अमावस की काली रात थी और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, लेकिन दिवाकर के मन में जो तूफ़ान चल रहा था, वह बाहर के मौसम से कहीं ज़्यादा भयानक था। वह अपने कमरे में खिड़की के पास खड़ा था, उसके हाथ में एक नीला लिफाफा था जिसे उसने इतनी ज़ोर से भींच रखा था कि वह मुड़-तुड़ गया था। यह बैंक का नोटिस था। “कुर्क” (Attachment) शब्द उस कागज़ पर किसी काले नाग की तरह फन फैलाए बैठा था।
दिवाकर ने एक गहरी साँस ली और पीछे मुड़कर देखा। बिस्तर पर उसकी पत्नी, रश्मि, सो रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर तनाव की लकीरें नींद में भी साफ दिख रही थीं। पिछले छह महीनों ने उनकी हंसती-खेलती दुनिया को वीरान कर दिया था। दिवाकर का टेक्सटाइल का कारोबार, जिसे उसने अपने पिता के गुज़रने के बाद खून-पसीने से सींचा था, उसके ही पार्टनर के धोखे के कारण ताश के पत्तों की तरह बिखर गया था। पार्टनर सारा पैसा लेकर विदेश भाग चुका था और पीछे छोड़ गया था करोड़ों का कर्ज़ और बैंक के यह नोटिस।
कल सुबह बैंक के अधिकारी घर सील करने आने वाले थे। यह घर सिर्फ ईंट-गारे का ढांचा नहीं था; यह दिवाकर की माँ, सुमित्रा देवी का मंदिर था। इस घर के कोने-कोने में उनके पति की यादें बसी थीं। सुमित्रा देवी को इस बर्बादी की रत्ती भर भी भनक नहीं थी। दिवाकर ने अपनी माँ को एक कांच की गुड़िया की तरह संभाल कर रखा था। वह जानता था कि अगर माँ को पता चला कि उनका यह पवित्र आशियाना छिनने वाला है, तो वह यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी।
तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। दिवाकर ने झटपट लिफाफा तकिए के नीचे छिपाया और आंसू पोंछकर दरवाजा खोला।
सामने सुमित्रा देवी खड़ी थीं। हाथ में गर्म दूध का गिलास। उनके चेहरे पर वही चिरपरिचित शांत मुस्कान थी जो दिवाकर की सारी थकान मिटा देती थी।
“अभी तक जागा है लल्ला?” सुमित्रा देवी ने कमरे में आते हुए कहा। “घड़ी देख, रात के दो बज रहे हैं। सुबह जल्दी फैक्ट्री भी तो जाना है।”
दिवाकर का गला रुंध गया। उसे लगा जैसे वह अपनी माँ से झूठ बोलकर कोई अपराध कर रहा है। अब कोई फैक्ट्री नहीं बची थी, सब नीलाम हो चुका था। बचा था तो बस यह पुश्तैनी मकान।
“बस माँ, नींद नहीं आ रही थी,” दिवाकर ने नज़रें चुराते हुए कहा।
सुमित्रा देवी ने दूध का गिलास मेज पर रखा और दिवाकर के पास आकर उसके माथे पर हाथ रखा। “तेरा माथा तो तप रहा है। देख दिवाकर, मैं जानती हूँ काम का बोझ ज़्यादा है। लेकिन तू फिक्र क्यों करता है? तेरे बाबूजी हमेशा कहते थे—ईमानदार की नाव डोलती है, पर डूबती नहीं। मुझे तेरे ऊपर पूरा भरोसा है। तू सब संभाल लेगा।”
“भरोसा…” यह शब्द दिवाकर के सीने में खंजर की तरह चुभा।
“माँ,” दिवाकर ने कांपती आवाज़ में पूछा, “अगर… अगर कभी मैं सब कुछ ठीक न कर पाया तो? अगर मैं हार गया तो?”
सुमित्रा देवी हंसीं। उन्होंने दिवाकर का चेहरा अपने हाथों में लिया। “हार? मेरा बेटा और हार? तूने चलना सीखने से पहले गिरना सीखा था, पर तू कभी रुका नहीं। मुझे दुनिया का तो पता नहीं, पर मुझे अपनी परवरिश और तेरे इरादों पर इतना विश्वास है कि तू पत्थर से भी पानी निकाल सकता है। बस एक बात याद रखना बेटा, चाहे कुछ भी हो जाए, कभी गलत रास्ता मत चुनना। घर छोटा हो या बड़ा, छत अपनी होनी चाहिए, और वो छत ईमानदारी की होनी चाहिए।”
सुमित्रा देवी उसे दूध पीने की हिदायत देकर चली गईं। लेकिन उनके जाने के बाद दिवाकर बिस्तर पर धम्म से बैठ गया। माँ का यही विश्वास तो उसे मार रहा था। कल जब बैंक वाले आकर उन्हें घर से बाहर निकालेंगे, तब यह विश्वास कैसे बचेगा? वह अपनी माँ की आँखों में वो लाचारी और अपमान कैसे देख पाएगा?
दिवाकर के दिमाग में एक ही रास्ता बचा था। आत्महत्या। उसे लगा कि अगर वह नहीं रहेगा, तो शायद बैंक वाले कुछ दिन रुक जाएं, या बीमा की रकम से घर बच जाए। यह एक कायरतापूर्ण विचार था, लेकिन उस वक्त उसे यही एकमात्र समाधान लग रहा था। वह उठी हुई भावनाओं के ज्वार में बह रहा था।
उसने रश्मि के सोने का इंतज़ार किया। सुबह के चार बजे, जब अंधेरा सबसे गहरा होता है, दिवाकर ने अपनी कार की चाबी उठाई। वह शहर से दूर जाकर अपनी जीवनलीला समाप्त करना चाहता था। उसने एक चिट्ठी लिखी—“माँ, मुझे माफ़ करना। मैं तुम्हारा घर नहीं बचा पाया, लेकिन तुम्हारा विश्वास नहीं तोड़ना चाहता था…”
वह दबे पांव मुख्य द्वार की ओर बढ़ा। पूरा घर शांत था। हॉल में लगी उसके पिता की तस्वीर उसे घूर रही थी। उसने मन ही मन माफ़ी मांगी और दरवाजा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।
“कहाँ जा रहा है, दिवाकर?”
पीछे से आई उस आवाज़ ने दिवाकर के पैरों को ज़मीन में गाड़ दिया। उसने मुड़कर देखा। सुमित्रा देवी वहां खड़ी थीं। उन्होंने पूजा की साड़ी पहन रखी थी, जैसे वे पूरी रात जागी हों।
“माँ… वो… फैक्ट्री में आग लग गई है, अर्जेंट जाना है,” दिवाकर ने हड़बड़ाहट में झूठ बोला।
सुमित्रा देवी धीरे-धीरे उसके पास आईं। उन्होंने दिवाकर के हाथ से कार की चाबी छीन ली और उसकी जेब से वह चिट्ठी निकाल ली, जिसका एक कोना बाहर झांक रहा था। दिवाकर की साँसें थम गईं।
सुमित्रा देवी ने चिट्ठी नहीं पढ़ी। उन्होंने उसे बिना खोले ही फाड़ दिया और टुकड़ों को अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
“तूने क्या सोचा था?” सुमित्रा देवी की आवाज़ में अब ममता नहीं, एक कड़क थी। “कि तू चुपचाप चला जाएगा और तेरी माँ को पता नहीं चलेगा? तू मेरे पेट में नौ महीने रहा है दिवाकर, तेरी सांसों की गति से मैं तेरा दर्द पहचानती हूँ। पिछले एक महीने से देख रही हूँ, तू छुप-छुप कर रोता है। बैंक के कागज, वकीलों के फोन… मुझे सब पता है।”
दिवाकर सन्न रह गया। “तु… तुम्हें पता है? घर के बारे में?”
“हाँ,” सुमित्रा देवी ने कहा। “मुझे पता है कि विकास (पार्टनर) ने धोखा दिया है। मुझे पता है कि आज दोपहर तक हमारे पास यह घर नहीं रहेगा। मैं अनपढ़ हो सकती हूँ दिवाकर, पर अंधी नहीं।”
दिवाकर घुटनों के बल गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा। “माँ, मैं हार गया। मैं पापा की निशानी नहीं बचा पाया। मैं नकारा हूँ माँ। मैंने तुम्हारा सब कुछ लुटवा दिया।”
सुमित्रा देवी ने उसे उठाया नहीं। वे उसके बराबर ज़मीन पर बैठ गईं।
“पागल लड़के,” उन्होंने दिवाकर के सिर को अपनी छाती से लगा लिया। “तुझे क्या लगता है, मेरी दौलत यह ईंट-पत्थर का मकान है? या तेरे बाबूजी की इज़्ज़त इन दीवारों में कैद है?”
सुमित्रा देवी ने दिवाकर का चेहरा ऊपर उठाया और उसकी आँखों में देखा। “सुन, यह घर हमने बनाया था, घर ने हमें नहीं बनाया। जब मैं और तेरे बाबूजी इस शहर में आए थे, तो हमारे पास एक टूटी संदूक और सौ रुपए थे। हमने झोपड़ी में दिन काटे, तब भी हम खुश थे। फिर यह महल बनाया, तब भी खुश थे। आज अगर यह जा रहा है, तो जाने दे। लेकिन तू… तू मेरी असली पूँजी है। अगर तुझे कुछ हो जाता, तो मैं वाकई कंगाल हो जाती।”
“लेकिन माँ, कल जब लोग आएंगे… वो तमाशा…”
“होने दे तमाशा,” सुमित्रा देवी ने दृढ़ता से कहा। “जो लोग हमारी गरीबी पर हंसेंगे, वो हमारे अपने कभी थे ही नहीं। और सुन, मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं। यह बुरा वक्त भी कट जाएगा।”
सुमित्रा देवी उठीं और अपने कमरे में गईं। दो मिनट बाद वे एक पुरानी, मखमली पोटली लेकर लौटीं। उन्होंने वह पोटली दिवाकर के हाथ में रख दी।
“यह क्या है माँ?”
“खोल इसे।”
दिवाकर ने कांपते हाथों से पोटली खोली। अंदर पुराने ज़माने के भारी सोने के कंगन, एक नवलखा हार और कुछ गिन्नी (सोने के सिक्के) थे। यह खानदानी जेवर थे।
“माँ, यह तो नानी ने तुम्हें दिए थे। तुमने कहा था तुम मरते दम तक इन्हें हाथ नहीं लगाओगी,” दिवाकर ने कहा।
“हाँ, मैंने कहा था,” सुमित्रा देवी मुस्कुराईं। “मैंने सोचा था यह तेरी बहू की गोद भराई में काम आएंगे। लेकिन आज यह मेरे बेटे की ‘जिंदगी भराई’ के काम आएंगे। इसे ले जा। बेच दे। या गिरवी रख दे। बैंक का मुंह बंद कर।”
“नहीं माँ!” दिवाकर ने पोटली वापस कर दी। “मैं तुम्हारे स्त्री-धन को हाथ नहीं लगा सकता। मैं इतना गिरा हुआ नहीं हूँ। यह पाप है।”
सुमित्रा देवी ने उसके गाल पर एक जोरदार तमाचा मारा।
दिवाकर चौंक गया।
“पाप?” सुमित्रा देवी की आँखों में अंगारे थे। “पाप वो होता है जो तू अभी करने जा रहा था—आत्महत्या। कायरता पाप है। मुसीबत से भागना पाप है। यह सोना, यह गहने… ये किसलिए होते हैं? क्या मेरे मरने के बाद मेरी छाती पर लाद कर जलाएगा इन्हें? ये मुसीबत के वक्त के लिए ही होते हैं।”
उन्होंने जबरदस्ती वह पोटली उसकी जेब में डाल दी।
“दिवाकर, यह गहने मेरी माँ का विश्वास थे जो उन्होंने मुझे दिए। आज मैं यह तुझे दे रही हूँ। यह भीख नहीं है, यह एक ढाल है। जा, अपना घर बचा। और अगर घर न भी बचे, तो इस पैसे से किराए का मकान ले और फिर से शुरुआत कर। जीरो से। जैसे तेरे बाप ने किया था।”
दिवाकर रो रहा था, लेकिन यह आंसू लाचारी के नहीं थे। यह आंसू शक्ति के थे। उसे अपनी माँ के उस रूप के दर्शन हो रहे थे जो उसने पहले कभी नहीं देखा था। वह दुर्गा थी।
“माँ, मैं कसम खाता हूँ,” दिवाकर ने माँ के पैर पकड़ लिए, “मैं एक-एक पाई चुकाऊंगा। मैं यह गहने वापस लाऊंगा। मैं सब ठीक कर दूंगा।”
“मुझे गहने वापस नहीं चाहिए दिवाकर,” सुमित्रा देवी ने उसे उठाया और गले लगाया। “मुझे बस एक वादा चाहिए। मेरी माँ के विश्वास को मत टूटने देना। और एक माँ का विश्वास यह नहीं होता कि उसका बेटा दुनिया का सबसे अमीर आदमी बने। माँ का विश्वास यह होता है कि उसका बेटा चाहे कितनी भी गहरी खाई में गिरे, वह उठने की हिम्मत रखे। वह कभी हार मानकर अपनी जान देने की न सोचे।”
सुबह हुई। बारिश रुक चुकी थी। सूरज की पहली किरण ने बादलों को चीर कर अपना रास्ता बना लिया था।
दिवाकर बैंक पहुंचा। उसने मैनेजर की टेबल पर वह पोटली नहीं रखी, बल्कि उस सोने के आधार पर एक सेटलमेंट का प्रस्ताव रखा। सोना बिका नहीं, गिरवी रखा गया। घर की नीलामी रुक गई। दिवाकर को छह महीने का वक्त मिल गया।
अगले छह महीने दिवाकर ने न दिन देखा न रात। उसने छोटी सी शुरुआत की। कपड़े की दलाली (commission agent) शुरू की। रश्मि ने भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया और घर में ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। उन्होंने अपनी बड़ी कार बेच दी, खर्चे कम किए, और एक तपस्वी की तरह जीवन जिया।
समाज ने बातें बनाईं। रिश्तेदारों ने मुँह मोड़ा। लेकिन घर के अंदर, सुमित्रा देवी चट्टान की तरह खड़ी रहीं। जब भी दिवाकर थका-हारा घर लौटता, सुमित्रा देवी कहतीं, “बस थोड़ा और बेटा, हम किनारे के पास हैं।”
दो साल बाद।
दिवाकर उसी ज्वेलरी शॉप में खड़ा था जहाँ उसने माँ के गहने गिरवी रखे थे (बाद में बेचकर बैंक का लोन चुकाया था)। आज वह उन्हें वापस खरीदने नहीं, बल्कि नए और उससे भी भारी गहने खरीदने आया था। उसका नया बिज़नेस अब चल पड़ा था।
वह घर लौटा। सुमित्रा देवी तुलसी को जल दे रही थीं।
दिवाकर ने उनके सामने एक नई मखमली पोटली रखी।
“यह क्या है?” सुमित्रा देवी ने पूछा।
“तुम्हारा विश्वास,” दिवाकर ने मुस्कुराते हुए कहा। “तुम्हारे वो कंगन तो नहीं ला पाया, लेकिन उससे मिलते-जुलते बनवाए हैं।”
सुमित्रा देवी ने पोटली को हाथ भी नहीं लगाया। उन्होंने दिवाकर की आँखों में देखा, जो अब आत्मविश्वास से चमक रही थीं।
“मैंने कहा था न, मुझे गहने नहीं चाहिए,” सुमित्रा देवी ने कहा। “मेरी असली दौलत मेरे सामने खड़ी है। जिस रात तूने वह आत्महत्या वाली चिट्ठी फाड़ी थी और लड़ने का फैसला किया था, मेरा विश्वास उसी दिन जीत गया था। यह सोना-चांदी तो बस पत्थर हैं।”
फिर भी, दिवाकर ने जबरदस्ती वह कंगन माँ की कलाई में पहनाए। सुमित्रा देवी की झुर्रियों वाले हाथ कांप रहे थे, लेकिन उनकी आँखों में जो सुकून था, वह दुनिया के किसी भी खज़ाने से बड़ा था।
उस रात, दिवाकर को फिर से नींद नहीं आ रही थी। वह बालकनी में खड़ा शहर को देख रहा था। रश्मि उसके पास आई।
“क्या सोच रहे हो?” रश्मि ने पूछा।
“यही कि लोग भगवान को मंदिरों में ढूंढते हैं,” दिवाकर ने आसमान की तरफ देखा और फिर अंदर कमरे में सो रही अपनी माँ की ओर। “मुझे मेरा भगवान घर में ही मिल गया। अगर उस रात माँ ने मुझे रोका न होता, तो आज यह सब… यह हम… कुछ न होता।”
रश्मि ने उसका हाथ थामा। “उन्होंने सिर्फ तुम्हें रोका नहीं दिवाकर, उन्होंने तुम्हें दोबारा जन्म दिया।”
दिवाकर मुस्कुराया। उसे समझ आ गया था कि माँ का विश्वास कोई नाजुक धागा नहीं होता जिसे हालात तोड़ सकें; वह तो लोहे की जंजीर होता है जो बिखरते हुए इंसान को भी थाम लेता है। उसने मन ही मन दोहराया—हाँ माँ, अब यह विश्वास कभी नहीं टूटेगा। कभी नहीं।
लेखक : अंशुमान सक्सेना