सास बड़ी बहू की ज्यादतियों की सजा छोटी बहु को दे रही थी.. फिर हुआ कुछ ऐसा
रसोई घर के बर्तनों की खड़खड़ाहट के बीच भी सावित्री देवी की तीखी नज़रों से कुछ नहीं छुपता था। जैसे ही उनकी छोटी बहू, वंदना, ने फ्रिज खोला, सावित्री देवी हॉल से ही चिल्लाईं, “वंदना! दूध का पैकेट खोल रही है? देख लेना, उसमें से आधा अलग रख देना। कल की तरह पूरा खत्म मत कर देना। आजकल महंगाई आसमान छू रही है, और तुम लोगों को तो बस उड़ाना आता है।”
वंदना का हाथ एक पल के लिए ठिठक गया। उसने एक गहरी सांस ली, खुद को शांत किया और धीमी आवाज़ में बोली, “जी माँ जी, खीर बनानी थी, आज रविवार है, विनय (वंदना का पति) को पसंद है।”
“हाँ-हाँ, सब नखरे विनय के ही हैं या तुम्हारी जीभ के? जब देखो तब पकवान। अरे, सादा खाना खाकर गुजारा नहीं होता क्या?” सावित्री देवी बड़बड़ाते हुए अपनी कमर में खोंसा हुआ चाबियों का गुच्छा टटोलने लगीं।
यह चाबियों का गुच्छा सावित्री देवी के शरीर का एक हिस्सा बन चुका था। सोते, जागते, नहाते—यह गुच्छा हमेशा उनके पास रहता। वंदना पिछले दो साल से इस घर की बहू थी, लेकिन आज तक उसे अलमारी तो छोड़िए, राशन के डिब्बे की चाबी तक नहीं मिली थी। हर सुबह सावित्री देवी खुद नाप-तौल कर दाल, चावल और चीनी निकालतीं, जैसे वंदना कोई बहू नहीं, बल्कि चोर हो।
वंदना जानती थी कि इस अविश्वास और कड़वाहट की जड़ वह नहीं थी। इसकी जड़ थी ‘विशाखा’—सावित्री देवी की बड़ी बहू।
पाँच साल पहले, विशाखा ने इस घर में कोहराम मचाया था। वह मीठी बातें करके आई थी और एक दिन मौका पाकर सावित्री देवी के पुश्तैनी गहने और विनय के बड़े भाई (अपने पति) को लेकर अलग हो गई थी। जाते-जाते उसने न केवल घर का बंटवारा किया था, बल्कि सावित्री देवी के मन के भी टुकड़े कर दिए थे। उस दिन के बाद से सावित्री देवी का विश्वास दुनिया से उठ गया था।
समस्या यह थी कि विशाखा तो चली गई थी, लेकिन उसकी दी हुई चोट का मरहम लगने के बजाय, सावित्री देवी ने उस चोट का बदला वंदना से लेना शुरू कर दिया था। उन्हें लगता था कि अगर बड़ी बहू, जिसे उन्होंने पलकों पर बिठाया था, धोखा दे सकती है, तो यह कल की आई वंदना क्या चीज़ है?
“दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है,” यह कहावत वंदना के जीवन का अभिशाप बन गई थी।
शाम को विनय घर आया। वंदना ने उसे चाय दी और पास बैठकर बोली, “विनय, अगले हफ्ते मेरी ममेरी बहन की शादी है। मुझे जाने के लिए कुछ अच्छे गहने चाहिए थे। माँ जी के पास लॉकर में मेरा सेट रखा है जो पापा ने शादी में दिया था। क्या आप उनसे कहेंगे कि मुझे दे दें?”
विनय ने कप मेज पर रखा और बेबसी से पत्नी को देखा। “वंदना, तुम तो माँ का स्वभाव जानती हो। विशाखा भाभी के कांड के बाद वो लॉकर की चाबी को हाथ भी नहीं लगाने देतीं। मैं कहूँगा तो घर में क्लेश होगा। तुम अपनी आर्टिफीसियल ज्वेलरी पहन लो न।”
वंदना की आँखों में आंसू आ गए। “विनय, वह मेरा अपना स्त्री-धन है। मेरे पिता ने दिया है। मैं चोर नहीं हूँ। मैं विशाखा भाभी नहीं हूँ। मुझे कब तक किसी और के किए की सजा मिलती रहेगी?”
विनय चुप रहा। वह माँ के डर और पत्नी के दर्द के बीच पिस रहा था।
अगले दिन सुबह, सावित्री देवी पूजा कर रही थीं। वंदना ने हिम्मत करके कह ही दिया, “माँ जी, मुझे शादी में जाना है। मेरा वह कुंदन वाला सेट चाहिए था।”
सावित्री देवी की घंटी रुक गई। उन्होंने मुड़कर वंदना को ऐसे देखा जैसे उसने उनकी किडनी मांग ली हो।
“गहने? शादी में जाने के लिए? और फिर क्या? वहाँ से आकर कहोगी कि भीड़ में गिर गया? या चोरी हो गया? मुझे सब पता है ये चालें। विशाखा भी यही कहकर मेरा रानी-हार ले गई थी कि ‘बहन की गोद भराई है’। आज तक वह हार वापस नहीं आया। कोई ज़रूरत नहीं है असली गहने पहनने की। सादगी में रहो।”
“लेकिन माँ जी, वह मेरा है…” वंदना ने प्रतिवाद किया।
“इस घर में जो आ गया, वह इस घर का है। और इसकी मालकिन मैं हूँ,” सावित्री देवी ने फैसला सुना दिया। “जब तक मैं ज़िंदा हूँ, एक तिनका भी यहाँ से बाहर नहीं जाएगा।”
वंदना रोते हुए अपने कमरे में चली गई। उसने तय कर लिया कि वह शादी में नहीं जाएगी। अपमान सहकर सजने से अच्छा है घर में रहना।
दो दिन बाद की बात है। विनय ऑफिस गया हुआ था। वंदना छत पर कपड़े सुखा रही थी। अचानक नीचे से ज़ोरदार आवाज़ आई। वह दौड़कर नीचे आई तो देखा सावित्री देवी बाथरूम के दरवाजे पर गिरी पड़ी थीं। उनके सीने में तेज़ दर्द हो रहा था और वे पसीने से तर-बतर थीं।
“माँ जी!” वंदना घबरा गई। उसने तुरंत एम्बुलेंस को फोन किया और विनय को खबर दी।
अस्पताल में डॉक्टर ने बताया कि उन्हें माइनर हार्ट अटैक आया है और तुरंत एंजियोप्लास्टी करनी पड़ेगी। स्थिति गंभीर थी। विनय शहर से बाहर टूर पर था और उसे आने में कम से कम 5 घंटे लगने वाले थे।
अस्पताल के रिसेप्शन पर कैशियर ने कहा, “मैडम, आपको तुरंत पचास हज़ार रुपये जमा कराने होंगे ताकि हम प्रक्रिया शुरू कर सकें।”
वंदना के पास पर्स में मुश्किल से दो हज़ार रुपये थे। विनय का फोन नहीं लग रहा था। उसने सावित्री देवी के पर्स को टटोला, लेकिन उसमें कुछ नहीं था। तभी उसकी नज़र सावित्री देवी की कमर पर गई, जहाँ बेहोशी में भी उनका हाथ चाबियों के गुच्छे को जकड़े हुए था।
वंदना ने कांपते हाथों से वह गुच्छा निकाला। यह वही चाबियां थीं जिनके लिए उसे रोज़ ताने मिलते थे। आज ये चाबियां उसकी सास की जान बचा सकती थीं।
उसने विनय के एक दोस्त को फोन किया और गाड़ी मंगवाई। वह घर भागी। घर पहुँचकर उसने सीधे सावित्री देवी के कमरे का रुख किया। पहली बार उसने वह भारी गोदरेज की अलमारी खोली। अंदर लॉकर था। चाबी लगाई। लॉकर खुल गया।
अंदर नोटों की गड्डियां और गहनों के डिब्बे रखे थे। वंदना ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने ज़रूरी पैसे निकाले। तभी उसकी नज़र एक लाल मखमली डिब्बे पर पड़ी। यह वही कुंदन सेट था जो उसने मांगा था। और उसके पास ही विशाखा भाभी के ले जाए हुए गहनों के खाली डिब्बे भी पड़े थे, जो सावित्री देवी ने शायद अपनी बदनसीबी की याद के तौर पर रखे थे।
वंदना ने पैसे लिए, लॉकर बंद किया और वापस अस्पताल भागी।
पैसे जमा हुए। ऑपरेशन शुरू हुआ। तीन घंटे बाद डॉक्टर ने कहा, “खतरा टल गया है। आप उनसे मिल सकती हैं।”
सावित्री देवी को होश आ गया था। विनय भी तब तक पहुँच चुका था। सावित्री देवी ने अपनी कमर पर हाथ फेरा। चाबियां गायब थीं। उनका चेहरा पीला पड़ गया। मशीनें बीप करने लगीं।
“मेरी… मेरी चाबियां…” वे बुदबुदाईं।
वंदना आगे बढ़ी। उसने अपनी मुट्ठी खोली। चाबियों का गुच्छा उसकी हथेली पर था।
“ये रही माँ जी,” वंदना ने कहा और गुच्छा उनके तकिए के पास रख दिया।
सावित्री देवी ने झपटकर गुच्छा पकड़ लिया। उनकी आँखों में राहत थी, लेकिन साथ ही एक संदेह भी। उन्होंने वंदना को घूरकर देखा। “तुमने… तुमने अलमारी खोली थी?”
“हाँ माँ जी,” वंदना ने सच बोल दिया। “अस्पताल में पैसे जमा करने थे। विनय जी यहाँ नहीं थे। मुझे घर जाकर पैसे लाने पड़े।”
सावित्री देवी की आँखों में एक अजीब सा डर तैर गया। उन्होंने सोचा, ‘अब तो लॉकर खुल गया। इसने जरूर हाथ साफ कर दिया होगा। मौका था, मैं थी नहीं, चाबी हाथ में थी। विशाखा ने भी यही किया था।’
वे कुछ नहीं बोलीं, बस आँखें बंद कर लीं। लेकिन मन ही मन उन्होंने ठान लिया कि घर जाते ही सबसे पहले लॉकर चेक करेंगी। उन्हें यकीन था कि वंदना ने पैसे के साथ-साथ गहने भी निकाल लिए होंगे।
दो दिन बाद सावित्री देवी को छुट्टी मिल गई। घर पहुँचते ही, अपनी कमजोरी के बावजूद, उन्होंने जिद की कि उन्हें उनके कमरे में ले जाया जाए।
विनय उन्हें सहारा देकर कमरे में लाया। वंदना उनके लिए खिचड़ी बनाने रसोई में चली गई।
जैसे ही विनय बाहर गया, सावित्री देवी ने कांपते हाथों से अलमारी खोली। उनका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उन्होंने लॉकर खोला।
उनकी नज़र सबसे पहले नोटों की गड्डियों पर गई। उनमें से कुछ पैसे कम थे (जो अस्पताल में दिए गए थे), और बाकी पैसे सलीके से रखे थे। साथ ही अस्पताल की रसीद भी रखी थी, ताकि हिसाब रहे।
फिर उनकी नज़र गहनों के डिब्बों पर गई। उन्होंने एक-एक डिब्बा खोलकर देखा। उनका भारी रानी-हार, कड़े, और वह कुंदन का सेट—सब कुछ वहीं था। एक तिनका भी इधर से उधर नहीं हुआ था।
सावित्री देवी लॉकर के सामने सुन्न खड़ी रह गईं। वंदना के पास पूरा मौका था। घर खाली था, चाबी उसके पास थी, और सबसे बड़ी बात—उसके पास ‘कारण’ भी था। सावित्री देवी ने उसे इतना प्रताड़ित किया था कि अगर वह चाहती तो बदला लेने के लिए या अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए कुछ भी ले जा सकती थी। विशाखा ने तो बिना किसी कारण के सब लूट लिया था, जबकि वंदना के पास तो वजह थी।
लेकिन वंदना ने सिर्फ सास की जान बचाने के लिए पैसे लिए, और बाकी सब जस का तस रख दिया।
सावित्री देवी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। उन्हें अपनी छोटी सोच पर घिन आने लगी। उन्होंने एक मासूम लड़की को, जो उनकी सेवा करती रही, उसे सिर्फ इसलिए चोर समझा क्योंकि किसी और ने उन्हें धोखा दिया था।
तभी वंदना खिचड़ी की थाली लेकर कमरे में आई।
“माँ जी, आप अलमारी के पास क्यों खड़ी हैं? डॉक्टर ने आराम करने को कहा है,” वंदना ने चिंता से कहा।
सावित्री देवी ने मुड़कर वंदना को देखा। उनकी आँखों में अब वह सख्ती नहीं थी, बल्कि एक नमी थी।
“वंदना…” सावित्री देवी का गला भर आया। “तूने… तूने कुछ लिया क्यों नहीं?”
वंदना चौंक गई। उसने थाली मेज पर रखी। “क्या मतलब माँ जी?”
“तेरे पास चाबी थी। मैं अस्पताल में थी। तू चाहती तो विशाखा की तरह सब कुछ ले सकती थी। मैंने तेरे साथ इतना बुरा व्यवहार किया, फिर भी तूने ईमानदारी दिखाई? क्यों?”
वंदना मुस्कुराई, एक दुखभरी लेकिन स्वाभिमानी मुस्कान। “माँ जी, विशाखा भाभी और मुझमें एक फर्क है। वो इस घर में ‘व्यापार’ करने आई थीं, मैं ‘संसार’ बसाने आई हूँ। और रही बात गहनों की, तो मैंने आपसे गहने मांगे थे, आपका विश्वास मांगा था, चोरी नहीं करनी थी मुझे। मेरे संस्कार मुझे अपनों की मजबूरी का फायदा उठाना नहीं सिखाते। आप मेरी माँ समान हैं, और माँ की जान से कीमती कोई हीरा नहीं होता।”
सावित्री देवी के हाथ से चाबियों का गुच्छा छूटकर ज़मीन पर गिर गया। वह गुच्छा जो उनकी सत्ता और अविश्वास का प्रतीक था।
वे आगे बढ़ीं और वंदना को गले लगा लिया। वे फूट-फूट कर रोने लगीं। “मुझे माफ़ कर दे बहू। मैं अंधी हो गई थी। मैंने एक सांप के डर से रस्सी को भी जलाना चाहा। मैं भूल गई थी कि हर बहू विशाखा नहीं होती। तूने आज न सिर्फ मेरी जान बचाई है, बल्कि मेरे मरे हुए विश्वास को भी ज़िंदा कर दिया है।”
वंदना ने सास के आंसू पोंछे। “शांत हो जाइए माँ जी, आपकी तबीयत खराब हो जाएगी।”
सावित्री देवी ने अपने पल्लू से आंसू पोंछे। वे मुड़ीं और लॉकर से वह लाल मखमली डिब्बा (कुंदन सेट) निकाला। फिर उन्होंने अपने गले से सोने की वह भारी चेन भी उतारी जो वे कभी नहीं उतारती थीं।
उन्होंने वंदना का हाथ अपने हाथ में लिया और दोनों चीज़ें उसकी हथेली पर रख दीं।
“ये कुंदन सेट तेरा है, तेरे पिता की निशानी। और यह चेन… यह मेरा आशीर्वाद है। और सुन…” सावित्री देवी ने ज़मीन पर गिरा चाबियों का गुच्छा उठाया और वंदना के पल्लू के छोर में बांध दिया।
“माँ जी, यह क्या कर रही हैं?” वंदना हड़बड़ा गई।
“आज से यह गुच्छा तेरी कमर पर रहेगा,” सावित्री देवी ने दृढ़ता से कहा। “अब मैं थक गई हूँ पहरेदारी करते-करते। और जिस घर में ऐसी ईमानदार और संस्कारी बहू हो, वहां सास को पहरेदार बनने की ज़रूरत नहीं होती। आज से तू इस घर की मालकिन है। राशन हो या गहने, सब तेरे भरोसे।”
विनय दरवाज़े पर खड़ा यह सब देख रहा था। उसकी आँखों में सुकून था।
उस दिन घर के दरवाजे पर लगा ताला तो वही था, लेकिन घर के अंदर रिश्तों पर लगा अविश्वास का ताला हमेशा के लिए खुल गया था। बड़ी बहू की ज्यादतियों की सजा जो छोटी बहू भुगत रही थी, वह सजा आज एक ‘पुरस्कार’ में बदल गई थी—और वह पुरस्कार था ‘अटूट विश्वास’।
सावित्री देवी ने उस रात चैन की नींद सोई, बिना चाबियों के गुच्छे के, क्योंकि अब उनकी तिजोरी से ज्यादा सुरक्षित उनके रिश्ते थे।
लेखक : मुकेश पटेल
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