अब मुझसे नहीं होती तुम्हारे बाबूजी की सेवा – अर्चना खंडेलवाल 

“समीर, मेरी बात ध्यान से सुनो। अब मुझसे नहीं होती तुम्हारे बाबूजी की सेवा। बस, बहुत हो गया।”

आवाज़ में न तो गुस्सा था, न ही कोई ऊँचा स्वर। एक अजीब सी ठंडी, सपाट और निर्णय लेने वाली दृढ़ता थी। समीर पलटा। सामने उसकी पत्नी, वंदना खड़ी थी। उसके चेहरे पर थकान की लकीरें थीं, लेकिन आँखों में एक ऐसा फैसला था जिसे बदलना मुश्किल लग रहा था।

समीर का माथा ठनका। “क्या मतलब? तुम कहना क्या चाहती हो वंदना? आज ऑफिस में वैसे ही बहुत तनाव था, अब तुम घर पर शुरू मत हो जाओ। बाबूजी को क्या हुआ? उन्होंने कुछ कहा तुम्हें?”

“उन्होंने कुछ नहीं कहा,” वंदना ने शांति से जवाब दिया। “वो कुछ कहते ही कहाँ हैं? पिछले छह महीने से जब से उन्हें लकवा (paralysis) मारा है, वो बस उस बिस्तर पर पड़े रहते हैं। लेकिन मैं… मैं अब थक गई हूँ समीर। मैं कोई मशीन नहीं हूँ। सुबह नहलाने से लेकर रात को करवट बदलवाने तक, सब मैं ही करूँ? मैं अब यह नहीं कर सकती।”

समीर को गुस्सा आ गया। “तो कौन करेगा? मैं? तुम्हें पता है मैं सुबह आठ बजे निकलता हूँ और रात को नौ बजे आता हूँ। मैं किसके लिए खट रहा हूँ? इसी घर के लिए न? और तुम घर पर रहती हो, अगर तुमने पिताजी की देखभाल कर ली तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा? शादी के वक्त तो बड़ी बड़ी बातें करती थी कि ये मेरे भी पिता समान हैं।”

“पिता समान हैं, पिता नहीं हैं,” वंदना ने कड़े शब्दों में कहा। “और तुम? तुम तो सगे बेटे हो। तुम्हारा क्या फ़र्ज़ है? सिर्फ पैसे कमाना और महीने के अंत में दवाइयों का बिल भरना? क्या बेटे का धर्म बस चेक साइन करने तक सीमित होता है?”

“देखो वंदना, मुझे यह इमोशनल ड्रामा नहीं चाहिए,” समीर चिल्लाया। “साफ़-साफ़ बताओ, क्या चाहिए? मेड चाहिए? नर्स चाहिए? मैं कल ही इंतजाम कर देता हूँ। पर यह ‘सेवा नहीं होगी’ वाला रट लगाना बंद करो।”

“मुझे मेड या नर्स नहीं चाहिए,” वंदना ने समीर की आँखों में सीधे देखते हुए कहा। “मुझे मेरी आज़ादी चाहिए। मैं कल सुबह अपनी माँ के घर जा रही हूँ। कुछ दिनों के लिए। पीछे से तुम जानो और तुम्हारे बाबूजी जाने।”

समीर सन्न रह गया। “तुम मुझे ब्लैकमेल कर रही हो? पिताजी की इस हालत में तुम घर छोड़कर जाओगी?”

“हाँ,” वंदना ने अलमारी से अपना सूटकेस निकाला। “क्योंकि शायद तभी तुम्हें समझ आएगा कि उस कमरे में एक ज़िंदा इंसान रहता है, कोई फर्नीचर नहीं।”

समीर ने वंदना को रोकने की बहुत कोशिश की, धमकाया, मनाया, लेकिन वंदना नहीं मानी। अगली सुबह, जब समीर की नींद खुली, तो वंदना जा चुकी थी। घर में एक अजीब सा सन्नाटा था।

रसोई में नाश्ता नहीं बना था। और सबसे बड़ी बात—बाबूजी के कमरे से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।

समीर घड़ी की तरफ देखा। सुबह के आठ बज रहे थे। यह बाबूजी की चाय और स्पंज-बाथ (सफाई) का समय था। समीर के पसीने छूटने लगे। उसे ऑफिस जाना था, एक ज़रूरी मीटिंग थी। उसने सोचा कि आज छुट्टी ले ले, पर बॉस नहीं मानेगा। उसने झुंझलाते हुए सोचा कि जल्दी से बाबूजी को चाय देकर और मेड को बुलाकर निकल जाएगा।

वह बाबूजी के कमरे में गया।

कमरे में दवाइयों और फिनाइल की एक मिली-जुली गंध थी। 70 वर्षीय दीनानाथ जी बिस्तर पर लेटे छत को घूर रहे थे। समीर को देखते ही उनकी आँखों में एक चमक आई, जो तुरंत ही एक सवाल में बदल गई—’वंदना कहाँ है?’

“बाबूजी, वंदना… वो मायके गई है। आज मैं हूँ,” समीर ने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा।

उसने बाबूजी को उठाने की कोशिश की। “चलिए, उठिए। चाय पीनी है न?”

लेकिन यह इतना आसान नहीं था। दीनानाथ जी का शरीर भारी और शिथिल था। समीर ने उन्हें खींचकर तकिए के सहारे बिठाने की कोशिश की, लेकिन उसका संतुलन बिगड़ गया और दीनानाथ जी एक तरफ लुढ़क गए। उनके मुंह से एक हल्की कराह निकली।

समीर घबरा गया। “सॉरी बाबूजी, सॉरी!” उसने बड़ी मुश्किल से उन्हें सीधा किया। उसका सूट पसीने से भीग गया था। उसे एहसास हुआ कि वंदना यह रोज़ अकेले कैसे करती थी।

जैसे-तैसे उसने चाय पिलाई। आधी चाय बाबूजी के कुर्ते पर गिर गई। समीर को गुस्सा आने लगा—बाबूजी पर नहीं, अपनी स्थिति पर, और वंदना पर। “कैसे छोड़कर जा सकती है वो?”

तभी बाबूजी ने इशारे से कुछ कहा। उन्हें वॉशरूम जाना था।

समीर के हाथ-पाँव फूल गए। यह काम उसने कभी नहीं किया था। उसे घिन नहीं आ रही थी, पर एक अजीब सी झिझक थी। वह अपने ही पिता के नग्न शरीर को कैसे देखेगा? कैसे साफ़ करेगा? लेकिन कोई चारा नहीं था।

अगले पंद्रह मिनट समीर के जीवन के सबसे लम्बे पंद्रह मिनट थे। उसने पिता को गोद में उठाया (और उसे हैरानी हुई कि पिता का वज़न कितना कम हो गया था, हड्डियों का ढांचा मात्र), व्हीलचेयर पर रखा, और बाथरूम ले गया।

पिता की ज़रुरत पूरी करवाते वक्त समीर ने देखा कि दीनानाथ जी की आँखें बंद थीं। वे शर्मिंदा थे। एक पिता अपने बेटे के सामने अपनी लाचारी पर शर्मिंदा था। समीर का दिल बैठ गया। उसने चुपचाप उन्हें साफ़ किया, कपड़े बदलवाए और वापस बिस्तर पर लिटाया।

समीर जब कमरे से बाहर आया, तो वह हाँफ रहा था। घड़ी में दस बज चुके थे। ऑफिस की मीटिंग छूट चुकी थी। उसने फ़ोन उठाया और स्विच ऑफ कर दिया।

दोपहर हुई। खाने का समय। समीर ने खिचड़ी बनाई। गीली, बेस्वाद। जब वह थाली लेकर कमरे में गया, तो दीनानाथ जी ने खाने से मना कर दिया।

“खाइये बाबूजी, मुझे भूख नहीं लगी है,” समीर ने चिढ़कर कहा। “प्लीज़ नखरे मत कीजिये। मैं वंदना नहीं हूँ जो दस तरह की मनुहार करूँ।”

दीनानाथ जी ने कांपते हाथ से समीर का हाथ पकड़ा। उनकी जुबान लकवे के कारण साफ़ नहीं थी, पर वे अकलाते हुए बोले, “ब… बेटा… तू… खा ले।”

समीर का गुस्सा पिघल गया। वह कुर्सी खींचकर पिता के पास बैठ गया।

“बाबूजी, आप मुझसे नाराज़ हैं न? मैं आपको समय नहीं दे पाता।”

दीनानाथ जी ने न में सिर हिलाया। वे बस समीर को देखे जा रहे थे। जैसे बरसों बाद उन्हें अपना बेटा नसीब हुआ हो।

शाम होते-होते समीर पूरी तरह थक चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वंदना यह सब कैसे मैनेज करती थी और फिर भी शाम को मुस्कुराते हुए उसका स्वागत करती थी। उसने सोचा, “वाकई, सेवा करना और पैसे भेजना दो अलग बातें हैं।”

रात को समीर पिता के कमरे में ही सो गया, यह सोचकर कि कहीं उन्हें रात में ज़रुरत न पड़े।

रात के करीब दो बजे, समीर की नींद खुली। उसे लगा कोई रो रहा है। उसने देखा, दीनानाथ जी सिसक रहे थे।

“क्या हुआ बाबूजी? दर्द हो रहा है?” समीर हड़बड़ाकर उठा।

दीनानाथ जी ने अपने सही हाथ से इशारे से तकिए के नीचे से कुछ निकालने को कहा। समीर ने देखा, वहां एक पुरानी फोटो एल्बम थी। दीनानाथ जी ने उसे खोलने का इशारा किया।

समीर ने पन्ने पलटे। उसमें समीर के बचपन की तस्वीरें थीं। समीर के पहले कदम, स्कूल का पहला दिन, साइकिल चलाते हुए समीर—और हर तस्वीर में दीनानाथ जी उसके पीछे खड़े थे, उसे थामे हुए।

दीनानाथ जी ने एक तस्वीर पर ऊँगली रखी। उसमें नन्हा समीर बीमार बिस्तर पर पड़ा था और दीनानाथ जी उसके पास बैठे रात भर जाग रहे थे।

“तु… तुझे… याद है?” दीनानाथ जी ने टूटी-फूटी आवाज़ में पूछा। “टाइफाइड… हुआ था। मैं… सोया नहीं था।”

समीर की आँखों से आंसू बह निकले। उसे याद आया। वह दस साल का था। पंद्रह दिन तक वह बिस्तर से उठ नहीं पाया था। उसके पिता ने ऑफिस से छुट्टी ले ली थी। वे उसे अपने हाथों से नहलाते थे, खिलाते थे, और उसे कहानियाँ सुनाते थे। तब पिता को न तो उसके गंदे कपड़े साफ़ करने में घिन आती थी, न ही उनकी रातों की नींद खराब होने का गुस्सा आता था।

“मैं भूल गया था बाबूजी,” समीर ने पिता का हाथ अपने गाल पर रखा। “मैं भूल गया था कि आपने मुझे पालने के लिए क्या-क्या किया। और आज… आज एक दिन आपकी सेवा करके मुझे लग रहा है कि मैंने पहाड़ उठा लिया।”

“नहीं बेटा,” दीनानाथ जी ने मुश्किल से मुस्कुराते हुए कहा। “वंदना… अच्छी है। बहुत… अच्छी है। पर… मुझे… तेरी… तेरी गंध… चाहिए थी।”

समीर सन्न रह गया। “मेरी गंध?”

“हाँ,” दीनानाथ जी ने आँखें मूँद लीं। “नर्स… वंदना… सब सेवा करते हैं। पर… बेटा… जब छूता है… तो लगता है… खून… खून को छू रहा है। रूह… जुड़ती है।”

समीर को वंदना की कड़वी बातें याद आईं—‘पिता समान हैं, पिता नहीं। तुम सगे बेटे हो।’

समीर को अब समझ आया। वंदना थकी नहीं थी। वंदना उसे मौका दे रही थी। वंदना ने यह नाटक इसलिए किया क्योंकि वह देख रही थी कि दीनानाथ जी को ‘दवा’ की नहीं, ‘बेटे’ की ज़रुरत थी। वंदना एक दीवार बन गई थी पिता और पुत्र के बीच, और वह दीवार उसने खुद गिरा दी थी, भले ही इसके लिए उसे ‘बुरी’ बनना पड़ा।

समीर फूट-फूट कर रो पड़ा। उसने अपना सर पिता की छाती पर रख दिया। दीनानाथ जी ने अपने कांपते हाथ से बेटे के बालों को सहलाया। उस रात उस कमरे में बीमारी की गंध नहीं, बल्कि रिश्तों के जुड़ने की खुशबू थी।

अगली सुबह, दरवाज़े की घंटी बजी।

समीर ने दरवाज़ा खोला। सामने वंदना खड़ी थी। उसके हाथ में सूटकेस नहीं था। वह शायद पास के किसी होटल में या सहेली के घर रुकी थी, मायके गई ही नहीं थी।

समीर उसे देखता रहा। वंदना की आँखों में सवाल था—’क्या तुम समझ पाए?’

समीर ने कुछ नहीं कहा। उसने वंदना को गले लगा लिया।

“थैंक यू,” समीर ने उसके कान में फुसफुसाया। “तुमने मुझे मेरी औकात दिखा दी, और मेरे पिता से मिलवा दिया।”

वंदना मुस्कुराई। “बाबूजी कैसे हैं?”

“ठीक हैं,” समीर ने कहा। “मैंने स्पंज-बाथ दे दिया है। अब तुम नाश्ता बनाओ, मैं उन्हें खिलाऊँगा। आज मैंने ऑफिस से ‘वर्क फ्रॉम होम’ लिया है।”

“और कल?” वंदना ने पूछा।

“कल से हम शिफ्ट्स बांटेंगे,” समीर ने दृढ़ता से कहा। “सुबह का काम मेरा, शाम का तुम्हारा। और रात को मैं उनके पास सोऊंगा। वो मेरे पिता हैं वंदना, सिर्फ तुम्हारी ज़िम्मेदारी नहीं।”

वंदना रसोई की तरफ बढ़ी, उसके चेहरे पर एक सुकून था। उसे पता था कि अब उसकी थकान कम हो जाएगी, शरीर की नहीं, बल्कि मन की थकान। क्योंकि अब उस घर में एक ‘बहू’ सेवा नहीं कर रही थी, बल्कि एक ‘परिवार’ साथ जी रहा था।

कमरे के अंदर, दीनानाथ जी खिड़की से बाहर देख रहे थे। उनके चेहरे पर बीमारी का पीलापन अब भी था, लेकिन आँखों में एक नई चमक थी। वह चमक थी—अपने बेटे को वापस पा लेने की। उन्हें पता चल गया था कि अब उनकी सेवा ‘बोझ’ मानकर नहीं, बल्कि ‘हक़’ मानकर की जाएगी।

उस दिन के बाद, समीर के घर में कभी यह वाक्य नहीं गूँजा कि “मुझसे सेवा नहीं होती।” क्योंकि सेवा वहाँ होती है जहाँ औपचारिकता हो, जहाँ प्रेम होता है, वहाँ बस ‘खयाल’ रखा जाता है। और खयाल रखने में थकान नहीं होती।

मूल लेखिका : अर्चना खंडेलवाल 

error: Content is protected !!