सबसे बड़ा धन-परिवार – डाॅ संजु झा

विभा अपने अतीत का पुनरावलोकन करते हुए  मन-ही-मन सोचती है -“सचमुच सबसे बड़ा धन परिवार ही है।अगर उसे परिवार का साथ न मिला होता,तो पति मनीष की बेवफाई के बाद उसकी जिंदगी तिनकों की तरह हवा में उड़कर बिखर गई होती!”

विभा के टूटे हुए मन को उसके सास-ससुर,देवर-ननद ने बड़े ही प्यार से सॅंभाला था।उसकी सास उसे धैर्य का संबल प्रदान करते हुए कहती -“बहू! परिवार ही सबसे बड़ा धन है।यह तो एक तरह से साॅंसों का आरोह-अवरोह है,जो हर पल एहसास में समाऍं रहते हैं। जिंदगी में आऍं  दुख परिवार के प्यार के सहारे ही कट जाते हैं!”

घर के सन्नाटे को भंग करती हुई काॅलबेल की आवाज से एकाएक विभा स्मृतियों के कारागार से वर्त्तमान के धरातल पर आ गिरी।जब तक वह दरवाजे के पास पहुॅंचती,तब तक डाकिया लिफाफा  दरवाजे के अंदर डालकर जा चुका था।लिफाफे को देखकर पहचान की एक क्षीण-सी सुगंध उसकी नथुनों में समा गई,

परन्तु कुछ न समझ आने के कारण लिफाफे की ऊपरी लिखावट में ही मस्तिष्क उलझकर रह गया।उसने लिफाफे को वहीं रख दिया और रसोई में खाना बनाने चली गई।वैसे तो उसके दोनों बच्चे बड़े हो गए हैं,उनकी दुनियाॅं अब विस्तार लेने लगी है।बेटा विपुल इंजीनियरिंग फाइनल में है और बेटी सिया बारहवीं में। बच्चों के लौटने से पहले वह रसोई का काम खत्म कर लेना चाहती है।

विभा ने जल्दी -जल्दी काम खत्म किया और उत्सुकतावश आशंकित मन से लिफाफे को उठाकर खोल डाला। उसमें से निकली चिट्ठी को पढ़ते ही काले अक्षरों में लिखे गए शब्द रेत की भाॅंति उसकी ऑंखों के आगे बिखर गए।इतने वर्षों बाद पत्र में पति मनीष का करुण निवेदन -“विभा! मैं अपनी जिंदगी के अंतिम पल काट रहा हूॅं।

मेरी जिंदगी के कुछ ही पल बचे हुए हैं।गुजरे वक्त में मुझे एहसास हो गया कि परिवार को धोखा देकर कोई भी खुश नहीं रह सकता है, क्योंकि परिवार से बड़ा कोई धन नहीं होता है। कृपया!एक बार तुम बच्चों को लेकर आ जाओ।अपने परिवार से मिलकर और अपने गुनाहों की माफी माॅंगकर मैं सुकून से मुक्ति चाहता हूॅं!”

पत्र पढ़ते ही विभा की ऑंखों से अचानक ऑंसुओं की रसधार बह निकली। वर्षों से रूके ऑंसू बाॅंध तोड़कर उन्मुक्त बह निकले,मानो उसकी वर्षों की साधना किसी भी क्षण उफनती नदी की तरह बह जाएगी और वह बच्चों से भी बेसहारा होकर अकेलेपन के दंश को झेलने के लिए मजबूर हो जाएगी!पत्र पढ़कर उसकी उठती-गिरती साॅंसें किसी सिंह के मुख में फॅंसे

मृगशावक की भाॅंति छटपटा रहीं थीं।उसके बच्चे तो पिता का नाम सुनना ही नहीं चाहते हैं।उसे समझ में नहीं आ रहा है कि किस प्रकार वह अपने छोटे -से परिवार को एकजुट रखे?उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि उसके चारों ओर दमघोंटू वातावरण उपस्थित हो गया हो।केवल उसकी धड़कनों की तेज गति ही उसे जिंदा होने का एहसास करा रही थी।

सचमुच एक पत्नी का प्रेम भी विचित्र होता है,जिस पति का नाम उसने अपनी जिंदगी की किताब से वर्षों पूर्व फाड़ दिया था,आज उसी का पत्र पढ़कर वह व्याकुल होकर छटपटा उठी। पत्र को हाथ में लिए कितनी ही कटु और मधुर यादें जीवित होकर चलचित्र की तरह ऑंखों के सामने घूमने लगीं।

विभा का मायके में भरा-पूरा  परिवार था।उसका  जीवन परिवार के प्यार से सुवासित था। ग्रेजुएशन करते ही माता-पिता की पसन्द से उसकी शादी मनीष से हो गई।मनीष देखने में आकर्षक और सरकारी नौकरी प्राप्त नवयुवक थे।विभा मन में ढ़ेरों अरमान सॅंजोए ससुराल पहुॅंच गई।

साधारण रुप-रंग की विभा इतने खुबसूरत पति को पाकर निहाल हो उठी। ससुराल में सास-ससुर, देवर-ननद ने अपने प्यार और सम्मान से उसे घर में बड़ी बहू का रुतबा दिया।ऐसे परिवार को पाकर वह खुद को सौभाग्यशाली समझने लगी।

उसके परिवार में सभी सदस्य एक-दूसरे का मान-सम्मान करते।सभी के साथ पति की बेपनाह मुहब्बत ने उसे मायका भूलने पर मजबूर कर दिया।उसके मन में गाना मचलता रहता’मैं तो भूल चली बाबुल का देश,पिया का घर मुझे प्यारा लगे।’

समय के साथ वह दो बच्चों बेटा विपुल और बेटी सिया की माॅं बन गई। ससुराल के परिवार में वह इतनी रच-बस गई कि उसे मायके जाने की फुर्सत ही नहीं मिलती।

वह मायका विशेष अवसरों पर ही दो-चार दिनों के लिए जा पाती। इन्हीं दो-चार दिनों में ही उसके पति विरह से व्याकुल हो उठते। सास-ससुर, देवर-ननद का भी उसके बिना घर में दिल नहीं लगता।सभी उससे जल्दी आने की गुहार लगाते।इतने अच्छे परिवार पाकर वह खुद को भाग्यशाली समझती थी।उसकी सहेलियाॅं उसे छेड़ती हुई कहतीं -“विभा! ध्यान रखना, जीजाजी का अति प्यार और रोमांस कहीं तुम्हें ठग न लें?”

विभा भी मुस्कराते हुए अति विश्वास से कहती-“मेरे पति बहुत भोले  और सरल हैं।वे मुझे कभी भी धोखा नहीं दे सकतें ।”

विभा को क्या पता था कि एक दिन सब कुछ रेत की मानिंद उसके हाथों से फिसल जाएगा!अपनी गृहस्थी में डूबीं विभा को बिखराव की आहट का तनिक भी आभास नहीं था।

कुछ समय पश्चात् मनीष ने दफ्तर से आकर खुशी से अपने प्रमोशन की खबर सुनाई।खबर सुनते ही परिवार में सभी खुशी से चिल्ला उठे। परिवार के साथ खुशियाॅं मनाने से खुशी दुगुनी हो जाती है और ग़म बाॅंटने से आधा रह जाता है,इसी कारण तो मनुष्य की खुशियों का मूल स्रोत परिवार को ही माना गया है।विभा के परिवार ने मिलकर खुशियाॅं मनाईं, परन्तु उसके दिल्ली तबादले की बात सुनकर सभी एकाएक खामोश-से हो उठे।विभा ने भी एक दीर्घ श्वास ली,तत्क्षण उसकी मधुर कल्पना फुर्र से हवा में विलीन हो गई।

रात में विभा ने पति की बाॅंहों में सिमटते हुए कहा -“मनीष! मैं आपके वगैर एक पल भी नहीं रह सकती हूॅं। बच्चों के साथ मैं भी आपके साथ दिल्ली चलूॅंगी!”

मनीष ने उसे और करीब खींचते हुए कहा -“विभा! मैं भी तुमलोगों के वगैर नहीं रह सकता हूॅं, परन्तु पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुॅंह भी तो नहीं मोड़ सकता हूॅं।माॅं-पिताजी इस उम्र में अकेले कैसे रहेंगे?भाई की पढ़ाई अभी पूरी नहीं हुई है।बहन की भी शादी करनी है।सबसे बड़ी बात यह है कि बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहें हैं। बार-बार उनकी पढ़ाई में बाधा पहुॅंचाना ठीक नहीं है। मैं कोशिश करके फिर से यहाॅं पटना या आस-पास तबादला करवा लूॅंगा। उम्मीद है तब तक पारिवारिक जिम्मेदारियों को सॅंभालने में तुम मदद करोगी?”

विभा ने भी एक आज्ञाकारिणी पत्नी के समान पति की बातों को मानकर नम  ऑंखों से उसे विदा किया। आरंभ में तो मनीष एक-दो महीने पर आ जाता था। जाने पर उसे दिल्ली से बराबर प्रेम रस से सराबोर चिट्ठियाॅं भेजता था।उस समय तो चिट्ठियाॅं ही दिल की धड़कनों के समान होतीं थीं। चिट्ठी पढ़कर  पति के प्यार के समंदर में डूबकर उसे गम का एहसास नहीं होता था।ससुराल वाले उसकी जरूरतों का ख्याल रखते।वह भी उनका मान-सम्मान करती। परिवार के सहयोग से उसकी जिंदगी रफ्तार पकड़ रही थी।पाॅंच साल बीत चुके थे, परन्तु मनीष का वापस तबादला नहीं हुआ था। मनीष प्रत्येक बार तबादले को लेकर कोई -न-कोई बहाना बना देता।विगत वर्षों में उसकी ननद-देवर  की शादी हो चुकी थी।देवर रमेश पत्नी समेत नौकरी करने दूसरे शहर जा चुका था।अब अपने बच्चों और बूढ़े सास-ससुर की जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ चुकी थी।रमेश उसकी सहायता करने की भरसक कोशिशें करता, परन्तु दूर रहकर नहीं कर पाता। धीरे-धीरे मनीष परिवार के प्रति लापरवाह होता जा रहा था। माता-पिता के गुजरने पर आया था, परन्तु नौकरी में काम के बोझ का बहाना बनाकर जल्द ही निकल गया।

मनीष के व्यवहार से विभा के मन रुपी आकाश में आशंकाओं की बदली छाने लगी।एक दिन उसकी सहेली निशा,जो दिल्ली से आई थी,उसने विभा को खौलते लावे की तरह खबर सुनाते हुए कहा-“विभा! मैंने वहाॅं मनीष को एक औरत के साथ घूमते-फिरते देखा है!”

इस खबर को सुनते ही विभा सन्न रह गई। विश्वासघात के कारण क्रोध से उसके अंदर जलती हुई ज्वाला उबलने लगी।उसे अपने पति की वेवफाई पर विश्वास नहीं हो रहा था।उसने रो-रोकर अपने देवर से अपनी व्यथा सुनाई। रमेश ने उसे सांत्वना देते हुए कहा -“भाभी!लोगों मत  । हम दिल्ली जाकर असलियत पता करेंगे।”

विभा ने कुछ दिनों के लिए बच्चों को ननिहाल भेज दिया और दिल्ली जाकर सच्चाइयों की पता लगाई। एकाएक मनीष के घर में उसके साथ एक गोरी-चिट्टी लंबे कद की महिला सिंदूर लगाए खड़ी थी।पति के सानिध्य से चमकता चेहरा उसका मुॅंह चिढ़ा रहा था।वह भी तो उसी पति की सुहागन थी, परन्तु उसे छल-प्रपंच और रिझाने की कला कभी नहीं आई।

विभा ने जब खुद अपनी ऑंखों से ये सब देख लिया,तो उसकी आहत भावनाऍं दबी चिंगारी की भाॅंति सुलगने लगी। मनीष मुॅंह फेरकर अंदर जाने लगा।उसनेअवरुद्ध कंठ से भावावेग में पति का हाथ पकड़ लिया।पीड़ा से वह पसीने-पसीने हो उठी।उसके हाथ-पैर काॅंपने लगें।उसने हिम्मतकर अपने थरथराते हुए होंठों से कहा -” मनीष!मुझे बताओ  कि मेरी क्या ग़लती है?मेरे दोनों बच्चों का क्या कसूर है? मैं तुम्हारे इंतज़ार में विरह की अग्नि में झुलसती रही और तुम्हें इसके साथ गुलछरे उड़ाने में कोई शर्म नहीं आई?तुमने मेरे विश्वास को क्यों खंडित किया?”

मनीष के पास कोई जवाब नहीं था।वह इधर-उधर बगलें झाॅंकने लगा।उसी समय उसकी दूसरी पत्नी उसे खींचकर अंदर ले गई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।

उदास -सी विभा कुछ देर तक घर के बाहर बहुत बनी खड़ी रही।उसके भीतर बहुत कुछ दरक चुका था।।उसने जो दुनियाॅं बसाई थी,उसका तिनका-तिनका बिखर चुका था।उसके जीवन में दुखों की ऐसी ऑंधी आई कि एक ही झटके में सारी खुशियाॅं उसकी पहुॅंच से दूर हो गईं।पति की बेवफाई ने उसके उपवन जैसे जीवन को काॅंटों की सेज बना दिया।उसका दिल कर रहा था कि वह वहीं पर जोर-जोर से फूटकर रोऍं, परन्तु उसने कठोरता से खुद को सॅंभालने की कोशिश करने लगी।

देवर रमेश बुत बना बेबस-सा तमाशा देख रहा था।जब विभा का अपमान चरम पर पहुॅंच गया,तो रमेश ने उसे सॅंभालते हुए कहा -“भाभी!अब यहाॅं से चलो।इनकी ऑंखों पर वासना की पट्टी चढ़ चुकी है!इनके लिए सही-गलत का कोई पैमाना नहीं रह गया है।  इनके लिए  परिवार का कोई महत्त्व नहीं रह गया है!”

उस विषय परिस्थिति से उबारकर रमेश उसे वापस घर ले आया।उस घटना ने विभा की ज़िन्दगी को पूरी तरह बदल दिया।उसने अपनी जिंदगी से मनीष को सदा के लिए निकालकर फेंक दिया। सास-ससुर भी इस सदमे को अधिक दिन तक झेल नहीं सके, परन्तु उसके ससुर बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था  करके गए थे।उसने न तो कभी पति से तलाक माॅंगा और न ही पैसा।ससुर की संचित निधि और देवर के सहयोग से बच्चों का पालन -पोषण करने लगी।वक्त की अच्छी बात है कि बुरा हो या अच्छा रूकता नहीं है,सदैव‌ गतिशील रहता है। देखते-देखते बच्चे भी बड़े हो गए।बेटा नौकरी भी करने लगा।अब उसकी जिंदगी में ठहराव आने लगा।बढ़ती उम्र के साथ पति की स्मृतियों का बोझ लुप्तप्राय हो चुका था। बच्चों के साथ अपनी दुनियाॅं में मस्त थी। अचानक से आई चिट्ठी ने एक बार फिर से उसकी दुनियाॅं में हलचल मचाकर रख दी है। चिट्ठी पकड़े हुए अनायास ही उसकी ऑंखों के कोर गीले होने लगें।

अचानक से बेटे की आवाज ने उसका ध्यान भंग कर दिया।माॅं के कांतिहीन चेहरे को देखकर बेटे ने पूछा -” माॅं!आपकी तबीयत तो ठीक है न?”

विभा ने चिट्ठी बेटे की ओर बढ़ा दी। चिट्ठी पढ़ते समय बेटे के चेहरे का रंग पल-पल बदल रहा था।उसने क्रोध में चिट्ठी एक ओर फेंकते हुए कहा -” माॅं!जिस आदमी ने अपने परिवार की परवाह नहीं की। हमें मझधार में मरने के लिए छोड़ दिया।उस आदमी के बारे में सोचने की क्या जरूरत है?”

अतीत की कसैली यादें विभा को झकझोड़ रहीं थीं।वह धर्मसंकट में पड़ी थी।जिन्दगी के जिस अध्याय को विस्मृत कर दिया था,वहीं आज जीवंत हो उठा है।एक पति के रुप में तो मनीष को कब का भूल चुकी है, परन्तु मानवता के लिहाज से एक मरते हुए व्यक्ति की इच्छा पूरी करना उसका फर्ज और धर्म बनता है।उसने अपने अंदर साहस बटोरते हुए कहा -“बच्चों! उन्होंने जो भी किया,उसको विस्मृत नहीं किया जा सकता है, परन्तु सच्चाई यह है कि वे मेरे पति और तुम्हारे पिता हैं।एक बार उनसे मिलना हमारा फर्ज बनता है।हम कल उनके पास चल रहें हैं!”

आखिरकार विभा की भावनाओं की कद्र करते हुए दोनों बच्चे माॅं के साथ दिल्ली रवाना हो गए। वहाॅं पहुॅंचकर विभा ने देखा कि मनीष अस्थिपंजर मात्र रह गया है। उसने मन-ही-मन सोचा कि परिवार की कद्र न करनेवालों की यही हालत होती है! उन्हें देखकर मनीष ने बिस्तर से उठने की कोशिश की, परन्तु सफल नहीं हो सका। लेटे-लेटे मनीष ने विभा के हाथ पकड़ लिऍं और कहा -“विभा! मैं माफी माॅंगने के काबिल तो नहीं हूॅं, फिर भी माॅंगता हूॅं। मैंने तुम लोगों के साथ बहुत अन्याय किया है। दूसरी पत्नी की कैंसर से मौत के  बाद मुझे दिल से एहसास हुआ कि व्यक्ति के लिए परिवार ही सबसे बड़ा धन है। परिवार के बिना व्यक्ति अस्तित्वहीन बिन पैंदी के लोटे के समान जिन्दगी भर इधर-उधर लुढ़कता रहता है। बच्चों एक बार आकर मेरे गले लग जाओ।”

पिता की दर्द भरी करुण पुकार से दोनों बच्चे भाव-विह्वल हो उठे और जाकर गले लग गऍं। बच्चों के गले लगते ही मनीष के प्राण-पखेरु उड़ गए।

विभा नम ऑंखों से उसे श्रद्धांजलि देते हुए अपने बच्चों  से कहती है-“शायद तुम्हारे  पापा मेरे पास रहते तो ये दुर्गति नहीं होती। इसीलिए परिवार को सबसे बड़ा धन कहा गया है! 

विभा मनीष की गति-मुक्ति के बाद बच्चों के साथ वापस अपने शहर लौट आती है।

समाप्त।

लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)

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