सावित्री देवी ने अपने सूटकेस की आखिरी चेन बंद की और कमरे के चारों ओर एक संतोषजनक नज़र डाली। आज पैंतीस साल की लंबी और बेदाग़ नौकरी के बाद, वे ‘प्रिंसिपल सावित्री देवी’ के पद से सेवानिवृत्त हुई थीं। मेज पर रखे गुलदस्ते और विदाई समारोह में मिली शॉल उन्हें बार-बार यह अहसास दिला रहे थे कि जीवन का एक अध्याय समाप्त हो चुका है और दूसरा शुरू होने वाला है।
लेकिन यह अंत नहीं था, बल्कि सावित्री के लिए यह उस उड़ान की शुरुआत थी जिसके पंख उन्होंने बीस साल पहले काट दिए थे जब उनके पति का देहांत हुआ था। तब वे सिर्फ एक माँ और एक शिक्षिका बनकर रह गई थीं। अपने शौक, अपनी पेंटिंग, अपनी घुमक्कड़ी—सब कुछ उन्होंने बेटे मयंक की परवरिश और घर की जिम्मेदारियों के संदूक में बंद कर दिया था।
अब मयंक की शादी हो चुकी थी। वह और उसकी पत्नी, आन्या, पुणे में एक अच्छी कॉर्पोरेट लाइफ जी रहे थे। सावित्री देवी यहाँ इंदौर में अकेली थीं, लेकिन खुश थीं। उन्होंने ‘शांति निकेतन’ में एक महीने के आर्ट वर्कशॉप के लिए अपना रजिस्ट्रेशन करवा लिया था। कल उनकी ट्रेन थी।
तभी फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर ‘बेटा’ चमक रहा था।
“नमस्ते बेटा, कैसे हो?” सावित्री जी ने उत्साह से फोन उठाया।
“नमस्ते माँ। बहुत बधाई हो रिटायरमेंट की,” मयंक की आवाज़ में एक हड़बड़ाहट थी। “माँ, मैंने और आन्या ने आपके लिए सरप्राइज़ प्लान किया है। आपकी कल की ट्रेन कैंसिल करवा दी है।”
सावित्री जी का दिल धक से रह गया। “क्या? पर मयंक, मेरी वर्कशॉप…”
“अरे माँ, वर्कशॉप तो कभी भी हो सकती है,” मयंक ने बात काट दी। “हमने आपकी फ्लाइट बुक की है पुणे की। कल सुबह की। दरअसल, आन्या को प्रमोशन मिला है और उसे छह महीने के लिए लंदन प्रोजेक्ट पर जाना है। और यहाँ मेरा भी शेड्यूल बहुत टाइट है। डुग्गू (पोता) अभी सिर्फ़ तीन साल का है। हमने सोचा, अब आप रिटायर हो गई हैं, एकदम फ्री हैं, तो आपसे बेहतर डुग्गू को कौन संभालेगा?”
सावित्री जी के गले में शब्द अटक गए। “फ्री हैं”—यह शब्द किसी पत्थर की तरह उनके सीने पर लगा।
“मयंक, बेटा… मैंने तुम्हें बताया था न कि मुझे पेंटिंग दोबारा शुरू करनी है। मैंने फीस भी जमा कर दी है,” सावित्री जी ने धीमे स्वर में विरोध दर्ज कराना चाहा।
उधर से आन्या ने फोन ले लिया। “मम्मी जी, प्लीज। पेंटिंग तो हॉबी है, घर पर कभी भी कर लीजिएगा। यहाँ डुग्गू को आपकी ज़रूरत है। हम किसी मेड या नैनी के भरोसे उसे नहीं छोड़ सकते। और अब तो आप घर पर ही रहेंगी, तो बोर भी नहीं होंगी। डुग्गू के साथ मन लगा रहेगा। बस छह महीने की तो बात है। प्लीज, ना मत कहिएगा, वरना मेरा प्रमोशन और लंदन ट्रिप सब कैंसिल हो जाएगा।”
आन्या की आवाज़ में विनती कम और भावनात्मक दबाव ज़्यादा था। सावित्री जी जानती थीं कि ‘ना’ कहने का मतलब होगा—एक स्वार्थी माँ और सास कहलाना।
भारी मन से, सावित्री जी पुणे पहुँच गईं।
पुणे का वह आलीशान फ्लैट हर सुख-सुविधा से लैस था। मयंक और आन्या ने उनका स्वागत किया, लेकिन उस स्वागत में एक ‘राहत’ थी कि अब उनकी समस्या हल हो गई है।
डिनर टेबल पर आन्या ने बड़े उत्साह से अपना प्लान बताया। “मम्मी जी, मैंने घर का पूरा शेड्यूल बना दिया है। सुबह 7 बजे डुग्गू उठता है, उसे नहलाकर नाश्ता देना होगा। फिर 9 बजे उसका प्ले-स्कूल है, वैन आती है। 12 बजे वह वापस आएगा। फिर लंच, नैप-टाइम, और शाम को पार्क। मयंक को ऑफिस से आने में रात के 9 बज जाते हैं, और मैं तो लंदन में रहूँगी, तो वीडियो कॉल कर लूँगी। मेड खाना और झाड़ू-पोछा कर देगी, बस आपको डुग्गू और घर को ‘सुपरवाइज’ करना है।”
सावित्री जी चुपचाप सुनती रहीं। उन्हें लगा जैसे वे एक नौकरी से रिटायर होकर दूसरी नौकरी में ज्वाइन कर रही हैं—वो भी बिना वेतन और बिना छुट्टी की।
“और मम्मी जी,” मयंक ने कहा, “हमने गेस्ट रूम को आपके लिए सेट कर दिया है। डुग्गू का सारा सामान वहीं शिफ्ट कर दिया है ताकि रात को अगर वो रोए तो आपको परेशानी न हो, वह आपके पास ही सो जाएगा।”
सावित्री जी ने उस कमरे को देखा। वह कमरा खिलौनों, डायपर के पैकेटों और बच्चों के कपड़ों से भरा था। वहां सावित्री जी के कैनवास या रंगों के लिए एक इंच भी जगह नहीं थी। उनकी पहचान उस कमरे में कहीं खो गई थी, वहां सिर्फ ‘दादी’ की जगह थी।
दो दिन बाद आन्या लंदन चली गई।
सावित्री जी की दिनचर्या एक मशीन जैसी हो गई। सुबह 6 बजे उठना, पोते के पीछे भागना, घर की व्यवस्था देखना, दूध वाले से लेकर धोबी तक का हिसाब रखना। शाम होते-होते वे इतना थक जातीं कि कमर सीधी करना भी मुश्किल हो जाता। उनकी उंगलियाँ, जो ब्रश पकड़ने के लिए फड़फड़ाती थीं, अब दिन भर पोते की मैली पैंट बदलने और रोटियाँ सेंकने में व्यस्त थीं (क्योंकि मेड की रोटियाँ मयंक को पसंद नहीं थीं)।
एक शाम, मयंक जल्दी घर आ गया। उसने देखा सावित्री जी बालकनी में बैठी डूबते सूरज को देख रही हैं। उनके पास एक स्केचबुक थी जिस पर उन्होंने चारकोल से कुछ लकीरें खींची थीं।
“अरे माँ, चाय मिलेगी?” मयंक ने सोफे पर बैठते हुए आवाज़ लगाई।
सावित्री जी ने स्केचबुक बंद की और उठ गईं। चाय बनाते वक्त उन्हें चक्कर सा आया। वे पिछले एक महीने से लगातार काम कर रही थीं। बीपी की गोलियां भी कई बार लेना भूल जाती थीं।
चाय देते वक्त उन्होंने हिम्मत जुटाई। “मयंक, मुझे तुमसे कुछ बात करनी थी।”
“हूँ… बोलो माँ,” मयंक मोबाइल में लगा था।
“बेटा, मुझे लगता है तुम्हें डुग्गू के लिए एक फुल-टाइम नैनी रख लेनी चाहिए। मेरा शरीर अब इतनी भागदौड़ की इजाज़त नहीं देता। मुझे थकान बहुत होती है, और घुटनों में भी दर्द बढ़ गया है।”
मयंक ने मोबाइल रख दिया और माथे पर शिकन लाते हुए बोला, “माँ, आप फिर शुरू हो गईं? नैनी? आपको पता है आजकल नैनी कितनी महंगी हैं? और फिर वो भरोसा करने लायक नहीं होतीं। आप घर की हैं, दादी हैं उसकी। अपना खून, अपना खून होता है। और आप करती ही क्या हैं दिन भर? डुग्गू तो 12 बजे तक स्कूल में रहता है। आराम ही तो है।”
“करती ही क्या हूँ?” सावित्री जी की आवाज़ थोड़ी ऊंची हो गई। “मयंक, क्या तुम्हें अंदाज़ा है कि एक तीन साल के बच्चे को संभालना 60 साल की उम्र में कितना मुश्किल है? और बात सिर्फ थकान की नहीं है। मेरे भी कुछ सपने थे। मैं आर्ट स्कूल जाना चाहती थी।”
मयंक ने चिढ़कर कहा, “माँ, प्लीज। इस उम्र में पेंटिंग करके आप कौन सा पिकासो बन जाएंगी? ये उम्र तो भजन-कीर्तन और पोते-पोतियों के साथ खेलने की होती है। आप खुशकिस्मत हैं कि आप बेटे-बहू के साथ हैं। देखो मेरे दोस्तों के माता-पिता को, जो अकेले पड़े हैं। हम आपको साथ रख रहे हैं, आपकी ज़रूरतें पूरी कर रहे हैं, बदले में थोड़ी मदद मांग ली तो आपको बुरा लग रहा है?”
सावित्री जी सन्न रह गईं। उनके बेटे ने उनके प्रेम और त्याग को ‘सौदे’ में बदल दिया था। ‘हम आपको साथ रख रहे हैं’—यह वाक्य उनके स्वाभिमान पर किसी कोड़े की तरह पड़ा। यह घर उनका नहीं, मयंक का था, और वे यहाँ एक ‘उपयोगी वस्तु’ की तरह थीं। अगर वे काम की नहीं, तो उनकी कद्र नहीं।
उस रात सावित्री जी सो नहीं पाईं। वे पूरी रात सोचती रहीं। क्या माँ होना एक आजीवन कारावास है? क्या रिटायरमेंट का मतलब सिर्फ ‘काम के स्वरूप’ का बदलना है, आराम नहीं? क्या उनकी अपनी कोई इच्छा, कोई वजूद मायने नहीं रखता?
अगले दिन रविवार था। आन्या का वीडियो कॉल आया। वह बहुत खुश थी।
“हाय मम्मी जी! डुग्गू कैसा है? और सुनिए, एक गुड न्यूज़ है। मेरा प्रोजेक्ट एक्सटेंड हो गया है। अब मैं छह महीने नहीं, बल्कि एक साल बाद आऊँगी। कंपनी मुझे वहां परमानेंट शिफ्ट करने का सोच रही है। अगर ऐसा हुआ तो मयंक और डुग्गू भी लंदन आ जाएंगे। तब तक आप प्लीज सब संभाल लीजिएगा। वैसे भी आपको वहां इंडिया में अकेले क्या करना है?”
सावित्री जी ने स्क्रीन पर अपनी बहू का मुस्कुराता चेहरा देखा। उन्होंने मयंक की तरफ देखा जो थम्स-अप दिखा रहा था।
सावित्री जी ने एक गहरी सांस ली। “आन्या, मयंक… मुझे कुछ कहना है।”
“हाँ माँ, बोलो,” मयंक ने बेपरवाही से कहा।
“मैं कल इंदौर वापस जा रही हूँ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। आन्या की मुस्कान गायब हो गई। मयंक चौंक गया।
“क्या? आप मज़ाक कर रही हैं माँ? आप कैसे जा सकती हैं? डुग्गू को कौन देखेगा? हमारा घर कौन संभालेगा?” मयंक चिल्लाया।
सावित्री जी की आवाज़ शांत लेकिन दृढ़ थी। “डुग्गू तुम्हारा बेटा है मयंक, तुम्हारी और आन्या की जिम्मेदारी। मैंने अपनी जिम्मेदारी—तुम्हें पालने की—पूरी निष्ठा से निभाई। बीस साल मैंने अकेले संघर्ष किया, नौकरी की, घर चलाया, तुम्हें काबिल बनाया। मैंने कभी तुमसे नहीं कहा कि मेरी जवानी खराब हो रही है या मेरे सपने मर रहे हैं। लेकिन अब… अब यह मेरा समय है।”
“माँ, आप इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती हैं?” मयंक ने कड़वाहट से कहा। “बहू की मजबूरी नहीं समझ रही हैं?”
“स्वार्थी मैं नहीं, तुम दोनों हो मयंक,” सावित्री जी ने पहली बार बेटे की आंखों में आंखें डालकर कहा। “तुमने यह मान लिया कि चूंकि मैं रिटायर हो गई हूँ, मेरा समय ‘फालतू’ है। तुमने यह नहीं पूछा कि ‘माँ, आप क्या करना चाहती हैं?’ तुमने बस अपना शेड्यूल मुझ पर थोप दिया। आन्या को अपना करियर प्यारा है, तुम्हें अपना पैसा प्यारा है। इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन मेरी कीमत पर नहीं।”
“लेकिन माँ, लोग क्या कहेंगे? कि दादी ने पोते को छोड़ दिया?” आन्या ने भावनात्मक कार्ड खेला।
“लोग तब कहाँ थे आन्या, जब मैं मयंक को बुखार में पीठ पर लादकर स्कूल पढ़ाने जाती थी? लोग तब कहाँ थे जब मैं रात भर अपनी पेंटिंग्स को रद्दी में फेंककर मयंक के लिए नोट्स बनाती थी?” सावित्री जी की आँखों में आंसू थे, पर वे कमजोर नहीं थीं। “और अगर लोग यह कहेंगे कि एक 60 साल की औरत ने अपने जीवन के आखिरी कुछ साल अपने लिए जीना चाहा, तो कहने दो। मुझे मंज़ूर है।”
सावित्री जी उठीं और अपने कमरे में गईं। उन्होंने अपना सूटकेस पैक करना शुरू किया। मयंक पीछे-पीछे आया, गुस्सा भी किया, मनाया भी, रोया भी।
“माँ, मैं नैनी रख लूँगा। आप बस सुपरवाइज कर लेना। जाना मत।”
सावित्री जी रुकीं। उन्होंने मयंक के गाल पर हाथ रखा। “बेटा, नैनी तुम रख लोगे, मुझे पता है। तुम सक्षम हो। लेकिन मुझे ‘सुपरवाइजर’ भी नहीं बनना। मुझे ‘सावित्री’ बनना है। मैं पेंट करना चाहती हूँ, रंगों से खेलना चाहती हूँ, बिना किसी घड़ी की टिक-टिक के। मैं दादी बनकर आऊँगी, मेहमान बनकर, चार दिन रहूँगी, डुग्गू को लाड़ करूँगी और चली जाऊँगी। मैं ‘केयरटेकर’ बनकर अपनी बची हुई सांसें नहीं बिताना चाहती।”
अगली सुबह, मयंक ने भारी मन से माँ को स्टेशन छोड़ा। घर में सन्नाटा था। डुग्गू रो रहा था। मयंक को ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ी। उसे समझ आ रहा था कि माँ अब तक कितना बड़ा काम कर रही थीं जिसे वह ‘कुछ नहीं’ समझता था।
सावित्री जी जब ट्रेन में बैठीं, तो उनके मन में कोई ग्लानि नहीं थी। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। पेड़ पीछे छूट रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे उनकी पुरानी जिम्मेदारियां। उन्होंने अपने बैग से स्केचबुक निकाली। ट्रेन की लय के साथ उनकी पेंसिल चलने लगी।
छह महीने बाद।
इंदौर की एक आर्ट गैलरी में प्रदर्शनी लगी थी। मुख्य दीवार पर एक बड़ी पेंटिंग टंगी थी—जिसमें एक बूढ़ी औरत, जिसके चेहरे पर झुर्रियां थीं लेकिन आँखों में एक बच्ची जैसी चमक थी, एक खुले पिंजरे के ऊपर बैठी थी और आसमान की ओर देख रही थी। पेंटिंग का शीर्षक था—“दूसरी पारी” (The Second Innings)।
उस पेंटिंग के सामने मयंक और आन्या खड़े थे। आन्या लंदन से वापस आ गई थी (क्योंकि बिना सास के मदद के, उसे समझ आ गया था कि परिवार और करियर दोनों संभालने के लिए उसे खुद उपस्थित रहना होगा)। मयंक की गोद में डुग्गू था।
सावित्री जी, जो अब पहले से ज्यादा तरोताजा और खुश लग रही थीं, उनके पास आईं। उन्होंने एक सुंदर हैंडलूम साड़ी पहनी थी और बालों में फूल लगा रखा था।
“कैसी लगी?” सावित्री जी ने पूछा।
मयंक की आँखों में आंसू आ गए। उसने माँ को गले लगा लिया। “बहुत सुंदर माँ। आप सही थीं। अगर आप उस दिन नहीं जातीं, तो हम यह मास्टरपीस कभी नहीं देख पाते। और शायद… हम कभी अपने पैरों पर खड़े होना भी नहीं सीख पाते।”
आन्या ने झुककर पैर छुए। “सॉरी मम्मी जी। हमने आपको ‘ग्रांटेड’ ले लिया था। आपकी आज़ादी छीनकर हम अपनी आज़ादी ढूंढ रहे थे।”
सावित्री जी ने दोनों को आशीर्वाद दिया। उन्होंने डुग्गू को गोद में लिया और चूमा। “मैं दादी हूँ, हमेशा रहूँगी। लेकिन याद रखना बच्चों, किसी के वजूद को उसकी उपयोगिता से मत तौलो। हर इंसान का अपना एक आसमान होता है, चाहे वो 20 का हो या 60 का।”
उस शाम गैलरी में सावित्री जी सिर्फ किसी की माँ या दादी नहीं थीं। वे एक कलाकार थीं, जिनकी पहचान उनके कैनवास पर बिखरे रंगों से चमक रही थी। उन्होंने साबित कर दिया था कि जीवन की सांझ में भी सूरज उगाया जा सकता है, बस क्षितिज बदलने की हिम्मत होनी चाहिए।
मूल लेखिका : स्वाति जैन