ससुराल में भी कोई अपना होता है – संगीता अग्रवाल 

शाम के सात बज रहे थे, और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। बारिश की बूंदें खिड़की के कांच पर ठीक वैसे ही टकरा रही थीं जैसे नैना के दिल पर डर की दस्तक हो रही थी। वह अपने बेडरूम के कोने में, अलमारी के पास ज़मीन पर बैठी थी। उसके हाथ में एक मखमली डिब्बी थी—वही डिब्बी जिसमें उसकी सास, सुहासिनी देवी, ने खानदानी ‘नौलखा हार’ रखकर दिया था।

लेकिन समस्या यह थी कि डिब्बी खाली थी।

नैना की सांसें फूल रही थीं। आज रात घर में ‘सत्यनारायण की कथा’ थी और उसके बाद एक बड़ी डिनर पार्टी। सुहासिनी देवी ने सुबह ही हिदायत दी थी, “नैना, आज वो हार पहनना। मेरी बहनें आ रही हैं, उन्हें दिखाना है कि मेरे घर की छोटी बहू क्या लाई है और क्या पहनती है।”

नैना को याद था कि उसने कल रात वह हार निकालकर ड्रेसिंग टेबल पर रखा था। उसने उसे साफ़ किया था। लेकिन आज सुबह से वह गायब था। उसने पूरा कमरा छान मारा था, बेड के नीचे, दराजों में, बाथरूम में—लेकिन हार का कहीं नामोनिशान नहीं था।

नैना की आँखों से आंसू बह रहे थे। उसकी शादी को अभी सिर्फ़ छह महीने हुए थे। वह एक मध्यमवर्गीय परिवार से थी, जबकि उसका ससुराल शहर के रईस घरानों में गिना जाता था। उसकी सास उसे पसंद नहीं करती थीं; वे चाहती थीं कि उनके छोटे बेटे आर्यन की शादी किसी बड़े बिजनेसमैन की बेटी से हो। नैना की हर छोटी ग़लती को यहाँ बड़ा अपराध माना जाता था। और आज? आज तो हार गायब था। चोरी का इल्ज़ाम सीधा उसी पर लगेगा।

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला।

नैना का दिल धक से रह गया। उसने जल्दी से खाली डिब्बी अपने दुपट्टे के नीचे छिपा ली।

दरवाज़े पर उसकी जेठानी, ‘प्रिया’, खड़ी थी।

प्रिया—घर की बड़ी बहू। गंभीर, कम बोलने वाली और बेहद अनुशासित। सुहासिनी देवी अगर घर की सरकार थीं, तो प्रिया उनकी सेनापति। घर की चाबियां, लॉकर, नौकरों का हिसाब—सब प्रिया के हाथ में था। नैना हमेशा प्रिया से डरती थी। उसे लगता था कि प्रिया भी सास की तरह उसे नापसंद करती है, क्योंकि प्रिया ने कभी नैना से हंसकर बात नहीं की थी। हमेशा बस काम की बात—“नैना, सब्ज़ी कट गई?”, “नैना, साड़ी ठीक से पहनना।”

प्रिया कमरे के अंदर आई और दरवाज़ा बंद कर दिया। उसकी नज़रें नैना के सूखे हुए चेहरे और सूजी हुई आँखों पर टिक गईं।

“तैयार नहीं हुई अभी तक?” प्रिया ने अपनी कड़क आवाज़ में पूछा। “मेहमान आने वाले हैं। और माँजी पूछ रही थीं कि हार निकाला या नहीं।”

नैना के होंठ कांपने लगे। वह कुछ बोल नहीं पाई।

प्रिया धीरे-धीरे चलकर उसके पास आई। “क्या हुआ? तबीयत ख़राब है?”

नैना अब और बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसका बांध टूट गया। वह फफक कर रो पड़ी।

“दीदी… वो हार… वो हार नहीं मिल रहा!”

प्रिया के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। वह स्थिर रही। “क्या मतलब नहीं मिल रहा? कल तो तुम्हारे पास था।”

“मैंने ड्रेसिंग टेबल पर ही रखा था दीदी,” नैना ने सिसकते हुए, हाथ जोड़कर कहा। “कसम से, मैंने उसे लॉकर में रखने के लिए ही निकाला था। पर मैं भूल गई… और अब वो वहां नहीं है। मैंने पूरा कमरा देख लिया। दीदी, माँजी मुझे मार डालेंगी। वो वैसे ही मुझे पसंद नहीं करतीं। वो कहेंगी मैंने हार चुराकर मायके भेज दिया। मेरा विश्वास कीजिये दीदी, मैंने चोरी नहीं की!”

नैना बच्चों की तरह रो रही थी। उसे लगा कि अब प्रिया बाहर जाएंगी, सास को बुलाएंगी और आज ही उसे इस घर से निकाल दिया जाएगा। प्रिया का रुतबा घर में ऐसा था कि अगर वो कह दें कि दिन है, तो सब दिन मानेंगे। और अगर वो कह दें कि नैना चोर है, तो नैना को सफाई देने का भी मौका नहीं मिलेगा।

प्रिया ने एक पल के लिए नैना को देखा। फिर उसने कमरे के चारों ओर नज़र दौड़ाई।

“तुमने मेड (कमला) को कमरा साफ़ करने दिया था आज?” प्रिया ने पूछा।

“हाँ… सुबह वो झाड़ू लगाने आई थी,” नैना ने कहा।

प्रिया के चेहरे की लकीरें सख्त हो गईं। “हम्म। कमला को मैंने आज जल्दी जाते हुए देखा था। उसका बैग भी भरा हुआ था।”

नैना का रंग सफ़ेद पड़ गया। “तो क्या… कमला ने?”

“चुप रहो,” प्रिया ने उसे डांटा। “बिना सबूत के किसी का नाम मत लेना। और रोना बंद करो। अगर माँजी ने तुम्हारी ये लाल आँखें देख लीं, तो हार मिले न मिले, क्लेश ज़रूर खड़ा हो जाएगा।”

नैना ने जल्दी से आंसू पोंछे, लेकिन उसका शरीर डर से कांप रहा था। “अब क्या होगा दीदी? मैं नीचे कैसे जाऊँगी? माँजी तो हार देखने के लिए बैठी हैं।”

प्रिया ने नैना को देखा, फिर अपनी साड़ी के पल्लू के नीचे से चाबियों का गुच्छा निकाला। उसने नैना के कमरे का दरवाज़ा लॉक किया और नैना का हाथ पकड़कर उसे ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ा कर दिया।

“अपनी आँखें बंद करो और मेकअप ठीक करो,” प्रिया ने आदेश दिया।

“लेकिन दीदी, हार?” नैना समझ नहीं पा रही थी।

प्रिया ने अपनी अलमारी की तरफ इशारा नहीं किया, बल्कि उसने अपने गले में हाथ डाला। उसने एक भारी, जड़ाऊ हार उतारा—जो बिल्कुल वैसा ही दिखता था जैसा नैना का खोया हुआ हार था।

असल में, दोनों बहुओं की शादी पर सुहासिनी देवी ने एक जैसा डिज़ाइन बनवाया था, बस फर्क इतना था कि प्रिया के हार में रूबी (माणिक) जड़े थे और नैना वाले में पन्ना (एमराल्ड)। लेकिन दूर से देखने पर दोनों सोने के भारी हार एक जैसे लगते थे।

प्रिया ने वो हार नैना की हथेली पर रख दिया।

“इसे पहन लो,” प्रिया ने कहा।

नैना सन्न रह गई। उसने हार को देखा, फिर प्रिया को।

“लेकिन दीदी… यह तो आपका हार है। आप क्या पहनेंगी? और माँजी पहचान लेंगी। इसमें लाल नग हैं, मेरे वाले में हरे थे।”

प्रिया ने नैना के कंधे पर हाथ रखा। उसका स्पर्श आज सख्त नहीं, बल्कि एक बड़ी बहन जैसा मज़बूत था।

“माँजी की नज़र अब कमज़ोर हो चुकी है नैना। भीड़भाड़ और रोशनी में उन्हें लाल और हरे का फर्क नहीं दिखेगा, उन्हें बस ‘सोना’ और ‘वजन’ दिखेगा। और रही मेरी बात…”

प्रिया अपनी अलमारी की ओर गई और वहां से एक हल्का सा मोती का सेट निकाला।

“मैं यह पहन लूँगी। अगर किसी ने पूछा, तो कह दूँगी कि भारी गहनों से मुझे आज गर्दन में रश (allergy) हो रहा है। मेरी बात कोई नहीं काटेगा।”

नैना को विश्वास नहीं हो रहा था। जिस जेठानी को वह अपनी दुश्मन, या कम से कम एक ‘कठोर और पराई’ औरत समझती थी, वो आज अपना सबसे कीमती गहना उसे दे रही थी? और वो भी तब, जब नैना की लापरवाही से लाखों का नुकसान हुआ था?

“लेकिन दीदी…” नैना का गला भर आया। “अगर बाद में पता चला तो? और वो चोरी हुआ हार? उसका क्या?”

“वो मेरी चिंता है,” प्रिया ने दृढ़ता से कहा। “कमला अभी बस स्टॉप तक नहीं पहुँची होगी। मैं ड्राइवर को भेजकर उसे बुलवाती हूँ। मैं उससे उगलवा लूँगी। और अगर हार नहीं भी मिला… तो मैं माँजी से कह दूँगी कि मैंने उसे पॉलिश के लिए दिया था और सुनार ने घुमा दिया। डांट पड़ेगी, तो मुझे पड़ेगी। तुम नई हो, तुम पर इल्ज़ाम लगा तो तुम्हारा जीवन नर्क हो जाएगा। मैं दस साल से यहाँ हूँ, मेरी चमड़ी अब मोटी हो चुकी है।”

नैना खड़ी-खड़ी प्रिया को देखती रही। उसे लगा जैसे उसके सामने कोई अजनबी खड़ा है। वह प्रिया, जो हमेशा उसे टोकती थी—“पल्लू ठीक करो”, “धीरे बोलो”—आज उसके लिए ढाल बनकर खड़ी थी।

नैना के मुंह से अनायास ही एक कड़वा सच, एक सवाल निकल गया जो उसके दिल में महीनों से घर किए हुए था।

उसने हार को मुट्ठी में भींचा और रूंधे गले से, एक अजीब सी हताशा और अविश्वास के साथ पूछा, “जेठानी जी! ससुराल में भी कोई अपना होता है भला? मैंने तो सुना था यहाँ सब एक-दूसरे की टांग खींचते हैं। आप… आप मेरे लिए इतना क्यों कर रही हैं? आप तो मुझे पसंद भी नहीं करतीं न?”

प्रिया, जो मोती का हार पहन रही थी, रुक गई। उसने आईने के ज़रिये नैना को देखा। प्रिया के चेहरे की वो सख्त नकाब धीरे-धीरे पिघल गई और उसके पीछे एक थकी हुई, लेकिन ममतामयी औरत दिखाई दी।

प्रिया मुड़ी और नैना के पास आई।

“तुम्हें लगता है मैं तुम्हें पसंद नहीं करती?” प्रिया ने फीकी मुस्कान के साथ कहा। “नैना, जब मैं इस घर में नई आई थी, तो मेरी जेठानी नहीं थी। मैं अकेली थी। माँजी के ताने, घर की जिम्मेदारियां, और नए माहौल का डर… मैंने सब अकेले झेला। मेरी ग़लतियों पर पर्दा डालने वाला कोई नहीं था। मुझे रोने के लिए अपना तकिया ही मिलता था।”

प्रिया ने नैना के सिर पर हाथ फेरा।

“जब तुम आई, तो मैंने तुम्हें देखा। डरी हुई, सहमी हुई। बिल्कुल वैसी जैसी मैं दस साल पहले थी। मैं सख्त इसलिए बनती थी ताकि तुम ग़लतियां न करो, ताकि तुम मज़बूत बनो। मैं नहीं चाहती थी कि तुम वो सब भुगतो जो मैंने भुगता। हाँ, ससुराल में कोई ‘अपना’ नहीं होता, यह सच है। यहाँ रिश्ते खून के नहीं, ‘ज़रूरत’ और ‘समझौते’ के होते हैं। लेकिन…”

प्रिया की आँखों में एक चमक आ गई।

“…लेकिन हम औरतें अगर एक-दूसरे की ढाल नहीं बनेंगी, तो कौन बनेगा? मैं तुम्हारी जेठानी बाद में हूँ, पहले एक औरत हूँ। और इस घर में, इस चारदीवारी के अंदर, हम दोनों एक ही टीम में हैं। अगर तुम गिरोगी, तो चोट मुझे भी लगेगी। अगर तुम जीतोगी, तो सिर मेरा भी ऊंचा होगा।”

नैना के हाथ से हार छूटकर बिस्तर पर गिर गया। उसने आगे बढ़कर प्रिया को कसकर गले लगा लिया। वह फूट-फूट कर रोई, लेकिन इस बार डर के नहीं, बल्कि सुकून के आंसू थे। उसे आज पहली बार महसूस हुआ कि इस बड़े से अनजान घर में वह अकेली नहीं है। उसके पास एक ‘दीदी’ है।

“बस, बस… अब मेकअप ख़राब हो जाएगा,” प्रिया ने उसे थपथपाते हुए अलग किया, लेकिन उसकी अपनी आँखें भी नम थीं। “जल्दी से तैयार हो जाओ। और याद रखना, नीचे सबके सामने सिर झुकाकर नहीं, सिर उठाकर चलना। मेरी देवरानी हो, कमज़ोर दिखना मना है।”

नैना ने आंसू पोंछे और प्रिया का हार पहन लिया। वह हार अब उसे सोने का नहीं, बल्कि विश्वास और प्रेम का लग रहा था।

नीचे पार्टी में सब कुछ सामान्य रहा। सुहासिनी देवी ने नैना का हार देखा और गर्व से अपनी बहनों से कहा, “देखा? कहा था न मेरी पसंद कभी ग़लत नहीं होती। देखो कैसे चमक रहा है।”

नैना और प्रिया ने एक-दूसरे को देखा और नज़रों ही नज़रों में मुस्कुरा दीं। सुहासिनी देवी को लाल और हरे का फर्क नहीं दिखा, क्योंकि उनकी आँखों पर ‘अहंकार’ का चश्मा चढ़ा था।

रात को, जब सब मेहमान चले गए, प्रिया ने नैना को अपने कमरे में बुलाया।

मेज़ पर नैना का असली ‘हरा हार’ रखा था।

“मिल गया?” नैना चीख पड़ी।

“हाँ,” प्रिया ने इत्मीनान से कहा। “कमला ही ले गई थी। ड्राइवर ने उसे गेट पर पकड़ लिया। मैंने उसे पुलिस की धमकी दी तो उसने उगल दिया। हार मिल गया और मैंने उसे नौकरी से निकाल दिया है। माँजी को बताया है कि उसने चोरी की कोशिश की थी, लेकिन हार तिजोरी में सुरक्षित है।”

नैना ने राहत की सांस ली। उसने अपना हार उठाया और प्रिया का हार वापस कर दिया।

“थैंक यू दीदी,” नैना ने कहा। “आज आपने मुझे सिर्फ़ बचाया नहीं, मुझे एक बहुत बड़ी सीख दी है।”

“क्या?” प्रिया ने अपनी नाईट क्रीम लगाते हुए पूछा।

“यही कि खून के रिश्ते ही सब कुछ नहीं होते। कभी-कभी दिल के रिश्ते उनसे बड़े होते हैं। और आज मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया।”

“कौन सा सवाल?”

नैना मुस्कुराई। “यही कि ससुराल में भी कोई अपना होता है। और वो आप हैं।”

प्रिया ने आईने में देखा और मुस्कुरा दी। वह सख्त जेठानी अब पिघल चुकी थी। उस रात उस घर की छत के नीचे दो अजनबी औरतें नहीं, बल्कि दो बहनें सो रही थीं। उन्होंने उस पुरानी कहावत को बदल दिया था कि ‘एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं’। उन्होंने साबित कर दिया था कि अगर एक ढाल बन जाए, तो दूसरी तलवार बनकर दुनिया जीत सकती है।

नैना अपने कमरे में गई, तो उसे अब डर नहीं लग रहा था। उसे पता था कि चाहे कोई भी मुसीबत आए, उसकी ‘दीवार’ उसके साथ खड़ी है। और वह दीवार उसकी जेठानी थी।

मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल 

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