बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, लेकिन शर्मा विला के ड्राइंग रूम में जो तूफ़ान खड़ा था, वह बाहर के मौसम से कहीं ज़्यादा भयानक था। दीवार घड़ी रात के नौ बजा रही थी। कमरे के बीचों-बीच बिखरे हुए काँच के टुकड़े और फटे हुए कागज़ इस बात की गवाही दे रहे थे कि यहाँ कुछ बहुत बुरा हुआ है।
सावित्री देवी सोफे पर बैठीं अपनी छाती पीट-पीटकर रो रही थीं। उनके बाल बिखरे हुए थे और आँखों में ऐसे आँसू थे जो किसी भी पत्थर दिल को पिघला दें। सामने उनका बेटा, राघव, खड़ा था। उसका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था, नसें तन गई थीं और मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं।
राघव के सामने, दीवार से सटकर खड़ी थी उसकी पत्नी—अवनि। अवनि की आँखों में डर नहीं था, बल्कि एक अजीब सी, डरावनी शांति थी। वह चुप थी। बिल्कुल खामोश।
“देख लिया तूने?” सावित्री देवी ने चीखते हुए कहा, “मैंने तुझे कहा था न राघव! यह औरत डायन है, डायन! इसने आज मेरे मरे हुए पति की आखिरी निशानी, वह सोने की चेन चुराकर अपने भाई को दे दी। और जब मैंने रंगे हाथों पकड़ा, तो मुझ पर हाथ उठाने आई थी। देख… देख मेरा गाल!”
सावित्री देवी ने अपना गाल आगे किया, जिस पर लाल निशान उभरे हुए थे। वह निशान, जो उन्होंने खुद अवनि के कमरे में जाने से पहले अपने ही हाथों से बनाए थे।
राघव ने अपनी माँ का सूजा हुआ गाल देखा और उसका विवेक शून्य हो गया। वह अपनी माँ को भगवान मानता था। पिछले दो सालों से, जब से अवनि इस घर में आई थी, सावित्री देवी रोज़ राघव के कान भरती थीं, लेकिन आज तो हद हो गई थी। चोरी और फिर माँ पर हाथ उठाना?
“अवनि!” राघव गुर्राया। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई माँ को छूने की?”
अवनि ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस राघव की आँखों में देख रही थी।
“जवाब दे वरना मैं भूल जाऊंगा कि तू मेरी पत्नी है,” राघव आगे बढ़ा।
सावित्री देवी ने आंसुओं के बीच से एक तिरछी नज़र अवनि पर डाली। उनकी आँखों में जीत की चमक थी। यही तो वह चाहती थीं। वह जानती थीं कि राघव आवेश में आकर आज अवनि को पीटेगा। और एक बार हाथ उठ गया, तो रिश्ता टूटना तय है। रिश्ता टूटेगा, अवनि घर से निकलेगी, और फिर वह अपने भाई की साली से राघव की दूसरी शादी करवाएंगी, जहाँ से उन्हें मुँह-मांगा दहेज मिलने वाला था।
“मार इसे राघव!” सावित्री देवी ने आग में घी डाला। “ऐसी औरत लातों की ही भूत होती है। इसे जब तक पीटेगा नहीं, इसे अपनी औकात समझ नहीं आएगी। आज इसे घर से निकालने से पहले इसका हिसाब कर दे।”
राघव ने पास पड़े एक भारी बेल्ट को उठा लिया। माहौल में एक सन्नाटा छा गया। वह अवनि की तरफ बढ़ा।
अवनि हिली नहीं। उसने अपनी जगह से एक इंच भी कदम पीछे नहीं खींचा। जब राघव बिल्कुल उसके करीब आ गया, और उसका हाथ हवा में उठा, अवनि ने बहुत धीमे, लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा,
“राघव, अगर आज यह हाथ मुझ पर गिरा, तो तुम एक पत्नी को नहीं, बल्कि एक ‘सच्चाई’ को मारोगे। और वह सच्चाई तुम्हें ज़िंदगी भर सोने नहीं देगी।”
राघव का हाथ हवा में रुक गया। अवनि की आवाज़ में कोई याचना नहीं थी, एक चुनौती थी।
“क्या बकवास कर रही है?” राघव चिल्लाया। “सच्चाई सामने है। माँ का गाल लाल है।”
“हाँ, गाल लाल है,” अवनि ने कहा। उसने अपनी साड़ी के पल्लू में छिपा एक छोटा सा पेन-ड्राइव निकाला। “लेकिन उस लाल गाल के पीछे की कहानी इस छोटी सी चीज़ में कैद है।”
सावित्री देवी की रोने की आवाज़ एक पल के लिए रुकी, फिर और तेज़ हो गई। “अरे, यह अब कहानियाँ बनाएगी! यह तो जादू-टोना जानती है। राघव, इसकी मत सुन। मार इसे!”
अवनि ने राघव की आँखों में देखा। “राघव, तुम एक इंजीनियर हो। तथ्यों पर भरोसा करते हो न? मुझे मारने से पहले, बस पाँच मिनट मुझे दे दो। उसके बाद अगर तुम्हें लगे कि मैं गुनहगार हूँ, तो तुम जो सज़ा दोगे, मैं उफ़ तक नहीं करूँगी। जान ले लेना मेरी।”
राघव की सांसें भारी चल रही थीं। वह असमंजस में था। एक तरफ माँ का दर्द, दूसरी तरफ पत्नी का यह आत्मविश्वास।
“पाँच मिनट,” राघव ने बेल्ट नीचे नहीं की, लेकिन हाथ ढीला छोड़ दिया। “सिर्फ़ पाँच मिनट।”
अवनि तेज़ी से टीवी की तरफ बढ़ी। उसने स्मार्ट टीवी के यूएसबी पोर्ट में वह पेन-ड्राइव लगा दी।
सावित्री देवी अब घबरा गई थीं। वह सोफे से उठीं। “यह क्या तमाशा है? मेरे घर में मेरी बेइज्जती करवाएगा तू? बंद कर इसे राघव!” वह टीवी की तरफ लपकीं।
“माँ, रुकिए!” राघव ने पहली बार माँ को ऊँची आवाज़ में रोका। “देखने दीजिए उसे क्या दिखाना है।”
अवनि ने रिमोट दबाया। स्क्रीन काली हुई, और फिर एक वीडियो शुरू हुआ।
यह वीडियो कोई धुंधला सीसीटीवी फुटेज नहीं था। यह एक हिडन कैमरा रिकॉर्डिंग थी, जो हाई डेफिनेशन में थी। कैमरा अवनि और राघव के बेडरूम में अलमारी के ऊपर रखा गया था, जिसका एंगल सीधे उस लॉकर की तरफ था जहाँ गहने रखे जाते थे।
वीडियो में तारीख और समय आज दोपहर का था।
राघव स्क्रीन को घूरने लगा।
वीडियो में अवनि कमरे में नहीं थी। दरवाज़ा खुला, और सावित्री देवी अंदर आईं। उनके चेहरे पर वह ममतामयी भाव नहीं था जो राघव अक्सर देखता था। उनके चेहरे पर एक धूर्त मुस्कान थी। उन्होंने इधर-उधर देखा, फिर अपनी साड़ी के तह से एक चाबी निकाली।
“ये… ये चाबी तो सिर्फ मेरे और अवनि के पास रहती है,” राघव बुदबुदाया।
वीडियो में सावित्री देवी ने लॉकर खोला। उन्होंने सोने की वह चेन निकाली। उसे एक पल के लिए निहारा, और फिर… उसे अपने ब्लाउज के अंदर छिपा लिया।
राघव का मुँह खुला का खुला रह गया।
लेकिन वीडियो अभी ख़त्म नहीं हुआ था। सावित्री देवी ने अपना फोन निकाला और किसी को कॉल किया। टीवी के स्पीकर से उनकी आवाज़ साफ़ गूंजने लगी।
“हाँ बिमला, काम हो गया। चेन मैंने छिपा दी है। अब शाम को जब राघव आएगा, तो ऐसा तमाशा खड़ा करूँगी कि आज ही इस अवनि का पत्ता साफ़। तू बस अपनी भतीजी का रिश्ता पक्का समझ। और हाँ, वह पच्चीस लाख नकद तैयार रखना, राघव का नया बिज़नेस शुरू करवाने के नाम पर लूँगी।”
कमरे में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। सावित्री देवी का चेहरा पीला पड़ चुका था, जैसे किसी ने उनका सारा खून निचोड़ लिया हो। वह कांपते हुए सोफे पर गिर पड़ीं।
राघव ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाकर अपनी माँ को देखा। वह बेल्ट उसके हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गई।
लेकिन अवनि ने वीडियो अभी नहीं रोका।
“अभी और भी है राघव,” अवनि ने कहा।
अगला क्लिप शुरू हुआ। यह शाम का था, राघव के आने से ठीक दस मिनट पहले का।
सावित्री देवी आईने के सामने खड़ी थीं। अवनि कमरे के एक कोने में खड़ी रिकॉर्डिंग कर रही थी (शायद फ़ोन छिपाकर)। सावित्री देवी अवनि को देख नहीं पा रही थीं।
सावित्री देवी ने अपना हाथ उठाया और… चटाक! उन्होंने खुद अपने गाल पर ज़ोर से थप्पड़ मारा। एक बार। दो बार। फिर उन्होंने अपनी आँखें रगड़ीं ताकि वे लाल हो जाएं। फिर उन्होंने बाल बिखराए और शीशे में देखकर अपनी रोने की ‘एक्टिंग’ का रिहर्सल किया।
“हाय मेरा बेटा… लुट गई मैं…” वह शीशे के सामने बोल रही थीं और फिर खुद ही हंस रही थीं। “बुद्धू है मेरा राघव। माँ की ममता के नाम पर तो मैं उससे ज़हर भी पीला दूँ तो पी लेगा।”
वीडियो ख़त्म हो गया। स्क्रीन फिर से काली हो गई।
कमरे में सिर्फ़ बारिश की आवाज़ आ रही थी। राघव ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया। उसका पूरा अस्तित्व हिल चुका था। जिस माँ की गोद में सिर रखकर वह सुकून पाता था, आज पता चला कि वह गोद कांटों से भरी थी। जिसे वह देवी मानता था, वह एक सौदागर निकली जो उसे बेच रही थी।
सावित्री देवी ने अब आखिरी दांव खेला। वह दौड़कर राघव के पास आईं और उसके पैरों में गिर पड़ीं। “बेटा, यह सब झूठ है! यह वीडियो इसने कंप्यूटर से बनाया है। आजकल ‘डीपफेक’ क्या-क्या होता है न… यह मुझे फंसा रही है! मैं तेरी माँ हूँ राघव!”
राघव ने धीरे से अपने पैर पीछे खींचे। उसकी आँखों में अब गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरा, असीम दुःख था।
“माँ,” राघव की आवाज़ टूटी हुई थी। “टेक्नोलॉजी वीडियो बना सकती है, लेकिन वह बातें… जो आपने फोन पर कहीं… वो बिमला आंटी वाली बात… वो पच्चीस लाख वाली बात… वो बातें कोई कंप्यूटर नहीं बना सकता क्योंकि बिमला आंटी का प्रस्ताव तो सिर्फ़ मुझे और आपको पता था। मैंने अवनि को कभी बताया ही नहीं था।”
सावित्री देवी की जुबान पर ताला लग गया। वह अपने ही जाल में बुरी तरह फंस चुकी थीं।
राघव खड़ा हुआ। वह अवनि के पास गया। अवनि अब भी वैसी ही शांत खड़ी थी, लेकिन उसकी आँखों में नमी उतर आई थी।
राघव ने कांपते हाथों से अवनि का हाथ पकड़ा। “तुमने… तुमने मुझे बताया क्यों नहीं? यह कैमरा… यह सब?”
“क्योंकि तुम विश्वास नहीं करते, राघव,” अवनि ने कहा। “तुम माँ से इतना प्यार करते हो कि अगर मैं भगवान को भी गवाह बनाकर लाती, तो तुम माँ को ही चुनते। मुझे सबूत चाहिए था। पिछले छः महीनों से मैं यह महसूस कर रही थी कि घर में चीज़ें गायब हो रही हैं और इल्ज़ाम मुझ पर आ रहा है। मैंने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे और मेरे रिश्ते को बचाने के लिए यह कैमरा लगाया था।”
राघव ने सिर झुका लिया। उसे शर्म आ रही थी। उस बेल्ट को ज़मीन पर पड़ा देख उसे खुद से घिन आ रही थी।
वह मुड़ा और अपनी माँ की ओर देखा। सावित्री देवी अब रो नहीं रही थीं। उनका चेहरा पत्थर हो गया था। जब खेल ख़त्म हो जाता है, तो मुखौटे की ज़रूरत नहीं रहती।
“राघव,” सावित्री देवी ने रूखी आवाज़ में कहा, “मैंने जो किया, तेरे भले के लिए किया। यह लड़की हमारे लायक नहीं है। बिमला वाले बहुत पैसे वाले हैं, तेरी ज़िंदगी सेट हो जाती।”
“भला?” राघव हंसा, एक खोखली हंसी। “आपने मेरा घर उजड़ने का सौदा किया, मेरे हाथों मेरी पत्नी को पिटवाने की साज़िश रची, मुझे एक अपराधी बनाने चली थीं… और यह मेरा भला था?”
राघव अपने कमरे में गया। दो मिनट बाद वह अपना वॉलेट और गाड़ी की चाबी लेकर बाहर आया।
“चलो अवनि,” उसने कहा।
“कहाँ?” अवनि ने पूछा।
“जहाँ भी, बस यहाँ नहीं,” राघव ने कहा। “मैं उस छत के नीचे एक पल भी नहीं रह सकता जहाँ मेरी माँ ने मेरे भरोसे का क़त्ल किया हो।”
“राघव, तू मुझे छोड़कर जाएगा?” सावित्री देवी चिल्लाईं। “इस दो टके की लड़की के लिए अपनी माँ को छोड़ेगा? दूध का हक़ नहीं अदा करेगा?”
राघव दरवाज़े पर रुका। उसने मुड़कर नहीं देखा।
“दूध का हक़ तो मैं अदा कर रहा हूँ माँ, आप पर हाथ न उठाकर,” राघव ने सपाट स्वर में कहा। “वरना जो अपराध आपने आज किया है, उसके लिए कोई और होता तो शायद पुलिस बुला लेता। यह घर आपका है, आप ही रखिये। अपने गहने, अपनी साज़िशें और अपना वह ‘पच्चीस लाख’ का सपना… सब आपको मुबारक।”
राघव ने अवनि का हाथ थामा और वे दोनों उस आलीशान घर से बाहर निकल गए, बारिश के बीच।
गाड़ी में बैठते ही राघव स्टेरिंग व्हील पर सिर रखकर रो पड़ा। वह फूट-फूटकर रोया, एक बच्चे की तरह। अवनि ने उसे चुप नहीं कराया। उसे रोने दिया। वह जानती थी कि यह आँसू उस राघव के हैं जो आज बड़ा हो गया था—दर्दनाक तरीके से।
थोड़ी देर बाद, राघव शांत हुआ। उसने अवनि की ओर देखा। “मुझे माफ़ कर दो, अवनि। मैं… मैं अंधा था।”
अवनि ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “तुम अंधे नहीं थे राघव, तुम बस एक अच्छे बेटे थे। और एक अच्छे बेटे का फायदा उठाना दुनिया का सबसे आसान काम होता है।”
“अब हम कहाँ जाएंगे?” राघव ने पूछा।
“फिलहाल होटल,” अवनि ने मुस्कुराते हुए कहा। “और कल… कल हम एक नया घर ढूंढेंगे। एक ऐसा घर जिसकी दीवारों में कान नहीं होंगे, और जिसकी नींव झूठ पर नहीं टिकी होगी।”
राघव ने गाड़ी स्टार्ट की। पीछे मुड़कर देखा तो विला की बत्तियाँ जल रही थीं, लेकिन उसके लिए वह घर अब हमेशा के लिए अंधेरे में डूब चुका था।
सावित्री देवी ने अपने बेटे के हाथों बहू को पिटवाने की तैयारी की थी, लेकिन अवनि ने कुछ ऐसा किया कि सिर्फ़ थप्पड़ ही नहीं रोका, बल्कि उस हाथ को हमेशा के लिए थाम लिया, और सावित्री देवी को उनके ही सोने के महल में तन्हा छोड़ दिया। उस रात अवनि जीती नहीं थी, बल्कि उसने अपने परिवार को एक नासूर से मुक्त कराया था।
लेखक : मुकेश पटेल
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