आज ‘गृह-प्रवेश’ की पूजा थी। घर मेहमानों से भरा था। हर कोई विनय और उसकी पत्नी शिखा की किस्मत की तारीफ कर रहा था।
“क्या घर बनाया है विनय! बिल्कुल महल जैसा है,” विनय के बॉस ने व्हिस्की का गिलास थामते हुए कहा।
विनय का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। “थैंक यू सर। बस, बरसों का सपना था कि अपना एक ऐसा आशियाना हो जिसे दुनिया देखे।”
भीड़ और शोरगुल से दूर, उस विशाल घर के सबसे आखिरी कोने वाले कमरे में, 65 वर्षीय कांति देवी अपनी पुरानी लोहे की संदूक के पास बैठी थीं। वह विनय की माँ थीं। उनके चेहरे पर वह खुशी नहीं थी जो बाहर मेहमानों के चेहरों पर थी। उनकी आँखों में एक अजीब सी घबराहट थी, जैसे कोई पक्षी सोने के पिंजरे में कैद हो गया हो।
कांति देवी ने अपनी संदूक से एक पुरानी, पीतल की दीया निकाली। यह उनके पुश्तैनी घर की निशानी थी। वे चाहती थीं कि नए घर के मंदिर में पहली ज्योत इसी दीये से जलाई जाए।
वे धीरे-धीरे चलते हुए ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ीं। उनके पैरों में हवाई चप्पल थी और शरीर पर एक साधारण सूती साड़ी। मार्बल के फर्श पर उनकी चप्पलों की ‘चप-चप’ आवाज़, मेहमानों की ‘क्लास’ में खलल डाल रही थी।
विनय की नज़र माँ पर पड़ी। वह लपका और उनके पास पहुँचा।
“माँ, तुम यहाँ क्या कर रही हो?” विनय ने दबी आवाज़ में, पर सख्ती से कहा। “और यह हाथ में क्या है? वह पुराना काला पड़ा हुआ दीया? शिखा ने मंदिर के लिए चांदी का दीया मंगाया है। इसे अंदर रखो। और प्लीज, मेहमानों के सामने ऐसे मत आया करो। तुम्हारी साड़ी… तुम ठीक से तैयार भी नहीं हो।”
कांति देवी का हाथ कांप गया। “बेटा, यह तेरे दादाजी के समय का है। शगुन के लिए…”
“माँ, यह गाँव नहीं है,” विनय ने उनकी बात काट दी। “यह स्मार्ट होम है। यहाँ सब कुछ मैचिंग होता है। जाओ, कमरे में आराम करो। खाना वहीं भिजवा दूंगा।”
कांति देवी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने वह पीतल का दीया अपने पल्लू में छिपाया और वापस अपने कमरे की ओर मुड़ गईं। उनकी आँखों से एक भी आँसू नहीं गिरा, क्योंकि अपमान जब अपनों से मिलता है, तो आँसू सूख जाते हैं, बस दिल रोता है।
पूजा खत्म हुई। पार्टी शुरू हुई। कांति देवी अपने कमरे की खिड़की से नीचे शहर की टिमटिमाती बत्तियों को देख रही थीं। उन्हें अपना वह छोटा सा कस्बा याद आ रहा था, जहाँ घर कच्चा था, लेकिन रिश्ते पक्के थे। जहाँ शाम को तुलसी के पास दीया जलाने पर पूरा मोहल्ला राम-राम करने आता था। यहाँ 24वीं मंजिल पर हवा तो बहुत थी, पर सांस लेना मुश्किल हो रहा था।
अगले कुछ हफ़्तों में, कांति देवी को यह एहसास दिला दिया गया कि वे इस घर के ‘फर्नीचर’ से ज़्यादा कुछ नहीं हैं, और वह भी एक ऐसा फर्नीचर जो घर की सजावट से मेल नहीं खाता।
एक दिन शिखा ने विनय से कहा, “विनय, मम्मी जी को बार-बार खाँसी आती है। रात को आवाज़ गूंजती है। मेरी नींद खराब होती है। और फिर, मेरे फ्रेंड्स आते हैं तो मम्मी जी का बार-बार किचन में आना उन्हें अजीब लगता है। क्यों न हम उनके लिए कोई और इंतज़ाम कर दें?”
विनय लैपटॉप पर काम कर रहा था। उसने बिना नज़र हटाए कहा, “क्या मतलब?”
“मतलब… शहर के बाहर ‘सुकून विला’ नाम का एक ओल्ड एज होम है। बहुत लग्ज़री है। फाइव स्टार सुविधाएं हैं। वहाँ उनकी उम्र के लोग मिलेंगे। भजन-कीर्तन होगा। वे यहाँ बोर होती हैं, वहाँ खुश रहेंगी।”
विनय रुका। एक पल के लिए उसे लगा कि यह गलत है। लेकिन फिर उसने अपने ‘स्टेटस’, अपनी ‘प्राइवेसी’ और शिखा की ‘खुशी’ के बारे में सोचा। उसे लगा कि शायद पैसे खर्च करके वह माँ को खुशी दे सकता है।
उसने कांति देवी से बात की। “माँ, तेरे लिए एक बहुत अच्छी जगह देखी है। यहाँ तू अकेली पड़ जाती है। वहाँ तेरे जैसी बहुत सी सहेलियाँ मिलेंगी। तुझे अच्छा लगेगा।”
कांति देवी ने बेटे की आँखों में देखा। वे समझ गईं कि बेटा उनकी खुशी नहीं, अपनी आज़ादी मांग रहा है। एक माँ सब कुछ दे सकती है, तो यह आज़ादी क्यों नहीं?
“ठीक है बेटा,” कांति देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, एक ऐसी मुस्कान जो अंदर तक टूटी हुई थी। “जैसी तेरी मर्जी। तू खुश रहे, बस।”
वह दिन भी आ गया। विनय अपनी चमचमाती कार में माँ को छोड़ने ‘सुकून विला’ गया। रास्ते भर रेडियो बजता रहा, लेकिन दोनों के बीच खामोशी थी।
आश्रम के गेट पर मैनेजर ने विनय का स्वागत किया। “चिंता मत कीजिये सर, यहाँ माताजी को रानी की तरह रखा जाएगा।”
विनय ने फॉर्म पर साइन किए। एक मोटी रकम जमा की।
जाते समय कांति देवी ने विनय का हाथ पकड़ा। “विनय…”
“क्या है माँ? मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है,” विनय ने घड़ी देखते हुए कहा।
“कुछ नहीं,” कांति देवी ने अपनी पोटली से वही पुराना पीतल का दीया निकाला। “इसे रख ले। नए घर में रोशनी कम पड़ जाए, तो इसे जला लेना। माँ की दुआओं में तेल कभी खत्म नहीं होता।”
विनय ने बेमन से वह दीया लिया और जेब में डाल लिया। “अच्छा माँ, चलता हूँ। संडे को आऊंगा मिलने।”
विनय चला गया। कांति देवी गेट पर खड़ी धूल उड़ती हुई देखती रहीं।
विनय को लगा कि अब ज़िंदगी सेट है। घर में शांति है, कोई रॉक-टोक नहीं। लेकिन अजीब बात थी, माँ के जाने के बाद वह घर ‘महल’ तो था, पर ‘घर’ नहीं लग रहा था।
शाम को वह ऑफिस से लौटा। ताले की चाबी घुमाई। दरवाज़ा खोला। अंदर सन्नाटा था। एसी की आवाज़ किसी तूफ़ान की तरह लग रही थी। शिखा अपनी किटी पार्टी में गई थी।
विनय ने पानी पीने के लिए फ्रिज खोला। बोतल निकाली। पानी पिया। लेकिन प्यास नहीं बुझी। उसे याद आया, जब वह ऑफिस से आता था, तो माँ हमेशा पूछती थी, “आ गया लल्ला? ले पानी पी ले।” वह आवाज़ अब इस सन्नाटे में कहीं खो गई थी।
रात को खाने की मेज पर वह अकेला बैठा था। रसोइये ने खाना बनाया था। शाही पनीर, नान, पुलाव। सब कुछ था। विनय ने पहला निवाला मुंह में डाला। स्वाद तो था, पर तृप्ति नहीं थी। उसे माँ के हाथ की जली हुई रोटी याद आने लगी।
दिन बीतते गए। विनय का बड़ा सा घर उसे काटने को दौड़ने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कमी क्या है। उसके पास दुनिया की हर सुख-सुविधा थी, फिर भी एक खालीपन था जो भर नहीं रहा था।
एक रविवार, विनय किसी काम से शहर के दूसरे हिस्से में गया था। अचानक बारिश शुरू हो गई। उसकी कार खराब हो गई। उसे एक छोटी सी चाय की टपरी पर रुकना पड़ा।
टपरी के पीछे एक छोटा सा, टूटा-फूटा मकान था। छत से पानी टपक रहा था। लेकिन अंदर से हंसी की आवाज़ें आ रही थीं। विनय ने देखा, एक बूढ़ी औरत चूल्हे पर कुछ पका रही थी और उसका बेटा, जो शायद दिहाड़ी मजदूर था, गीले कपड़ों में ही माँ के पास बैठकर हंस रहा था।
“अरे ओ बुढ़िया, आज तो पकौड़े खिला दे,” बेटे ने लाड़ से कहा।
“हट पागल, पहले कपड़े तो बदल ले, बीमार पड़ जाएगा,” माँ ने उसे डांटा, लेकिन फिर अपने पल्लू से उसका सिर पोंछने लगी।
विनय वह दृश्य देखता रहा। उस घर में फर्श नहीं था, मार्बल नहीं था, एसी नहीं था। शायद ठीक से छत भी नहीं थी। लेकिन वहाँ ‘सुकून’ था। वहाँ एक ‘घर’ था।
तभी टपरी वाले ने विनय को चाय दी। “साहब, गाड़ी ठीक होने में टाइम लगेगा। चाय पी लो।”
विनय ने पूछा, “यह लोग कौन हैं? इतनी गरीबी में भी इतना खुश कैसे हैं?”
टपरी वाला हंसा। “साहब, गरीबी तो जेब में है, दिल में नहीं। वह रामू है। उसका बाप मर गया, घर गिरवी है। लेकिन वह कहता है कि जब तक उसकी ‘अम्मा’ बैठी है, उसका घर ‘अयोध्या’ है। वह अपनी माँ को छोड़कर शहर कमाने जा सकता था, पर कहता है कि जिस घर में माँ का साया न हो, वह घर नहीं, ईंटों का गोदाम होता है।”
विनय के हाथ से चाय का गिलास लगभग छूट गया।
ईंटों का गोदाम।
उसने अपनी जेब में हाथ डाला। उसकी उंगलियां उस ठंडे, पीतल के दीये से टकराईं जो माँ ने उसे दिया था।
उसे अपने आलीशान पेंटहाउस का ख्याल आया। वह 24वीं मंजिल का घर अब उसे एक आलीशान कब्रगाह जैसा लग रहा था। उसने महसूस किया कि उसने ईंटें जोड़ीं, दीवारें खड़ी कीं, छत बनाई, लेकिन उस छत को थामने वाला ‘स्तंभ’—उसकी माँ—को उसने बेघर कर दिया।
बारिश और तेज़ हो गई थी, लेकिन विनय को अब भीगने की परवाह नहीं थी। मैकेनिक ने गाड़ी ठीक कर दी।
विनय ने गाड़ी घर की तरफ नहीं मोड़ी। उसने गाड़ी ‘सुकून विला’ की तरफ मोड़ दी।
शाम ढल चुकी थी। आश्रम का गेट बंद होने वाला था। विनय पागलों की तरह गाड़ी से उतरा और अंदर भागा।
“सर, विज़िटिंग आवर्स खत्म हो चुके हैं,” चौकीदार ने रोका।
“हटो!” विनय ने उसे धक्का दिया और रिसेप्शन की तरफ बढ़ा। “मेरी माँ कहाँ है? कांति देवी?”
मैनेजर बाहर आया। “मिस्टर विनय? आप इस वक़्त? क्या हुआ?”
“मेरी माँ कहाँ है?” विनय की आवाज़ कांप रही थी। उसकी आँखों में आँसू थे।
“वे मंदिर में हैं। शाम की आरती के बाद वे वहीं बैठी रहती हैं,” मैनेजर ने बताया।
विनय मंदिर की तरफ दौड़ा। वहाँ, भगवान की मूर्ति के सामने, एक धुंधली रोशनी में कांति देवी बैठी थीं। वे आँखे बंद करके प्रार्थना कर रही थीं।
विनय धीरे-धीरे उनके पीछे जाकर खड़ा हो गया। उसने सुना, माँ क्या मांग रही थीं।
“हे भगवान,” कांति देवी बुदबुदा रही थीं, “मेरे बेटे के नए घर में हमेशा बरकत रखना। उसे कभी किसी चीज़ की कमी न हो। अगर मेरे वहां रहने से उसे तकलीफ थी, तो अच्छा हुआ मैं यहाँ आ गई। बस मेरे बच्चे को खुश रखना…”
विनय टूट गया। वह घुटनों के बल गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा। “माँ!”
कांति देवी हड़बड़ाकर मुड़ीं। “विनय? लल्ला? क्या हुआ? सब ठीक तो है? किसी ने कुछ कहा? तू रो क्यों रहा है?”
वे भूल गईं कि इसी बेटे ने उन्हें निकाला था। वे बस एक माँ थीं, और उनका बेटा रो रहा था। उन्होंने दौड़कर उसे गले लगा लिया।
“मुझे माफ़ कर दे माँ,” विनय ने बच्चों की तरह सिसकते हुए कहा। “मैं बहुत बड़ा बेवकूफ हूँ। मैंने मकान बनाया, पर उसे घर बनाना भूल गया। मैं भूल गया कि छत ईंटों से नहीं, बुजुर्गों के आशीर्वाद से टिकती है। मैं तुझे छोड़कर आया, लेकिन तेरे बिना मेरा वो करोड़ों का महल वीरान है माँ। मुझे दम घुटता है वहाँ।”
कांति देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से उसके आँसू पोंछे। “पगले, माँ कभी नाराज होती है क्या? मैं तो बस तेरी खुशी के लिए…”
“मेरी खुशी तेरे चरणों में है माँ,” विनय ने कहा। “चलो। अभी चलो। और मैं तुझे ‘गेस्ट रूम’ में नहीं रखूँगा। तू उस घर की मालकिन है। तू जहाँ कहेगी, वहां रहेगी। और अगर शिखा को दिक्कत है, तो मैं दूसरा घर ले लूंगा, लेकिन तेरे बिना अब एक पल नहीं रहूँगा।”
विनय उसी रात माँ को लेकर वापस आया।
जब वे ‘स्काईलाइन एन्क्लेव’ पहुंचे, तो शिखा दरवाज़े पर खड़ी थी। वह हैरान थी।
विनय ने माँ का हाथ थाम रखा था। उसने शिखा को कुछ नहीं कहा, बस इतना कहा, “शिखा, अगर इस घर को घर बने रहना है, तो इसकी नींव को वापस आना ही था।”
कांति देवी अंदर दाखिल हुईं। इस बार विनय ने उन्हें रोका नहीं। वह उन्हें सीधा मंदिर के पास ले गया। उसने जेब से वही पुराना पीतल का दीया निकाला, उसमें घी भरा और माँ के हाथ में माचिस दी।
“जलाओ माँ,” विनय ने कहा। “आज असली गृह-प्रवेश हुआ है।”
जैसे ही कांति देवी ने दीया जलाया, उसकी लौ फड़फड़ाई और फिर स्थिर हो गई। उस एक छोटे से दीये की रोशनी ने इटालियन मार्बल और विदेशी झूमरों की चमक को फीका कर दिया। घर में एक अजीब सी गर्माहट फैल गई—ममता की गर्माहट।
विनय ने माँ के पैर छुए और मन ही मन उस खुदा से एक ही दुआ मांगी:
“हे ईश्वर, मुझे दौलत दे या न दे, शोहरत दे या न दे, लेकिन मेरी ज़िंदगी में बस इतनी रहमत रखना—कि एक माँ के बिना कोई घर न हो, और कोई माँ कभी किसी घर से बेघर न हो।”
उस रात, 24वीं मंजिल के उस फ्लैट में विनय को बरसों बाद सुकून की नींद आई। उसे समझ आ गया था कि माँ घर की दीवार नहीं, बल्कि घर की ‘नींव’ होती है। और नींव कभी घर से बाहर नहीं निकाली जाती, क्योंकि नींव हटी, तो महल चाहे कितना भी ऊँचा हो, वह गिर ही जाता है।
लेखक : मुकेश पटेल