कहीं बहु ने ससुराल की बातें अपने मायके में जग-जाहिर कर दी तो??
रसोई के दरवाजे की ओट में खड़ी सुलोचना देवी की सांसें जैसे गले में ही अटक गई थीं। उनकी बहू, आकृति, फोन पर अपनी माँ से बात कर रही थी। आवाज़ धीमी थी, लेकिन सुलोचना देवी के कान चौकन्ने थे।
“हाँ माँ… यहाँ हालात वैसे नहीं हैं जैसे दिखते हैं। बहुत दिक्कत है। इनके पास तो…”
आकृति ने जैसे ही आहट सुनी, उसने बात अधूरी छोड़ी और फोन काट दिया। सुलोचना देवी जल्दी से वहाँ से हट गईं और अपने कमरे में जाकर धम्म से पलंग पर बैठ गईं। उनका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। माथे पर पसीने की बूंदें छलक आई थीं।
वही हुआ जिसका उन्हें डर था।
“कहीं बहू ने ससुराल की बातें अपने मायके में जग-जाहिर कर दीं तो??”
यह सवाल सुलोचना देवी को पिछले छह महीनों से, जब से आकृति ब्याह कर आई थी, अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।
सुलोचना देवी का परिवार, ‘शेखावत निवास’, शहर के सबसे पुराने और रईस परिवारों में गिना जाता था। हवेलीनुमा घर, पुराना रसूख और खानदानी शान-ओ-शौकत। बाहर से देखने वाले को यही लगता था कि इस घर में पैसों की बारिश होती है। लेकिन सच तो यह था कि यह हवेली अब एक दीमक लगे लकड़ी के ढांचे जैसी हो गई थी—बाहर से मज़बूत, अंदर से खोखली।
सुलोचना देवी के पति के गुज़रने के बाद, उनका बेटा विवान बिज़नेस संभाल नहीं पाया था। गलत फैसलों और पुराने कर्ज़ ने उनकी कमर तोड़ दी थी। स्थिति यह थी कि घर के रोज़मर्रा के खर्च चलाने के लिए भी उन्हें पुराने ज़ेवर गिरवी रखने पड़ रहे थे। लेकिन यह बात ‘शेखावत खानदान’ की इज़्ज़त का सवाल थी। दुनिया की नज़रों में वे आज भी ‘राजा’ थे, और सुलोचना देवी इस भ्रम को टूटने नहीं देना चाहती थीं।
आकृति एक मध्यमवर्गीय लेकिन संपन्न व्यापारी परिवार की बेटी थी। शादी के वक़्त सुलोचना देवी ने बहुत होशियारी से अपने आर्थिक तंगी को छिपा लिया था। विवान की महंगी गाड़ी (जो बैंक लोन पर थी) और हवेली की चकाचौंध ने आकृति के परिवार को भ्रम में रखा था।
लेकिन शादी के बाद, घर की हकीकत बहू से कितने दिन छिपती? आकृति समझदार थी। उसने देखा था कि कैसे डाइनिंग टेबल पर चांदी के बर्तनों में खाना परोसा जाता है, लेकिन खाने में अक्सर सिर्फ दाल और एक सब्ज़ी होती है। उसने देखा था कि विवान अक्सर रात को देर तक जागकर हिसाब-किताब में उलझा रहता है और चिड़चिड़ा रहता है। उसने देखा था कि सुलोचना देवी बहाने बनाकर नई साड़ी या चीज़ें लेने से मना कर देती हैं।
सुलोचना देवी को सबसे ज़्यादा डर इसी बात का था। अगर आकृति ने अपने अमीर पिता को बता दिया कि उसकी ससुराल वाले असल में ‘कंगाल’ हैं, तो क्या होगा? आकृति के पिता क्या सोचेंगे? समाज में उनकी नाक कट जाएगी। वे सोचेंगे कि हमने उनकी बेटी को धोखे से ब्याहा है। और अगर आकृति ने यह सब बताकर उनसे मदद मांग ली, तो यह तो डूब मरने वाली बात होगी। ‘शेखावत खानदान’ अपनी बहू के मायके से भीख लेगा? यह अपमान सुलोचना देवी जीते जी बर्दाश्त नहीं कर सकती थीं।
आज आकृति की वो अधूरी बात सुनकर सुलोचना देवी का शक यकीन में बदल गया।
“इनके पास तो…” आगे उसने ज़रूर यही कहा होगा कि “इनके पास तो फूटी कौड़ी नहीं है।”
रात के खाने पर सन्नाटा पसरा हुआ था। विवान चुपचाप खाना खा रहा था। आकृति ने सुलोचना देवी की तरफ देखा।
“माँजी, पापा का फोन आया था,” आकृति ने सहज भाव से कहा।
सुलोचना देवी का निवाला हाथ में ही रुक गया। विवान ने भी सिर उठाकर पत्नी को देखा।
“वो… वो कल आ रहे हैं। आपसे और विवान से मिलने,” आकृति ने बताया।
सुलोचना देवी के चेहरे का रंग उड़ गया। कल? इतनी जल्दी? ज़रूर आकृति ने सब बता दिया है। अब उसके पिता आएँगे और उलाहना देंगे। शायद अपनी बेटी को वापस ले जाने की बात करेंगे। या फिर कोई चेक फेंककर मारेंगे और कहेंगे कि ‘यह लो, अपना कर्ज़ चुकाओ और मेरी बेटी को खुश रखो’।
“कल क्यों? सब खैरियत तो है?” सुलोचना देवी ने मुश्किल से गले से आवाज़ निकाली।
“हाँ माँजी, बस शहर आ रहे थे किसी काम से, तो सोचा मिलते जाएं,” आकृति ने मुस्कुराते हुए कहा।
उस रात सुलोचना देवी सो नहीं पाईं। उन्हें अपनी पूरी इज़्ज़त रेत की तरह फिसलती हुई महसूस हो रही थी। उन्होंने विवान से बात की।
“विवान, मुझे लगता है आकृति ने सब बता दिया है। कल उसके पिता ज़रूर कोई तमाशा करेंगे। हमारी पोल खुल जाएगी।”
विवान ने हताशा में सिर हिलाया। “माँ, अब जो होगा देखा जाएगा। वैसे भी मैं थक गया हूँ यह मुखौटा पहनकर। कब तक हम रईस होने का नाटक करेंगे?”
“जब तक मेरी सांस है!” सुलोचना देवी ने दृढ़ता से कहा। “कल उनके सामने हमारी कमज़ोरी ज़ाहिर नहीं होनी चाहिए। मैं अपने कंगन बेच दूँगी, लेकिन कल खाने की मेज़ पर कोई कमी नहीं होनी चाहिए। उन्हें लगना चाहिए कि उनकी बेटी राज कर रही है।”
अगले दिन सुबह से ही घर में अफरा-तफरी थी। सुलोचना देवी ने अपने आखिरी बचे हुए सोने के कंगन सुबह-सुबह सोनार के पास भिजवा दिए और उससे आए पैसों से बेहतरीन पकवान, मेवे और फल मंगवाए। घर को सजाया गया। पुराने फीके पड़ चुके पर्दों को बदल दिया गया।
दोपहर को आकृति के पिता, मिस्टर खन्ना, अपनी बड़ी सी कार में आए।
सुलोचना देवी ने चेहरे पर बनावटी मुस्कान ओढ़कर उनका स्वागत किया। “आइए समधी जी, आइए। बहुत खुशी हुई आप आए।”
मिस्टर खन्ना खुशमिज़ाज़ इंसान थे। वे सोफे पर बैठे और इधर-उधर देखा।
“वाह, हवेली तो आपकी बहुत शानदार है। पुरानी चीज़ों की बात ही कुछ और होती है,” उन्होंने कहा।
सुलोचना देवी का दिल धक-धक कर रहा था। वे हर पल उस ‘बात’ का इंतज़ार कर रही थीं। कब वो कहेंगे कि ‘सुना है आपकी हालत खस्ता है’।
खाने की मेज़ पर छप्पन भोग सजे थे। विवान और सुलोचना देवी ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
खाना खाते हुए मिस्टर खन्ना ने अचानक विवान से कहा, “बेटा विवान, मैंने सुना है तुम टेक्सटाइल (कपड़े) के बिज़नेस में कुछ नया करना चाहते हो?”
विवान चौंक गया। “जी… जी अंकल। बस सोच रहा था।”
“देखो बेटा,” मिस्टर खन्ना ने संजीदगी से कहा, “मेरे पास एक बहुत बड़ा एक्सपोर्ट ऑर्डर आया है। यूरोप से। लेकिन दिक्कत यह है कि मेरी फैक्ट्री में अभी कैपिसिटी नहीं है। और मुझे किसी भरोसेमंद आदमी की तलाश थी जो क्वॉलिटी से समझौता न करे। आकृति बता रही थी कि तुम्हें कपड़ों की बहुत अच्छी परख है और तुम्हारा पुराना नेटवर्क बहुत मज़बूत है।”
सुलोचना देवी ने आकृति की तरफ देखा। आकृति चुपचाप खाना परोस रही थी।
“मैं चाहता हूँ कि तुम यह ऑर्डर संभालो,” मिस्टर खन्ना ने कहा। “इसमें इन्वेस्टमेंट मेरी होगी, काम तुम्हारा होगा। और प्रॉफिट हम फिफ्टी-फिफ्टी बांट लेंगे। यह कोई मदद नहीं है, यह बिज़नेस पार्टनरशिप है। क्योंकि मुझे पता है कि ‘शेखावत’ नाम का बाज़ार में आज भी सिक्का चलता है, बस उसे सही दिशा की ज़रूरत है।”
विवान और सुलोचना देवी सन्न रह गए। यह मदद थी, लेकिन ‘भीख’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘सम्मान’ के रूप में।
“लेकिन… आपको कैसे पता कि मुझे ज़रूरत…” विवान हकलाया।
मिस्टर खन्ना हंसे। “अरे, ज़रूरत किसे नहीं होती? बिज़नेस में उतार-चढ़ाव तो आते रहते हैं। वो तो आकृति बता रही थी कि तुम आजकल नए वेंचर की तलाश में हो। उसने कहा कि ‘पापा, विवान में टैलेंट बहुत है, बस सही मौके का इंतज़ार है’। तो मैंने सोचा, घर की बात घर में ही रहे तो अच्छा है।”
सुलोचना देवी की आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने जल्दी से पानी पीने के बहाने चेहरा घुमा लिया।
जब मिस्टर खन्ना चले गए, तो घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। विवान के कंधे, जो कल तक झुके हुए थे, आज उम्मीद से सीधे हो गए थे। उसे एक बड़ा प्रोजेक्ट मिल गया था, वह भी बिना अपनी इज़्ज़त गंवाए।
सुलोचना देवी अपने कमरे में बैठी थीं। आकृति चाय लेकर आई।
“माँजी, चाय।”
सुलोचना देवी ने आकृति को पास बुलाया।
“बैठो बहू।”
आकृति बैठ गई। सुलोचना देवी ने उसकी आँखों में देखा।
“तूने अपने पिता को सब बता दिया न?”
आकृति ने नज़रें झुका लीं। “माँजी, मैंने कोई शिकायत नहीं की थी। मैंने बस… मैंने बस एक समाधान ढूँढने की कोशिश की।”
“तूने क्या कहा उनसे?” सुलोचना देवी ने पूछा।
आकृति ने धीरे से कहा, “मैंने पापा से कहा कि विवान बहुत मेहनती हैं, लेकिन मार्केट की मंदी की वजह से उनका टैलेंट ज़ाया हो रहा है। मैंने उनसे कहा कि ससुराल में सब बहुत अच्छे हैं, मुझे बहुत प्यार करते हैं, लेकिन विवान की परेशानी मुझसे देखी नहीं जाती। मैंने पापा से झूठ बोला कि विवान उनसे मदद मांगने में हिचकिचा रहे हैं क्योंकि उनका स्वाभिमान बहुत ऊँचा है। मैंने पापा से कहा कि अगर वो कोई बिज़नेस प्रपोजल लेकर आएंगे, तो विवान मना नहीं करेंगे और उनकी मदद भी हो जाएगी।”
आकृति ने सुलोचना देवी का हाथ पकड़ा।
“माँजी, मैंने ससुराल की ‘कमज़ोरी’ ज़ाहिर नहीं की, मैंने ससुराल की ‘ताकत’ को सही जगह पहुँचाने का रास्ता बनाया। मायका सिर्फ शिकायतें करने की जगह नहीं होती। अगर मायका मज़बूत है, तो वो ससुराल की नींव को सहारा भी दे सकता है। और इसमें कोई शर्म की बात नहीं है। जब मैं इस घर की बहू बनी, तो यह घर मेरा हो गया। इसकी इज़्ज़त मेरी इज़्ज़त है। मैं कैसे देख सकती थी कि यह घर बिखर रहा है?”
सुलोचना देवी को वो फोन कॉल याद आया। “इनके पास तो…”
आकृति शायद कह रही होगी—”इनके पास तो अनुभव बहुत है, बस मौके की कमी है।”
सुलोचना देवी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। वे जिसे ‘घर का भेदी’ समझ रही थीं, वो असल में इस ढहते हुए किले की सबसे मज़बूत दीवार निकली थी। उन्होंने हमेशा सोचा था कि बहू के मायके वाले ‘दुश्मन’ होते हैं जो ससुराल की बुराई सुनने को बेताब रहते हैं। लेकिन आज आकृति ने साबित कर दिया था कि एक समझदार बहू दो परिवारों के बीच खाई नहीं खोदती, बल्कि पुल बनाती है।
उन्होंने देखा कि आकृति की कलाई सूनी थी।
“तेरे कंगन कहाँ हैं बहू?” सुलोचना देवी ने पूछा, हालाँकि उन्हें जवाब पता था।
“वो… वो पॉलिश के लिए दिए हैं,” आकृति ने झूठ बोला।
सुलोचना देवी जानती थीं कि आज के दावत के खर्च के लिए जो उनके कंगन कम पड़ गए थे, तो आकृति ने चुपके से अपने कंगन भी मिलाकर सोनार को भिजवा दिए होंगे, ताकि सास की नाक न कटे।
सुलोचना देवी उठीं। उन्होंने अपनी अलमारी खोली और उसमें से एक पुरानी, मखमली डिब्बी निकाली। उसमें खानदानी हीरों का हार था—वो आखिरी चीज़ जो उन्होंने सबसे बुरे वक़्त के लिए बचाकर रखी थी।
उन्होंने वो हार आकृति के गले में पहना दिया।
“माँजी, यह क्या? यह तो…”
“यह इस घर की ‘लक्ष्मी’ के लिए है,” सुलोचना देवी ने भर्राई आवाज़ में कहा। “मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैं डर गई थी कि तू हमारे राज़ खोल देगी, हमारी गरीबी का मज़ाक बनवाएगी। मैं भूल गई थी कि बेटी, चाहे वो बहू के रूप में ही क्यों न हो, कभी अपने पिता या पति का घर उजड़ते नहीं देख सकती।”
“तूने आज ससुराल की बातें जग-जाहिर नहीं कीं, तूने आज ससुराल का ‘मान’ जग-जाहिर किया है। तूने अपने पिता को यह नहीं बताया कि हम गरीब हैं, तूने बताया कि हम स्वाभिमानी हैं। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है?”
उस शाम, हवेली के पुराने झूमर की रोशनी थोड़ी मद्धम ज़रूर थी, लेकिन घर के लोगों के चेहरों पर जो सुकून था, वो किसी भी दौलत से ज़्यादा चमकदार था।
विवान और आकृति मिलकर नए प्रोजेक्ट की फाइल देख रहे थे, और सुलोचना देवी दूर बैठकर उन्हें निहार रही थीं। उनके मन से वह डर हमेशा के लिए निकल गया था। उन्हें समझ आ गया था कि अगर बहू समझदार हो, तो वह मायके को ‘अदालत’ नहीं, बल्कि ‘सहारा’ बना लेती है।
दीवारों का खोखलापन अब नहीं डरा रहा था, क्योंकि घर की नींव अब प्यार और विश्वास से भर गई थी।
मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश