बहू ने सीमा खींच दी – मधु वशिष्ठ

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सर्दियों की दोपहर में ,और गर्मियों की शाम को, गुप्ता आंटी , “कॉलोनी में ”    अपने घर के बाहर चारपाई बिछाकर सबको इकट्ठा करके बहू पुराण शुरू हो जाती थी। उस पुराण में कहीं कुछ भूल जाए तो याद कराने का काम उनके साथ बैठी उनकी बिटिया रानी का था। खाने का काम तो दोनों को ही नहीं करना था, क्योंकि यह काम तो बहुरानी का था। बिटिया तो अपना काम कर चुकी थी ,”अपने पतिदेव को लेकर, घर के पास में ही किराए पर मकान ले चुकी थी”।  उसने अपने प्यारे बेटे को बहुरानी की निगरानी के लिए छोड़ रखा था।

आंटी के तीन बेटे और एक बेटी थी ।बड़े  “बैंक में क्लर्क”  बेटे ,के लिए पता नहीं ,उन्होंने कैसे,  “बैंक की अफसर ”  बहू ढूंढ ली। और यही नहीं उस बहू को अपने इशारों पर नचा कर भी दिखाया। यह तो कुछ वक्त बाद जब बहू का स्थानांतरण मेरठ हुआ, तो बेटे को भी वहीं अपना स्थानांतरण करवाना पड़ा । इस तरह से बड़ी बहू को तो मुक्ति मिली। लेकिन दूसरी बहू को तो लगन से सारे नियम समझाए गए। उनका पालन करवाने में कोई कोताही नहीं बरती जाती थी। सवेरे 5:00 बजे से उठकर  लगभग 11:00 बजे तक तो उसे घर का काम करते देखा ही जा सकता था। घूंघट में सिर्फ उसकी पनियाली आंखें ही कुछ चुगली कर जातीं थी, वरना उस बहू से बात करने की अनुमति तो किसी को भी नहीं थी।      क्या पता! कोई क्या कुछ सिखा दे ?      बेटे को टूर पर पांच 6 दिन के लिए कहीं जाना था, तो उस बहुरानी को पीहर जाने की अनुमति मिली थी ।यह तो बाद में ही पता चला कि बेटे ने अपने ऑफिस के पास ही एक घर किराए पर ले लिया था, और टूर पर जाने के बहाने वह दोनों भी अपना जरूरी सामान बैग में रखकर घर से भाग चुके थे।

आंटी का तीसरा और सबसे छोटा बेटा जन्मजात गूंगा और बहरा था। स्कूल की पढ़ाई तो उसने बारहवीं तक की थी ।घर के काम में भी वह प्रवीण था ।आंटी का लाडला था, पास ही एक स्वीट हाउस में वह काम करता था। आंटी और  वह इशारों में काफी देर तक बातें करते थे ।जब आंटी के तीसरे बेटे की शादी का कार्ड आया तो यह पूरी कॉलोनी की चर्चा का विषय बन गया था। जी हां आंटी ने अपने तीसरे बेटे की भी शादी कर दी थी।

गज़ब की सुंदर ,    मोटी मोटी आंखें ,प्यारी सी मुस्कान ,चेहरे पर गुलाबी आभा, यह तो बाद में पता पड़ा कि वह लड़की भी गूंगी बहरी ही थी।  यह तो कसाई आंटी के जाल से निकल भी नहीं सकती।  आंटी और उनकी बेटी के चेहरे की विजयी मुस्कान देख कर उस नई बहू के प्रति बहुत सहानुभूति उमड़ रही थी।

लेकिन यहां तो उल्टी गंगा ही बह निकली थी।  रोज सुबह 9:00 बजे उनके घर से जोर जोर से दरवाजा पीटने की आवाज आती थी।   शायद बहुरानी को जल्दी उठने की आदत नहीं थी ,और कोई भी  आवाज उन्हें सुनाई भी नहीं देती थी।  इसलिए बहु रानी अपने मनमाने समय पर ही उठतीं थी। अपना काम गुप्ता आंटी स्वयं करें।  बहुरानी को पति को लंच देने की कोई खास चिंता  नहीं थी,वह तो अपना खाना होटल में भी खा सकता था। बहुरानी को समझाने के लिए आंटी  इशारे करते-करते भले ही “पूरा नाच “नाच लें ,लेकिन बहु रानी को कुछ समझ नहीं आता था, या “वह समझना ही नहीं चाहती थी”, पता नहीं।  वह तो वही काम करती थी, जो कि वह करना चाहती थी। गुप्ता आंटी के माथे में भले ही कितने बल पड़ जाएं, पर बहु रानी की मुस्कान में कोई कमी नहीं होती थी। शाम को बेटा और बहू दोनों पार्क में घूमते हुए देखे जा सकते थे।  पार्क में सब के इशारों को  बहुरानी बहुत अच्छे से समझती थी और अपने इशारे सब को समझा भी देती थी ।  अब तो गुप्ता आंटी और उनकी बेटी को चौकड़ी बिठाने का टाइम भी बहुत कम ही मिलता था क्योंकि घर का काम भी तो उन्होंने खुद ही देखना था। बहूरानी पर तो कोई दबाव काम नहीं करता था। बहुरानी ने तो अपनी सीमा खींच ली थी। वह तो अक्सर शाम को तैयार होकर अपने पति के साथ थोड़ा “चाट पापड़ी “खाने निकल जाती थी। आखिर वह थी भी तो अपने पति की लाडली पत्नी ।  वह लखनऊ के पास के किसी गांव की थी ,तो दिल्ली जैसे शहर को तो देखने की उसकी बहुत इच्छा होती थी। छुट्टी वाले दिन तो दोनों ‌मेट्रो में घूमने निकल ही जाते थे।दोनों के चेहरे की खुशी देखते ही बनती थी।

आज तो आंटी कुछ ज्यादा ही उदास थी, चेहरे पर बहुत बिचारगी झलक रही थी। पूछने पर फट पड़ी और बोलीं, यह बेटा बहू करते क्या है, यह तो अब मैं समझ भी नहीं सकती, क्योंकि ,”इन दोनों ने इशारे ही बदल लिए हैं”। ——-मन को बहुत शांति मिली,  लोग सच ही कहते हैं ,सेर को सवा सेर मिलता ही है। छोटी बहू ने सीमा खींच ही दी। अब गुप्ता आंटी और उनकी बेटी चाह कर भी छोटी बहू को तंग नहीं कर पाती थी।

छोटी बहू अब उसे घर में बड़े आराम से रहते थे। जो काम करना चाह कर लेती थी जो नहीं करना चाहे वह नहीं करती थी और उसे पर कोई दबाव भी नहीं था। 

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा 

बहू ने सीमा खींच दी विषय के अंतर्गत लिखी कहानी।

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