्दी पर बैठता था, हिसाब-किताब और क्लाइंट्स से डील करना उसका काम था। दूसरी ओर, केशव कारीगरों के बीच रहता था। नए डिज़ाइन बनाना, कपड़े की क्वालिटी चेक करना और कारीगरों के सुख-दुख में शामिल होना—यह केशव की दुनिया थी।
शहर भर में ‘केशव की पसंद’ की धूम थी। बड़े-बड़े बुटीक से लोग आते और कहते, “विक्रम भाई, वो केशव जी वाला नया लॉट दिखाइये।” विक्रम मुस्कुराकर माल तो बेच देता, लेकिन अंदर ही अंदर यह बात उसे किसी सुई की तरह चुभती थी। उसे लगता था कि मालिक वह है, बड़ा भाई वह है, लेकिन नाम केशव का हो रहा है। यह ईर्ष्या कब नफरत में बदल गई, केशव को इसकी भनक तक नहीं लगी।
आज सुबह जो हुआ, वह केशव के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था।
दुकान के लॉकर से पाँच लाख रुपए गायब थे। यह रकम एक बड़े कारीगर को एडवांस देने के लिए रखी गई थी। जब विक्रम ने लॉकर खोला और पैसे नहीं मिले, तो उसने सीधा इल्जाम केशव पर लगा दिया। उसने माँ और रिश्तेदारों के सामने यह साबित कर दिया कि केशव को ऑनलाइन सट्टेबाजी की लत लग गई है और उसी ने ये पैसे चुराए हैं। सबूत के तौर पर विक्रम ने केशव के दराज से सट्टेबाजी की कुछ पर्चियां (जो झूठी थीं) निकालकर दिखाई थीं।
केशव सन्न रह गया था। वह जुआ तो दूर, पान-मसाला तक नहीं खाता था। लेकिन विक्रम का अभिनय इतना सधा हुआ था—माथे पर पसीना, आवाज़ में चिंता और आँखों में झूठे आंसू—कि माँ भी पिघल गईं।
“मैंने सोचा नहीं था कि तू ऐसा निकलेगा केशव,” कावेरी देवी ने रोते हुए कहा था। “तेरे पिता ने यह इज़्ज़त कमाई थी, और तूने उसे मिट्टी में मिला दिया? विक्रम तो दिन-रात खटता है और तू उसकी मेहनत पर पानी फेर रहा है?”
केशव कुछ बोलना चाहता था, अपनी सफाई देना चाहता था, लेकिन विक्रम ने उसे बोलने का मौका ही नहीं दिया। “माँ, जाने दो। अब जो नुकसान होना था, हो गया। मैं अपनी एफडी (FD) तुड़वाकर कारीगर को पैसे दे दूंगा। बस केशव सुधर जाए, यही बहुत है। घर की बात घर में ही रहे तो अच्छा है।”
विक्रम के इस ‘त्याग’ ने उसे माँ की नज़रों में देवता और केशव को दानव बना दिया था।
अब शाम हो चुकी थी। रिश्तेदार जा चुके थे। केशव अपने कमरे में अंधेरे में बैठा था। उसे बचपन की याद आ रही थी। जब उसे स्कूल में चोट लगती थी, तो यही विक्रम भैया उसे गोद में उठाकर घर लाते थे। जब पिता जी डांटते थे, तो विक्रम भैया ढाल बन जाते थे। केशव सोच रहा था—”क्या वह प्यार झूठ था? या यह नफरत नई है?”
तभी उसके कमरे का दरवाजा धीरे से खुला। उसकी पत्नी, मीरा, अंदर आई। मीरा की आँखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर विश्वास था। वह केशव के पास बैठी और उसका हाथ थाम लिया।
“मैं जानती हूँ आपने पैसे नहीं लिए,” मीरा ने दृढ़ता से कहा।
केशव ने उसे देखा। “पर माँ नहीं मानतीं, मीरा। और भैया… भैया ऐसा क्यों करेंगे? पाँच लाख रुपए के लिए वो मुझे चोर साबित कर देंगे?”
मीरा ने एक गहरी सांस ली। “बात पैसों की नहीं है केशव। बात ‘अस्तित्व’ की है। पिछले महीने जब मिनिस्टर साहब की पत्नी दुकान पर आई थीं, तो उन्होंने भैया के सामने कहा था कि ‘असली कलाकार तो केशव है, विक्रम तो बस दुकानदार है’। मैंने उस वक्त भैया का चेहरा देखा था। उनका रंग फक्क पड़ गया था। यह साजिश आपको दुकान से बेदखल करने की है, पैसों की चोरी तो बस एक बहाना है।”
केशव का दिल नहीं मान रहा था। उसने सोचा कि वह एक बार भैया से अकेले में बात करेगा। शायद कोई गलतफहमी हो। शायद कोई स्टाफ मेंबर ने चोरी की हो और भैया को गलतफहमी हो गई हो।
रात के ग्यारह बज रहे थे। केशव पानी पीने के बहाने कमरे से निकला। विक्रम का कमरा उसके कमरे के बगल में ही था। वहां से थोड़ी आवाज़ें आ रही थीं। केशव के कदम ठिठक गए।
कमरे के अंदर विक्रम अपनी पत्नी, शालिनी से बात कर रहा था।
“तुमने आज माँ के सामने कुछ ज्यादा ही नाटक कर दिया विक्रम,” शालिनी की आवाज़ थी। “बेचारा केशव रो रहा था।”
विक्रम की हंसी सुनाई दी—एक ऐसी हंसी जो केशव ने पहले कभी नहीं सुनी थी। क्रूर और ठंडी।
“रोना ज़रूरी था उसका, शालिनी। अगर आज मैं यह ड्रामा नहीं करता, तो कल वो दुकान मेरे हाथ से निकल जाती। तुम्हें पता है, पिता जी की वसीयत के हिसाब से, अगले महीने केशव के तीस साल के होते ही, दुकान की पचास फीसदी हिस्सेदारी उसके नाम क़ानूनी तौर पर हो जाती। और जिस तरह से मार्केट में उसकी पूछ बढ़ रही है, कुछ सालों में लोग ‘विक्रम’ को भूल जाते। अब, जब उस पर चोरी और सट्टेबाजी का दाग लग गया है, तो मैं माँ से कहकर उसे बिज़नेस से अलग कर दूंगा। कह दूंगा कि इसे हिस्सा दिया तो यह सब जुए में उड़ा देगा।”
“लेकिन वो तुम्हारा भाई है…” शालिनी ने दबी आवाज़ में कहा।
“व्यापार में कोई भाई नहीं होता,” विक्रम ने सख्त लहेज़े में कहा। “मैंने उसे पाला, उसे काम सिखाया, और अब वो मुझसे बड़ा बन जाए? यह मुझे बर्दाश्त नहीं। वो पर्चियां बनवाने में मुझे काफ़ी मेहनत लगी, अब मैं अपनी मेहनत बेकार नहीं जाने दूंगा। कल सुबह देखना, मैं उसे ऐसा ऑप्शन दूंगा कि वो खुद ही दुकान छोड़कर चला जाएगा।”
दरवाजे के बाहर खड़े केशव को लगा जैसे किसी ने उसका कलेजा निकालकर मसल दिया हो। उसका शरीर सुन्न पड़ गया। आँखों से आंसू सूख गए। जिस भाई को वह राम मानता था, वह असल में रावण से भी बदतर निकला। उसे पैसों का लालच नहीं था, उसे केशव की ‘प्रतिष्ठा’ से ईर्ष्या थी। वह केशव को बर्बाद करना चाहता था सिर्फ़ इसलिए क्योंकि केशव काबिल था।
केशव चुपचाप अपने कमरे में लौट आया। उसने मीरा को कुछ नहीं बताया, बस इतना कहा, “सो जाओ, कल सुबह एक नया फैसला लेना है।”
पूरी रात केशव जागता रहा। उसने अपनी पूरी ज़िन्दगी का लेखा-जोखा किया। उसने महसूस किया कि प्रेम और सम्मान भीख में नहीं मिलते। और जहाँ विश्वास की जड़ें ही खोद दी गई हों, वहां रिश्ते का पेड़ खड़ा नहीं रह सकता।
अगली सुबह नाश्ते की मेज पर सन्नाटा था। कावेरी देवी अभी भी मुंह फुलाए बैठी थीं। विक्रम अखबार पढ़ रहा था, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
केशव आया और चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठ गया। मीरा उसके लिए चाय लेकर आई।
विक्रम ने अखबार नीचे किया और गंभीर आवाज़ में बोला, “केशव, कल जो हुआ, उसके बाद मैंने एक फैसला लिया है। मैं नहीं चाहता कि पुलिस केस हो या तुम्हारी बदनामी हो। इसलिए, मैं माँ से कह रहा था कि हम बंटवारा कर लेते हैं।”
कावेरी देवी चौंक गईं, “बंटवारा? नहीं विक्रम, घर नहीं टूटेगा।”
“माँ, घर नहीं टूटेगा, बस ज़िम्मेदारी बंटेगी,” विक्रम ने शातिर चाल चली। “केशव को अभी पैसों की समझ नहीं है। अगर इसे पूरी आज़ादी दी तो यह सब डूबा देगा। इसलिए, मैं चाहता हूँ कि केशव दुकान की ज़िम्मेदारी छोड़ दे। बदले में मैं इसे हर महीने एक फिक्स रकम (घर खर्च) देता रहूंगा। और हाँ, जो पाँच लाख का गबन हुआ है, वो मैं इसके हिस्से से धीरे-धीरे काट लूंगा।”
विक्रम की योजना साफ़ थी—केशव को नौकर बनाकर रखना।
केशव ने चाय का कप मेज पर रखा। उसकी आँखों में आज वो डर या संकोच नहीं था जो हमेशा बड़े भाई के सामने रहता था। उसकी आँखों में एक ऐसी शांति थी जो तूफ़ान के बाद आती है।
“भैया,” केशव ने शांत स्वर में कहा। “बंटवारा तो कल रात ही हो गया था, जब आपने लॉकर से पैसे निकालकर मेरी दराज में वो पर्चियां रखी थीं।”
विक्रम के हाथ से अखबार गिर गया। “क्या बकवास कर रहे हो?”
“बकवास नहीं, सच,” केशव ने माँ की ओर देखा। “माँ, आपको लगता है मैंने चोरी की। ठीक है, मैं मान लेता हूँ। क्योंकि अगर मैं सच साबित करूँ, तो आपकी नज़रों में आपका बड़ा बेटा गिर जाएगा। और मैं आपको यह दुख नहीं देना चाहता। पिता जी हमेशा कहते थे कि बड़े भाई का सम्मान पिता समान होता है। मैंने वही किया।”
केशव खड़ा हो गया। “भैया, आपको दुकान चाहिए थी न? आपको मेरा बढ़ता हुआ नाम खटक रहा था न? आप मुझसे मांग लेते। मैं खुशी-खुशी साइन कर देता। उसके लिए आपको मुझे ‘चोर’ और ‘जुआरी’ साबित करने की क्या ज़रूरत थी? आपको मेरे चरित्र पर कीचड़ उछालने की क्या ज़रूरत थी?”
“तू जुबान लड़ा रहा है?” विक्रम चिल्लाया, ताकि अपनी घबराहट छिपा सके।
“नहीं, मैं बस अलविदा कह रहा हूँ,” केशव ने अपनी जेब से दुकान की चाबियां निकालीं और मेज पर रख दीं। “ये लीजिए चाबियां। और वो वसीयत के कागज़ भी आप रख लीजिये। मुझे हिस्सा नहीं चाहिए। मुझे वो दौलत नहीं चाहिए जिसकी नींव मेरे भाई के धोखे पर रखी हो।”
कावेरी देवी घबरा गईं, “केशव, तू क्या कह रहा है? तू कहाँ जाएगा?”
“जहाँ मेरी कला की कद्र हो माँ, और जहाँ मुझे हर पल यह साबित न करना पड़े कि मैं चोर नहीं हूँ,” केशव ने मीरा का हाथ थाम लिया। “हम यह घर छोड़कर जा रहे हैं।”
“तू खाली हाथ जाएगा? सड़क पर भीख मांगेगा?” विक्रम ने ताना मारा, “कारीगरी से घर नहीं चलते, दुकान से चलते हैं।”
केशव दरवाजे पर रुका। उसने मुड़कर विक्रम को देखा। उस नज़र में इतना तेज था कि विक्रम को नज़रे चुरानी पड़ीं।
“भैया,” केशव मुस्कुराया, “कौवे के छीनने से मोर के पंख नहीं झड़ते। हुनर मेरे हाथों में है, दुकान की दीवारों में नहीं। आपने दुकान रख ली, पर ‘अवध टेक्सटाइल्स’ की रूह तो मैं अपने साथ लेकर जा रहा हूँ। आज मैं खाली हाथ ज़रूर हूँ, पर मेरा जमीर साफ़ है। और याद रखिएगा, व्यापार विश्वास से चलता है, और आपने आज अपनी सबसे बड़ी पूंजी—अपने भाई का विश्वास—खो दी है।”
केशव और मीरा घर से निकल गए। उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
कावेरी देवी रोती रहीं। विक्रम को लगा कि वह जीत गया है। दुकान अब उसकी थी। कोई हिस्सेदार नहीं, कोई कॉम्पिटिशन नहीं।
लेकिन समय सबसे बड़ा न्यायधीश होता है।
अगले दो सालों में शहर का मंज़र बदल गया। विक्रम के पास दुकान तो थी, लेकिन ‘नयापन’ गायब हो गया था। पुराने डिज़ाइन पिटने लगे थे। कारीगर, जो केशव को उस्ताद मानते थे, धीरे-धीरे काम छोड़कर जाने लगे। ग्राहकों ने आना कम कर दिया क्योंकि उन्हें वो ‘जादू’ नहीं मिल रहा था।
दूसरी तरफ, शहर के एक छोटे से हिस्से में, एक किराए के कमरे से केशव ने ‘मीरा क्रिएशन्स’ की शुरुआत की। उसके पास बड़ी दुकान नहीं थी, कोई शो-रूम नहीं था। लेकिन उसके पास उसका हुनर और मीरा का साथ था। उसने सोशल मीडिया पर अपने डिज़ाइन डाले। उसकी सच्चाई और कला ने लोगों का दिल जीत लिया। जो ग्राहक ‘अवध टेक्सटाइल्स’ से निराश लौटते, वे केशव के छोटे से कारखाने तक पहुँच जाते।
तीन साल बाद, एक बड़े फैशन शो में केशव को ‘बेस्ट आर्टिसन ऑफ द ईयर’ का अवार्ड मिल रहा था। पूरा हॉल तालियों से गूंज रहा था। केशव स्टेज पर खड़ा था, सफल और आत्मविश्वासी।
उसी भीड़ के एक कोने में, विक्रम खड़ा था। उसके कपड़े अब उतने महंगे नहीं थे, चेहरे पर झुर्रियां और तनाव था। ‘अवध टेक्सटाइल्स’ अब कर्ज में डूबा हुआ था और बिकने की कगार पर था। उसने सोचा था कि केशव को निकालकर वह राजा बन जाएगा, लेकिन केशव को निकालकर उसने असल में अपनी दुकान की ‘किस्मत’ ही निकाल फेंकी थी।
केशव की नज़र भीड़ में विक्रम पर पड़ी। विक्रम ने नज़रें झुका लीं। उसे केशव की कही बात याद आ गई—“हुनर मेरे हाथों में है, दीवारों में नहीं।”
केशव ने माइक पर कहा, “यह अवार्ड मैं अपनी माँ को समर्पित करता हूँ। और अपने बड़े भाई को भी… जिन्होंने मुझे सिखाया कि जब अपने ही घर में आग लगा दी जाए, तो उस आग से जलना नहीं, बल्कि कुंदन बनकर निखरना कैसे होता है।”
स्टेज की रौशनी में केशव चमक रहा था, और विक्रम अंधेरे कोने में अपनी ईर्ष्या और पछतावे की राख में जल रहा था। जतिन बाबू की तरह केशव ने भी भाई द्वारा लगाई गई आग को महसूस किया था, लेकिन उसने उस आग में खुद को स्वाहा नहीं होने दिया, बल्कि उससे अपनी सफलता की मशाल जला ली।
निष्कर्ष:
रिश्तों में जब जहर घुल जाए, तो उससे लड़ने का सबसे अच्छा तरीका वही है जो केशव ने अपनाया—वहां से हट जाना और अपनी लकीर इतनी बड़ी कर लेना कि दूसरे की लकीर अपने आप छोटी नज़र आए। ईर्ष्या करने वाला अंततः अपना ही नुकसान करता है, क्योंकि वह दूसरे को गिराने में इतना व्यस्त हो जाता है कि खुद को संभालना भूल जाता है।
मूल लेखिका : डॉ पारुल अग्रवाल