दरवाजे की घंटी बजी और डिलीवरी बॉय ने एक बड़ा सा कार्टन बरामदे में रख दिया। पसीने से तर-बतर होकर उसने रसीद पर साइन मांगे।
रसोई से बाहर आईं 60 वर्षीय सुमित्रा देवी ने उस विशाल डिब्बे को देखा और उनका माथा ठनका।
“यह क्या है?” उन्होंने अपनी बहू, अवनी, से पूछा जो अभी-अभी डिलीवरी बॉय को टिप देकर अंदर आ रही थी।
अवनी के चेहरे पर एक चमक थी। उसने उत्साह से कहा, “माँजी, यह ओटीजी (OTG – Oven Toaster Griller) है। बड़ा वाला, प्रोफेशनल बेकिंग के लिए।”
सुमित्रा देवी की आँखों में सवालिया निशान और चेहरे पर सख्ती आ गई। “ओवन? हमारे पास तो गैस वाला तंदूर है न? और रोटियाँ तो तवे पर बनती हैं। इसकी क्या ज़रूरत थी? और सुना है यह बिजली बहुत खाता है।”
“माँजी, यह रोटियों के लिए नहीं है,” अवनी ने समझाना चाहा। “मुझे केक और कुकीज़ बनाने का शौक है। मैं सोच रही थी कि इसे थोड़ा प्रोफेशनल तरीके से करूँ।”
सुमित्रा देवी ने अवनी को ऊपर से नीचे तक देखा। फिर उन्होंने एक गहरी सांस ली, जैसे अपने गुस्से को पी रही हों।
“अवनी, इधर आ,” उन्होंने सोफे पर बैठते हुए कहा।
अवनी पास आई।
“बेटा, तेरे पति, राघव की तनख्वाह पचास हज़ार है। शहर में किराए का मकान है, राशन है, बिजली का बिल है, और भविष्य के लिए बचत भी करनी है। अभी पिछले महीने तूने नया सोफा कवर मंगवाया, उससे पहले वो महँगी साड़ियाँ। और अब यह मशीन। इसकी कीमत क्या है?”
अवनी ने धीरे से कहा, “बारह हज़ार।”
“बारह हज़ार!” सुमित्रा देवी की आवाज़ ऊँची हो गई। “अवनी, तू समझदार है, पढ़ी-लिखी है। पर तुझे घर चलाने का अक्ल नहीं है। हम मध्यमवर्गीय लोग हैं। हमारे सपने हमारी जेब के हिसाब से होने चाहिए। बहू, जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारने चाहिए। अगर चादर से बाहर पैर निकालोगी, तो ठंड भी लगेगी और मच्छर भी काटेंगे।”
अवनी चुप रही। यह मुहावरा उसने सुमित्रा देवी से हज़ारों बार सुना था। ‘चादर’ और ‘पैर’ का यह गणित इस घर का संविधान था। यहाँ हर चीज़ को ज़रूरत के तराजू पर तौला जाता था, और अगर वो चीज़ ‘बेहद ज़रूरी’ न हो, तो उसे फ़िज़ूलखर्ची मान लिया जाता था।
“माँजी, यह फ़िज़ूलखर्ची नहीं है, यह निवेश (investment) है,” अवनी ने अपनी बात रखने की कोशिश की।
“निवेश?” सुमित्रा देवी ने कड़वाहट से हंसा। “रसोई में केक बनाकर कौन सा महल खड़ा हो जाएगा? राघव शाम को आएगा तो उसे यह बिल मत दिखाना, वर्ना उसका बीपी बढ़ जाएगा। इसे वापस कर दे।”
“वापस नहीं होगा माँजी, ओपन बॉक्स डिलीवरी थी,” अवनी ने झूठ बोल दिया, हालाँकि उसके दिल की धड़कन तेज़ थी। वह जानती थी कि उसने एक जोखिम लिया है।
उस रात राघव जब घर आया, तो माहौल तनावपूर्ण था। सुमित्रा देवी ने खाने की मेज़ पर बात छेड़ दी।
“तेरी बीवी ने आज बारह हज़ार का चूल्हा मंगवाया है। अब महीने का राशन कैसे आएगा, तू ही देख।”
राघव ने थकी हुई आँखों से अवनी को देखा। “अवनी, सच में? अभी हमें कार की ईएमआई भरनी थी। तुम्हें मुझसे पूछना चाहिए था।”
“राघव, मुझे सिर्फ़ तीन महीने का वक़्त दो,” अवनी ने पहली बार दृढ़ता से कहा। “अगर मैंने इस बारह हज़ार से चौबीस हज़ार नहीं बनाए, तो मैं वादा करती हूँ कि मैं अपनी जॉब (जो उसने शादी के बाद छोड़ दी थी) वापस जॉइन कर लूँगी और घर का खर्च चलाऊंगी।”
सुमित्रा देवी बड़बड़ाईं, “शौक न हुआ, आफत हो गई। अब बिजली का बिल आसमान छुएगा।”
अगले दिन से घर में एक नई गतिविधि शुरू हुई। अवनी सुबह जल्दी उठ जाती। घर का सारा काम निपटाकर वह अपने उस नए ओवन के पास खड़ी हो जाती। पूरा घर वनीला, चॉकलेट और ताज़ी ब्रेड की खुशबू से महकने लगा।
सुमित्रा देवी को यह खुशबू पसंद तो थी, पर वे अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करती रहतीं। “दिन भर बिजली जलती रहती है। और यह मैदा, चीनी, मक्खन… कितना पैसा फूँक रही है यह लड़की।”
अवनी ने शुरुआत में आस-पास के पड़ोसियों को फ्री में सैंपल भेजे। सबको स्वाद बहुत पसंद आया। धीरे-धीरे, व्हाट्सएप ग्रुप्स पर बात फैलने लगी। ‘अवनीज़ होम बेक्स’ (Avni’s Home Bakes) का नाम लोगों की ज़बान पर चढ़ने लगा।
पहला ऑर्डर आया – एक बच्चे के जन्मदिन का केक। 1 किलो का चॉकलेट ट्रफल। अवनी ने पूरी जान लगा दी। जब केक बनकर तैयार हुआ, तो वह किसी बाज़ार के केक से कम नहीं लग रहा था।
उस महीने के अंत में, अवनी के पास 5 हज़ार रुपये आए।
सुमित्रा देवी ने पैसे देखे तो बोलीं, “पाँच हज़ार कमाए, और सामान कितने का लगा? और बिजली? सब बराबर ही है। सिर्फ़ मेहनत की बर्बादी।”
अवनी निराश नहीं हुई। उसे पता था कि व्यापार जमने में वक़्त लगता है।
तीन महीने बीत गए। राघव की कंपनी में मंदी की खबरें आने लगी थीं। वह रोज़ तनाव में घर आता। एक दिन, राघव ने आकर बताया कि कंपनी ने 20% सैलरी काट दी है और कुछ लोगों को निकाला जा रहा है।
घर में मातम सा छा गया।
“पचास हज़ार में तो घर मुश्किल से चलता था, अब चालीस में कैसे चलेगा?” सुमित्रा देवी रोने लगीं। “मैंने कहा था न, पैसे जोड़कर रखो। पर यहाँ तो ओवन और शान-ओ-शौकत में पैसे उड़ाए गए।”
अवनी ने राघव का हाथ पकड़ा। “हिम्मत मत हारो राघव। हम मैनेज कर लेंगे।”
अगला महीना बहुत कठिन था। सुमित्रा देवी ने दूध आधा करवा दिया, सब्ज़ियों में कटौती कर दी। लेकिन अवनी के ओवन का काम नहीं रुका। बल्कि, अवनी ने अब रात-रात भर जागना शुरू कर दिया था। दिवाली आने वाली थी और उसने ‘गिफ्ट हैम्पर्स’ का विज्ञापन डाला था।
दीवाली के दो दिन पहले, घर की घंटी लगातार बज रही थी। कभी डिलीवरी बॉय सामान लेने आ रहा था, तो कभी कोई ग्राहक अपना ऑर्डर लेने। पूरा ड्राइंग रूम डब्बों और रिबन से भरा पड़ा था।
सुमित्रा देवी यह सब देखकर झल्ला रही थीं। “घर को गोदाम बना दिया है। पैर रखने की जगह नहीं है। राघव, तू कुछ बोलता क्यों नहीं?”
राघव चुप था। उसे अपनी नौकरी के जाने का डर अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। उसे लग रहा था कि अवनी का यह छोटा-मोटा काम सिर्फ़ एक टाइम-पास है जो घर की मुसीबतें नहीं सुलझा सकता।
दीवाली की शाम आई। घर में दीये जल रहे थे, लेकिन राघव और सुमित्रा देवी के चेहरों पर उदासी थी। इस बार बोनस नहीं मिला था, नए कपड़े नहीं आए थे।
अवनी अपने कमरे से बाहर आई। उसने एक लिफाफा राघव के हाथ में रखा और एक छोटी सी डिब्बी सुमित्रा देवी के हाथ में।
“ये क्या है?” राघव ने पूछा।
“खोलो,” अवनी मुस्कुराई।
राघव ने लिफाफा खोला। उसमें पचास हज़ार रुपये नकद थे।
राघव की आँखें फटी की फटी रह गईं। “पचास हज़ार? अवनी, यह कहाँ से आए?”
सुमित्रा देवी ने भी अपनी डिब्बी खोली। उसमें सोने की बालियां (earrings) थीं। वे हक्की-बक्की रह गईं।
“यह उस ओवन की कमाई है माँजी, जिसे आपने फ़िज़ूलखर्ची कहा था,” अवनी ने शांति से कहा। “पिछले महीने मैंने दिवाली के लिए कॉर्पोरेट ऑर्डर्स लिए थे। दिन-रात एक करके मैंने 200 किलो कुकीज़ और 50 केक बनाए हैं। सारा खर्च निकालकर, यह मेरा शुद्ध मुनाफ़ा (net profit) है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा देवी उन सोने की बालियों को देख रही थीं। वे जानती थीं कि पिछले पांच साल से उन्होंने सोने का एक दाना नहीं खरीदा था क्योंकि ‘चादर छोटी थी’।
“अवनी…” राघव का गला भर आया। “इतना सब? तुमने अकेले कैसे किया?”
“अकेले नहीं राघव,” अवनी ने कहा। “तुम्हारी सपोर्ट थी, इसलिए कर पाई। और माँजी…”
अवनी सुमित्रा देवी के पास गई और उनके घुटनों के पास बैठ गई।
“माँजी, आप हमेशा कहती थीं न कि ‘जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारने चाहिए’?”
सुमित्रा देवी ने नज़रें झुका लीं।
“माँजी, यह कहावत शायद पुराने ज़माने के लिए सही थी,” अवनी ने बहुत प्यार से, बिना किसी अहंकार के समझाया। “लेकिन आज के ज़माने में, अगर चादर छोटी पड़ रही हो, तो पैर सिकोड़कर ठंड में ठिठुरने से बेहतर है कि हम मेहनत करके एक दूसरी चादर जोड़ लें और उसे बड़ा कर लें।”
सुमित्रा देवी की आँखों से आंसू बह निकले। उन्हें अपनी संकीर्ण सोच पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। वे जिसे ‘बर्बादी’ समझ रही थीं, वो असल में इस घर की ‘सुरक्षा’ थी। जिस बहू को वे ताने मार रही थीं, उसने चुपचाप उस वक़्त घर को थाम लिया जब उनका बेटा डगमगा रहा था।
“मुझे माफ़ कर दे बहू,” सुमित्रा देवी ने अवनी को गले लगा लिया। “मैं पुरानी सोच की औरत हूँ। मैं डरती थी। मुझे लगता था कि जोखिम लेना हमें सड़क पर ले आएगा। पर मुझे नहीं पता था कि जोखिम न लेना ही सबसे बड़ा जोखिम है।”
राघव ने भी अवनी को देखा। उसकी आँखों में एक नया सम्मान था। “तुमने सिर्फ़ चादर बड़ी नहीं की अवनी, तुमने इस घर की छत को ऊँचा कर दिया।”
“अभी रुकिए,” अवनी ने हंसते हुए कहा। “अभी तो शुरुआत है। मेरे पास एक और ख़बर है।”
“क्या?” राघव और सुमित्रा देवी ने एक साथ पूछा।
“अगले महीने एक शादी का बड़ा ऑर्डर मिला है। उसके लिए मुझे एक सहायक (helper) की ज़रूरत पड़ेगी। राघव, अगर तुम्हें ऐतराज़ न हो, तो क्या तुम वीकेंड पर मेरी मदद कर सकते हो? डिलीवरी और पैकिंग में? मैं तुम्हें तुम्हारी सैलरी दे दूँगी,” अवनी ने मज़ाक में कहा।
राघव हँस पड़ा। उसका तनाव, उसका डर, सब पल भर में गायब हो गया। “बिल्कुल मैडम! आपकी कंपनी में नौकरी मिल जाए, इससे बड़ी बात क्या होगी?”
सुमित्रा देवी ने अपने आंसू पोंछे और खड़ी हो गईं।
“और मैं क्या करूँगी? मुफ़्त की रोटियाँ तो मैं भी नहीं तोडूंगी।”
अवनी मुस्कुराई। “माँजी, आपके हाथ का बना वो जो स्पेशल ‘आम का अचार’ है न? मेरे क्लाइंट्स को उसका टेस्ट बहुत पसंद आया था जब मैंने पिछली बार चखाया था। अगर आप वो अचार बना दें, तो हम उसे भी बेचना शुरू कर सकते हैं।”
सुमित्रा देवी का चेहरा खिल उठा। उन्हें सालों बाद लगा कि उनकी भी कोई ‘कीमत’ है, उनका हुनर भी ‘बिक’ सकता है।
“अरे, तो खड़ी क्या है? जा, आम मंगवा। मैं अभी मसाला तैयार करती हूँ,” सुमित्रा देवी में नई ऊर्जा आ गई थी।
उस रात, उस छोटे से किराए के मकान में, चादर अब भी वही थी, लेकिन अब उसमें पैर सिकोड़ने की ज़रूरत नहीं थी। क्योंकि उस घर के लोगों ने समझ लिया था कि चादर बाज़ार से खरीदकर नहीं लाई जाती, बल्कि अपनी मेहनत, सूझबूझ और हौसले के धागों से बुनी जाती है।
अवनी ने ओवन की तरफ़ देखा और मन ही मन शुक्रिया अदा किया। वह मशीन सिर्फ़ केक नहीं पका रही थी, वह उस घर के सपनों को पका रही थी। और सबसे ज़रूरी बात, उसने सास की उस पुरानी कहावत को हमेशा के लिए बदल दिया था। अब उस घर का नया उसूल था – “पैर पसारने से डरो मत, बस चादर सिलने का हुनर सीख लो।”
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क्या अवनी ने सही किया?
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“बहू का हौसला ही असली पूंजी है”
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तो आप सपोर्ट करते या रोकते?
लेखिका : सावित्री मल्होत्रा