सुबह बाबुजी का फोन आया ,मां के जाने के बाद बाबुजी के बस एक आध ही तो फोन आये थे ।. आज उन्होंने बिना किसी लाग लपेट के बड़ी गंभीर आवाज में कहा था ’’जाकर घर संभाल आना, जो सामान ठिकाने लगाना है लगा देना, घर चाहो तो रखो अन्यथा अपने भाई माधव से पूछ लेना। तुम आपस में मिलकर जो करना चाहो’’।
मैंने घीरे से पूछा “और आप’?
उन्होंने कुछ रूककर कहा “मैं अब आश्रम में ही रहूंगा । मैंने अपनी व्यवस्था कर ली है’’।
हिम्म्त बटोर कर स्वरा ने कहा था ’’बाबु जी आप हम सब के रहते एैसा कैसे कर सकते हैं’’
उन्होंने ठन्डे लहजे से कहा था “कैसे नहीं कर सकता मैं अपनी सारी जिम्मेंदारियाँ पूरी कर चुका हुं अब में अपनी मर्जी से जीवन जीना चाहता हुं। इसी लिये तुम्हे आज फोन किया है अब तुम तीनों देख लो अपना अपना’’ । मन किया कह दूं साफ क्यों नहीं कहते “मैने तो अपना देख लिया तुम्हारा तुम जानों’’। स्वरा पूछना चाहती थी “कौनसी जिम्मेंदारी बाबुजी’’ ?
“क्या क्या गिनाऊं, उन्होनें कौनसी जिम्मेदारी निभाई है। मां को बिमारी के बाद न संभालने की, मुझें पढाई छुडाकर ससुराल भेजने की, भाई को गैर जिम्मेदार बनाकर घर से निकाल देने की, क्या क्या गिनाऊँ, बाबुजी वो सारी जिम्मेंदारियाँ जो आप निभा कर आश्रम में जाने की बात कर रहे हैं। आज आप के स्थान पर मां रह गई होती तो क्या वह भी हम दौनों के साथ एैसा ही व्यवहार करती”?
हां याद आया ‘मां कैसे कर सकती थी एैसा व्यवहार आप तो सदा उन्हें याद जो दिलाते रहे हो…. “तुम्हारे बच्चे, तुम्हरा बेटा , तुम्हारी गृहस्थी…” क्या बाबुजी आपका कुछ नहीं था, इस घर में?
पूरी जिन्दगी कुछ करना न पडे़ इसलिए अखबार की आड़ में छुपकर चुप रहे। ‘सोचती हुं मां के प्यार की शीतल छांव और बाबुजी का रूखा व्यवहार’ अब समझ आया “गलती उस नीम की नहीं कि वह कडुवा हैं खुद गर्जं है, गलत तो वह जुबान हैं जिसे मीठा ही पसंद हैं”।
मां के जाने के बाद स्वरा के मन से जैसे पिहर का नाम ही मिट कर रह गया था। पिहर को जब भी याद करती उसे दुलार करने वाली मां, डरा डरा सा भाई और साथ खेलकर बड़ी हुई बहन ही याद आती। बहन अब अपने परिवार में इतनी रच बस गई है कि उसे मेरी भी याद कभी कभी ही आती है। पर स्वरा जानती थी कि “रिश्ते अगर दिल से हें तो तोडने से भी नहीं टूटते और अगर दीमाग से हो तो जोड़ने से भी नहीं जुड़ते”।
दीदी के लिये कैसे कुछ कहुं ससुराल की जिम्मेदारीयों में उसे कभी पिहर आने का भी अवसर नहीं मिला। मां ने ही सदा के लिए विदा से पूर्व दो दिन पहले जिद्द करके अपने पास बुलाया था। ये तो अच्छा हुआ कि उसके घरवालों ने उसे भेज दिया। वर्ना माँ तेा दीदी से मिलने की चाह मन ही में लेकर चली जाती| उसे भी मां की बिमारी का समाचार मिला था । एक दिन भागती दौडती मिलने भी आई थी।
मां को जाते समय और तो कोई दुःख नहीं था। भाई को तो आज के दस वर्ष पहले ही बाबुजी मारपीट कर घर से निकाल चुके थे। पता नहीं वह इतना स्वार्थी और असंवेदन शील कैसे था। जब उसे घर से निकाला था| उसकी पढाई पूरी नहीं हुई ही थी। फिर भी किसी काम की तलाश कर रहा था। किसी छोटी सी नौकरी को कर लेन की जिद्द को लेकर भाई और पिताजी में जो झगडा हुआ की बाबुजी ने उसे घर से निकाल कर ही दम लिया। भाई को मां का स्नेह भी नहीं रोक पाया था। वह तो माँ थी, दबे छुपे भाई की खोज खबर लेती रहती थी। पर जितनी ललक मां को उससे मिलने की थी| उसके मन में ऐसा कुछ था ही नहीं। हम बहनों में से भी उसे मुझ से थोडा बहुत लगाव था। शायद वह बाबुजी जैसा स्वभाव लेकर पैदा हुआ था।
उसके लिये कोई अपना नहीं था। समय आने पर मां बाबा को बताये बिना उसने घर भी बसा लिया था। वर्ष में एक आध बार उसके घर भी गई| भाभी का क्या दोष, वह तो पराये घर से आई है भाई के शुष्क व्यवहार के कारण परिवार से संबध आगे कैसे बढें। ‘जहॉ दूसरों को समझाना मुश्किल हो जाये वहाँ खुद को ही समझ लेना बेहतर होता है’।इसी सोच के कारण संम्पर्क बनाये रखा।
स्वरा ने बाबा के फोन की सूचना भाई , बहन को भी दी और स्वरा आज पति समीर को साथ लेकर वह अपने पीहर आई है। बडी बहन भी आने वाली है| इसलिये कुछ दिन साथ रहने के विचार से घर को साफ किया। स्वरा मां जैसी चमक तो उस घर में नहीं ला पाई थी। पर प्रयास पूरा किया। गत चार साल से माँ भी घर को पहले जैसा कहॉ संभाल पाई थी।
स्वरा ने माधव भैया को भी आने के लिये संदेश भेजा था पर वह दिल्ली था और उसने कहा था| “तुम दोंनों जो निर्णय लोगी मुझे मंजूर है मुझे उस घर से लगाव हो भी कैसे सकता है”? पर इतना भला किया की भाभी और बच्चों को हमारे साथ रहने भेज दिया।
दो दिन अच्छे बीते। भाभी हमसे प्यार से मिलकर रही| मां की कितनी अन्जानी बातें उन्होंने हम से सुनीं। मां के बारे में वह तो कुछ नहीं जानती थी। दो दिन बाद निर्णय लिया। इतनी जल्दि मां की यादों को मिटा देना उचित नहीं है| भाभी का मत था कि “हम तीनों जब एक मत है तो सोच विचार कर निर्णय करेंगे’।
सारा सामान एक कमरे में रख देते हैं। सामान रखते समय आँखे झर झर बह रहीं थीं। हमारे बचपन की मीठी यादें और बाबुजी की हर प्रवंचनाओं को सहती मां , संसार इसी रिश्ते पर तो टिका है। जो आज उनकी घरोहर थी। मां की वो प्यारी सिलाई मशीन, मां के वो ऊन के गोले, जिसे उसने कब से संभाल कर रखा था। हमारे बचपन के कुछ कपड़े जिन्हें मां ने सहेज कर रख रखा था।
वो पुरानी सी भगवान् राम की तस्वीर, जिसे मां सदा अपने साथ रखती थी। बाबुजी की डांट फटकार के बाद, न जाने रामजी को देखकर उनसे मन ही मन क्या कहती थी । मां की सुबह की चाय की वह छोटी तपेली, वेा चांदी को पंखा न जाने क्या क्या? यह वो वस्तुएँ थी जिससे हम उतने ही जुड़े थे जितने हम मां से जुडे थे। हमारे दुःख सुख की साथी रहीं थी यह चीजे।
अचानक मां की अलमारी में मुझे नीचे की और एक लाल थैली नजर आई भाभी से कहा निकालो क्या हैं। भाभी ने लापरवाही से कहा कुछ पत्र हैं, शायद आप लोगों ने लिखे होंगे ।
पर मुझे याद था मैने यह थैली मां के पास कभी नहीं देखी। क्या था उसमें …..देखने का समय नहीं था इसलिये मैंने वह थैली भाभी को मेरे सामान में रखने के लिये कहा और सबने मिलकर सारा सामान एक कमरे में किया और मां की यादों में रातें कभी बिसुरते कभी हॅसते हँसाते बीती।
मकान को किराये पर देने के सारे प्रयास करके अपने अपने घर आ गये। मैं भी समीर के साथ अपने घर आ गई थी। सप्ताह भर बाद मैं अपना सामान खेाल कर जमा रही थी। मेरी नज़र उस थैली पर पड़ी जो तो माँ की अलमारी में रखी थी। समय लिकाल कर खोला, करीब पचास साल पुराने पत्र थे।
माँ के नाम से लिखे गये थे। ’’प्रिय सुनन्दा’’ माँ तो जीते जी प्रिय शब्द सुनने को ही तरस गई होगी, पर खैर सारे पत्र पढे़। सघी हुई भाषा सुन्दर भाव, प्रेम से सरोबार, आत्मियता भरे पत्र कहीं कहीं विवाह न कर सकने की मजबूरी का भी जिक्र था। कहीं पर ये भी लिखा था “तुम अपने जीवन साथी के साथ खुश रहना। मुझे भूल जाना” …किससे पूछे मां को यह पत्र लिखने वाला कौन था । दूसरे दिन समय निकाल कर एक एक पत्र को ध्यान से देखने पर स्वरा को पता मिल गया। मां के पीहर के पास की कोई जगह का पता था। कोई सुदर्शन नामक व्यक्ति के पत्र थे जो मां के नाम थे। समस्या थी पति को क्या कहे, यदि पति को सच बताया तो वह भी ’’समय गई बात गई’’ कहकर भूल जाने की सलाह देंगे, पर मैं यदि उनसे नहीं मिली तो मुझे चैन नहीं आयेगा।
‘कभी कभी समय हमारा सबसे बडा मददगार होता है’ मामा की बिमारी का समाचार भैया के पास आया था। वह मिलकर भी आया था। मुझे भी समय निकाल कर जाने का आग्रह कर रहा था।
कानपुर शहर के स्टेशन पर उतरी तो माँ बड़ी याद आई। ना जाने कितनी बार मां की अंगूली थामें हम यहाँ आये थे।ननिहाल में मामा काफी बूढ़े और बीमार नजर आ रहे थे। दोपहर के समय अपने साथ पता लेकर सुदर्शन नाम के व्यक्ति से मिलने निकली। सोच रही थी यह व्यक्ति जो भी हों मेरे पिता की उम्र के व्यक्ति होंगे। उस घर में सामने ही लान में एक सज्जन बैठे थे । मैंने सामने बैठे व्यक्ति से विनम्रता से पूछा “क्या मैं सुदर्शन जी से मिल सकती हुं”। बडी सहजता से कहा “हॉ आप मिल सकती हैं बैठिये “.मैने कहा “आप उनको बुलवा दें”। मंद मंद मुस्काते हुये उन्होंने कहा “अभी बुलाता हुं”। “आप पानी पीलें, आराम से बैठो बेटी”। मैं असहज महसूस कर रही थी घर में कुछ बच्चे खेल रहे थे। सोचा नाती पोते होंगे इनके। वो शहर में गर्मी की, भीड़ की बातें करते रहे। मैंने फिर कहा आप सुदर्शन जी को बुलवा दें । हल्कि सी स्मित के साथ उन्होंने कहा “मैं ही सुदर्शन हुं कहो बेटा क्या काम है”। मैं तो एक दम सकपता गईं। मानसिक रूप से तैयार भी नहीं थी, इस तरह के परिचय के लिये । मैं उन्हें उपर से नीचे तक एैसे देख रही थी जैसे अपनी बेटी के लिये लडका पसंद करने आई हुं। हाथ कांपने लगे, जबान लड़खड़ाने लगी| उन्होंने मेरी मनस्थिती भांप ली और कहा ‘बेटा आराम से….’। चलो चाय पीते हैं मैं तब भी कुछ नहीं कह पाई । उन्होने दो कप चाय लाने का किसी को आदेश दिया। एक माँ की उम्र की महिला हमें दो कप चाय पकड़ा कर चली गई। अपनी उलझन में मैं उन्हें भी ठीक से नहीं देख पाई। वह मेरे चैहरे को एैसे पढ़ रहे थे जैसे मुझ में कुछ ढूंढ रहे हों । कहाँ से आई हो मैने अपने शहर का नाम बताया। उन्होंने घीरे से कहा कोई चंदा चाहिये? मैंने ना में सिर हिलाया।
मैं वकील हुं मुझ से कोई काम है? मैंने कहा नहीं। तो बेटा फिर तुम ही कहो तुम्हारे आने का कारण।…
मैने हिम्म्त बटोर कर कहा “आप किसी सुन्न्दा को जानते हैं”? ऑखें में अदभुत चमक के साथ उन्होंने कहा “हाँ जानता हुं”। मैंने भी उसी अंदाज से कहा “मैं उनकी बेटी हुं”। एक लम्बी चुप…… चुप्पी को मैंने ही तोडा ’’आप कैसे है? अपना सारा स्नेह लूटाते हुये उन्होंने कहा “मैं ठीक हुं बेटा, कहाँ है सुनन्दा”? क्या तुम्हारे साथ आई है? तब मैने उन्हें वो दुःखद समाचार दिया, जिसे सुनकर वह चुप हो गये। कुछ समय बाद उन्होने कहा “अच्छा है उस इंसान की यातनाओं से छूट गई”। अर्थात वह बाबुजी के स्वभाव से परिचित थे?
अंत में आत्म विश्वास बटोर कर मैने बात करना आरम्भ किया। आपने माँ का साथ आगे तक क्यों नहीं दिया? उन्होंने कुछ सोच कर कहा ’’क्यों कि विधाता ने हमारा साथ इतना ही लिखा था’’।
आपको पता था ना बाबुजी मां को कितना परेशान करते थे ’’हां मैं उस आदमी के साथ दस वर्ष काम कर चुका हुं’’
। …फिर भी आप ने मां…… आगे के शब्द मेरे कंठ में अटक गये….
उन्होने कहा क्यों की ’’ मैं बहुत कुछ चाहते हुये भी कुछ नहीं कर सकता था| मेरा हर कदम सुन्नदा की मुसीबतें बढ़ा सकता था। मेरे पास देखते रहने के अलावा कोई उपाय नहीं था ’’।
कुछ रूककर मैने पूछा था ’’क्या बाबुजी जानते थे कि आप मां को पहले से जानते हो? ’’नहीं उन्हें इस विषय में कुछ नहीं पता था’’। एक दो बार आर्थिक मदद भी मैने उसे तुम्हारे मामा की द्धारा ही पहुँचाई थी। तुम्हारे मामा सब जानते थे’’ ।
आगे वह बहुत कुछ जानना चाहते थे पर मैने उठने का उपक्रम किया, तो उन्होने मुझे बैठने का इशारा किया। अभी आया कह कर अंदर चले गये| पैन्ट शर्ट पहनकर आये। तब उनके हाथ में गााडी की चाबी थी। अपने पास वाली सीट पर बैठाते हुये उन्होने गाडी र्स्टाट कर दी और मुझे कानपुर की गलियों में न जाने कहाँ ले जाने लगे। एक पुराने से बगीचे के पास ले जाकर उन्होने बताया ’’इस बगीचें में वह मंदिर नजर आ रहा है ना हम यहीं मिलते थें। उन्हानें बहुत सी मीठी सरल बातें बताई जो उनसे व मां से उनके पवित्र प्रेम से जुडी थीं। और अति भावुक होकर उन्हाने कहा था ’’एक बात और कहनी है बेटी आज मिल गई हो मेरा जीवन सफल हुंआ’’।
बस अपनी बड़ी बहन और भाई से मिलवा देना। जानता हुं तुम्हारा भाई संभवतः इसे सहज स्वीकार नहीं करे, इसलिये ये निर्णय तुम्हें करना है मैं उससे किस रिश्ते से मिलूं.. कब मिलूं। तुम्हारे मामा के घर मेरा आना जाना है । बस बेटा मेरी यही सोच रही है ’’हँस कर जीना दस्तूर हैं जिन्दगी का एक यही किस्सा मशहूर हैं जिन्दगी का बीते हुये पल कभी लौट कर नहीं आते, यही सबसे बडा कसूर है”।
उनसे मिलकर लगने लगा। जीवन एैसा हो जो जीना सिखा दे, जीवन एैसा हो जो संबंधों इंसानों की कदर करे और सम्बंध एैसे हो जो याद करने को मजबूर करें। बाबा के बारे में सोचती तो लगता ‘जो आदमी औरतों की छोटी छोटी गलतियों को माफ नहीं कर सकते वो उनकी खूबीयों का आनन्द भी नहीं ले सकते‘।
उनकी किसी भी बात का जवाब देने की स्थिती में तो नहीं थी मैं। पर जब लौटने लगी तो लाख छुपाने पर भी ऑखेँ दो बूंदे ढ़लका कर भेद खोल गयी। उन्होने घीरे से मेरे सिर पर हाथ रखा । रिक्क्षे में बेठते समय मेरे हाथ में कुछ देते हुये कहा था। मुझे याद करती रहना बेटी और मेरी मुठठी में कुछ दबा दिया। रीक्षा चलने को था। प्रणाम भी ठीक से नहीं कर पाई ।
रास्ते में देखा उन्होंने सुन्दर अक्षरों में अपना पता, फोन नम्बर लिखकर दिये थे। साथ में ठेर सा आर्शिवाद भी था। आज मैं अपना एक सम्पूर्ण पीहर मेरी मुठठी में लेकर लौटी थी। सच्चे लोग कभी प्रशंसा के मोहताज नहीं होते, क्यों की फूलो को कभी इत्र लगाने की जरूरत नहीं पडतीं।
प्रेषक प्रभा पारीक भरूच, गुजरात