मैं आदर्श बहू नहीं बनना चाहती – शिल्पा अग्रवाल

कमरे में एसी की धीमी घड़घड़ाहट और बाहर सन्नाटा पसरा हुआ था। रात के ग्यारह बज रहे थे। बेडसाइड लैंप की मद्धम रोशनी में अनन्या अपनी फाइल बंद कर रही थी जब उसके पति, रोहन ने करवट बदली और थोड़ी हिचकिचाहट के साथ वह बात कही जो शायद वह पिछले दो घंटों से कहने की हिम्मत जुटा रहा था।

“अच्छा अनु, सुनो… कल मम्मी-पापा आ रहे हैं। वे दस दिन हमारे साथ रहेंगे। प्लीज, थोड़ा एडजस्ट कर लेना।”

अनन्या ने फाइल टेबल पर रखी और चश्मा उतारते हुए रोहन की तरफ देखा। उसकी आँखों में न तो कोई घबराहट थी, न गुस्सा और न ही वह पुरानी वाली बेताबी जो अक्सर ससुराल वालों के आने की खबर सुनकर उसके चेहरे पर आ जाया करती थी। उसने बहुत शांत स्वर में जवाब दिया, “कोई बात नहीं रोहन, आने दीजिये। अबकी बार शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा।”

रोहन को इस जवाब की उम्मीद नहीं थी। उसे लगा था कि अनन्या पुरानी बातों को लेकर बहस करेगी, पूछेगी कि अचानक क्यों आ रहे हैं, या फिर अपनी ऑफिस की व्यस्तता का हवाला देगी। लेकिन अनन्या की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था—बर्फ जैसा ठंडा और चट्टान जैसा सख्त। रोहन ने कुछ कहना चाहा, पर अनन्या ने लाइट बंद कर दी और चादर ओढ़कर सो गई।

लेकिन नींद अनन्या की आँखों से कोसों दूर थी। अंधेरे में उसकी आँखें छत को घूर रही थीं। “एडजस्ट कर लेना”—यह तीन शब्द उसके वैवाहिक जीवन के पिछले पाँच सालों का सार थे। जब वह नई-नई ब्याह कर आई थी, तो उसने ‘एडजस्ट’ करने की हर मुमकिन कोशिश की थी। वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर  थी,

लेकिन घर पर वह एक आदर्श बहू बनने की होड़ में लगी रहती थी। सासू माँ, विमला देवी, और ससुर जी, हरीश बाबू, जब भी आते, अनन्या अपनी छुट्टी ले लेती। वह सुबह पांच बजे उठती, उनके लिए नाश्ता बनाती, उनकी पसंद की साड़ियाँ पहनती, और दिन भर उनकी जी-हुजूरी में लगी रहती।

बावजूद इसके, हर बार विदाई के वक्त शिकायतों का एक पुलिंदा उसके हाथ में थमा दिया जाता था। “बहू, खाने में वो स्वाद नहीं था,” “बहू, तुमने समय नहीं दिया,” “बहू, घर में धूल थी।” रोहन हमेशा चुप रहता और बाद में अनन्या से कहता, “बूढ़े हैं, एडजस्ट कर लो।” पिछली बार जब वे आए थे, तो अनन्या को एक बहुत ज़रूरी प्रेजेंटेशन छोड़नी पड़ी थी, जिसके कारण उसका प्रमोशन रुक गया था। और बदले में उसे क्या मिला था? विमला देवी का ताना—”अरे, ऐसी भी क्या नौकरी कि घर आए मेहमानों के लिए कचौड़ी न बना सको।”

उस दिन अनन्या अंदर से कुछ टूट गई थी। उसने रोहन से नहीं लड़ा, उसने ससुराल वालों को पलटकर जवाब नहीं दिया। उसने बस खुद को बदल लिया। वह समझ गई थी कि वह चाहे अपनी जान भी दे दे, वह कभी वह ‘पारंपरिक बहू’ नहीं बन सकती जिसकी तस्वीर विमला देवी के मन में छपी थी। इसलिए, इस बार उसने रणनीति बदल दी थी। इस बार ‘शिकायत का मौका नहीं मिलेगा’ का मतलब यह नहीं था कि वह और ज्यादा खटेगी। इसका मतलब था कि वह अब कोशिश करना ही छोड़ देगी। वह वही करेगी जो सही है, न कि वह जो उनसे उम्मीद की जाती है।

अगली सुबह, अनन्या ने अलार्म बजने से पहले ही उठकर अपनी दिनचर्या शुरू कर दी। उसने योगा किया, अपनी ब्लैक कॉफी पी और ऑफिस जाने के लिए तैयार हो गई। जब रोहन उठा, तो उसने देखा कि अनन्या अपने लैपटॉप बैग के साथ तैयार है।

“अरे, तुम ऑफिस जा रही हो? मम्मी-पापा की ट्रेन दस बजे आएगी,” रोहन ने हैरान होकर पूछा।

“हाँ रोहन, मेरी आज मीटिंग है। मैंने ड्राइवर को भेज दिया है, वह उन्हें ले आएगा। घर पर सारी तैयारी है,” अनन्या ने सपाट लहजे में कहा और निकल गई।

जब हरीश बाबू और विमला देवी घर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि घर का नक़्शा बदला हुआ है। पहले जब वे आते थे, तो अनन्या दरवाज़े पर खड़ी मिलती थी, घबराई हुई सी, पल्लू संभाले हुए। लेकिन आज दरवाज़ा घर की पुरानी सहायिका, कमला दीदी ने खोला। घर शीशे की तरह चमक रहा था। गेस्ट रूम में नए परदे, ताज़े फूल और बेड पर धुली हुई चादरें थीं। साइड टेबल पर पानी का जग, दवाइयां और फलों की टोकरी सलीके से रखी थी। सब कुछ परफेक्ट था, बिल्कुल किसी होटल जैसा।

विमला देवी ने घर का मुआयना किया। कहीं धूल का एक कण नहीं। किचन में जाकर देखा तो वहां एक नया रसोइया, महाराज जी, खाना बना रहे थे।

“ये कौन हैं?” विमला देवी ने कमला से पूछा।

“मांझी, ये दस दिनों के लिए रखे गए हैं। भाभी ने कहा है कि आपको और साहब को ताज़ा और आपकी पसंद का खाना समय पर मिलना चाहिए। भाभी को ऑफिस से देर हो जाती है, तो आपको इंतज़ार न करना पड़े, इसलिए महाराज जी को रखा है,” कमला ने रटा-रटाया जवाब दिया।

विमला देवी के पास बोलने को कुछ नहीं था, लेकिन मन में एक खटास थी। वे चाहती थीं कि बहू उनके लिए खाना बनाए, भले ही वह देर से आए। यह ‘सुविधा’ उन्हें रास नहीं आ रही थी, क्योंकि इसमें ‘सेवा’ का भाव गायब था।

शाम को जब अनन्या लौटी, तो उसने साड़ी नहीं, अपना ऑफिस का फॉर्मल सूट पहन रखा था। वह सीधे ड्राइंग रूम में आई जहाँ सास-ससुर बैठे थे। उसने झुककर पैर नहीं छुए, बल्कि हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए नमस्ते किया।

“नमस्ते मम्मी जी, नमस्ते पापा जी। सफ़र कैसा रहा? कोई तक़लीफ़ तो नहीं हुई?” उसकी आवाज़ में विनम्रता थी, पर वह अपनापन नदारद था जो पहले हुआ करता था।

“ठीक रहा,” हरीश बाबू ने संक्षेप में कहा।

विमला देवी ने ताना मारने की कोशिश की, “हाँ, तक़लीफ़ कैसी? ड्राइवर ले आया, नौकर ने पानी पिला दिया, महाराज ने खाना खिला दिया। बहु के दर्शन तो अब शाम को हो रहे हैं।”

पहले वाली अनन्या होती तो माफ़ी मांगने लगती, बहाने बनाती। लेकिन यह नई अनन्या थी। वह मुस्कुराई और सोफे पर बैठते हुए बोली, “यह तो अच्छी बात है मम्मी जी कि आपको कोई असुविधा नहीं हुई। मैंने यही सोचकर सब इंतजाम किया था कि मेरी व्यस्तता के कारण आपकी आवभगत में कोई कमी न रह जाए। अब आप आराम से रहिये, आपको किसी चीज़ के लिए मेरा इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा।”

अनन्या का यह जवाब सुनकर विमला देवी अवाक रह गईं। शिकायत का तीर चलाने से पहले ही कुंद हो गया था।

अगले चार दिन इसी तरह बीते। घर में एक अजीब सा अनुशासन आ गया था। सुबह 8 बजे नाश्ता टेबल पर होता। महाराज जी पूछते, “माता जी, आज क्या बनेगा?” और वही बना देते। शाम को अनन्या आती, हाल-चाल पूछती, थोड़ी देर बैठती और फिर अपने कमरे में काम करने चली जाती। न कोई बहस, न कोई आंसू, न कोई हड़बड़ाहट।

रोहन इस बदलाव को महसूस कर रहा था। वह देख रहा था कि अनन्या खुश नहीं है, बस ‘कुशल’ है। वह एक बेहतरीन मैनेजर की तरह घर चला रही थी।

“अनु, तुम मम्मी-पापा के साथ बैठती नहीं हो,” रोहन ने एक रात कहा।

“रोहन, मैं बैठती हूँ। बात भी करती हूँ। लेकिन अब मैं जबरदस्ती वो बनने का नाटक नहीं कर सकती जो मैं नहीं हूँ। उन्हें सुविधा चाहिए, मैंने दी। उन्हें इज़्ज़त चाहिए, मैंने दी। अब उन्हें मेरा ‘वक़्त’ चाहिए जो मेरे पास नहीं है, तो उसके लिए मैं माफ़ी नहीं मांगूंगी,” अनन्या ने स्पष्ट कर दिया।

पांचवें दिन एक घटना घटी। विमला देवी को अचानक घबराहट होने लगी। उनका बीपी बढ़ गया था। रोहन ऑफिस में था और उसका फोन नहीं मिल रहा था। घर पर सिर्फ़ विमला देवी और हरीश बाबू थे। हरीश बाबू घबरा गए, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। उन्होंने कांपते हाथों से अनन्या को फोन किया।

“बहू… तुम्हारी सास की तबीयत…” हरीश बाबू हकलाए।

“पापा जी, आप घबराइए मत। मैं अभी एम्बुलेंस भेज रही हूँ और डॉक्टर को कॉल कर रही हूँ। मैं पंद्रह मिनट में पहुँच रही हूँ,” अनन्या की आवाज़ में गज़ब का संयम था।

दस मिनट के अंदर एम्बुलेंस घर के नीचे थी। अनन्या ने अपनी मीटिंग बीच में छोड़ी और सीधे अस्पताल पहुँची। उसने वहां पहुँचकर रिसेप्शन पर बात की, फॉर्म भरे, डॉक्टर से कंसल्ट किया और विमला देवी को प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट करवाया। उसने रोहन को मैसेज कर दिया था, लेकिन उसके आने का इंतज़ार नहीं किया। वह एक ढाल की तरह खड़ी रही।

जब शाम को रोहन अस्पताल पहुँचा, तो उसने देखा कि विमला देवी आराम से सो रही हैं, ड्रिप लगी हुई है। हरीश बाबू कुर्सी पर बैठे थे और अनन्या डॉक्टर से डाइट चार्ट समझ रही थी।

“सब ठीक है?” रोहन ने हांफते हुए पूछा।

हरीश बाबू ने रोहन को देखा, फिर अनन्या को। उनकी आँखों में नमी थी। “हाँ बेटा, सब ठीक है। अगर आज अनन्या नहीं होती, तो पता नहीं क्या हो जाता। मैं तो हाथ-पांव फूलकर बैठ गया था। इस लड़की ने मिनटों में सब संभाल लिया। इसने मुझे एक पल के लिए भी महसूस नहीं होने दिया कि मैं अकेला हूँ।”

रोहन ने अनन्या को देखा। वह थकी हुई लग रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर संतोष था।

अगले दिन विमला देवी को डिस्चार्ज मिल गया। अनन्या उन्हें घर ले आई। उसने महाराज जी को सख्त हिदायत दी कि तेल-मसाला बिल्कुल बंद रहेगा। वह खुद समय-समय पर विमला देवी को दवा देने जाती।

विमला देवी बेड पर लेटी अनन्या को देख रही थीं। यह वही बहू थी जिसे वे कोसती थीं कि वह घर के काम नहीं करती। लेकिन आज जब जीवन पर बन आई, तो न उनका बेटा काम आया, न उनके रिश्तेदार। काम आई तो यही ‘ऑफिस वाली बहू’ जिसका काम करने का तरीका मशीनी था, लेकिन इरादे मज़बूत थे।

“अनन्या…” विमला देवी ने धीमे स्वर में पुकारा।

अनन्या दवा की शीशी रख रही थी। “जी मम्मी जी? पानी चाहिए?”

“नहीं,” विमला देवी ने अनन्या का हाथ पकड़ने की कोशिश की। “बैठो घड़ी भर।”

अनन्या कुर्सी खींचकर बैठ गई।

“तुमने सही कहा था बहू,” विमला देवी की आवाज़ भर्रा रही थी। “इस बार शिकायत का कोई मौका नहीं मिला।”

अनन्या चुप रही।

विमला देवी ने आगे कहा, “मैं हमेशा चाहती थी कि तुम मेरी तरह बनो। घर संभालो, रसोई में खटो, सबकी सेवा करो। मुझे लगता था कि प्यार उसी को कहते हैं। लेकिन आज समझ आया कि प्यार का मतलब सिर्फ गरम रोटियां सेंकना नहीं होता। प्यार का मतलब होता है ज़िम्मेदारी उठाना। तुमने मुझे वो नहीं दिया जो मैं ‘चाहती’ थी, पर तुमने मुझे वो दिया जिसकी मुझे ‘ज़रूरत’ थी।”

अनन्या की आँखों में एक हल्की चमक आई। उसने पहली बार अपने उस सख्त खोल को थोड़ा ढीला किया।

“मम्मी जी, मैं जानती हूँ मैं पारंपरिक बहू नहीं हूँ। मुझसे गोल रोटियां नहीं बनतीं, मुझसे चापलूसी नहीं होती। लेकिन यह परिवार मेरा भी है। रोहन मेरे पति हैं और आप उनके माता-पिता। आपकी सुरक्षा और सेहत मेरी प्राथमिकता है, लेकिन मेरा काम मेरा वजूद है। मैं दोनों में से किसी एक को नहीं चुन सकती।”

विमला देवी ने अनन्या का हाथ थपथपाया। “हमें माफ़ कर देना बेटा। हम अपनी पुरानी सोच में इतने जकड़े हुए थे कि तुम्हारी काबिलियत को तुम्हारा घमंड समझ बैठे। तुमने घर को होटल नहीं बनाया, तुमने घर को सुरक्षित किला बना दिया था।”

उस रात खाने की मेज़ पर माहौल बदला हुआ था। महाराज जी ने खाना परोसा। हरीश बाबू ने पहला निवाला खाया और बोले, “महाराज जी, खाना अच्छा है। लेकिन अगली बार जब हम आएं, तो बहू, एक दिन अपनी उस ‘पास्ता’ डिश को ज़रूर खिलाना। रोहन कहता है तुम बहुत अच्छा बनाती हो।”

रोहन का मुंह खुला का खुला रह गया। अनन्या मुस्कुरा दी। “ज़रूर पापा जी।”

दस दिन बीत गए। विदाई का समय आया।

हमेशा की तरह कार तैयार थी। सामान रखा जा चुका था। लेकिन इस बार विमला देवी के चेहरे पर वह खीझ नहीं थी जो अक्सर होती थी। उन्होंने अपने पर्स से एक छोटा सा लिफाफा निकाला और अनन्या के हाथ में रख दिया।

“ये क्या है मम्मी जी?” अनन्या ने पूछा।

“शगुन नहीं है,” विमला देवी मुस्कुराईं। “ये उस साड़ी के पैसे हैं जो मैं तुम्हारे लिए लाई थी, पर जानती हूँ तुम पहनोगी नहीं। इससे अपने लिए वो खरीदना जो तुम्हें पसंद हो। शायद कोई नई किताब या तुम्हारे लैपटॉप का कोई सामान।”

अनन्या की आँखों में आंसू आ गए। यह पहली बार था जब उसकी सास ने उसे ‘बहू’ के चश्मे से नहीं, बल्कि एक ‘व्यक्ति’ के रूप में देखा था।

“और सुनो,” हरीश बाबू ने कार में बैठते हुए कहा। “अगली बार जब हम आएं, तो तुम अपनी मीटिंग्स कैंसिल मत करना। हम अब समझ गए हैं कि इस घर का रिमोट कंट्रोल सही हाथों में है। हमें बस साथ रहना है, सेवा नहीं करवानी।”

कार चली गई। रोहन ने अनन्या के कंधे पर हाथ रखा।

“तुमने तो चमत्कार कर दिया। मुझे लगा था महाभारत होगा, यहाँ तो रामायण का सुखद अंत हो गया। कैसे किया तुमने यह सब?”

अनन्या ने गहरी सांस ली और रोहन की तरफ देखा। “रोहन, मैंने सिर्फ़ अपनी ‘उम्मीदें’ छोड़ दीं। मैं हमेशा चाहती थी कि वे मुझे मेरी तरह स्वीकार करें, और वे चाहते थे कि मैं उनकी तरह बन जाऊं। इस रस्साकशी में हम दोनों दुखी थे। इस बार, मैंने तय किया कि मैं अपना सौ प्रतिशत दूंगी, लेकिन अपने तरीके से। मैंने ‘एडजस्ट’ नहीं किया, मैंने ‘एक्सेप्ट’ (स्वीकार) किया। मैंने स्वीकार किया कि वे ऐसे ही हैं, और मैंने खुद को स्वीकार किया कि मैं ऐसी ही हूँ।”

रोहन मुस्कुराया। “तुम्हें पता है, आज मुझे तुम पर बहुत गर्व हो रहा है। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि तुमने सब संभाल लिया, बल्कि इसलिए कि तुमने अपनी पहचान खोए बिना रिश्तों को बचा लिया।”

अनन्या ने घर की तरफ देखा। घर अब भी शांत था, लेकिन वह खालीपन नहीं था। वहां अब एक नया संतुलन था। उसने सीखा था कि रिश्तों में झुकना ज़रूरी होता है, लेकिन इतना नहीं कि आपकी अपनी रीढ़ की हड्डी ही टूट जाए। कभी-कभी, सीधे खड़े रहकर, अपनी शर्तों पर प्यार और इज़्ज़त देना ही रिश्तों को बचाने का एकमात्र तरीका होता है।

“चलो,” अनन्या ने कहा, “कल से ऑफिस जल्दी जाना है, बहुत पेंडिंग काम है।”

“और महाराज जी?” रोहन ने पूछा।

“उन्हें मैंने पक्का कर लिया है,” अनन्या ने आँख मारते हुए कहा। “आखिर, शिकायत का मौका आगे भी नहीं मिलना चाहिए।”

दोनों हंसते हुए घर के अंदर चले गए। उस दिन ‘एडजस्ट’ शब्द का अर्थ उस घर के लिए हमेशा के लिए बदल गया था। यह अब समझौतों का नाम नहीं, बल्कि समझदारी का दूसरा नाम था।

लेखिका : शिल्पा अग्रवाल 

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