जब पिता ने बेटों से मांग लिया.. मकान में रहने का किराया : मुकेश पटेल

“माँ, आज फिर परांठे में घी ज्यादा है। आपको पता है न मैं डाइट पर हूँ? और यह वाई-फाई (Wi-Fi) फिर से अटक रहा है। पापा से कहिए न कि प्लान अपग्रेड करवाएं। मेरा वर्क फ्राम होम डिस्टर्ब होता है,” बड़े बेटे, नमन ने चिढ़ते हुए कहा। वह एक एमएनसी में सीनियर मैनेजर था, उम्र 32 वर्ष, लेकिन घर में उसका व्यवहार किसी ज़िद्दी टीनेजर जैसा था।

दूसरी तरफ छोटा बेटा, अंशुल (27 वर्ष), जो अभी अपनी आंखें मलता हुआ कमरे से निकला था, सोफे पर धम्म से बैठ गया। “मम्मी, चाय! और हां, मेरी बाइक की सर्विसिंग करवानी है, पापा से कह देना मैकेनिक को बुला लें। मेरे पास टाइम नहीं है।”

रसोई में खट रही 58 वर्षीय सावित्री देवी ने आदत के मुताबिक “हां बेटा, अभी करती हूं” कहा।

लेकिन आज, टेबल के मुखिया की कुर्सी पर बैठे रिटायर्ड कर्नल, सूर्यकांत राठी, चुप नहीं रहे। वे पिछले पंद्रह मिनट से अपने दोनों ‘सक्षम’ और ‘कमाऊ’ बेटों की बातें सुन रहे थे। उन्होंने अखबार को बड़ी शांति से मोड़ा और मेज़ पर रख दिया।

“सावित्री, चाय बाद में लाना। पहले ये लिफाफे इन दोनों नवाबों को दे दो,” सूर्यकांत जी की आवाज़ में एक फौजी कड़कपन था।

सावित्री जी, जो शायद पहले से इस योजना का हिस्सा थीं, डरी-सहमी सी आईं और उन्होंने दो सफ़ेद लिफाफे नमन और अंशुल के सामने रख दिए।

“ये क्या है पापा? कोई शगुन?” अंशुल ने हंसते हुए लिफाफा उठाया।

जैसे ही उसने लिफाफे के अंदर का कागज़ पढ़ा, उसकी हंसी गायब हो गई। नमन ने भी अपना पत्र पढ़ा और उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

“यह… यह क्या मज़ाक है पापा?” नमन चिल्लाया। “किराये का नोटिस? अपने ही घर में?”

कागज़ पर साफ़ शब्दों में लिखा था:

‘प्रिया किरायेदार (नमन राठी), दिनांक 1 तारीख से, इस घर (राठी विला) के प्रथम तल पर दो कमरों, अटैच बाथरूम और बालकनी के इस्तेमाल के लिए आपको 25,000 रुपये प्रतिमाह किराया देना होगा। खाने का चार्ज 5,000 रुपये अलग से। बिजली बिल मीटर के हिसाब से। हस्ताक्षर: मकान मालिक, सूर्यकांत राठी।

अंशुल के नोटिस में 15,000 रुपये किराया लिखा था क्योंकि उसका कमरा छोटा था।

“पापा, आप होश में तो हैं?” नमन ने कागज़ मेज़ पर पटका। “हम आपके बेटे हैं, कोई पेइंग गेस्ट नहीं। यह घर हमारा भी है।”

सूर्यकांत जी ने अपनी चाय की चुस्की ली। “घर तुम्हारा तब होगा जब मैं नहीं रहूँगा। अभी यह घर मेरे नाम पर है, मैंने अपनी पेंशन और ग्रेच्युटी से बनाया है। जब तक तुम लोग बच्चे थे, पढ़ रहे थे, तब तक मेरी ज़िम्मेदारी थी। अब तुम दोनों कमाते हो। नमन, तुम्हारी सैलरी डेढ़ लाख है। और अंशुल, तुम भी फ्रीलांसिंग से ठीक-ठाक कमा लेते हो। लेकिन तुम दोनों का योगदान इस घर में क्या है?”

“योगदान?” अंशुल ने तर्क दिया। “हम साथ रह रहे हैं, यही बड़ी बात है। आजकल तो बच्चे माँ-बाप को छोड़कर चले जाते हैं।”

“अहसान मत करो,” सूर्यकांत जी ने सख्त लहज़े में कहा। “तुम लोग यहाँ इसलिए रह रहे हो क्योंकि यहाँ तुम्हें बना-बनाया खाना मिलता है, कपड़े धुलकर मिलते हैं, और कोई रेंट नहीं देना पड़ता। तुम लोग अपनी सारी कमाई अपने महंगे जूतों, गैजेट्स और पार्टियों में उड़ाते हो, और घर का राशन, बिजली, पानी, इंटरनेट सब मेरी पेंशन से चलता है। और बदले में हमें क्या मिलता है? शिकायतें? ‘घी ज्यादा है’, ‘नेट धीमा है’?”

सावित्री जी कुछ बोलने को हुईं, लेकिन सूर्यकांत जी ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक दिया।

“तो फैसला साफ़ है,” सूर्यकांत जी खड़े हो गए। “अगली 1 तारीख से, या तो किराया टेबल पर होगा, या फिर तुम लोग अपना इंतज़ाम कहीं और कर लो। मार्किट में 2BHK का रेट पता कर लेना, फिर बात करना।”

सूर्यकांत जी अपने कमरे में चले गए।

डाइनिंग टेबल पर भूचाल आ गया था।

“पापा सठिया गए हैं,” नमन ने बड़बड़ाते हुए कहा। “देखना माँ, दो दिन में अकल ठिकाने आ जाएगी। मैं एक पैसा नहीं दूँगा। देखता हूँ क्या करते हैं।”

लेकिन 1 तारीख आई और सूर्यकांत जी ने नरमी नहीं दिखाई।

सुबह जब नमन नहाने गया, तो पानी नहीं आ रहा था। उसने चिल्लाकर माँ को आवाज़ दी।

जवाब सूर्यकांत जी ने दिया, “गीज़र का कनेक्शन काट दिया है। किराया जमा नहीं हुआ, तो सुविधाएं बंद। यह होटल नहीं है।”

नमन को ऑफिस के लिए देर हो रही थी। वह गुस्से में बाहर आया और अपनी वॉलेट से 30,000 रुपये निकालकर टेबल पर फेंक दिए।

“ये लीजिए! अब खुश? अब मुझे एक भी डिस्टर्बेंस नहीं चाहिए। और हाँ, खाने में आज पनीर बनना चाहिए। पैसा दिया है मैंने।”

अंशुल के पास पैसे कम थे। उसे अपनी नई बाइक की किश्त भी भरनी थी। उसने गिड़गिड़ाने की कोशिश की, “पापा, इस महीने थोड़ा टाइट हूँ…”

“तो बाइक बेच दो, या डबल शिफ्ट में काम करो,” सूर्यकांत जी का जवाब कोरा था। “किराया माफ़ नहीं होगा।”

मजबूरन, अंशुल को अपने दोस्तों से उधार लेकर किराया देना पड़ा।

अगले तीन महीने घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। घर अब ‘घर’ कम और ‘हॉस्टल’ ज्यादा लग रहा था।

नमन अब बात-बात पर अपनी माँ पर हुक्म चलाता। “माँ, खाना 8 बजे रेडी होना चाहिए, मैं पे कर रहा हूँ।” वह पिता से बात नहीं करता था, बस आते-जाते उन्हें घूरता रहता। उसे लगता था कि पैसे देकर उसने अपने माँ-बाप को खरीद लिया है।

दूसरी तरफ, अंशुल में बदलाव आ रहा था। अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा ‘किराये’ में देने के कारण उसे पैसों की कीमत समझ आने लगी थी। अब वह फालतू खर्चे नहीं करता था। उसने रात में एक्स्ट्रा प्रोजेक्ट्स लेने शुरू कर दिए थे ताकि वह अपना खर्च उठा सके। उसने देखा कि पिता उससे पैसे तो लेते हैं, लेकिन बदले में अब उसे टोकते नहीं हैं। उसे एक अजीब सी आत्मनिर्भरता महसूस होने लगी थी।

छह महीने बीत गए। दिवाली का त्यौहार नज़दीक था।

नमन ने खाने की टेबल पर घोषणा की।

“मैं अगले महीने शिफ्ट हो रहा हूँ। मैंने पास की सोसाइटी में फ्लैट देख लिया है। जब पैसे ही देने हैं, तो मैं अपनी मर्जी से रहूँगा। वहां कोई मुझे यह नहीं कहेगा कि रात को देर से क्यों आए या एसी बंद करो।”

सावित्री जी की आँखों में आंसू आ गए। “बेटा, त्यौहार के वक़्त घर छोड़ेगा?”

“यह घर अब घर कहाँ रहा माँ? यह तो लॉज है,” नमन ने कड़वाहट से कहा। “पापा ने ही इसे बिज़नेस बना दिया है।”

अंशुल चुप था। उसने धीरे से कहा, “भैया, मैं नहीं जा रहा। मुझे… मुझे अब ठीक लग रहा है। पापा ने सख्ती की, पर उस चक्कर में मेरी सेविंग्स की आदत बन गई है। मैं यहीं रहूँगा।”

सूर्यकांत जी चुपचाप खाना खाते रहे। उन्होंने नमन के जाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

दिवाली की रात, घर में पूजा हुई। नमन अपना सामान पैक कर चुका था। वह आखिरी बार हॉल में आया।

“मैं जा रहा हूँ। यह रही इस महीने के 15 दिन की पेमेंट,” उसने चेक मेज़ पर रखा।

सूर्यकांत जी ने वह चेक उठाया और उसे फाड़ दिया।

नमन चौंक गया। “यह क्या?”

सूर्यकांत जी ने सोफे के नीचे से एक फाइल निकाली और नमन और अंशुल को पास बुलाया।

“बैठो।”

उन्होंने दो पासबुक (Bank Passbooks) नमन और अंशुल के सामने रखीं।

“ये क्या है?” नमन ने पासबुक खोली। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

उसमें पिछले छह महीनों में नमन द्वारा दी गई किराये की पूरी रकम जमा थी। एक भी पैसा निकाला नहीं गया था। और उसके साथ ब्याज भी जुड़ा हुआ था। वही हाल अंशुल की पासबुक का भी था।

“पापा… यह?” नमन की आवाज़ कांपने लगी।

सूर्यकांत जी की आँखों में जो फौजी सख्ती थी, वह पिघलकर एक पिता की नमी में बदल गई।

“नमन, अंशुल… तुम्हें क्या लगा? मैं अपनी ही औलाद से धंधा करूँगा? मैं अपने बुढ़ापे के लिए तुमसे टैक्स वसूल रहा था?”

सूर्यकांत जी ने नमन के कंधे पर हाथ रखा।

“बेटा, पिछले कुछ सालों से मैं देख रहा था कि तुम दोनों ‘ज़िम्मेदारी’ भूल गए थे। तुम लोग इस घर को, अपनी माँ की सेवा को और मेरी कमाई को ‘फ्री’ की चीज़ समझने लगे थे। जो चीज़ मुफ्त मिलती है, इंसान उसकी कद्र नहीं करता। मुझे डर था कि जिस दिन मैं नहीं रहूँगा, तुम लोग ज़िंदगी की ठोकरों से बिखर जाओगे।”

उन्होंने अंशुल की तरफ देखा।

“देख अंशुल, छह महीने पहले तू अपनी बाइक की किश्त के लिए मुझसे पैसे मांगता था। आज तूने अपने दम पर किराया दिया, एक्स्ट्रा काम किया। तुझे पता चला कि रोटी कमाने में कितना पसीना बहता है। यह आत्मविश्वास तुझे सिखाने के लिए ही मैंने यह नाटक किया था।”

फिर वे नमन की ओर मुड़े।

“और नमन, तू घर छोड़कर जा रहा है, मुझे दुख है, लेकिन खुशी भी है। क्योंकि अब तू अपने घर की ज़िम्मेदारी खुद उठाएगा। लेकिन याद रखना, जब तू अपने फ्लैट का बिजली बिल भरेगा, तब तुझे याद आएगा कि तेरे पिता ने चालीस साल तक यह कैसे किया बिना किसी शिकायत के।”

नमन का सिर शर्म से झुक गया। उसे अपने पिछले छह महीने के व्यवहार पर घिन आ रही थी। उसने सोचा था कि वह पिता को पैसे देकर ‘आज़ाद’ हो गया है, जबकि पिता उन पैसों को जोड़कर उसी के भविष्य की नींव मज़बूत कर रहे थे।

“यह पैसे तुम्हारे हैं,” सूर्यकांत जी ने कहा। “नमन, यह तेरी डाउन-पेमेंट के काम आएंगे। और अंशुल, यह तेरी सेविंग्स हैं। इन्हें ले लो।”

नमन फूट-फूट कर रोने लगा। वह घुटनों के बल पिता के चरणों में गिर पड़ा।

“मुझे माफ़ कर दीजिए पापा। मैं… मैं बहुत स्वार्थी हो गया था। मैं कहीं नहीं जा रहा। यह घर मेरा है, और आप मेरे पापा हैं, मकान मालिक नहीं।”

सावित्री जी ने दौड़कर दोनों बेटों को गले लगा लिया।

अंशुल ने आंसू पोंछते हुए कहा, “पापा, एक बात कहूँ? आपने किराया मांगकर हमें घर से निकाला नहीं, बल्कि हमें असलियत में घर का ‘हिस्सेदार’ बना दिया। पहले हम सिर्फ रहते थे, अब हम घर को महसूस करते हैं।”

सूर्यकांत जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “चलो, अब यह ड्रामा बंद करो। दिवाली है। और हां नमन, अगले महीने से किराया माफ़, लेकिन…”

“लेकिन क्या पापा?” नमन ने डरते हुए पूछा।

“लेकिन घर का इंटरनेट बिल तू भरेगा। और अंशुल, बिजली का बिल तेरा। ताकि तुम्हें याद रहे कि पंखा चलाने में पैसे लगते हैं,” सूर्यकांत जी ने हंसते हुए कहा।

पूरा घर हंसी और आंसुओं में डूब गया।

उस रात नमन ने अपना सामान वापस अनपैक (unpack) कर दिया। उसने महसूस किया कि मुफ्त की रोटियों में स्वाद हो सकता है, लेकिन अपनी कमाई से घर चलाने का सुकून कुछ और ही होता है। पिता ने उनसे किराया नहीं मांगा था, उन्होंने उनसे उनकी ‘मर्दानगी’ और ‘परिपक्वता’ मांगी थी, जो अब उन्हें मिल चुकी थी।

घर अब भी वही था, लेकिन उसमें रहने वाले लोग अब बदल चुके थे। मकान अब वाकई ‘घर’ बन गया था।

लेखक : मुकेश पटेल

error: Content is protected !!