जज पिता का फैसला! – हेमलता गुप्ता

जब बूढ़े मां बाप की बेटी को बहू ने अपनी बर्थडे पार्टी में किया सबके सामने.. बेइज्जत.. तो माता पिता ने उठाया ऐसा कदम जिससे बेटे बहू की रूह कांप जाएगी 

शहर के सबसे पॉश इलाके में स्थित ‘रॉयल ओक बैंक्वेट हॉल’ आज रोशनी से नहाया हुआ था। बाहर महंगी कारों की कतार लगी थी और अंदर शहर के नामचीन लोगों का जमावड़ा था। मौका था मिसेज मल्लिका शेरगिल के जन्मदिन का। मल्लिका, जो शहर के एक बड़े बिजनेसमैन विवान शेरगिल की पत्नी थी, अपनी खूबसूरती और उससे कहीं ज्यादा अपने घमंड के लिए जानी जाती थी।

हॉल के बीचों-बीच खड़ी मल्लिका एक डायमंड नेकलेस पहने, शैम्पेन का गिलास हाथ में लिए अपनी सहेलियों के साथ ठहाके लगा रही थी। विवान भी अपने बिजनेस पार्टनर्स के साथ व्यस्त था।

हॉल के एक कोने में, एक गोल मेज के पास विवान के माता-पिता, रिटायर्ड जज भानुप्रताप जी और उनकी पत्नी सुमित्रा देवी बैठे थे। उनके चेहरे पर वह चमक नहीं थी जो बेटे की पार्टी में होनी चाहिए। वे थोड़े असहज लग रहे थे, जैसे किसी ने जबरदस्ती उन्हें वहां बैठा दिया हो।

“सुमित्रा, शिखा कब तक आएगी?” भानुप्रताप जी ने घड़ी देखते हुए पूछा।

“बस आती ही होगी। उसकी बस लेट हो गई थी। ऑटो करके आ रही है,” सुमित्रा जी ने धीरे से कहा।

शिखा, उनकी बेटी और विवान की बड़ी बहन। शिखा का जीवन विवान से बिल्कुल उलट था। उसने एक सरकारी स्कूल के अध्यापक से शादी की थी और एक छोटे शहर में सादगी से रहती थी। मल्लिका अक्सर शिखा के ‘मिडिल क्लास’ रहन-सहन का मजाक उड़ाती थी, इसलिए शिखा कम ही आती थी। लेकिन आज भाई की पत्नी का जन्मदिन था और माँ ने कसम दी थी, इसलिए वह आ रही थी।

तभी हॉल के मुख्य द्वार पर हलचल हुई। शिखा अंदर दाखिल हुई। उसने एक साधारण सी, लेकिन सलीके से पहनी हुई सूती साड़ी पहन रखी थी। उसके हाथ में एक गिफ्ट रैप किया हुआ पैकेट था।

मल्लिका की नज़र जैसे ही शिखा पर पड़ी, उसकी भौंहें तन गईं। वह अपनी सहेलियों, तानिया और सोनिया को इशारा करते हुए बोली, “लो, आ गई मेरी ननद रानी। देखना, अब फिर कोई इमोशनल ड्रामा होगा।”

शिखा ने माता-पिता के पैर छुए और फिर मुस्कुराते हुए मल्लिका की तरफ बढ़ी।

“जन्मदिन मुबारक हो मल्लिका,” शिखा ने गर्मजोशी से कहा और पैकेट आगे बढ़ाया।

मल्लिका ने गिफ्ट को हाथ में ऐसे पकड़ा जैसे कोई गंदी चीज़ हो। “थैंक्स शिखा दी। वैसे इसकी क्या ज़रूरत थी? आपको पता है न मैं ब्रांडेड चीज़ों के अलावा कुछ यूज़ नहीं करती।”

शिखा की मुस्कान फीकी पड़ गई। “ये… ये मैंने खुद बनाई है। मधुबनी पेंटिंग है। मुझे लगा तुम्हें आर्ट का शौक है, तो नई दीवारों पर अच्छी लगेगी।”

मल्लिका ने ज़ोर से हँसते हुए वह पैकेट पास खड़ी वेटर की ट्रे में रख दिया। “पेंटिंग? दीदी, मेरा घर इंटीरियर डेकोरेटर ने डिज़ाइन किया है। वहां ये ‘देहाती कला’ शोभा नहीं देगी। आप इसे अपने स्कूल में ही लगा लेतीं।”

आस-पास खड़े लोग हँसने लगे। शिखा का चेहरा शर्म से लाल हो गया। विवान पास ही खड़ा था, उसने सब सुना, लेकिन पत्नी के डर से या अपनी ‘इमेज’ के कारण चुप रहा।

भानुप्रताप जी ने अपनी मुट्ठी भींच ली, लेकिन सुमित्रा जी ने उनका हाथ दबा दिया, इशारा किया कि तमाशा न करें।

लेकिन मल्लिका का मन अभी भरा नहीं था। केक कटिंग का समय आया। मल्लिका ने माइक हाथ में लिया।

“थैंक यू एवरीवन! आज मेरे लिए बहुत खास दिन है। मेरे डैड ने मुझे यह डायमंड सेट भेजा है,” उसने गले का हार दिखाते हुए कहा। तालियाँ बजीं।

फिर मल्लिका ने शिखा की ओर देखा, जो कोने में खड़ी थी।

“और आज हमें यह भी सीखना चाहिए कि क्लास और स्टैण्डर्ड क्या होता है। मेरी ननद, शिखा दीदी, इतनी दूर से आईं, बस और ऑटो के धक्के खाते हुए। देखिये, सादगी अच्छी बात है, पर इतनी भी सादगी नहीं होनी चाहिए कि इंसान फटेहाल लगे। दीदी, अगर आपके पास पार्टी वियर साड़ी नहीं थी, तो मुझसे मांग लेतीं। मेरे पास मेरी मेड के लिए भी इससे बेहतर साड़ियाँ रखी हैं।”

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। यह मज़ाक नहीं था, यह चरित्र हनन था। शिखा की आँखों में आँसू आ गए। वह वहाँ एक पल भी रुक नहीं सकी और मुंह ढक्कर हॉल से बाहर भाग गई।

सुमित्रा जी का दिल बैठ गया। उन्होंने विवान की तरफ देखा, उम्मीद थी कि वह अपनी पत्नी को डांटेगा। लेकिन विवान ने बस इतना कहा, “मल्लिका, थोड़ा ज़्यादा हो गया,” और फिर मेहमानों को संभालने में लग गया।

भानुप्रताप जी अपनी जगह से उठे। उनका चेहरा पत्थर की तरह सख्त था।

“चलो सुमित्रा,” उन्होंने कहा।

“लेकिन जी, खाना…” सुमित्रा जी ने कहा।

“जिस घर में बेटी की इज़्ज़त नीलाम की जाए, वहां का पानी भी हराम है,” भानुप्रताप जी की आवाज़ में एक ऐसी कड़क थी जो सुमित्रा ने सालों बाद सुनी थी।

वे दोनों बिना किसी से कुछ कहे पार्टी से निकल गए। विवान ने उन्हें जाते देखा, पर रोकने की कोशिश नहीं की। उसने सोचा, ‘बुड्ढे-बुढ़िया हैं, नाराज़ होकर घर ही तो जाएंगे। सुबह मना लूँगा।’

शिखा उस रात अपने मायके नहीं रुकी, वह सीधे बस स्टैंड गई और अपने घर लौट गई। भानुप्रताप और सुमित्रा घर (विवान के बंगले) पहुंचे। वह बंगला, जिसे भानुप्रताप जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई से बनवाया था, लेकिन अब वहां विवान और मल्लिका की नेमप्लेट लगी थी।

उस रात उस बंगले में कोई शोर नहीं हुआ। भानुप्रताप जी अपने स्टडी रूम में देर रात तक किसी वकील से फोन पर बात करते रहे और कुछ कागज़ात तैयार करते रहे। सुमित्रा जी चुपचाप अपना और पति का सामान पैक करती रहीं।

अगली सुबह विवान और मल्लिका देर से सोकर उठे। पार्टी की थकान थी। जब वे नीचे नाश्ते की मेज पर आए, तो देखा कि घर में अजीब सा सन्नाटा है। रसोई में नौकरानी काम कर रही थी, लेकिन माता-पिता कहीं नहीं दिखे।

“मम्मी-पापा कहाँ हैं?” विवान ने नौकरानी से पूछा।

“साहब, वो तो सुबह 6 बजे ही टैक्सी बुलाकर चले गए। ये लिफाफा दे गए हैं आपके लिए,” नौकरानी ने मेज पर रखा एक बड़ा खाकी लिफाफा विवान को दिया।

मल्लिका ने कॉफी की चुस्की लेते हुए कहा, “चलो अच्छा है, शिखा दीदी के घर गए होंगे मनाने। ड्रामा है सब। दो दिन में आ जाएंगे।”

विवान ने लिफाफा खोला। अंदर कुछ कानूनी कागज़ात थे और एक हाथ से लिखी चिट्ठी। जैसे-जैसे विवान चिट्ठी पढ़ता गया, उसके चेहरे का रंग उड़ता गया। उसके हाथ कांपने लगे और माथे पर पसीना आ गया।

“क्या हुआ विवान? क्या लिखा है?” मल्लिका ने पूछा।

विवान ने धम्म से कुर्सी पर बैठते हुए कहा, “मल्लिका… पापा ने… पापा ने घर बेच दिया।”

“क्या बकवास कर रहे हो? यह घर हमारा है,” मल्लिका चिल्लाई।

“नहीं मल्लिका,” विवान का गला सूख गया था। “यह घर पापा के नाम पर था। मैंने सोचा था कि मैं इकलौता बेटा हूँ तो वसीयत मेरे नाम ही होगी। लेकिन पापा ने कल रात ही अपनी ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ का इस्तेमाल किया। उन्होंने यह बंगला शहर के एक बड़े बिल्डर को बेच दिया है। 15 करोड़ में।”

“15 करोड़?” मल्लिका की आँखें चमक उठीं। “तो क्या हुआ? पैसा तो हमारे पास ही आएगा न? हम नया पेंटहाउस ले लेंगे।”

विवान ने उसे एक घूरी दी और कागज़ आगे बढ़ा दिया। “आगे पढ़ो। पापा ने लिखा है कि इस बंगले की बिक्री से मिली पूरी रकम और उनकी बची हुई सारी जमा-पूंजी… उन्होंने एक ट्रस्ट को दान कर दी है। और उस ट्रस्ट का नाम है—’शिखा स्वाभिमान ट्रस्ट’।”

मल्लिका के हाथ से कॉफी का मग छूटकर ज़मीन पर गिर गया। “क्या? वो बुड्ढा ऐसा कैसे कर सकता है? हम कोर्ट जाएंगे! हम केस करेंगे!”

“कुछ नहीं हो सकता,” विवान ने हताशा में सिर पकड़ लिया। “पापा जज रहे हैं मल्लिका। उन्होंने कागज़ात इतने पक्के बनवाए हैं कि भगवान भी उसमें कमी नहीं निकाल सकता। उन्होंने लिखा है कि उन्हें अपनी बाकी ज़िन्दगी के लिए हमारी ज़रूरत नहीं है, और न ही हमें उनकी जायदाद की।”

तभी विवान का फोन बजा। स्क्रीन पर ‘पापा’ फ्लैश हो रहा था। विवान ने जल्दी से फोन उठाया और स्पीकर पर डाल दिया।

“पापा! यह क्या मज़ाक है? आप घर कैसे बेच सकते हैं? हम कहाँ जाएंगे?” विवान चिल्लाया।

उधर से भानुप्रताप जी की आवाज़ आई, एकदम शांत और गंभीर।

“विवान, मज़ाक तो कल रात तुम लोगों ने अपनी बहन की इज़्ज़त के साथ किया था। रही बात घर की, तो बेटा, घर दीवारों से नहीं, संस्कारों से बनता है। जिस घर की दीवारों के बीच मेरी बेटी का अपमान हुआ और मेरा बेटा चुप रहा, वो घर मुझे नहीं चाहिए।”

“लेकिन पापा, मल्लिका तो बस मज़ाक कर रही थी। आप इतना बड़ा फैसला कैसे ले सकते हैं? हम सड़क पर आ जाएंगे,” विवान गिड़गिड़ाया।

“सड़क पर तो तुम नहीं आओगे विवान,” भानुप्रताप जी ने कहा। “तुम्हारे पास तुम्हारी कंपनी है, मल्लिका के पास उसके ब्रांडेड कपड़े और डायमंड्स हैं। तुम लोग अपना ‘क्लास’ और ‘स्टैण्डर्ड’ मेंटेन कर लोगे। लेकिन हाँ, जिस ‘रॉयल विला’ पर तुम दोनों को घमंड था, वो अब नहीं रहा। बिल्डर के आदमी आज दोपहर तक आ जाएंगे। तुम्हें घर खाली करने के लिए एक हफ़्ते का समय मिला है।”

मल्लिका फोन के पास आई और चिल्लाई, “पापा जी, आप ऐसा नहीं कर सकते! मैं माफी मांग लूँगी। प्लीज़ डील कैंसिल कर दीजिये।”

भानुप्रताप जी हंसे, एक सूखी, व्यंग्यात्मक हंसी।

“माफी? मल्लिका बेटा, कुछ शब्द शीशे की तरह होते हैं, एक बार टूट जाएं तो जुड़ते नहीं। तुमने शिखा की गरीबी का मज़ाक उड़ाया था न? तुमने कहा था कि उसके पास ‘स्टैण्डर्ड’ नहीं है? आज मैंने वही ‘स्टैण्डर्ड’ बराबर कर दिया है। शिखा के पास अब 15 करोड़ का ट्रस्ट है, जिससे वो गरीब बच्चों के लिए स्कूल खोलेगी। और तुम लोगों के पास… अब सिर्फ तुम्हारा अहंकार बचा है।”

“और आप ? आप  कहाँ हैं पापा?” विवान ने रोते हुए पूछा।

“हम हरिद्वार में हैं बेटा,” भानुप्रताप जी ने कहा। “हमने वानप्रस्थ आश्रम में अपना कमरा बुक कर लिया है। अपनी पेंशन से हमारा खर्चा आराम से निकल जाएगा। हमें अब शांति चाहिए, जो तुम्हारे उस शोर-शराबे वाले महल में नहीं थी।”

“पापा, प्लीज़…”

“विवान,” भानुप्रताप जी ने बात काटते हुए कहा, “एक बात याद रखना। वसीयत में जायदाद लिखी जा सकती है, नसीब नहीं। तुम एक अच्छे बिजनेसमैन बन गए, पर एक अच्छे भाई और बेटे नहीं बन पाए। जिस दिन तुम्हें अपनी गलती का असली अहसास हो, उस दिन हरिद्वार आकर गंगा में डुबकी लगा लेना। शायद मन हल्का हो जाए। घर वापस नहीं मिलेगा।”

फोन कट गया।

विवान और मल्लिका उस आलीशान ड्राइंग रूम में खड़े थे, जो अब उनका नहीं था। मल्लिका, जो कल तक अपनी ‘क्लास’ पर इतरा रही थी, आज छत छिन जाने के डर से कांप रही थी। उसे अपनी वो बात याद आई—“शिखा दीदी, मेरे पास मेड के लिए भी इससे बेहतर साड़ियाँ हैं।”

आज विवान की निगाहों में मल्लिका के लिए प्यार नहीं, बल्कि एक आरोप था।

“तुम्हारी वजह से… तुम्हारी इस बदज़ुबानी की वजह से आज मैं अपने मां-बाप और अपनी छत, दोनों से हाथ धो बैठा,” विवान ने दीवार पर मुक्का मारा।

“मुझ पर मत चिल्लाओ!” मल्लिका रो पड़ी। “मुझे क्या पता था कि वो खामोश रहने वाले जज साहब ऐसा एटम बम फोड़ देंगे।”

लेकिन अब पछताने का कोई फायदा नहीं था।

एक हफ्ते बाद, जब वे अपना सामान पैक करके एक किराए के फ्लैट में शिफ्ट हो रहे थे, तो मल्लिका ने देखा कि शिखा अपनी पुरानी मारुति कार से वहां आई।

शिखा ने विवान को देखा। उसकी आँखों में कोई घमंड नहीं था, न ही कोई जीत का भाव।

“भैया,” शिखा ने कहा, “पापा ने मुझे ट्रस्ट का ट्रस्टी बनाया है। उन्होंने कहा है कि अगर कभी तुम्हें पैसों की सच में ज़रूरत हो—दिखावे के लिए नहीं, रोटी के लिए—तो मैं मदद कर सकती हूँ।”

मल्लिका नज़रें नहीं मिला पा रही थी। जिस ननद को उसने ‘फटेहाल’ कहा था, आज वही ननद उसे मदद की पेशकश कर रही थी।

विवान ने सिर झुका लिया। “नहीं शिखा। पापा ने सही किया। हमें इस ठोकर की ज़रूरत थी। हमने चीज़ों को प्यार किया और लोगों का इस्तेमाल किया। पापा ने हमें सिखा दिया कि जब जड़ें ही काट दोगे, तो पेड़ खड़ा नहीं रह सकता।”

शिखा वहां से चली गई।

विवान और मल्लिका उस खाली बंगले को देखते रह गए। उनकी रूह सच में कांप गई थी—पैसे के जाने से नहीं, बल्कि उस खालीपन से जो माता-पिता के आशीर्वाद के चले जाने से पैदा हुआ था। उन्हें समझ आ गया था कि ‘अपमान’ की आग में इंसान दूसरों को नहीं, बल्कि अपना ही आशियाना जला बैठता है।

हरिद्वार में, गंगा किनारे बैठे भानुप्रताप और सुमित्रा जी ने एक नई शुरुआत की थी। उन्होंने संपत्ति खोई थी, लेकिन अपना और अपनी बेटी का ‘स्वाभिमान’ बचा लिया था।

दोस्तों, अब आप बताइए👇
क्या भानुप्रताप जी का फैसला सही था?

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“हाँ सही था” या “नहीं बहुत कठोर था”

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❤️ “बेटी का सम्मान सबसे बड़ा धर्म है।”

मूल लेखिका : हेमलता गुप्ता 

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